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दिल्ली की लोकायन संस्था के निमंत्रण पर

by Samta Marg
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     विनोद कोचर

साथी सुनील से मैं पहली बार तब मिला था जब दिल्ली की ” लोकायन “संस्था के निमंत्रण पर मैं लोकायन के लिए म.प्र.का संयोजक (कोऑर्डिनेटर) बनकर दिल्ली पहुंचा था|


सुनील उन दिनों जेएन यू में शिक्षा ग्रहण करने के साथ साथ “समता संगठन” में भी काफी सक्रिय थे|समता संगठन को,

मेरा लोकायन के लिए काम करना अरुचिकर लगता था|

मेरे राजनैतिक गुरु मधु लिमये को भी मेरा ये काम नापसंद था|

समता संगठन विदेशी धन के सहारे चलने वाली इस संस्था की नेकनीयति के प्रति सशंकित रहते थे|


मात्र6माह के अपने कार्यानुभव ने मुझे भी समता संगठन के इस विचार का ही न केवल, बल्कि इस विचार का भी समर्थक बना दिया कि लोकायन न केवल विदेशी धन से बल्कि विदेशी ज्ञान से भी चलने वाली संस्था है|

अपने अनुभवजनित ऐसे ही आरोप लिखित रूप से लगाकर,मैं लोकायन से इस्तीफा देकर अपने घर वापस आ गया था|


उसके बाद पत्रों, सम्मेलनों तथा “सामयिक वार्ता” के जरिये, मैं साथी सुनील,गोपाल राठी,अजय खरे और इन सबसे ऊपर,आदरणीय किशन पटनायक के संपर्क में कई सालों तक जुड़ा रहा|

अभी 2015 में फेसबुक से जुड़ने के बाद,पहली बार मुझे अपने एक मित्र से ज्ञात हुआ कि साथी सुनील अब हमारे बीच नहीं रहे|


मात्र 59 वर्ष की आयु में उनका बिछुड़ना बेहद दुखदायी तो है ही,इससे समाजवादी आंदोलन को भी भारी क्षति पहुंची है|


साथी सुनील अपने विचारों और लेखन के जरिये अपने देहांत के बाद भी हम सबको हमेशा प्रेरित करते रहते हैं,करते रहेंगे|


उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि!


बकौल शायर:-


ये फूल अपनी खुशबू की दाद पा न सका।
खिला जरूर, मगर खिलकर मुस्कुरा न सका।।

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