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गांधी की मीराबेन

by Samta Marg
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गांधी की मीराबेन
 दत्तप्रसाद दाभोलकर

महात्मा गांधी के बेहद करीबी लोगों में मीराबेन प्रमुख हैं। प्रस्तुत है, उन पर अनिल काररवानिस की लिखी मराठी पुस्तक ‘मीराबेन-आत्म्याच्या शोधात’ पर दत्तप्रसाद दाभोलकर की समीक्षा। ‘सप्रेस’ के लिए इसका हिन्दी अनुवाद अरूण डिके ने किया है। – संपादक


 

 

गांधीजी

 

के जीवन और तत्व-ज्ञान से प्रभावित होकर दुनिया भर के कई लोग उनसे जुड़े जिनमें स्त्रियों की संख्या ज्यादा थी। उनमें सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति थीं, मीराबेन। उनका और गांधीजी का आपसी भावनात्मक रिश्ता अद्भुत है। मीराबेन यानी अंग्रेज कन्या मॅडलिन स्लैड। अंग्रेजी साम्राज्य की सर्वशक्तिमान ‘नेवी’ में सर्वोच्च कमांडर थे, एडमांट स्लैड। इन्हीं की लाडली बेटी थी, मॅडलिन।

हम अपनी परिकथाओं में जिस विलासिता के बारे में पढ़ते हैं उसी ऐशो-आराम की जिंदगी मॅडलिन जी रही थी। किशोरावस्था छोड़ जब उसने जवानी में कदम रखा तब वो बीथोवन के संगीत में आकंठ डूबी थी। बीथोवन का संगीत गहरी, गूढ़ और अंधेरी गुफा में ले जाकर अपनी अंतरात्मा खोजने को बाध्य कर देता है।

मॅडलिन को भी यह महसूस हुआ। उन दिनों फ्रांसीसी दार्शनिक, लेखक रोम्यां रोलां का बीथोवन की जीवनी पर आधारित ग्यारह खंडों में प्रकाशित उपन्यास ‘जिन-ख्रिस्टॉफ’ मॅडलिन हाथ लगा और फिर उसकी रोम्यां रोलां से मुलाकातें शुरू हो गईं।

रोम्यां रोलां ने एक दिन मॅडलिन से कहा कि संगीत को तुम केवल एक माध्यम समझ रही हो, जबकि तुम्हारा उद्देश्य अपनी अंतरात्मा को खोजने का मार्ग होना चाहिए। मैंने गांधी पर लिखी एक किताब पढ़ी है।

आज ईसा मसीह फिर से मानव के रूप में पृथ्वी पर विचर रहा है, यह तुम्हें देखना हो तो गांधी से मिलो।

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मॅडलिन ने सोचा गांधी से मिलने, उनके आश्रम में रहने के पहले मुझे अपने आपको उसके लिए ढालना होगा। एक साल तक यह कन्या शराब, मांसाहार बंदकर कठोर ब्रम्हचर्य व्रत का पालन करती है।

जमीन पर सोना, केवल आध्यात्मिक साहित्य ही पढ़ना, दिन में दो बार तकली से सूत कातना सब करती है। तब कहीं जाकर गांधी उसे आश्रम में प्रवेश देते हैं। आश्रम का जीवन तो इससे भी ज्यादा कठोर है, यह उसे वहाँ जाकर पता चलता है, मगर वह उसका पालन करती है।

गांधीजी का भोजन, उनकी समय की पाबंदी, दोपहर की विश्रांति, उनके नहाने के लिए लगने वाला धूप का कुनकुना पानी-यह सब मीराबेन के जिम्मे रहता है। जिस तरह माँ अपने बेटे का ख्याल रखती है, वैसा।

मीराबेन का यह आत्मचरित्र अपने लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि ‘नमक सत्याग्रह’ से लेकर भारत-विभाजन और उसके कारण गांधीजी की असहाय छटपटाहट, आसपास क्या हो रहा है इस पर मीराबेन की टिप्पणियाँ आज भी हम तक पहुँची नहीं हैं। इस पुस्तक की केवल दो घटनाओं का मैं जिक्र करूंगा।

नई तकनीक और पिछड़ती हुई भाषा

भगतसिंह की फांसी पर पूरा देश क्रोध से उबल रहा था। भगतसिंह को फांसी मत दीजिए, इस आशय का गांधीजी ने वाइसराय को पत्र लिखा था। गांधीजी और वाइसराय लार्ड इर्विन के बीच जो बैठक होने वाली थी उसमें शायद यह प्रस्ताव पास होना था कि भगतसिंह की फांसी रुकवा दी जाए, लेकिन कराची जाने के लिए गांधीजी जब ट्रेन पर चढ़ रहे थे तभी पता चला कि भगतसिंह और उनके साथियों को फांसी पर लटका दिया गया है।

जिन लोगों ने भगतसिंह की फांसी रुकवाने के लिए रत्ती भर कोशिश नहीं की, उन्होंने अफवाह फैलाई कि भगतसिंह की फांसी रुकवाने के लिए गांधीजी ने कुछ नहीं किया। रात में सुकुर स्टेशन पर जब गाड़ी रूकी, तब संतप्त युवा लाठियाँ लेकर गांधीजी के डिब्बे में चढ़ने की कोशिश कर रहे थे। गांधीजी सो रहे थे।

उनके साथ डिब्बे में मीराबेन और दो साथी थे। उन्होंने सभी दरवाजे, खिड़कियाँ बंद कर ली थीं। गाड़ी चलने लगी थी, फिर भी कांच को अपने सिर से फोड एक युवक खून में लथपथ अंदर घुसा।

26 अगस्त को वाइसराय से चर्चा कर गांधीजी ने ‘गोलमेज परिषद’ में जाने का तय किया। 27 अगस्त को मीराबेन को गांधीजी का तार मिला कि जहाज 29 अगस्त को रवाना होने वाला है। मीराबेन, महादेव भाई और अन्य साथियों ने गांधीजी को बताया कि 4-5 बक्सों में आवश्यक चीजें भर ली हैं। गांधीजी ने कहा कि केवल दो बक्से पर्याप्त हैं, बाकी सब नाव में उतार दो, नहीं तो मुझे उतार देना।

 

लंदन में गांधीजी की दिनचर्या और अर्ध-नग्न पोषाक वैसी ही थी। परिषद की बैठक से वे रात एक बजे लौटते और अलार्म लगाकर सुबह तीन बजे सबको उठाकर प्रार्थना प्रारंभ कर देते। लंदन में गांधी जहां भी जाते, उन्‍हें देखने जनता की जो भीड़ इकट्ठी होती उसे देखकर सादी पोषाक में गांधी के लिए भेजे गए अंगरक्षक भी चकित थे। मॅडलिन लिखती हैं हम राजघराने में रहने के आदी थे, लेकिन ऐसा कभी नहीं देखा।


पोप ने उन्हें वेटिकन आमंत्रित किया और गांधीजी ने उसे स्वीकार कर लिया। इटली के तानाशाह मुसोलिनी ने भी उन्हें बुलाया और गांधीजी उनसे भी मिले। पांच दिन गांधीजी रोम्यां रोलां के साथ थे। रोम्यां रोलां ने अपने मित्रों को लिखा कि उन दिनों यदि आप यहाँ होते तो आपको पता चलता कि गांधी ही आध्यात्मिक शक्ति हैं। गांधीजी कहते थे कि मैं अब बदल गया हूँ। पहले मैं परमेश्वर को ही सत्य का स्वरूप मानता था, लेकिन अब मुझे पता चला है कि सत्य ही परमेश्वर है।

स्वतन्त्रता आंदोलन में अंग्रेजों का दमन-चक्र प्रारंभ हो चुका था, सभी नेता जेल में थे। भूमिगत होकर मीराबेन अखबारों की खबरें भेजकर बताती कि वस्तुस्थिति क्या है। उन्हें आर्थर-रोड़ कारावास में एक साल के लिए बंद किया गया था। उनके आसपास वेश्याएं और खूनी महिलाऐं रहती थी। जब वे जेल से छूटीं तो गांधीजी ने उन्हें सलाह दी कि तुम वापिस इंग्लेंड जाओ और वहाँ के अखबारों को सच्ची घटनाऐं बताओ। वे इंग्लेंड जाती हैं और भाषणों के जरिये जनता से बात करती हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल और अमेरिका के राष्ट्रपति रूझवेल्ट की पत्नी से मिलती हैं।

जब वापिस आती हैं तब उन्हें पता चलता हैं कि गांधीजी, कस्तूरबा और महादेव देसाई को आगाखान पैलेस में नजरबंद कर रखा है। कस्तूरबा और महादेव देसाई की मृत्यु के बाद मीराबेन गांधीजी को सांत्वना देती हैं। विभाजन का दुख और गांधीजी की हत्या पर बहुत संयत शब्दों में मीराबेन ने लिखा है। उनका और गांधीजी का पत्राचार भी इस पुस्तक में है। बानगी के लिए गांधीजी बोरसाड में है वहाँ का मौसम बहुत खराब चल रहा है। ‘तुम अब सेवाग्राम क्यूं नहीं जाती,’ कहकर गांधीजी उस पर झुंझलाते हैं, जिस पर नाराज होकर वे चली जाती हैं।

उन्हें गांधीजी का पत्र मिलता है –मीरा, मैं जब चरखा चलाता हूँ तो हर समय तुम मेरे मन में रहती हो। मगर कोई इलाज नहीं। एक बात ध्यान रखना, सारा सुख और ऐश्वर्य छोड़कर तुम मेरी सेवा करने यहाँ नहीं आई हो, मैंने जिन जीवन मूल्यों को अंगीकार किया है उसे आत्मसात करने आई हो। जब मैंने देखा कि सारा समय तुम मेरी सेवा में लगी रहती हो तब मुझे लगा कि मैं तुम्हारा दुरूपयोग कर रहा हूँ। इसलिए मैं जरा-जरा सी बात पर तुमसे नाराज हो जाता हूँ। तुम्हारी सेवा स्वीकारते समय मुझे लगा मेरी यह अग्नि-परीक्षा है।’

मीराबेन जब कारावास में थी तब उन्हें दो विकल्प दिए गए थे – पहला, हफ्ते में कोई भी व्यक्ति एक बार मिलने आ सकता है। दूसरा, हफ्ते में केवल एक पत्र लिख सकती हो। मीराबेन दूसरा विकल्प चुनती हैं। उन्हें भेजे पत्र में गांधी लिखते हैं, स्वयं को खोजने के लिए कारावास जैसी कोई जगह नहीं है। तुम्हें बाइबल और ईसा मसीह तो मालूम हैं, अब कुरान और अमीर अली का ‘स्पिरिट ऑफ इस्लाम’ पढ़ लेना। वेद, महाभारत, रामायण, उपनिषद पढ़ लेना, तब तुम्हें हिन्दू तत्व-ज्ञान की अंतरंग समझ होगी।

मीराबेन के आत्मचरित्र का एक और उदाहरण हमारी आंखें खोलने वाला है। ‘तुम्हें यदि ईसा मसीह को जानना हो तो गांधी से मिलो’ – कहने वाले रोम्यां रोलां जब ‘गोलमेज परिषद’ से लौटते समय गांधीजी के साथ पांच दिन रहे, तब उन्होंने मीराबेन से कहा, ‘बेटी, मुझे गांधी में विवेकानंद के अंश भी दिखे हैं।’ (सप्रेस)


 दत्तप्रसाद दाभोलकर ‘रबर टेक्नॉलाजी विशेषज्ञ’ और लेखक हैं। मूल मराठी लेखक अनिल काररवानिस (1985 ) बैंक के सेवा-निवृत्त अधिकारी हैं।


 

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