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एक तरफ जलवायु परिवर्तन के चलते, दुनिया महाविनाश

by Samta Marg
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एक तरफ जलवायु परिवर्तन के चलते, दुनिया महाविनाश की ओर बढ़ती चली जा रही है तो दूसरी तरफ गरीबी और अमीरी के बीच विषमता की खाई भी तेजी से गहराती चली जा रही है।
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस साल भारत के ऋतु चक्र में, यौवन की मादकता के संदेशवाहक बसंत ऋतु के दस्तक देने की संभावना कम हो गई है तो हिमालय से निकलने वाली भारत की नदियों के समय से पहले ही सूख जाने की आहट भी सुनाई देने लगी है।गर्मी इस बार आधे साल तक भारत को तपाने वाली है।जंगलों में आग लगने की बढ़ती घटनाओं ने भी खतरे का बिगुल बजा ही दिया है।
दूसरी तरफ पिछले चार सालों में दुनिया के 5सबसे अमीर पूंजीपतियों की संपत्ति दोगुनी से भी जादा हो गई है तो दुनिया के 500 करोड़ लोग पहले से भी जादा गरीब हो गए हैं।
आर्थिक विशेषज्ञों की भविष्यवाणी तो ये भी है कि अगर विषमता की खाई का गहराना इसी रफ्तार से जारी रहा तो गरीबी आने वाले229सालों में भी कम नहीं होने वाली है।
बढ़ती बेरोजगारी में ए आई(बनावटी बुद्धिमत्ता)का योगदान बढ़ता जा रहा है जो हाथों के श्रम को छीन लेगा और इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भारत को ही भुगतना पड़ेगा।आसार तो अभी से नजर आने लगे हैं।
लेकिन दुखद विडंबना तो ये है कि तकनीकी कौशल के पूंजीवादी हथियारों से घायल पर्यावरण और विषमता के अंतर्संबंधों से बेखबर भारत के हिन्दूराष्ट्रवादी हुक्मरान इन दिनों, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रहनुमाई में, रामलला की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा के मीडियाई ढोल नगाड़ों से भारत के चप्पे चप्पे को गुंजायमान करके, महाविनाश के मृत्युनाद को अनसुना करने के काम को ही सच्ची देशभक्ति के रूप में परिभाषित करने से बाज नहीं आ रहे हैं।
बकौल दुष्यंत:-
मैं इन बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ?
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं????

–विनोद कोचर

विनोद कोचर

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