गाँधी, लोहिया और समाजवाद! – दीपक मिश्र
महात्मा गाँधी और उनके क्रांतिधर्मी शिष्य राममनोहर लोहिया के सम्बन्ध, वैचारिक साम्य व साझा विरासत पर नए सिरे से उनकी सामयिक प्रासंगिता की कसौटी पर चर्चा नितान्त आवश्यक है। सर्वविदित है कि गाँधी व...
कर्ज किसका, नुकसान किसका? : सुभाष चंद्रा के बहाने दिवाला व्यवस्था की पड़ताल
— अनिल अत्रि —
देश में कर्ज केवल रकम का सवाल नहीं है, उसके साथ व्यवस्था का रवैया भी जुड़ा है। एक किसान कुछ लाख रुपये के कर्ज में फंसकर अपनी जमीन, फसल और परिवार...
भारत के राज्य खनिज रॉयल्टी के मामले में केंद्र सरकार के मोहताज होंगे
— मिथिलेश कुमार दांगी —
भारतीय संविधान के अनुसार भारत राज्यों का संघ है । इसका विश्लेषण करेंगे तो राज्यों को भी अपने लिए कुछ कानून बनाने का अधिकार है। इसी कार्य को करने के...
महाराष्ट्र में हिंदी भाषियों पर जुल्म और भेदभाव बंद करो – रघु ठाकुर
महाराष्ट्र में 3 लाख गैर महाराष्ट्रीयन ऑटो चालक टेंपो टैक्सी वाले लोग हैं .।अब इनके लिए मराठी पढ़ना और उसका प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य कर दिया गया है जबकि यह लोग कई दशकों से...
संघ का अनुशासन और मनुष्य का विवेक – शिवानन्द
संघ का अनुशासन मनुष्य को किस हद तक अविवेकी बना सकता है, इसका एक अनुभव मुझे बहुत पहले हुआ था। गोलवलकर साहब यानी संघ के गुरु जी की किसी किताब में स्वयंसेवकों को संबोधित...
समाजवादी समागम के तत्वाधान में वैचारिक आभासी विचार गोष्ठी के आयोजन
— प्रिया कुमारी —
वैचारिक गोष्ठी में प्रथम सत्र की शुरुआत युवा आंदोलन और लोकतांत्रिक संघर्षों की वर्तमान स्थिति पर केंद्रित संवाद से हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता समाजवादी समागम के अध्यक्ष एवं प्रख्यात समाजशास्त्री प्रो. आनंद...
वंदे मातरम् और कांग्रेस की विरासत!
— गुरदीप सिंह सप्पल —
ऑस्कर फर्नांडिस लगभग चार दशकों तक कांग्रेस संगठन के एक बड़े स्तंभ रहे। उन्होंने चुपचाप कई पीढ़ियों के युवा कांग्रेसियों को गढ़ा और सँवारा। अक्सर जब कोई छात्र या युवा...
अकेला “वंदे मातरम्” ही पूरा क्यों, “जनगणमन” भी पूरा का पूरा गाइए!
— Tribhuvan —
अकेला "वंदे मातरम्" ही पूरा क्यों, "जनगणमन" भी पूरा का पूरा गाइए! और "जनगणमन" और "वंदे मातरम्" ही क्यों, सब कुछ ही पूरा-पूरा पढ़िए!
1.
यदि किसी रचना, श्लोक या मंत्र के एक स्वीकृत...
अभिजीत दीपके और नई पीढ़ी का संघर्ष
— डॉ लता प्रतिभा मधुकर —
सीजेपी के बढ़ते प्रभाव को देखकर कुछ शक्तियाँ असहज होती दिखाई दे रही हैं। यही कारण है कि अभिजीत दीपके को निशाना बनाने की कोशिश की जा रही है,...
वांगचुक को कोसिए, सत्याग्रह को नहीं – अरुण कुमार त्रिपाठी
कृतघ्नता दिल्ली के स्वभाव में है। चूंकि दिल्ली भारत की राजधानी है इसलिए वह स्वभाव एक चरित्र बनकर पूरे देश में व्याप्त हो गया है। इसीलिए ‘जनसत्ता’ अखबार के संस्थापक संपादक प्रभाष जोशी का...
















