आज़ाद भारत में औपनिवेशिक पुलिस व्यवस्था: आखिर कब बदलेगा इसका चरित्र?
— शिवानन्द —
आज़ाद भारत में भी अंग्रेज़ों के ज़माने की पुलिसिया बर्बरता और औपनिवेशिक प्रशासनिक व्यवस्था आज तक जारी है। इसमें सुधार की सख़्त...
परिवर्तन की नई आवाज बनती भारतीय लड़कियां
परंपरागत रूप से, महिलाएं घरेलू क्षेत्र तक अपने को सीमित रखती हैं, जिसमें पत्नी, मां और गृहिणी के रूप में उनकी भूमिकाओं पर बल...
गांधी के गांव गणराज्य का सपना आज भी अधुरा – राज...
अगस्त 1947 को देश की पहली स्वतंत्रता दिवस पर गांधीजी ने कहा था 'मेरे सपनों का भारत सात लाख गांव गणराज्यों का संघ' होगा।...
चुनाव आयोग में विवाद से मतदाताओं के बीच भरोसे का संकट...
भारतीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद को लेकर आई एक रिपोर्ट के बाद देश...
सवाल पूछने की आजादी बनाम सोशल मीडिया की अराजकता – राज...
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को मध्य प्रदेश के बालाघाट में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स द्वारा घेरे जाने और उनके साथ तीखी बहस...
रचनात्मक कार्य : पूर्ण स्वराज्य की अहिंसक राह
— रमेश चंद शर्मा —
‘सत्य ही ईश्वर है’, ‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है’, ‘सेवक की प्रार्थना’, ‘एकादश व्रत’ और ‘अचूक ताबीज का मंत्र’...
वंदे मातरम् के सवाल पर भारतीय जनता पार्टी! – शिवानन्द
वंदे मातरम् के सवाल पर भारतीय जनता पार्टी आज जिस तरह गदर मचा रही है, उसके पीछे असली कहानी कुछ और है। इसे मुस्लिम...
वन्दे मातरम् – प्रेमकुमार मणि
वंदे मातरम् गीत विस्तार को लेकर यदि देश में सर्वानुमति नहीं बन पा रही है तो इसे समझा जाना चाहिए। इस गीत पर सर्वानुमति...
नेताजी, जनगणमन और जर्मनी – अरुण कुमार त्रिपाठी
जब राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच राष्ट्रीय स्तर पर विवाद उठ खड़ा हुआ है तब इस बात की आशंका...
लोकतंत्र का संकट और समाज
— अनिल अत्रि —
डॉ. राममनोहर लोहिया का मानना था कि लोकतंत्र की असली ताक़त केवल संसद में नहीं, बल्कि समाज की जागरूकता, नागरिक भागीदारी...














