दीपक जी के प्रति सभी के मन में बहुत सम्मान था

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— मदनलाल हिन्द — 

दिल्ली में 24 गुरुद्वारा रकाबगंज रोड में डा लोहिया रहते थे। उसमें दो सर्वेन्ट क्वार्टर थे। वहां शांति थी, शोरगुल नहीं था। इसलिए ओमप्रकाश दीपक वहां एक कमरे में काम करना पसन्द करते थे। लोहिया के मासिक पत्र ‘जन’ का काम देखते थे। दूसरे कमरे में ‘मैनकाइंड’ का छोटा-मोटा काम मैं देखता था। मुख्य काम रमा मित्रा और किशन पटनायक देखते थे। तब तक दीपक जी से मेरा अधिक परिचय नहीं था। जब चाय का समय होता था तब दीपक जी मुझे भी वहां ले जाते थे।

जिस दिन ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में साप्ताहिक छुट्टी होती थी उसी दिन मैं वहां जाता था। शेष दिन नहीं।

1968 में 57 दिन की हड़ताल दिल्ली के अखबारों में हुई थी। मुझे करीब दो महीने का वेतन नहीं मिला था। फिर भी मेरे परिवार का काम किसी तरह चल रहा था। एक दिन रमा मित्रा, ओमप्रकाश दीपक, किशन पटनायक और उर्मिलेश जी ने फैसला किया कि जब तक अखबारों में हड़ताल है, तब तक जन-मैनकाइंड कोष से मदनलाल हिंद को कुछ मदद की जाय। दीपक जी का इस पर विशेष आग्रह था। इससे हड़ताल के संकट में मुझे कुछ राहत मिली। दीपक जी के इस कदम के कारण मानसिक रूप से मैं और भी उनके नजदीक हो गया।

दीपक जी की पत्नी कमला दीपक एक स्कूल में शिक्षक थीं। कभी कभी स्कूल से छुट्टी होने पर वह दीपक जी को घर ले जाने के लिए आती थीं। दीपक जी ने कमला जी से मेरा परिचय करवाया। एक दिन कमला जी और दीपक जी चाय पीने के लिए मुझे अपने घर ले गए। इस तरह हमारा परिचय बढ़ता गया।

24 गुरुद्वारा रकाबगंज में हरेक महीने जन-मैनकाइंड की एक गोष्ठी होती थी। उसमें डा नामवर सिंह, कमलेश शुक्ल, मुद्राराक्षस, अशोक सेकसरिया जैसे करीब 15-20 लोग आते थे। मैं भी इसमें नियमित भाग लेता था। गोष्ठी के मुख्य संचालक ओमप्रकाश दीपक होते थे। रमा जी, किशन जी आदि तो रहते ही थे।

मैं दिल्ली के लिए बिल्कुल नया था। मेरी उम्र करीब 23 साल की थी। सभी साथियों का प्यार और आशीर्वाद मुझे प्राप्त था। लेकिन दीपक जी मुझ पर खास मेहरबान रहते थे।

धीरे धीरे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, दिल्ली में मेरी दिलचस्पी बढ़ती गयी। और मैंने जन, मैनकाइंड में आना जाना बंद कर दिया। जब दिल्ली संसोपा का वार्षिक अधिवेशन और चुनाव हुआ, तो मैं दिल्ली संसोपा का मंत्री निर्वाचित हुआ। मुझे करीब 300 वोट मिले। मेरे विरोधी साथी प्रेम मायर को 104 वोट मिले। डा परिमल कुमार दास दिल्ली संसोपा के अध्यक्ष चुने गए।

डा परिमल कुमार दास से बातचीत कर हमलोगों ने पार्टी के पार्लियामेंट्री बोर्ड के अध्यक्ष पद के लिए ओमप्रकाश दीपक का नाम पेश किया। परिमल जी ने मुझसे पूछा कि क्या दीपक जी मान जाएंगे। मैंने कहा कि मैं उनसे बात करूंगा। सौभाग्यवश दीपक जी सहमत हो गए। उन्होंने यह जरूर कहा कि “व्यावहारिक” राजनीति का मुझे ज्यादा अनुभव नहीं है। फिर भी इस काम को दीपक जी ने बहुत कुशलतापूर्वक अंजाम दिया।

मोती नगर, कर्मपुरा, अंधा मुगल, गांधी नगर आदि इलाकों में पार्टी की अच्छी यूनिटें थीं। इन जगहों पर कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए गए। इन शिविरों में ट्रेनिंग देने के लिए ओमप्रकाश दीपक और जनार्दन द्विवेदी जैसे लोग जाते थे।

साथी खेमचंद वर्मा एक फैक्टरी में काम करते थे। बहुत जुझारू साथी थे। साज-सामान से वह बहुत मदद करते थे। वह दीपक जी के भक्तों में से थे।

दीपक जी के प्रति सभी साथियों के मन में बहुत सम्मान था। दीपक जी भी सभी साथियों को काफी स्नेह देते थे। इसलिए शिविरों का संचालन अच्छी तरह होता था।

जब बिहार में आंदोलन शुरू हुआ तब जयप्रकाश जी ने आग्रह करके ओमप्रकाश दीपक को पटना बुलाया।

जब आंदोलन के लिए दो अखबार- एक हिंदी में और दूसरा अंग्रेजी में- दिल्ली से निकाले गए तब फिर जेपी के आदेश पर दीपक जी ने एक अखबार का भार अपने कंधों पर लिया।इसके लिए दीपक जी को पंद्रह सौ रुपए मासिक मानदेय मिलता था।

डा लोहिया के अखबार ‘जन’ में केवल 200 रुपए मिलते थे। बाद में 250 रुपए कर दिए गए थे। इसलिए जब 1500 रुपए मिलने लगे तब दीपक जी ने हॅंसते हुए कहा कि इतने रुपए मैंने कभी देखा ही नहीं था।

जब बिहार आंदोलन शुरू हुआ तब मैं दीपक जी से मिलने के लिए एक्सप्रेस बिल्डिंग गया। मैंने उनसे कहा कि मैं बिहार आंदोलन में काम करना चाहता हूं। उन्होंने मुझे जेपी के निजी सचिव सच्चिदानन्द सिन्हा से मिलने के लिए पटना भेजा।

पटना में सच्चिदानन्द बाबू ने मुझे त्रिपुरारी बाबू से मिलाया। मुझे गिरिडीह और कोडरमा में काम करने के लिए भेजा गया।

सच्चिदा बाबू ने मुझे यह भी कहा कि मैं उनके बहनोई के घर पर रहकर पूरे क्षेत्र में काम करूं। उनके बहनोई उस वक्त बिहार के एडवोकेट जनरल थे। वहां अपना सामान रख कर मैं कोडरमा के समाजवादी नेता और एमएल ए विश्वनाथ मोदी के यहां गया। इस तरह मुख्य रूप से कोडरमा, गिरीडीह, हजारीबाग आदि इलाकों में काम करने लगा।

मुझे पटना में ही सावधान किया गया था कि आरएसएस और जनसंघ के लोग मिथ्या प्रचार कर रहे हैं कि जेपी हिंदू राष्ट्र और भगवा ध्वज के लिए ही काम कर रहे हैं। यह चेतावनी ओमप्रकाश दीपक ने भी मुझे दिल्ली में दे दी थी। इसलिए इस विषय पर मैं पूरा सावधान था। दीपक जी को मैं अपने काम की जानकारी चिट्ठी द्वारा देता रहता था।

जब मैं वहां काम कर रहा था तब एक अंधे नौजवान साथी से एक गांव में मेरी मुलाकात हुई। वह बहुत मेहनती युवक था और आंदोलन से बहुत प्रतिबद्ध था। उससे प्रभावित होकर मैंने एक लेख लिखकर ओमप्रकाश दीपक को भेजा। मेरे लेख का हेडलाइन था “Portrait of a blind revolutionary”. इसको Everyman’s के सम्पादक अजित भट्टाचार्य ने बहुत सराहा। इस तरह की  रपट “Field report from M L Hind” के बाइलाइन से छपती रही

इसी बीच मेरे छोटे भाई की अचानक मौत हो गयी और मुझे वापस दिल्ली आना पड़ा। करीब एक महीने के बाद मैं दुबारा बिहार जाने की तैयारी कर रहा था। लेकिन अचानक इमरजेंसी की घोषणा हो गयी। और मैं दिल्ली में ही भूमिगत आंदोलन के काम में लग गया।

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