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मैं रह जाता हूँ मैं रह जाता हूँ। : परिचय दास

by Samta Marg
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।। मैं रह जाता हूँ ।।

मैं रह जाता हूँ।
ज़िंदगी की कामयाबी के रास्तों के बीच
जाते- न-जाते मैं रह जाता हूँ।
उनसे बात करनी हो
उनसे इसरार करना हो
उन्हें महसूस करना हो
खिलता फूल निहारना हो
मैं रह जाता हूँ।
किसी की चुप्पी  पढ़नी हो
दो डग के लिए शाबाशी देनी हो
जूठे पानी को अमृत बनाना हो
हृदय में उपनिषद खोजना हो
मैं रह जाता हूँ।
किसी की गलतियों को दिल लगाना हो
चकाचौंध में भी सुकून पाना हो
रोशनी के गलियारे में भटकना हो
अँधेरे-उजाले की धूपछाहीं कशमकश में
मैं रह जाता हूँ।
धोखों के बीच सलाहियत
आदमीयत के नक़ाब में खूँरेजी
दोस्ती की बुनियाद पर दुश्मनी
ताक़त की बदनीयती से अलग अकेला
मैं रह जाता हूँ ।
आवाज़ देता हूँ , वह सुनता नहीं
महज़ सुनाता है, सुनता नहीं
गरीब की हाय लेता है
हाक़िम है , पिघलता नहीं
बस , मैं रह जाता हूँ ।
आँखों की भाषा में एक समुद्र है
जो लहराता है थपेड़ों में भी
मैं उसे वापस बुलाना चाहता हूँ
नींद- अधनींद के बीच की कसक में
मैं रह जाता हूँ
मैं रह जाता हूँ ।।
परिचय दास

परिचय दास

 

 

 

 

 

 

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