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सम्मान एक जननायक का

by Samta Marg
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भारत सरकार द्वारा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिए जाने की घोषणा देर से आया एक दुरुस्त फ़ैसला है। दलितों, पिछड़ों और वंचितों के मसीहा कहे जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी, बिहार के अभूतपूर्व मुख्यमंत्री और समाजवाद के मजबूत स्तंभों में एक जननायक स्व. कर्पूरी ठाकुर ने अपना तमाम जीवन सदियों से दबे-कुचले वर्गो में राजनीतिक और सामाजिक चेतना जगाने और उन्हें अपने ताकत का अहसास कराने में लगा दी। अपने एक पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री स्व. भोला पासवान शास्त्री की तरह बगैर किसी तामझाम के उन्होंने बिहार की राजनीति में पारदर्शिता, ईमानदारी, सेवा और जन-भागीदारी के जो प्रतिमान गढ़े, उनके आसपास भी पहुंचना उनके बाद के किसी राजनेता के लिए संभव नहीं हुआ।

बिहार के समस्तीपुर जिले के एक गरीब नाई परिवार से आए कर्पूरी जी सत्ता के तमाम प्रलोभन के बीच भी जीवन भर सादगी, सरलता और निश्छलता की प्रतिमूर्ति बने रहे। ईमानदारी ऐसी कि अपने दो बार के उपमुख्यमंत्रित्व और दो बार के मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल अपने व्यक्तिगत कार्यों के लिए कभी नहीं किया। उनके बाद के मुख्यमंत्रियों के घरों और यात्राओं में कीमती गाड़ियों का काफ़िला देखने के आदी लोगों को शायद विश्वास नहीं होगा कि कर्पूरी जी ने अपने व्यक्तिगत कार्य के लिए न कभी सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल किया और न अपने परिवार के लोगों को इसकी इज़ाज़त दी। एक बार तो उन्होंने अपनी बेहद बीमार पत्नी को रिक्शे से अस्पताल भेजा था। राजनीतिक मूल्य, निष्ठा, शुचिता एवं सैद्धांतिक प्रतिबद्धता के अकाल के इस समय में कर्पूरी जी पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक दिखने लगे हैं। 

आज ‘गुदड़ी के लाल’ और ‘बिहार के भूमिपुत्र’ भारत रत्न कर्पूरी जी की जयंती पर उन्हें नमन !

ध्रुव शुक्ल

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