रवीश कुमार का इस्तीफा हमारे लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है

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— विमल कुमार —

नडीटीवी से रवीश कुमार के इस्तीफे से क्या भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक बार फिर काले अध्याय की शुरुआत होगी या भविष्य में देश में वैकल्पिक पत्रकारिता की बुनियाद और मजबूत होगी? यह सवाल इसलिए खड़ा हुआ है कि वर्तमान सत्ता के प्रतिरोध के प्रतीक बन चुके रवीश कुमार ने परसों अपनी अंतरात्मा की आवाज पर अंततः एनडीटीवी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने ट्वीट कर भी यह जानकारी कि उन्होंने एनडीटीवी से इस्तीफा दे दिया है लेकिन यह भी कहा है – याद रहे चैनल खरीद कर तुम रवीश कुमार को नहीं खरीद सकते।” वैसे, उनके इस्तीफा देने की अटकलें काफी दिनों से लगाई जा रही थीं और यह अफवाह भी फैला दी गयी थी कि उन्होंने इस्तीफा देकर अपना एक निजी यूट्यूब चैनल शुरू कर दिया है।

आखिर रवीश कुमार का इस्तीफा इतनी महत्त्वपूर्ण घटना क्यों है जिससे सत्तापक्ष आह्लादित है और विपक्षी खेमे में एक मायूसी सी है? अभी प्रणव राय ने एनडीटीवी से इस्तीफा नहीं दिया है लेकिन उनके प्रोमोटर होल्डिंग कम्पनी से उन्होंने और उनकी पत्नी राधिका राय ने बोर्ड में डायरेक्टर पद से इस्तीफा जरूर दे दिया है।

गौतम अडानी ने उस कम्पनी को खरीद कर एनडीटीवी का 29 प्रतिशत शेयर जरूर ले लिया है। वह और 26 प्रतिशत शेयर खरीदने की फिराक में हैं ताकि एनडीटीवी पर उनका मालिकाना हक हो जाए।

सोशल मीडिया में रवीश के इस्तीफे की खबर वायरल हो गयी है और एक पार्टी-विशेष के लोग गुलछर्रे उड़ा रहे हैं।आखिर क्यों? क्या इसलिए कि रवीश वर्तमान निजाम के लिए सरदर्द बन गए थे, सत्तारूढ़ पार्टी के झूठ का वे रोज पर्दाफाश कर देते थे, सत्तापक्ष द्वारा जो गुब्बारा फुलाया जा रहा था वे उसे अपने कार्यक्रम से पंक्चर कर देते थे। वह एकमात्र ऐसे पत्रकार हैं जिन्हें तीन-तीन बार गोयनका अवॉर्ड मिल चुका है और अरुण शौरी तथा पी साईनाथ के बाद वे तीसरे पत्रकार हैं जिन्हें रमन मैग्सेसे अवार्ड भी मिल चुका है।

अरुण शौरी का उभार और उस उभार का हश्र हम देख चुके हैं हालांकि अब वह मोदी सरकार से खुद दुखी और व्यथित हैं। जब तब वे भी सच बोलने लगे हैं। पी साईनाथ एक गम्भीर पत्रकार हैं। वे प्रिंट मीडिया के पत्रकार रहे हैं और उनका काम एकेडेमिक अधिक है। वे रवीश की तरह रोज सरकार के टायर को पंक्चर नहीं करते। ऐसे में रवीश के इस्तीफे का भारतीय मीडिया और लोकतंत्र पर कोई असर पड़ेगा या नहीं यह तो समय ही बताएगा लेकिन फिलहाल उनके इस्तीफे की घटना ने सबको जरूर चौंका दिया है और देश के अमनपसंद, प्रगतिशील और सेकुलर लोग एक बार फिर सकते में आ गए हैं कि आखिर हमारे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का क्या होगा, क्योंकि रवीश कुमार इस चौथे स्तंभ की एक भरोसेमंद आवाज बन चुके थे।लाखों-करोड़ों लोगों का दुख उनकी आवाज में व्यक्त हो रहा था, उनके द्वारा बोला गया समय का सच एक उम्मीद की किरण की तरह नजर आ रहा था। लेकिन एनडीटीवी में अडानी के प्रवेश से उम्मीद की वह किरण भी मिट गयी है और अब भारतीय मीडिया के लिए ही नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए भी एक खतरे की स्थिति पैदा हो गई है।

लेकिन यह सब कुछ अचानक नहीं हुआ। इसकी पूर्व पीठिका काफी दिनों से बन रही थी और इस बात की तैयारी भी बहुत दिनों से चल रही थी कि किस तरह एनडीटीवी जैसे मीडिया चैनल का गला घोंट दिया जाए या उसे कब्जे में ले लिया जाए। यूँ तो 2014 के बाद से किसी भी स्वतंत्र या निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए मुसीबतें पैदा हो रही थीं। कभी ‘आउटलुक’ पर गाज गिरती थी कभी ‘स्वराज’ चैनल पर तो कभी किसी अन्य चैनल या संस्थान पर।

कोई भी सरकार मीडिया को अपनी तरह से नियंत्रित करना चाहती है और मीडिया भी सत्ता के विरोध में खुलकर खड़ा नहीं हो पाता लेकिन मीडिया पर इतना नियंत्रण सत्ता का हो जाएगा यह सोचा नहीं जा सकता था।

मीडिया दो भागों में विभक्त हो गया है। यूँ तो नेहरू जी के जमाने मे लोहिया की शिकायत थी कि नेहरू जी के खिलाफ उनके बयान को अखबार वाले नहीं छापते या कम जगह देते हैं। दूसरा उदाहरण, रघुवीर सहाय को इंदिरा जी का कोपभाजन बनने के कारण ‘दिनमान’ के संपादक पद से हाथ धोना पड़ा था। कुलदीप नैयर को भी इंदिरा गांधी की नाराजगी के कारण ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से त्यागपत्र देना पड़ा था। आपातकाल में मीडिया का हश्र हम लोग देख चुके लेकिन 2014 के बाद तो अघोषित आपातकाल है।

पिछले कुछ सालों से कारपोरेट और सत्ता के गठबंधन ने मीडिया को कमजोर बनाया है। कांग्रेस के कार्यकाल में ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने जब 250 कर्मचारियों को निकाला तो कांग्रेस ने शोभना भारतीय को पद्मश्री से सम्मानित किया ही नहीं किया बल्कि राज्यसभा की सदस्यता भी दी। अब वही काम मोदी जी कारपोरेट हाउस या अपने प्रिय उद्योगपति मित्र अडानी के लिए कर रहे हैं।

कितने लोगों को पता होगा कि पिछले कुछ सालों से एक निजी न्यूज एजेंसी “एएनआई” को सरकार की ओर से काफी प्रश्रय दिया जा रहा है और देश की दो पुरानी न्यूज एजेंसी पीटीआई और यूएनआई पर सरकार की वक्र दृष्टि काम कर रही है।

पीटीआई के साथ मोदी सरकार का टकराव उस समय जगजाहिर हो चुका है जब अरुणाचल प्रदेश के मामले में चीन के राजदूत का इंटरव्यू पीटीआई ने जारी किया था जिससे सरकार के झूठ का पर्दाफाश हुआ था। उसके कुछ दिन बाद सरकार ने दोनों एजेंसियों की सेवा काट दी। इस तरह यूएनआई को विकलांग बना दिया जबकि वह पहले से बीमार चल रही थी। जब ज़ी टीवी ने उसे खरीदने की कोशिश की तो कर्मचारियों ने जबरदस्त विरोध किया था लेकिन कम्पनी की कमर टूट गयी और आज कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल रहा।

अदालत के आदेश तथा कम्पनी के निदेशकों के खिलाफ वारंट जारी होने के बाद भी सेवानिवृत्त कर्मचारियों को 45 माह का बकाया वेतन और ग्रेच्यूटी नहीं मिल रही है। लेकिन देश के पत्रकारिता जगत में खामोशी छायी हुई है। एनडीटीवी ने भी इसे मुद्दा नहीं बनाया और रवीश ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन कारपोरेट और सत्ता के गठजोड़ ने जब एनडीटीवी में सेंध लगा दी तो सबकी नींद खुली कि देश में हो क्या रहा है!

आज देश में मीडिया को लेकर इस तरह की जो घटनाएं घट रही हैं उसके पीछे कारपोरेट और राजनीतिक सत्ता का गठबंधन काम कर रहा है। कांग्रेस के जमाने में भी यह गठबंधन काम करता रहा था लेकिन मोदी सरकार में आकर यह गठबंधन और मजबूत हो गया है और मीडिया गोदी मीडिया तथा मोदी विरोधी मीडिया में विभाजित हो गया है। पहले यह विभाजन इतना स्पष्ट नहीं था लेकिन 2014 के बाद से जिस तरह कारपोरेट और सत्ता ने मीडिया पर अंकुश लगाना शुरू कर दिया उससे यह साफ जाहिर हो गया कि वर्तमान सत्ता को मीडिया के एक हिस्से से गहरी चुनौती मिल रही है। इसे देखते हुए पुण्य प्रसून वाजपेयी, अजीत अंजुम, अभिसार शर्मा, प्रज्ञा मिश्र और सत्या चैनल ने एक वैकल्पिक मीडिया खड़ा कर दिया।रवीश कुमार के इस्तीफे से वैकल्पिक मीडिया और मजबूत होगा।

सवाल है कि आज एनडीटीवी के साथ, रवीश के साथ यह हादसा हो रहा है, कल किसी और के साथ होगा; क्या पत्रकार बिरादरी इसका जमकर विरोध करेगी क्योंकि जो विरोध करेगा उसके खिलाफ सरकार जांच बिठा देगी।

फिलहाल प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के खिलाफ भी जांच चल रही है। मतलब सरकार हर हथकंडा अपनाकर मीडिया को अपने कब्जे में ले रही है। इसलिए रवीश कुमार ने साहस के साथ कहा, तुम चैनल तो खरीद सकते हो रवीश कुमार को नहीं खरीद सकते। क्या हम पत्रकार और नागरिक समाज खुलकर यह साहस दिखा सकेंगे? कारपोरेट की बढ़ती ताकत इस लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक बन चुकी है। यह पूंजीवाद का नंगा नाच है। देश में फासीवाद इस कारपोरेट के माध्यम से भी आ रहा है। आखिर भारतीय जनता कब जागेगी?

रवीश कुमार का इस्तीफा केवल एक पत्रकार का इस्तीफा नहीं है, यह हमारे लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। इस घंटी को समझिए।

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