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राजनीति

Failed Experiments in Foreign Policy Through Flattery and Flimflam!

चापलूसी और झूलेबाज़ी के ज़रिए विदेश नीति के असफल प्रयोग ! – श्रवण गर्ग

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डॉनल्ड ट्रम्प की चीन यात्रा की विफलता के कारणों को लेकर अमेरिकी मीडिया में जो विश्लेषण प्रकाशित हो रहे हैं हमारे लिए इस नज़रिए से चौंकानेवाले हो सकते हैं कि उनके निष्कर्षों को विदेश...

कौन सा विपक्ष, किसका विपक्ष और कैसा विपक्ष?

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— अरुण कुमार त्रिपाठी — स्वतंत्र भारत के इतिहास में कई बार विपक्ष की स्थिति कमजोर रही है। वह निष्प्रभावी रहा है और वैचारिक और सांगठनिक विखराव का शिकार रहा है। लेकिन जब भी मौका...

नए समय की राजनीति : विचार नहीं, प्रभाव चाहिए

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— परिचय दास — आज की राजनीति का सबसे बड़ा परिवर्तन शायद यही है कि उसका वैचारिक केंद्र लगातार धुँधला होता जा रहा है और "शक्ति" उसका एकमात्र स्थायी आकर्षण बनती जा रही है। पहले...
Modi and trump

ट्रम्प ने उड़ाया फिर भारत का मज़ाक़! – प्रोफेसर पंकज मोहन

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जिस देश की जनता का जीवन-स्तर जितना ऊंचा होता है, दुनिया उस देश को भी उतना ही अधिक महत्व देती है। ट्रम्प ने खुलेआम भारत को अपमानित किया। उसने कहा, भारत के लोग नारकीय...
Tamil Nadu at the Crossroads of Dravidian Politics

द्रविड़ राजनीति के चौराहे पर तमिलनाडु – परिचय दास

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तमिलनाडु की राजनीति इस समय एक ऐसे चौराहे पर खड़ी दिखाई देती है जहाँ केवल सरकार गठन का संकट नहीं है बल्कि एक पूरे राजनीतिक युग के बदलने की बेचैनी भी उपस्थित है। लंबे...

चुनाव बाद बंगाल में हिंसा का शमन कैसे संभव है? – परिचय दास

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चुनाव के बाद हिंसा का सवाल हर बार ऐसे सामने आता है जैसे लोकतंत्र एक दिन का उत्सव हो और बाकी दिन उसकी कीमत चुकाने के लिए छोड़ दिए गए हों। पश्चिम बंगाल में...

क्या ‌‌ऐसे भाजपा को हराया जा सकता है? – प्रोफेसर राजकुमार जैन

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पश्चिम बंगाल,असम, पांडूचेरी,में भाजपा ने जीत के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाए हैं, हर कोई इससे वाकिफ है परंतु सवाल है कि इसका मुकाबला कैसे किया जाए। जितने भी विरोधी दल हैं उनकी संगठनात्मक संरचना...
Mamata Banerji

भय और धमकियों से भरा लोकतंत्र – अरुण कुमार त्रिपाठी

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पश्चिम बंगाल चुनाव का परिणाम चाहे जो हो लेकिन चुनाव की प्रक्रिया ने एक बात तो साबित कर दी है कि भारतीय लोकतंत्र भय, अविश्वास, प्रतिशोध और पक्षपाती राज्य तंत्र के शिकंजे में फंस...
Modi

कब तक डर-डर कर जीना चाहता है देश? – श्रवण गर्ग

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हमने इस बात पर शायद ही कभी गौर किया हो कि आपसी बातचीत या ‘गोदी चैनलों’ की बहसों को देखने-सुनने के दौरान हम दिन के कितने घंटे सिर्फ़ एक ही व्यक्ति यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र...

राजनीति, पहचान और भाषा: गिरते मानकों की कथा – परिचय दास

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समय की सबसे विचित्र विडंबनाओं में एक यह है कि संवाद के साधन जितने विस्तृत हुए हैं, संवाद की गुणवत्ता उतनी ही संकुचित होती गई है। शब्दों की संख्या बढ़ी है, अर्थों की गरिमा...