राजनीति का जातिवादी दॉंव

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कार्टून साभार


— गोपाल राठी —

धीरे-धीरे मेरा यह विश्वास दृढ़ होता जा रहा है कि जातिवादी सामाजिक संगठन सिर्फ जयंती मनाने, शोभायात्रा निकालने और राजनैतिक सौदेबाजी के लिए बने हैं। इनमें अपनी जाति के लोगों के साथ होनेवाले अन्याय और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने तक की सामर्थ्य नहीं है। ये गैरजरूरी मुद्दों पर अति सक्रियता दिखाते हैं लेकिन जब बात अपनी ही जाति के व्यक्ति पर अत्याचार की आती है तो ये चुप्पी साध लेते हैं।

जाति संगठनों के नेता किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं जो अपने आप में कोई बुराई नहीं है। लेकिन अब तक देखने में यह आया है कि ये पार्टी में समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करते बल्कि अपनी जाति में पार्टी के एजेंट बनकर काम करते हैं। पार्टी को अपनी जाति के थोकबंद वोट दिलवाने का प्रयास करते हैं।

मध्यप्रदेश में आए दिन सामाजिक भेदभाव और अत्याचार की खबरें सामने आती रहती हैं लेकिन दलितों के संगठनों की कोई विशेष प्रतिक्रिया देखने में नहीं आती। भाजपा के अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ में पद पाकर, मंत्रियों और नेताओं के साथ फोटो शेयर करके यह बताने का प्रयास करते हैं कि वे अपने समाज (दलितों) के लिए बहुत काम कर रहे हैं। आम्बेडकर जयंती, रविदास जयंती पर गाजे-बाजे के साथ भव्य जुलूस निकालने वाले पिपरिया कालेज के रैकवार बाबू की आत्महत्या पर कुछ बोलना भी उचित नहीं समझते।

आदिवासियों को अपने जल, जंगल और जमीन से बेदखल करने के लिए अनेकों परियोजनाएं क्रियान्वित की जा रही हैं। उनको उनके पुरखों की जमीन से हटाया जा रहा है। उनके घर तोड़े जा रहे हैं, जलाए जा रहे हैं, घर का सामान फेंका जा रहा है। सिवनी की तरह कई जगह आदिवासियों की पिटाई और हत्या की जा रही है। लेकिन आदिवासी समाज के लोग इन घटनाओं का तीव्र विरोध करने के बजाय मोदी, शाह और शिवराज की रैलियों में जाकर भीड़ बनकर उनकी शोभा बढ़ाते हैं।

स्थानीय निकायों के चुनावों में पिछड़े वर्ग को आरक्षण दिलाने का श्रेय लेने के लिए भाजपा ने भोपाल में एक जलसा किया जिसमें पिछड़े वर्ग के नेताओं ने इकठ्ठे होकर मुख्यमंत्री का आभार प्रकट किया। पिपरिया में भी झंडा चौक पर भाजपा के पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ ने बहुत बड़ा बोर्ड लगाकर मुख्यमंत्री का आभार जताया। इसके दूसरे दिन ही पिछड़े वर्ग से आनेवाले कालेज के एक कर्मचारी ने सपरिवार सामूहिक आत्महत्या कर ली। इस घटना ने पूरे नगर को झकझोर दिया। लेकिन विश्वकर्मा समाज और पिछड़ा वर्ग ने अपने समाज के इस परिवार की आत्महत्या पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। ज्ञापन तो छोड़िए श्रद्धाजंलि तक अर्पित नहीं की। ऐसा लगता है कि पिछड़ा वर्ग नेता सरकार के एजेंट के रूप में काम करते हैं, उनका अपने समाज या समाज के व्यक्ति के सुखदुख से कोई लेना देना नहीं है।

पहले ऐसा कहा जाता था कि भाजपा बनियों की पार्टी है। सोशल इंजीनियरिंग के चलते भाजपा अब दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों की भी पार्टी बन गई है। बदली हुई परिस्थितियों में भाजपा के लिए बनियों की क्या अहमियत है यह तो भाजपा जाने। लेकिन यह सत्य है कि बहुसंख्यक व्यापारियों का समर्थन भाजपा को प्राप्त है। नोटबन्दी, जीएसटी और लाकडाउन में तमाम झटके खाने के बाद भी इस वर्ग का भाजपा से मोहभंग नहीं हुआ है।

हर व्यापारी यह मानता है कि मोदी के आने के बाद व्यवसाय करना सुगम नहीं रह गया है। व्यापार में अपने आपको टिकाए रखना भी कठिन हो गया है। यह सच्चाई जानने के बाद भी व्यापारी भाजपा के साथ बना हुआ है।

प्रमुख व्यवसायी जाति जैन समाज के एक बुजुर्ग की नीमच के एक भाजपा नेता ने पीट-पीट कर हत्या कर दी। अहिंसा को परम धर्म माननेवाले जैन समाज में इस घटना से कोई विशेष हलचल नहीं देखी गई। भाजपा के अधिकांश जैन बंधुओं ने चुप्पी साध ली। अन्य व्यावसायिक समाजों में तो कोई हलचल ही नहीं हुई। अहिंसा मार्ग के प्रवर्तक भगवान महावीर के अनुयायी इस घटना से तनिक भी विचलित नहीं दीखे, उनकी भाजपा, शिवराज और मोदी में आस्था पूर्व की तरह बनी हुई है।

मेरा ताल्लुक एक प्रमुख व्यवसायी जाति माहेश्वरी से है क्योंकि इस जाति में मेरा जन्म हुआ है। अभी 5 अप्रैल 2022 को नांदेड़ (महाराष्ट्र) निवासी युवा समाजसेवी श्री संजय वियाणी की हत्या पर माहेश्वरी समाज ने पूरे देश में सरकार को ज्ञापन देकर इस हत्या पर अपना विरोध जाहिर किया था। स्व.संजय जी बिल्डर थे। बताया जाता है कि व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा उनकी हत्या की प्रमुख वजह थी। कुछ वर्ष पहले माहेश्वरी समाज के जज लोया की रहस्यमय ढंग से मौत हो गई थी। इस मौत को स्वाभाविक नहीं माना गया। वे सत्ताधारी दल से जुड़े नेता के एक अहम प्रकरण में फैसला सुनाने वाले दें। जज लोया एक सिद्धांतवादी और ईमानदार जज थे। सत्ता के दबाव या लोभ लालच से उनको विचलित नहीं किया जा सकता था। ऐसे प्रतिभावान जज की मौत पर पूरा समाज एकाएक मौन हो गया, कहीं कोई हलचल नहीं हुई, किसी ने किसी को कोई ज्ञापन नहीं दिया। समाज के कर्णधारों ने जज लोया को श्रद्धांजलि देने में भी कंजूसी दिखाई। यह दोहरा मापदंड यह दिखाता है कि समाज कही न कहीं सत्ता के प्रभाव में है। सिर्फ उन्हीं मामलों में संज्ञान लेता है जो सत्ता के प्रतिकूल ना हों।

जाति उपजाति के संगठनों के साथ ही पिछले वर्षों में कुछ और संगठन भी अस्तित्व में आए हैं, उनकी भूमिका और भंगिमा पर भी विचार होना चाहिए। सभी प्रकार के ब्राह्मणों को एकजुट करने के लिए सर्व ब्राह्मण समाज और सभी वैश्यों को एक मंच पर लाने के लिए वैश्य महासम्मेलन जैसे संगठन सक्रिय हैं। इनकी सक्रियता को बारीकी से देखने समझने वाले भलीभांति समझ सकते हैं कि ये दोनों संगठन ब्राह्मण समाज या वैश्यों के भले के नहीं बल्कि राजनीतिक गोलबंदी के लिए बनाए गए हैं। शोभायात्रा, जयंती पर्व, खेलकूद प्रतियोगिता के अलावा इनका कोई एजेंडा नहीं है। इन संगठनों से जुड़ कर कितने ब्राह्मणों और वैश्यों का भला हुआ यह तो वे ही बता सकते हैं जो इनसे जुड़े हैं। इन संगठनों के प्रमुख पदाधिकारी आरएसएस से भेजे गए स्वयंसेवक हैं इसलिए आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं कि इनका छिपा हुआ एजेंडा क्या है?

जाति आधारित संगठनों के अलावा हिंदुओं के संगठन भी हैं जो यह दावा करते हैं कि उनका प्रादुर्भाव हिंदुओं के कल्याण के लिए हुआ है। जरा इनकी कल्याणकारी भावना का जायजा भी ले लेना चाहिए। भारत में आत्महत्या करनेवालों में सबसे ज्यादा संख्या किसानों की है।

2019 में 5,957 किसानों और 4324 कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की थी जबकि 2020 में आंकड़ा क्रमश: 5,579 और 5,098 रहा। यानी कृषि मजदूरों की आत्महत्या के मामले 2020 में बढ़े हैं। आत्महत्या करनेवाले अधिकांश किसान हिन्दू थे। किसान आंदोलन के दौरान अकाल मौत मरे लगभग 800 किसान हिंदू थे। लाकडाउन में महानगरों से अपने गांव तक सैकड़ों-हजारों किलोमीटर पैदल चलनेवाले मजदूर हिन्दू ही थे जिनमें से हजार मजदूर भूख, प्यास, थकान और दुर्घटना के कारण रास्ते में ही मर गए। हिन्दू रीति-रिवाज से शादी करनेवाले दलित दूल्हे को घोड़े से उतार दिया जाता है। दलित हिन्दू की बेटी से दिन में बलात्कार होता है और रात के ॲंधेरे में पुलिस उसकी लाश जला देती है।

एमपी के सिवनी में बजरंग दल के लड़के तो आदिवासियों को मार-मार कर जान ले लेते हैं। एमपी के नीमच में जैन समाज के एक बुजुर्ग की भाजपा नेता इतनी पिटाई करता है कि उसकी जान चली गई। पिपरिया में रैकवार बाबू मकरन विश्वकर्मा की परिवार सहित आत्महत्या होती है l क्या आपने इन घटनाओं पर किसी हिन्दू संगठन का खून खौलते हुए देखा? उनके द्वारा कोई ज्ञापन प्रदर्शन की आपको कोई जानकारी है? इन तथाकथित हिन्दू संगठनों का हिन्दुओं की रक्षा या भलाई से कोई सरोकार नहीं है। यह हिंदुओं के वोट भाजपा को दिलाने की मशीनें हैं। जो हिंदुओं को भारत पाकिस्तान हिन्दू मुसलमान और मन्दिर मस्ज़िद आदि मुद्दों में उलझाकर मूर्ख बना रहे हैं।

जाति समाज के संगठनों की प्रासंगिकता पर यह गंभीर सवाल है। वे राजनीतिक दलों के प्रकोष्ठ बनकर रह गए हैं। किसी घटना पर उनका एक्शन इस बात पर निर्भर करता है कि इस पर सरकार और पार्टी का कोई नुकसान तो नहीं हो रहा है। कितनी विचित्र बात है कि अब जातियों को देखकर ही राजनीतिक पण्डित यह बता देते है कि इनका वोट कहाँ जाएगा?

अब ऐसा लगने लगा है कि जाति के नेताओं ने अपनी जाति के मान-सम्मान और स्वाभिमान को राजनीतिक आकाओं के चरणों में गिरवी रख दिया है। अब पार्टियों ने भी हर जाति में अपने एजेंट नियुक्त कर उस जाति पर अपनी पकड़ मजबूत बना ली है।

आरआरएस आदिवासियों को वनवासी कहता है। वनवासी में सिर्फ वन में रहने का बोध होता है जबकि आदिवासी कहने से उनके मूल निवासी होने का भाव होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि आरएसएस आदिवासियों को मूल निवासी नहीं मानता। आरएसएस द्वारा नियंत्रित भाजपा ने अपनी पार्टी में अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ बना रखा है जिसमें बहुत-से आदिवासी नेताओं को पद और प्रतिष्ठा देकर उन्हें फांस रखा है। सत्तापक्ष से जुड़कर वे अपने आपको धन्य समझते हैं जबकि दूसरे बड़े लोग उनके नाम पर मज़े मारते हैं।

मध्यप्रदेश में गोंड, कोरकू, भील, भिलाला, बैगा, भरिया आदि जनजातियों के लोग (आदिवासी) निवास करते हैं। अन्य जातियों की तरह इन आदिवासी समुदायों में कभी अलगाव नहीं देखा गया। अपने अलग अलग रीति-रिवाजों के बावजूद सभी आदिवासी भाई अपने को एक मानते रहे हैं। संघर्ष में साथ-साथ रहे हैं।

भाजपा ने आदिवासी एकता में सेंध लगाना शुरू कर दिया है। गोंड, कोरकू, भील, भिलाला समुदाय के अलग अलग संगठन बनाकर उनमें अपने आदमी फिट कर दिए हैं। अब आदिवासियों की हर प्रजाति स्वतंत्र हो गई है। उनकी सामूहिकता को तोड़ने का यह षड्यंत्र आदिवासी आज भी नहीं समझ पा रहे हैं। आज के इस संक्रमण काल में सभी आदिवासियों की एकता समय की मांग है लेकिन ठीक इसी वक्त आदिवासियों की एकता को खण्ड खण्ड करने की चाल चली जा रही है। अगर आदिवासी इस साजिश को नहीं समझे तो जल, जंगल, जमीन, हक और इज्जत के लिए चल रही लड़ाई और कमजोर हो जाएगी।

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