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राष्ट्र निर्माता थे गांधीवादी डॉक्टर जय देव: योगेंद्र यादव

by Samta Marg
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यह राष्ट्र निर्माण क्या है? कैसे होता है? कौन करता है? डॉक्टर जय देव के देहांत और अम्बाला में उनकी स्मृति सभा में शामिल होने के बाद से मैं इन सवालों से उलझ रहा हूँ.

‘राष्ट्र निर्माण‘ जैसा शब्द हमारे मानस पटल पर बड़े राष्ट्रीय नेताओं की तस्वीर उभारता है. हमारे मन को दिल्ली या किसी बड़े शहर की ओर ले जाता है, किसी नेता, अफसर या किसी नामी गिरामी उद्योगपति की ओर लेकर जाता है. राष्ट्र निर्माण का ज़िक्र आने पर हम सरकार की बात सोचते हैं बड़ी राष्ट्रीय नीतियों की चर्चा करते हैं. ऐसा सोचना ग़लत नहीं है, लेकिन केवल यही सोचना ज़मीन पर हो रहे राष्ट्र निर्माण को हमारी नज़रों से ओझल कर देता है.

आज कल राष्ट्रवाद की छिछली समझ चल निकली है. अमरीका की तर्ज़ पर आजकल जो पैसा कमा ले उसे रोज़गार सृजक के नाम पर राष्ट्र निर्माता कह दिया जाता है. जो डिग्री देने की बड़ी दुकान खोल कर उसकी कमाई के सहारे बिज़नेस के साथ राजनीति का धंधा चलाये उसे शिक्षाविद और भविष्य निर्माता बता दिया जाता है. जो टीवी स्टूडियो में बैठकर पड़ोसियों को गाली दे और उनके ख़िलाफ़ जनता को भड़काये उसे राष्ट्रवादी का तमग़ा मिल जाता है. यह हमारे राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्र निर्माण के साथ एक भद्दा मज़ाक़ है.  

इनसे इतर कभी कभार हमारी नज़र उन सामाजिक संगठनो और आंदोलनो पर भी पड़ जाती है जो देश के भविष्य के लिए कुछ बड़ा काम कर रहे हैं. अब इस दायरे में भी बड़े एनजीओ और अंतर्राष्ट्रीय संगठन आ गये हैं जो मोटी तनख़्वाह देकर समाज सेवा करवाते हैं. उनके इलावा कुछ आंदोलन भी हैं जो स्वयंसेवा की परंपरा को बनाये रखते हुए अंतिम व्यक्ति के लिए कुछ कर गुजरने का संकल्प रखते हैं. इन संगठनों और आंदोलनों के बाहर भी हमारे देश में ऐसे लाखों व्यक्ति हैं जो बिना किसी सरकारी ग्रांट के, बिना किसी बड़े बैनर के और बिना किसी शोर शराबे के अनवरत कुछ निर्माण का काम करते जाते हैं. ऐसे “छोटे” कामों को जोड़ने से जो होता है वह बहुत बड़ा होता है, उसे राष्ट्र निर्माण कहना चाहिए.

ऐसे ही एक राष्ट्र निर्माता थे डॉक्टर जयदेव जिनका निधन 98 वर्ष की आयु में गत 15 नवंबर को अंबाला में हुआ। पिछले एक दशक से उनका आशीर्वाद मुझे मिला। लेकिन वे अपने बारे में इतने संकोची थे कि उनकी स्मृति सभा में ही उनके व्यक्तित्व के सभी आयामों को समझने का अवसर मिल सका। अंबाला के लोग उन्हें एक सफल व्यापारी, उद्योगपति, गांधीवादी और समाजसेवी के रूप में जानते रहे हैं।

लेकिन केवल समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण में फर्क है। किसी दुखियारे की मदद करना एक खूबसूरत मानवीय गुण है। लेकिन ऐसा दुःख हो ही न होने पाए उसकी व्यवस्था करना समाज सुधारक और राष्ट्र निर्माता का काम है। इस दीर्घकालिक मिशन के लिए समाज सेवा के साथ साथ जरूरी है संस्था निर्माण, चरित्र निर्माण और मूल्य का निर्माण। डॉक्टर जयदेव ने अपने लंबे और सार्थक जीवन में यह तीनों काम किए।

गुरुकुल कांगड़ी से चिकित्सा की डिग्री लिए डॉक्टर साहब के पास कोई पारिवारिक जायदाद नहीं थी। उन्होंने जो कुछ किया वो अपने दम पर और सहयोगियों की टीम के सहारे किया । पहले एक दवाखाना शुरू किया फिर दवाइयां का थोक व्यापार किया और उसे पूरे उत्तर भारत में फैलाया। कालांतर में उन्होंने अपने वैज्ञानिक बेटे के सहयोग से एडवांस्ड माइक्रोडिवाइसेज या MDI  नामक कंपनी बनाई जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक उत्पाद बनाती है और जिसका सालाना टर्नओवर अब 1000 करोड़ के करीब है। उन्होंने यह सब गांधीवादी रास्ते पर चलते हुए किया, मुनाफे के लिए कभी ईमान से समझौता नहीं किया। उन्होंने और उनके पूरे परिवार ने गांधीजी की ट्रस्टीशिप के सिद्धांत का अनुसरण करते हुए अपनी कमाई को अपने ऐशो आराम पर लुटाने की बजाय सादगी से जीवन जीते हुए समाज के लिए समर्पण के भाव से काम किए।

उनके मन में टीस थी की आजादी के बाद अंबाला शहर को तमाम सरकारों और नेताओं के द्वारा नजरअंदाज किया गया। इसलिए उन्होंने अंबाला में श्रेष्ठ संस्थाएं खड़ी करने का बीड़ा उठाया। अंबाला कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड अप्लाइड रिसर्च के माध्यम से ऐसी शैक्षणिक संस्था की बुनियाद डाली जिसने मैनेजमेंट कोटा के नाम पर पैसे वसूलने की बजाय केवल मेरिट पर दाखिले किए (जिसके चलते स्वयं उनकी नातिनी का प्रवेश कॉलेज में नहीं हो सका)। शिक्षा के नाम पर दुकानदारी के रिवाज से अलग हटते हुए यह कॉलेज आज भी अब तक 4000 विद्यार्थियों को शिक्षा दे चुका है। कुष्ठ रोगियों के लिए डॉक्टर साहब ने सरकारी मदद से एक गृह बनवाया जो पिछले 60 वर्षों से उनकी सेवा कर रहा है। मूक और बधिर विद्यार्थियों के लिए एक स्कूल बनाया। अब उनके परिवार ने मूक बधिर लोगों की साइन लैंग्वेज को आवाज में बदलने का नया सॉफ्टवेयर तैयार करने का बीड़ा उठा लिया है।

अंबाला में अच्छे अस्पताल की कमी को महसूस करते हुए उन्होंने रोटरी क्लब के अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर 100 बिस्तर वाले एक कैंसर और मल्टी स्पेशलिटी वाले अस्पताल की स्थापना की जो हर साल एक लाख मरीजो का इलाज करता है। चेरिटेबल अस्पतालों के नाम पर दुकानदारी की बजाय इस अस्पताल में मरीज केवल लागत खर्च देते हैं।

यही नहीं, डॉक्टर जयदेव ने पिछले 60 वर्ष से अंबाला में संगीतालोक नामक वार्षिक शास्त्रीय संगीत समारोह का भी आयोजित किया। इसमें उस्ताद आमिर खान, कुमार गंधर्व, जसराज, राजन और साजन मिश्रा, किशोरी आमोनकर, अमजद अली खान और जाकिर हुसैन जैसे श्रेष्ठ कलाकार शामिल हुए हैं।

आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में संस्था निर्माण, चरित्र निर्माण और मूल्यों के निर्माण कि इस नायब कोशिश को राष्ट्र निर्माण न कहे तो और क्या कहें? डॉक्टर जय देव को श्रद्धांजलि के साथ कर्मांजलि देने का संकल्प अंबाला वासियों ने लिया। लेकिन
उनके बहाने हमें इस देश के अनगिनत और गुमनाम राष्ट्र निर्माताओ को याद करना चाहिए।

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