आज किसान का अपना हित देश बचाने से जुड़ा है – योगेन्द्र यादव

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पिछले दिनों पंजाब के एक युवा किसान कार्यकर्ता से मुलाकात हुई। किसान आंदोलन को राजनीति करनी चाहिए या नहीं, इसे लेकर उसके मन में कई सवाल थे। हो सकता है उनमें से कुछ सवाल आपके मन में भी हों। हो सकता है इनमें से कुछ जवाब आपको भी जँचें।

सवाल : हमने तो सोचा था आप राजनीतिक आदमी हैं, लेकिन फिर किसान संगठनों द्वारा पंजाब के चुनाव में हिस्सा लेने का विरोध क्यों कर रहे हैं?

जवाब  : आपने सही सोचा। मुझे राजनीति में आस्था है। मैं तो राजनीति को युगधर्म कहता हूँ। हर समझदार, ईमानदार और दमदार नागरिक से अपील करता हूँ कि वह राजनीति में आए। खेती-किसानी के भाग्य का फैसला तो सरकार द्वारा किया जाता है, इसलिए किसान को राजनीति पर नजर रखनी चाहिए, राज की नीति पर सवाल उठाने चाहिए, किसान विरोधी नीतियों और नेताओं पर चाबुक चलाना चाहिए। किसान आंदोलन राजनीति से आँख मूँदकर न कभी रहा है न रह सकता है और न ही रहना चाहिए।

सवाल : फिर तो आपको कहना चाहिए कि संयुक्त किसान मोर्चा के संगठन विधानसभा चुनाव लड़े…

जवाब : मैंने राजनीति में दखल देने की बात कही, चुनावी राजनीति में नहीं। किसान संगठनों को राजनीति करनी चाहिए लेकिन छोटी नहीं बड़ी राजनीति। दरअसल, किसान बड़ी राजनीति कर सकें, इसके लिए किसान संगठनों को छोटी राजनीति से फासला बनाकर रखना चाहिए।

सवाल : यह तो आपने सीधी सी बात की जलेबी बना दी! राजनीति का मतलब चुनाव नहीं तो और क्या?

जवाब : यही तो सोच की गड़बड़ है। चुनावी राजनीति तो राजनीति का सिर्फ एक स्वरूप है। राजनीति का मकसद है समाज के शक्ति समीकरण में बदलाव। जब आज उपेक्षित किसान वर्ग जबरदस्ती लादे गये किसान विरोधी कानूनों को रद्द करने की माँग करते हैं तो वे राजनीति कर रहे हैं। जब किसान अपनी मेहनत के वाजिब दाम के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी माँगते हैं तो वे राजनीति कर रहे हैं। यह राजनीति जरूरी है, वाजिब है, और सुंदर है, लेकिन इसके लिए जरूरी नहीं कि चुनाव लड़ा जाए और वह भी किसान संगठनों के नाम से।

सवाल : यह तो अजीब बात हुई। मतलब किसान आंदोलन करें, संघर्ष करें और कोई दूसरे लोग चुनाव लड़कर सत्ता की मलाई खाएँ?

जवाब : लोकतंत्र में चुनाव लड़ना जरूरी है। चुनाव पर असर डालना जरूरी है और चुने हुए प्रतिनिधियों पर लगाम लगाना भी जरूरी है। लेकिन सत्ता की मलाई में फिसल न जाएँ इसके लिए चुनावी राजनीति की सख्त मर्यादा बनानी होगी।

सवाल : पंजाब में कुछ किसान संगठनों ने संयुक्त समाज मोर्चा बनाकर अलग से चुनाव लड़ने की घोषणा की है। उससे भला आंदोलन की विरासत को क्या खतरा है?

जवाब : मुझे इसमें दो खतरे दिखाई देते हैं। पहला तो यह कि इससे किसान आंदोलन की एकता में दरार पड़ सकती है, जबकि आंदोलन अभी खत्म नहीं हुआ है। कुछ किसान संगठनों ने चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है लेकिन पंजाब के सबसे बड़े किसान संगठनों ने इस घोषणा से अपने आप को अलग कर लिया है। मुझे लगता है कि संयुक्त समाज मोर्चा के सारे संगठन भी चुनाव तक एकसाथ नहीं रह पाएंगे। दूसरा खतरा यह है कि किसान संगठन सचमुच अलग रहकर चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। चुनाव के नजदीक पहुंचकर उन्हें खुले या छिपे रूप में किसी न किसी ऐसी पार्टी से समझौता करना पड़ेगा जिसकी नीतियाँ किसान विरोधी रही हैं। इस ऐतिहासिक आंदोलन की कमाई को ऐसी किसी पार्टी की झोली में डालना तो किसानों के संघर्ष के साथ गद्दारी ही कहलाएगी।

सवाल : अगर किसानों की पार्टी सरकार बना ले, या फिर किसान नेता मुख्यमंत्री बन जाए तब भी?

जवाब : मेरी दिलचस्पी नाम में नहीं, काम में है। मुख्यमंत्री के चहरे में नहीं बल्कि सत्ता के चरित्र में है। फिलहाल पंजाब में इसकी गुंजाइश दिखाई नहीं देती कि किसानों की पार्टी अपने दम पर सरकार बना लेगी। ज्यादा से ज्यादा कुछ किसान नेता एमएलए बन जाएंगे। या पिर किसी और पार्टी को दिखाने के लिए किसान नेता का चेहरा मिल जाएगा। नेताओं को जो कुछ भी हासिल हो, सवाल है कि किसानों को क्या हासिल होगा?

सवाल : तो आपका मतलब है कि इस विधानसभा चुनाव में किसान खाली दर्शक बनकर देखते रहें

जवाब : जी नहीं, चुनाव में कौन चेहरे जीतते हैं उससे बड़ी बात यह है कि चुनाव किन मुद्दों पर लड़ा जाता है और चुनी हुई सरकार किस दबाव में काम करती है। पंजाब और बाकी राज्यों में किसान संगठन चुनाव के मुद्दे और एजेंडा तय कर सकते हैं। आंदोलन की ताकत के दम पर किसान संगठन सभी पार्टियों को मजबूर कर सकते हैं कि वे खेती में कारपोरेट कब्जे की नीतियों को खारिज करें और किसानों को उनका वाजिब दाम दिलाने का लिखित वादा करें। पंजाब के सिवा बाकी राज्यों में भाजपा चुनाव में प्रमुख दावेदार है। वहाँ बंगाल की तरह किसान आंदोलन द्वारा किसान विरोधी भाजपा को हराने का अभियान चलाया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश में तो अजय मिश्र टेनी को मंत्री बनाये रखने के मुद्दे पर यह अभियान चलाना अनिवार्य होगा। 

सवाल : क्या इसे आप किसान की बड़ी राजनीति का नमूना बताएंगे?

जवाब : बेशक, चुनावों में चंद चेहरे जिताने से बड़ी राजनीति है चुनाव का एजेंडा तय करना, लेकिन एक जिम्मेदारी है जो उससे भी ज्यादा बड़ी है। आज देश में लोकतंत्र का क्षय हो रहा है, संघीय ढाँचे से खिलवाड़ हो रहा है, धर्मनिरपेक्षता को ताक पर रख दिया गया है। आज देश में इन संवैधानिक मूल्यों को बचानेवाली कोई संगठित ताकत नहीं दिख रही।

आज किसान का अपना हित देश बचाने से जुड़ा है। देश बचेगा और लोकतंत्र बचेगा, तभी किसान बच सकते हैं इसलिए किसान आंदोलन की बड़ी राजनीति यही होगी कि अगले दो साल तक किसान आंदोलन देश बचाने की लड़ाई का सिरमौर बने। इस ऐतिहासिक किसान आंदोलन से हासिल हुई राजनीतिक पूँजी को चंद कुर्सियाँ खरीदने में खर्च कर देना किसान और देश, दोनों के साथ धोखा होगा। इस पूँजी की हिफाजत करना, दूसरे आंदोलनों से रिश्ते बनाकर इसमें ब्याज जोड़ना और इसे देश बचाने की मुहिम में झोंकना ही सबसे बड़ी और पवित्र किसान राजनीति होगी।

(पंजाब केसरी से साभार)

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