नए समय की राजनीति : विचार नहीं, प्रभाव चाहिए
— परिचय दास —
आज की राजनीति का सबसे बड़ा परिवर्तन शायद यही है कि उसका वैचारिक केंद्र लगातार धुँधला होता जा रहा है और "शक्ति" उसका एकमात्र स्थायी आकर्षण बनती जा रही है। पहले...
ट्रम्प ने उड़ाया फिर भारत का मज़ाक़! – प्रोफेसर पंकज मोहन
जिस देश की जनता का जीवन-स्तर जितना ऊंचा होता है, दुनिया उस देश को भी उतना ही अधिक महत्व देती है। ट्रम्प ने खुलेआम भारत को अपमानित किया। उसने कहा, भारत के लोग नारकीय...
द्रविड़ राजनीति के चौराहे पर तमिलनाडु – परिचय दास
तमिलनाडु की राजनीति इस समय एक ऐसे चौराहे पर खड़ी दिखाई देती है जहाँ केवल सरकार गठन का संकट नहीं है बल्कि एक पूरे राजनीतिक युग के बदलने की बेचैनी भी उपस्थित है। लंबे...
चुनाव बाद बंगाल में हिंसा का शमन कैसे संभव है? – परिचय दास
चुनाव के बाद हिंसा का सवाल हर बार ऐसे सामने आता है जैसे लोकतंत्र एक दिन का उत्सव हो और बाकी दिन उसकी कीमत चुकाने के लिए छोड़ दिए गए हों। पश्चिम बंगाल में...
क्या ऐसे भाजपा को हराया जा सकता है? – प्रोफेसर राजकुमार जैन
पश्चिम बंगाल,असम, पांडूचेरी,में भाजपा ने जीत के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाए हैं, हर कोई इससे वाकिफ है परंतु सवाल है कि इसका मुकाबला कैसे किया जाए। जितने भी विरोधी दल हैं उनकी संगठनात्मक संरचना...
भय और धमकियों से भरा लोकतंत्र – अरुण कुमार त्रिपाठी
पश्चिम बंगाल चुनाव का परिणाम चाहे जो हो लेकिन चुनाव की प्रक्रिया ने एक बात तो साबित कर दी है कि भारतीय लोकतंत्र भय, अविश्वास, प्रतिशोध और पक्षपाती राज्य तंत्र के शिकंजे में फंस...
कब तक डर-डर कर जीना चाहता है देश? – श्रवण गर्ग
हमने इस बात पर शायद ही कभी गौर किया हो कि आपसी बातचीत या ‘गोदी चैनलों’ की बहसों को देखने-सुनने के दौरान हम दिन के कितने घंटे सिर्फ़ एक ही व्यक्ति यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र...
राजनीति, पहचान और भाषा: गिरते मानकों की कथा – परिचय दास
समय की सबसे विचित्र विडंबनाओं में एक यह है कि संवाद के साधन जितने विस्तृत हुए हैं, संवाद की गुणवत्ता उतनी ही संकुचित होती गई है। शब्दों की संख्या बढ़ी है, अर्थों की गरिमा...
सत्ता के समीकरण और वैचारिक दरारें: आम आदमी पार्टी के सामने नई चुनौती
— परिचय दास —
भारतीय राजनीति में दल-बदल अब उतना असामान्य नहीं रहा, जितना उसे कभी संविधान निर्माताओं ने समझा था। फिर भी हर बार जब किसी दल के कई सांसद या विधायक एक साथ...
जनगणना में जरूरी प्रवासी मजदूर – अरविन्द मोहन
करीब डेढ़ दशक बाद होने जा रही 'जनगणना 2027' में जातियों की बहुप्रचारित मर्दुमशुमारी के अलावा उन असंख्य प्रवासी-मजदूरों का भी महत्व होना चाहिए जो हमारे 'जीडीपी' को अनजाने में आसमान तक पहुंचाने में...















