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भिमा कोरेगांव की शहादत दिवस को 206 सालों के उपलक्ष्य में शहिदो को क्रांतिकारी अभिवादन !

by Samta Marg
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एक जनवरी 1818 के दिन पुणे के पेशवाई के खत्म करने की लड़ाई में महार रेजिमेंट की जित, जिसे भिमा कोरेगांव के उत्सव के पिछे, डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी का उद्देश्य, महार रेजिमेंट के बलिदान और पुणे के पेशवाई खत्म होने की खुशी मनाने के लिए !

विशेष रूप से डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर ने एक जनवरी 1927 को ! पहली बार खुद, भिमा कोरेगांव में जाकर उत्सव मनाने की शुरुआत की थी ! क्योंकि पेशवाई के अंतिम काल में पुणे और जहाँ – जहाँ पेशवा राज कर रहे थे ! वहां पर छूआछूत, और घोर जाति व्यवस्था की अपमानजनक पद्धति जारी थी ! (उदाहरण के लिए, अस्पृशोंने रस्ते से चलते समय कमर के पिछे झाडू बांध कर चलना है ! ताकि उसके पावके चिन्ह मिटने चाहिए ! और गले में मटका लटका कर चलना चाहिए ! क्योंकि वह थुंकेगा तो उस मटके के भीतर ही ! और जब – जब छाया लंबी होती हैं ! ऐसे समय में बाहर नहीं निकलने ! और पानी के हौद, अलग अलग रहेंगे ! तथा अन्य बंधनों के कारण अस्पृश्य समाज बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं ! )


इसलिये पेशवाई खत्म होने की एक जनवरी 1818 की ! भिमा कोरेगांव की लड़ाई, ढाई हज़ार पेशवा सैनिकों के साथ ! सिर्फ पांच सौ की संख्या में ! महार रेजिमेंट के सैनिकों ने ! जो शौर्य का प्रदर्शन किया ! उससे अंग्रेजी सेना की जित हुई ! और पेशवा हारे ! यह कई राष्ट्रवादी लोगों को आपत्तिजनक लग सकता है ! लेकिन भारतीय जाति-व्यवस्था की घृणास्पद, रुढी परंपरा के शिकार अस्पृश्य जातियों के लोगों के लिए मुक्ति का उत्सव है ! क्योंकि हजारों सालों से मनुस्मृति के अनुसार शुद्र – अतिशुद्र ( जिसमें स्त्रियों का भी समावेश है ! ) के साथ जो अपमानास्पद व्यवहार चले आ रहे थे ! इस से मुक्ति पाने की कोशिश मतलब भिमा कोरेगांव की लड़ाई है !


और मेरी नजर में भारत में सदियों से विदेशी आक्रमक लोग आते रहे हैं ! (शक, हूण, कुशणो से लेकर मंगोल, अफगानी, ईरानी, तुर्की, अंग्रेज, पोर्तुगीज, डच, फ्रेंच ) और इन आक्रमणकारियों के तरफ स्थानीय निवासियों ने, कोई विशेष ध्यान नहीं देने कि वजह, शायद नया शासक पहले की तुलना में अधिक उदार नीतियों वाले लोग हो सकते है ! और मनुस्मृति के अनुसार, क्षत्रिय छोड़कर अन्य लोगों को शस्त्र धारण करने की मनाही !

जिस कारण हजारों सालों से विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत में आकर अपना राज कायम किया है ! बहुजन समाज इन सब समयों में एक तो मुकदर्शक बना रहा है ! या दिलहि दिल में आने वाले नये आक्रमक शासकों का स्वागत किया होगा ! शायद यह पहला शासकों के तुलना में यह जो भी कोई नया आ रहा है ! ठीक होगा इस उम्मीद में भी रहा हो सकता है !


अन्यथा इतिहास में इतने आक्रमणकारी, अन्य देशों में नजर नहीं आते हैं ! जितने भारत में आते-जाते रहे हैं ! हिंदू धर्म की कर्मठता के कारण, बहुजन समाज को हमेशा अपमानित जिवन जिना पड़ा है ! और महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी उनके प्रतिनिधि के रूप में काम किये हैं ! और वह 1857 हो या उससे भी पहले चालिस साल पहले की भिमा कोरेगांव की लड़ाई हो ! इनमें बहुजन समाज के लोगों का नही होना ! या भिमा कोरेगांव में पेशवाओ के खिलाफ अंग्रेजो के साथ देने की बात समझ में आती है !
महात्मा ज्योतिबा फुले हो या डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी दोनों का सामाजिक समता की लड़ाई ! प्राथमिकता में प्रथम स्थान पर होने के कारण ! अन्य लोगों को लगता होगा “कि वह आजादी के आंदोलन में शामिल नहीं थे !” 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ! महात्मा ज्योतिबा फुले गिनकर तीस साल की उम्र के थे ! (1827 का जन्म ! ) लेकिन उन्होंने उस संग्राम में हिस्सेदारी नहीं की है ! क्योंकि उनके जन्म होने के नौ साल पहले ही पेशवाओ का राज खत्म हुआ था ! लेकिन ‘डोरी जलि लेकिन बल कायम’ वाली कहावत के अनुसार पुणे में छुआछूत और जाति-व्यवस्था की पद्धति बदस्तूर जारी थी ! क्योंकि अंग्रेजी हुकूमत स्थानीय लोगों के भावनाओं को ठेस पहुंचाने की गलती नहीं किया करते थे ! क्योंकि उन्हें अपनी सत्ता को चुनौती दे ऐसे लोगों को छेडना नहीं था ! वह समाज परिवर्तन करने के लिए नही आए थे ! वह तो सिर्फ आर्थिक शोषण करने के लिए आए थे !


लगभग डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी की भी प्राथमिकता सामाजिक स्वतंत्रता की, होने के कारण ! उन्होंने बहुत ही सोच-समझकर अपने जीवन के लक्ष्य तय किये थे !
और इसलिए उन्होंने, अपने जीवन का सबसे पहला लेख “Castes in India ” 9 मई 1916 को (उम्र के 25 वे साल में ! ) डॉ. ए. एल. गोल्डनवीज के अंथ्रापॉलॉजी सेमिनार में पढ़ने के बाद इस निबंध का कुछ हिस्सा World’s Best Literature of the Month इस कॉलम में The American Journal of Sociology इस पत्रिकाने प्रकाशित किया ! वह 1915 में एम. ए. और 1916 पी. एच. डी. हुए !


उस समय लाला लाजपत राय भी अमेरिका में थे ! और उनकी डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी के साथ मुलाकात हुई है ! कोलंबिया विश्वविद्यालय की लायब्रेरी में पढ़ने के लिए आते थे ! तो डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी उनके पहले आकर, और वह चले जाने के बाद भी, पढ़ाई करने की वजह से ! उन्होंने खुद होकर डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी के साथ परिचय कर लिया था ! और उन्होंने उन्हें अपने गदर संगठन की गतिविधियों में ! शामिल करने के लिए विशेष रूप से ! डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी को आग्रह किया ! लेकिन तब भी डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी अपने भावी जीवन के प्रति कितने स्पष्ट थे !


इस बात का प्रमाण ! 1916 के सितम्बर माह में, अमेरिका स्थित हिंदी विद्यार्थियों की एक बड़ी कांफ्रेंस में शामिल होने का आग्रह किया गया था ! तो डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी ने लालाजी को साफ – साफ शब्दों में कहा कि

“आप स्पृश्य हिंदू हम अस्पृश्योको गुलाम रखकर आजादी हासिल करना चाहते हो ! इसलिए अस्पृश्य आपकी आजादी के आंदोलन की कोशिश में शामिल नहीं होंगे !”

और इसिलिये एक जनवरी 1927 को पहली बार ! डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने खुद भिमा कोरेगांव में जाकर, वहां के विजयस्तंभ को खोजकर ! विजय दिवस मनाने की शुरुआत की है ! और एक जनवरी 2018 के दिन दो सौ साल के उपलक्ष्य में जो कार्यक्रम भिमा कोरेगांव में संपन्न हुआ था ! और उसके कारण गुस्सा होकर, तथाकथित सवर्ण जातियों के लोगों ने !

देश भर से आए हुए लोगों की गाडीया जलाने से लेकर कुछ लोगों पर शारीरिक हमले किए हैं ! और सब पूर्व नियोजित ढंग से करने वाले गुनाहगार ! संभाजी उर्फ मनोहर भिडे तथा मिलिंद एकबोटे आज भी आराम से बाहर घुम रहे हैं ! और जिनके उपर हमले हुए थे ! उन्हीके उपर गिरफ्तार करने से लेकर, दंगे भड़काने के आरोप में जेल में बंद कर दिया है ! क्योंकि उस समय केंद्र से लेकर महाराष्ट्र तक बीजेपी की ही सरकारें थी, और अभी भी है ! और इसीलिये आज छह साल होने वाले हैं ! लेकिन भिमा कोरेगांव के नाम पर लोग जेल में अभिभी बंद हैं !


हालांकि एक हप्ते के भीतर, 8 जनवरी 2018 के दिन, मैंने और राष्ट्र सेवा दल के अन्य सदस्यों ने मिलकर, भिमा कोरेगांव, वढूबुद्रुक, शिक्रापूर तथा आसपास के इलाकों में जाकर, वहां के लोगों से, बातचीत करने के बाद तुरंत रिपोर्ट लिखा है ! जो 23 जनवरी 2018 के ‘मेनस्ट्रीम’ नाम के अंग्रेजी पत्रिका में प्रकाशित हुआ है ! तथा हमने महाराष्ट्र सरकारने जो जांच आयोग नियुक्त किया है ! उसे भी रिपोर्ट को सौंपा है ! और सर्वोच्च न्यायालय में भिमा कोरेगांव के केस को सुनवाई के दौरान, वर्तमान मुख्य न्यायाधीश श्री. धनंजय चंद्रचूड ने अपने’ डिसेंट जजमेंट’ में हमारे रिपोर्ट को पूरा के पूरा कोट करते हुए, अपना अकेले का डिसेंट जजमेंट दिया है ! लेकिन वह अल्पमत में होने के कारण, बहुमत से अन्य जजों ने हर तरह से गलत फैसला दिया है !


वर्तमान समय में, पिछले पांच सालों से कुछ लोगों को भिमा कोरेगांव के मामले में तथाकथित देशद्रोह के आरोप में, गिरफ्तार किया है ! और विभिन्न जेलों में बंद कर दिया है ! हमारे देश की आज़ादी का अमृतमहोत्सव भी चल रहा हैं ! उसकी आड मे, गुजरात दंगों की पिडीता, बिल्किस बानो के, बलात्कारियों को अमृतमहोत्सवी उत्सव के दौरान, सजा से पहले ही माफी देकर छोडा गया है !

जिसे लेकर बिल्किस ने कोर्ट में गुहार लगायी है ! लेकिन भिमा कोरेगांव के मामले में, वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जब भिमा कोरेगांव के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के बेंच में एक न्यायाधीश की हैसियत से थे तब उन्होंने अपने डिसेंट जजमेंट में, हमारे (जब मैं राष्ट्र सेवा दल के अध्यक्ष पद पर कार्यरत रहते हुए यह जांच की थी ! 8 जनवरी 2018 ! ) भिमा कोरेगांव के रिपोर्ट को शब्दशः अपने जजमेंट में लिया है ! लेकिन उसके बावजूद भिमा कोरेगांव के मामले में बंद लोगों में से एक श्री. टेन्स स्वामी की मृत्यू हो गई !

पार्किंसंस नामक बिमारी से ग्रस्त आदमी ! पानी से लेकर, कोई भी पिने वाले पदार्थों को पिने के लिए ! क्योंकि बिमारी की वजह से उनके हाथों – पावों में कंपन होता था ! और उस कारण, कोई भी तरल पदार्थ पिने के लिए, वह कोर्ट से, सिर्फ एक स्ट्रॉ की मांग कर रहे थे ! लेकिन हमारे महान न्यायालय कि असंवेदनशीलता के कारण उन की मृत्यु हो गई लेकिन उन्हे स्ट्रा नहीं दी गई !


और नौ महीने की गर्भवती स्त्री के साथ ! ग्यारह लोग दिनदहाड़े, उसके परिवार के सात सदस्यों को मारकर ! और तीन साल की बच्ची को उसके आखों के सामने मारकर ! बलात्कार किया ! और आजादी के पचहत्तर साल के उपलक्ष्य में उन्हे रिहा किया जाता है ? क्या यह हमारे देश की न्यायपालिका की बेआबरू की बात नहीं है ? गुजरात के दंगों में बलात्कार करने वाले लोगों को यह सहुलियत ? हमारे देश के संविधान से लेकर मानवाधिकार के सभी मापदंडों का अपमान है ! क्या यही गुजरात मॉडल है ?


भिमा कोरेगांव के मामले में ज्यादातर लोगों की उम्र, साठ साल से भी अधिक है ! और उसमे से ज्यादा ब्लडप्रेशर, शुगर तथा उम्र के कारण, होने वाली विभिन्न बिमारीयो के मरीज होने के बावजूद ! हमारे देश की, न्यायपालिका के कानों में जूं नहीं रेंग रही है ! और यह सभी के सभी डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी के कारण भिमा कोरेगांव के उत्सव के अपराधियों के श्रेणी में चार साल से जेल में बंद हैं !
राज्य सरकारों से लेकर, केंद्र सरकार भी, 6 दिसंबर 2023 के दिन, डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी के, 67 वे पुण्यस्मरण दिवस पर, आयोजित कार्यक्रम करने का पाखंड किए हैं ! उसके एवज में भिमा कोरेगांव के कैदियों को रिहा करने का छोड़कर ! समस्त दलितों को अपमानित करने का काम कर रहे हैं ! मेरी तो राय है

“कि इस तरह के दिखावे के कार्यक्रम करने की जगह डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी के जीवन मुल्यो के अनुसार भारत के एक भी दलित के साथ अन्याय – अत्याचार नहीं होना चाहिये ! लेकिन पचहत्तर साल के बावजूद भारत के सभी प्रदेशों में दलित समुदाय के साथ होने वाले अत्याचारों में कमी आने के जगह और ज्यादा बढ़ोतरी हो रही है !”

आज भिमा कोरेगांव की शहादत दिवस को 206 सालों के अवसर पर समस्त दलित, आदिवासी, महिलाओं से लेकर, अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों की जान माल की सुरक्षा से लेकर उनके आत्मसम्मान के रक्षा के लिए विशेष रूप से भारतीय संविधान के अनुसार कारवाई होनी चाहिए ! यही प्रार्थना है !


डॉ. सुरेश खैरनार

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