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खब्बू से छविनाथ पाण्डेय तक

by Rajendra Rajan
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— योगेन्द्र नारायण —

ब्बू और छविनाथ पाण्डेय दो नहीं एक ही व्यक्ति हैं, लेकिन खब्बू एक बालक का अभिशप्त नाम है, जो उसके जन्म लेते ही मिला और छविनाथ उस बालक का अर्जित नाम है, जिसे उसने कदम-कदम पर लड़कर पाया। यदि यह बालक इतना जुझारू न होता तो ज्योतिषी द्वारा दिये इस नाम को, खब्बू जलालपुर माफी के खेतों और मेढ़ों पर खाकर खुद भी खतम हो चुका होता और उस बालक पर कुछ लिखने की जरूरत ही नहीं रहती। गांव जवार के लोग भी उसे कब का भूल चुके होते। बकौल छविनाथ पाण्डेय- ‘मैं बड़ी मनहूस घड़ी में माता के गर्भ में आया था। कम से कम मेरे घर के लोग बहुत दिनों तक ऐसा ही कहते थे। मां तो अभागा कहती ही थीं। वे कहा करतीं- ‘अगर अभागा न होता तो बाप को खाकर जन्म न लेता।’ मेरा जन्म पिता के मरने के एक मास छब्बीस दिन बाद हुआ था। हमारी एक काकी हैं। उन्होंने मेरा नाम ही खब्बू रख दिया था। खब्बू का अपभ्रंश ‘गब्बू’ हो गया और बहुत दिनों तक मैं इसी नाम से पुकारा जाता था। ‘छविनाथ’ नाम तो केवल स्कूल के रजिस्टर में था।’

मिर्जापुर जिले के जलालपुर माफी नामक गांव में सतुआ संक्रान्ति के दिन सन 1890 ई. में जनमे छविनाथ पाण्डेय ने गांव पर ही पढ़ाई शुरू की। स्कूल क्या था, ‘पढ़ने में तेज था और मन लगाकर पढ़ता भी था। हमारे मुन्शीजी श्री जीवधन सेठ मुझे मानते भी थे। मुन्शी जी पढ़ाते भी थे और अपना पेशा सोनारी भी करते थे। इसलिए जब-तब अपना-अपना क्लास हम लोगों को संभालना भी पड़ता था। …. स्कूल की हालत संतोषजनक नहीं थी। मुन्शीजी अधिकतर गढ़ाई का काम करते। चार रुपये वेतन में गुजारा कैसे होता? शनीचरी हमलोगों की तरफ चलती नहीं। गांव है तो बड़ा, लेकिन उस वक्त दस घर ब्राह्मण, तीन घर राजपूत थे। बाकी कुर्मी, अहीर, तेली, चमार, कुम्हार, नाई, धोबी और जुलाहों की आबादी थी। इसलिए पढ़ने वाले ज्यादातर लड़के मौसमी होते। खेती के काम के वक्त हाजिरी एकदम गिर जाती। इसलिए स्कूल हमेशा लड़खड़ाता रहता। मैं दर्जा एक में पहुुचा तो वह दम तोड़ने लगा। मैं दर्जा एक भी पास नहीं कर सका कि स्कूल टूट गया और मैं लगा ए बी सी घोखने।’ (अपनी बात)

बड़े भाई बनारस पढ़ाई के लिए ले आये। यहां अब अमरकोश और अष्टाध्यायी रटना पड़ा। न पढ़ने पर पिटाई। लिहाजा गांव भागे। करीब 15 किलोमीटर चलकर शाम तक गांव के पास पहुंचे तो सामने गंगा। दस-ग्यारह साल के बालक का दुस्साहस कि तैरकर गंगा पार करने की कोशिश में डूबने की नौबत आ पहुंची। मल्लाहों ने किसी प्रकार बचाया। लेकिन पढ़ना था। दुबारा बनारस आया और हरिश्चन्द्र हाई स्कूल से होकर सेण्ट्रल हिन्दू स्कूल से सन् 1917 में बीए किया। सेण्ट्रल हिन्दू स्कूल का इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सम्बद्धता का यह अंतिम वर्ष था। फिर इलाहाबाद से एलएलबी की डिग्री। सन् 1919 में एक यात्रा पूरी हुई और इसी वर्ष से कर्म क्षेत्र की नयी यात्रा प्रारम्भ हुई।

डिग्री ले लेने के बावजूद वकालत न करने का मन बना। कारण यह कि इन्होंने एक दिन कचहरी में वकीलों की हालत देख ली और समझ लिया कि यह काम उनसे नहीं हो सकेगा। संयोग था कि इसी वर्ष बाबू शिवप्रसाद गुप्त ने ज्ञानमंडल प्रेस की स्थापना कर प्रकाशन का कार्य आरम्भ किया। इस कार्य में शिवप्रसादजी के सलाहकार और सहयोगी थे, श्रीप्रकाशजी। उन्होंने पाण्डेयजी को इस लाइन में न आने की सलाह दी। बाद में 75 रु. मासिक पर रख लिया। ज्ञानमंडल में रखे जाने की घटना काफी रोचक है। इसलिए प्रस्तुत है उन्हीं के शब्दों में- ‘दूसरे दिन से मैं ज्ञानमण्डल के प्रकाशन विभाग में काम करने लगा। दो महीने बाद ही वहां से ‘स्वार्थ’ नाम का मासिक पत्र प्रकाशित हुआ। उसमें भी कुछ काम करना पड़ता था। इसलिए मेरा वेतन 75 रु.से 90 रु. कर दिया गया।

उस समय ज्ञानमण्डल प्रेस के मैनेजर प्यारेलाल भार्गव थे। हिसाब-किताब में वे बड़े कच्चे थे। ज्ञानमंडल प्रेस में उन्होंने साल भर तक बाहर का काम किया, लेकिन न तो एक भी काम का कहीं लेखाजोखा था और न एक भी बिल बना था। हम लोग कहा करते थे कि ज्ञानमंडल का हिसाब किताब बा. प्यारेलाल की जेब में रहता है। इससे उनकी नीयत पर किसी तरह का सन्देह नहीं किया जा सकता। बड़े ही ईमानदार, परिश्रमी और साथ ही योग्य व्यक्ति थे, पर थे लापरवाह। वे साल भर से अधिक ज्ञानमंडल प्रेस में नहीं टिक सके। एक दिन वे अलग हो गये और उनके स्थान पर आये बागची साहब। बागची साहब को प्रेस का बहुत ज्यादा अनुभव नहीं था। उम्र भी उनकी ज्यादा थी। उनकी कुछ शिकायत भी बाबू शिवप्रसादजी के यहां पहुंची थी। इसलिए उन्हें एक महीने का पेशगी वेतन देकर अलग कर दिया गया और मैनेजरी का सेहरा बंधा मेरे सिर पर।

एक दिन सबेरे बाबू शिवप्रसाद गुप्त का सिपाही मेरे यहां पहुंचा और बोला- बाबूजी ने लैंडो भेजा है। आपको बुलाया है। मैं उनकी लैंडो से नगवा पहुंचा। नगवा उनकी कोठी पर डॉ भगवानदास और बाबू श्रीप्रकाशजी पहले से ही मौजूद थे। बाबू शिवप्रसाद ने कहा- आप को प्रेस की मैनेजरी सम्भालनी होगी। मैं बड़े असमंजस में पड़ गया। प्रेस का क, ख, ग भी मैं नहीं जानता था। मैंने आनाकानी की, अपनी अयोग्यता और लाचारी प्रकट की, पर एक की भी सुनवाई नहीं हुई। मुझे प्रेस का मैनेजर बना दिया गया और मेरा वेतन 120 रु.मासिक कर दिया गया।’

सन् 1919 से 21 तक डेढ़ वर्ष का ज्ञानमंडल का कार्यकाल सीखने और दक्षता पाने का काल था। चाहे वह प्रेस की मैनेजरी हो, पत्रकारिता हो या अनुवादक का कार्य। इसी दौरान उन्होंने दो पुस्तकों का अनुवाद किया। एक था ‘पश्चिमी यूरोप’ जो वहीं से छपी और दूसरी पुस्तक थी ‘विलुप्त पूर्वी सभ्यता’, जो उनके ज्ञानमंडल छोड़ देने के कारण शायद नहीं छप पायी। ‘उपमा प्रकाशन’ पटना से सन् 1956 में छपी ‘अपनी बात’ में ज्ञानमंडल से अपने सम्बन्ध का उल्लेख करते हुए पाण्डेयजी ने लिखा है – ज्ञानमंडल के काम में मेरा मन खूब लगता था। दैनिक ‘आज’ के प्रकाशित होने से मेरा उत्साह और भी बढ़ गया। परिश्रम अधिक करना पड़ता था, पर उससे एक तरह का असीम आनन्द आता था। दैनिक पत्र हाथ में होने से हम लोग अपने को शक्तिशाली भी अनुभव करने लगते थे।

मुझे तो इससे दो महान लाभ हुए। इसके द्वारा कतिपय हिन्दी के तथा उस समय के राजनीति के महारथियों से परिचय का अवसर मिला। स्व. पं. मोतीलाल नेहरू, स्व. लाला लाजपत राय, स्व. पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्री गणेश शंकर विद्यार्थी, श्री मैथिलीशरण गुप्त आदि महान व्यक्तियों से ज्ञानमंडल और ‘आज’ में ही परिचय हुआ। दूसरे, मुझे कलम थाम्हने आ गया।’

इन सब के बावजूद उन्हें ज्ञानमंडल और ‘आज’ के भीतरी टकराव एवं इसी तरह के अन्य कारणों से ज्ञानमंडल छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा। बाबू शिवप्रसाद गुप्त और श्रीप्रकाशजी के समझाने का भी कोई असर नहीं हुआ। अंत में उन्होंने ज्ञानमंडल की सेवाओं के बदले एक हजार रुपये का एक चेक देना चाहा, परन्तु उसे भी लौटा दिया। बाद में शिवप्रसादजी ने उन्हें नगवा खाने पर बुलाया और विदा करते समय – ‘उन्होंने अपनी कलाई से सोने की घड़ी उतार कर मेरे हाथ में बांधते हुए कहा – यह मेरी यादगार है। इसे अस्वीकार करोगे तो मुझे दुख होगा। इतनी कीमती घड़ी मैं नहीं लेना चाहता था, लेकिन उनकी भावुकता के सामने मेरी दृढ़ता नहीं टिक सकी। मैंने घड़ी स्वीकार कर ली।’

उपमा प्रकाशन से सन् 1955 में छपी ‘अटपटे चित्र’ में पाण्डेयजी ने ज्ञानमंडल प्रेस के प्रारम्भ में ही आये मशीनमैन अब्दुल समद के बेहद प्रेरक चरित्र का चित्रण किया है। ‘अटपटे चित्र’ में उन्होंने अपने गांव से लेकर कलकत्ता, इलाहाबाद और पटना के उन 13 व्यक्तियों को याद किया है जो कभी शिखर पर आना तो दूर, जमीन की सतह से ऊपर तक नहीं आ पाये और नींव के पत्थर ही बने रहे।

कलकत्ता पहुंचने पर महीने भर मटरगश्ती करने के बाद बैजनाथ केडिया के वणिक प्रेस के मैनजर हो गये। उसके साल भर बाद वणिक प्रेस से निकली मासिक पत्रिका ‘साहित्य’ के सम्पादक बनाये गये। उसमें ‘तरंगानन्द’ के नाम से ‘भंग की तरंग’ शीर्षक से व्यंग्य लेख लिखते थे, परन्तु अपने अक्खड़ स्वभाव के कारण उससे इस्तीफा दे दिया। अब अनुवाद ही सहारा बचा। इस समय का वर्णन करते हुए पाण्डेयजी ने लिखा है – बड़ा बाजार के कुछ नवयुवकों ने कुमार सभा पुस्तकालय कायम किया था। राधाकृष्णजी उसके मंत्री थे। उनकी प्रबल इच्छा थी कि ‘यंग इण्डिया’ में महात्मा गांधी ने जितने सम्पादकीय लिखे हैं, सब का हिन्दी अनुवाद, पुस्तक के रूप में, प्रकाशित किया जाय।…….. श्री बाबूलाल राजगढ़िया ने इस काम के लिए कुमार सभा को पांच हजार रु. दिया और अनुवाद तथा प्रकाशन का काम होने लगा। अनुवाद भी मैं ही करता और प्रूफ भी मैं ही देखता। 9 फरवरी को कार्यारम्भ हुआ और 25 जून को तीन खण्डों में 2500 पृष्ठों की पुस्तक मैंने प्रस्तुत कर दी।’

इसके पूर्व 1920-21 में पाण्डेयजी तीन मौलिक उपन्यास ‘सुशीला या स्वर्गदेवी’, ‘स्वार्थी मित्र’ और राजनीतिक उपन्यास ‘प्रोत्साहन’ लिख चुके थे जिनमें ‘स्वार्थी मित्र’ अप्रकाशित रहा। सन् 1921 में ही ‘देशभक्त मेजिनी के लेख’ अनुवाद भी छप गया था। वणिक प्रेस से हटने के बाद बजरंगलाल, शंभुनाथ और पाण्डेयजी ने मिलकर ‘हिन्दी साहित्य कार्यालय’ नामक प्रकाशन संस्था बनायी। तीनों में काम का बंटवारा हुआ कि बजरंगलाल पैसा लगायेंगे, शंभुनाथ विक्रय का काम देखेंगे और छविनाथ पाण्डेय लिखेंगे। पाण्डेयजी ने साल भर में पांच पुस्तकें लिखीं। 1.भगवान की लीला, 2.प्रजा के अधिकार, 3.अमेरिका कैसे स्वाधीन हुआ, 4.प्रेमपुजारी राजा महेन्द्र प्रताप और 5.स्त्री कर्तव्य शिक्षा। परन्तु विक्रय में शिथिलता के कारण यह संस्था डूब गयी।

कोहाट के दंगे से क्षुब्ध पाण्डेयजी को सहारा दिया छोटेलाल कनोडिया, बनारसीलाल केडिया, भगीरथमल कनोडिया और रामकृष्ण मोहता ने। इन लोगों ने उन्हें हेशियन की दलाली के धन्धे में लगाया। इन लोगों के प्रभाव से उन्होंने कांग्रेस छोड़ हिन्दू सभा की सदस्यता ले ली, परन्तु यह सब ज्यादा दिन नहीं चला और डेढ़ साल बाद इसे छोड़ दिया। हालांकि इस दौरान पैसा भी कमाया।

पढ़ाई के बाद हिन्दी की साहित्य सेवा के साथ छविनाथ पाण्डेय के जीवन का नया दौर शुरू हुआ मुजफ्फरपुर से। सन् 1924 में पाण्डेयजी के बनारस में हरिश्चन्द्र स्कूल से ही अभिन्न मित्र और कुढ़नी इस्टेट के मालिक बाबू बचनूजी (विन्दवासनी प्रसाद) कलकत्ता आये और उन्हें अपने साथ ले जाकर कुढ़नी इस्टेट का मैनेजर बना दिया। पाण्डेय जी छह साल तक कुढ़नी इस्टेट की व्यवस्था संभालते रहे और लेखन भी जारी रहा। इस अवधि में उन्होंने सफल जीवन (निबन्ध संग्रह), गोर्की के प्रसिद्ध उपन्यास मदर का ‘मां का हृदय’ नाम से अनुवाद, समाज (नाटक), तालस्ताय के उपन्यास अन्ना कारेनिना का अनुवाद और गोर्की का ही ‘थ्री आफ देम’ का अनुवाद किया।

इसी बीच नमक सत्याग्रह छविनाथजी को अपनी ओर खींचने लगा। बचनू बाबू भी इससे सहमत थे, परन्तु उनकी शर्त थी कि पाण्डेयजी मुजफ्फरपुर को ही अपना केन्द्र बनायें। वे वहां सक्रिय हो गये और प्रचार तथा कार्यकर्ताओं को तैयार करने के लिए गांवों का दौरा शुरू हो गया। पुलिस वहां तो गिरफ्तार नहीं कर पायी, परन्तु गया में गिरफ्तार कर कैम्प जेल लाया गया और वहां से मुजफ्फरपुर भेज दिया गया, जहां उन्हें चार महीने की सख्त कैद और 150 रु. जुर्माने की सजा हुई। जुर्माना न देने पर डेढ़ महीने की कैद और। जेल से छूटने के बाद राजेन्द्र प्रसादजी ने एक दिन बुलाया और ‘सर्चलाइट’ का मैनेजर बना दिया। पाण्डेयजी सन् 1931 से 1940 तक सर्चलाइट से जुड़े रहे। बीच में जनवरी ’32 से जून ’33 तक आन्दोलन में भाग लेने और जेल जाने के कारण उस पद से अलग रहे। सर्चलाइट लिमिटेड संस्था थी। बाबू अनुग्रहनारायण सिंह उसके प्रबन्ध संचालक, बाबू राजेन्द्र प्रसाद उसके अध्यक्ष और नवल किशोर सहाय उसके मंत्री थे। लेकिन सर्चलाइट के असली मालिक मुरली बाबू ही थे। उन्हीं का पत्र पर एकछत्र अधिकार और बोलबाला था। सन् 1937 में प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनी तो छविनाथजी ने इस स्थिति का लाभ उठाया और सर्चलाइट के लिए एक बीघा जमीन ले ली, जिस पर सर्चलाइट का भवन बना।

सर्चलाइट से अलग होने के बाद पाण्डेयजी खड्गविलास प्रेस में आये, परन्तु ज्यादा दिन नहीं रह सके, क्योंकि सन् 1942 का आन्दोलन शुरू हो गया और उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, फिर वहां से हजारीबाग जेल भेज दिया गया। जहां से दो वर्ष बाद छूटते ही पुनः गिरफ्तार कर मिर्जापुर (उ.प्र.) जिले में नजरबंद कर दिया गया। यह नजरबंदी बिहार सरकार के आदेश पर हुई थी। 13 महीने बाद नजरबंदी से मुक्त हुए और पुनः पटना पहुंच गये। पटना का राजनीतिक माहौल अत्यंत दूषित हो गया था। बाबू अनुग्रहनारायण सिंह और श्रीकृष्ण सिंह में भयंकर राजनीतिक संघर्ष चल रहा था। दोनों से मित्रता थी और उनके बीच पड़ने का मतलब पिस जाना था। इसी समय बनारस से ज्ञानमंडल प्रेस के मैनेजर बाबू महताब राय और प्रेस के सुपरिण्टेण्डेट विश्वनाथ प्रसाद पाण्डेयजी को वाराणसी ले आये और जन्माष्टमी 1945 को ज्ञानमंडल का जनरल मैनेजर बना दिया और जनवरी 1946 में पुनः इससे अलग हो गये। पाण्डेयजी ने इस सम्बन्ध में लिखा है कि ‘श्री महताब राय के आग्रह और विश्वनाथ प्रसाद के निवेदन को नहीं टाल सका। यह मेरी सबसे बड़ी भूल थी और आगे चल कर उसके लिए मुझे पछताना पड़ा।’ इस अल्प काल में ही उन्हें डॉ.राजेन्द्र प्रसाद द्वारा अंग्रेजी में लिखी पुस्तक ‘डिवाइडेड इंडिया’ का प्रकाशन शीघ्र ही करना था। पुस्तक का आधा अनुवाद पाण्डेयजी ने किया तथा आधा अनुवाद दूसरे व्यक्ति ने किया। पुस्तक सन् 1946 में ‘खण्डित भारत’ नाम से प्रकाशित हुई।

पाण्डेयजी को बनारस में छात्र जीवन से ही नाटकों का शौक था। वहां उनका सम्बन्ध नाट्य परिषदों से भी था तथा कई नाटकों में अभिनय भी किया था। यह शौक कलकत्ता में भी कायम रहा तथा पटना आने पर बिहार नाट्य समिति भी कायम की गयी परन्तु वह ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सकी। बाद में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का भवन बन जाने पर गोपाल कृष्ण प्रसाद और बाबू अयोध्या प्रसाद के सहयोग से नाट्य परिषद का गठन किया गया। लगता था कि परिषद दीर्घजीवी होगी, परन्तु ’42 का आन्दोलन छिड़ जाने के कारण उसने भी दम तोड़ दिया। नाटकों से लगाव का उदाहरण तो इसी से समझा जा सकता है कि उन्होंने सन् 1931 में ‘समाज’ नाम का नाटक लिखा, जिसकी समीक्षा निरालाजी ने की थी।

सर्चलाइट प्रेस, स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी, जेल, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन, नाट्य परिषद और इलाहाबाद से प्रकाशित ‘देशदूत’ के लिए कॉलम लिखने के साथ-साथ पुस्तकों का अनुवाद और मौलिक पुस्तकें लिखने का क्रम जारी रहा। अब तक वे करीब 85 पुस्तकें लिख चुके थे, जिनमें से करीब दस पुस्तकें आर्थिक एवं अन्य कारणों से प्रकाशकों के यहां ही बिना छपे पड़ी रह गयीं। पाण्डेयजी सन् 1947 से 1953 तक बिहार के वयस्क शिक्षा बोर्ड के प्रकाशनाधिकारी थे। ’53 में वहां से अवकाश ग्रहण करने के बाद उनके लेखन में और गति आयी और सन् 1953 में ज्ञानपीठ से ‘अस्पताल’ (उपन्यास), सन् ’54 में वहीं से ‘राष्ट्रपिता’, और कुसुम प्रकाशन से ‘रूपजाल’, ट्राटस्की की हत्या (उपन्यास) तथा ‘हिन्दी की प्राचीन कहानियां’, उपमा प्रकाशन से ‘सुन्दर कहानियां भाग-2, मूर्खराज, पढ़ो और हंसो, सिर से पैर तक, यम से भिड़न्त, पारा से सोना, अनोखा चिड़ियाखाना और आग के शोले तथा 1955 में कलानिकेतन से कलंक (उपन्यास), चलता पुर्जा (कहानियों का संग्रह), जादू का हिरन (बच्चों की कहानियां) प्रकाशित हुईं। इसी वर्ष उपमा प्रकाशन से अटपटे चित्र और आपका बच्चा भी प्रकाशित हुए। इससे पहले वयस्क शिक्षा बोर्ड के लिए 1949 में ‘सुखी जीवन’ और ‘हिन्दू त्योहारों का इतिहास’ लिखा। सन् 1950 में अजन्ता प्रेस से डी.एस. लारेन्स के उपन्यास ‘रेनबो’ का अनुवाद ‘इन्द्रधनुष’ नाम से प्रकाशित हुआ। सन् 1951 में इसी प्रेस से मां की ममता (उपन्यास), महात्मा गांधी, देशरत्न राजेन्द्र प्रसाद और विद्रोही सुभाष (जीवनी) प्रकाशित हुए। सन् 1947 में ही किताब घर से ‘पुस्तकालय और उसका संचालन’ नाम की पुस्तक छप चुकी थी। पाण्डेयजी के अन्य महत्वपूर्ण अनुवादों में टालस्टाय के अन्ना कैरेनिना का अनुवाद अन्ना नाम से, अव्टन सिंक्लेयर के दो उपन्यासों आयल और दि जंगल का अनुवाद क्रमशः तेल और जंगल नाम से, एच.जी.वेल्स के उपन्यास इनविजिबल मैन का अनुवाद ‘अनोखा आदमी’ नाम से, सरवांतीस के उपन्यास डान क्विक्जोट का अनुवाद इसी नाम से, अलेक्जेण्डर ड्यूमा के उपन्यास थ्री मस्केटियर्स का अनुवाद ‘वे तीनों’ नाम से, पुश्किन, जार्ज गिसिंग, गाल्सवर्दी, अर्नाल्ड वेनट, विस्लोव चेखव, परहाल स्टोप, जार्ज स्टेनी गोर्नसम, स्टेफन वीग, लिम्बे एडम, एच एच मुनरो, एच ई वेट्स, कोरेल कापेक और शेलोखोव की कहानियों का अनुवाद ‘तूफान’ नाम से तथा लेडी मुरासाकी शिबुकु के प्रसिद्ध उपन्यास गेन्जी की कहानियां का अनुवाद किया, जो साहित्य अकादमी से प्रकाशित हुआ। ग्यारहवीं सदी में लिखित इस उपन्यास को दुनिया का पहला उपन्यास माना जाता है। यदि यह दुनिया का पहला उपन्यास है तो सातवीं सदी में वाणभट्ट द्वारा संस्कृत में लिखी गयी ‘कादम्बरी’ को क्या माना जाएगा? उन्होंने बांग्ला के प्रसिद्ध लेखक चारुचन्द्र बन्दोपाध्याय के उपन्यास विषाक्त प्रेम का अनुवाद ‘हेरफेर’ नाम से भी किया। काली किंकर दत्त लिखित कुंवर सिंह-अमर सिंह का उनके द्वारा किया गया अनुवाद और मुद्रण कला बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से प्रकाशित हुई।

हिन्दी जगत को पाण्डेयजी की महत्त्वपूर्ण देन बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का स्वरूप और उसका भवन है। सम्मेलन के भवन के लिए भूमि प्राप्त करना और उसपर वर्तमान भवन का निर्माण पाण्डेयजी का जुनून था। लगातार स्वयं खड़े रह कर जिस तरह उन्होंने इस भवन का निर्माण कराया, कहा जाता है कि भवन के निर्माण में उन्होंने ईंट तक ढोई। हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना सन् 1919 में मुजफ्फरपुर में हुई तथा किराये के कमरे में लोगों के दान से सम्मेलन की कार्रवाई चलती थी, परन्तु सन् 1934 में आये भूकम्प ने सम्मेलन का जो कुछ था सब नष्ट कर दिया। पाण्डेयजी उस समय मुजफ्फरपुर में ही आजादी की लड़ाई में सक्रिय थे। वहीं पर वे सम्मेलन से भी जुड़े थे। इसी समय भूकम्प से ठीक पहले भागलपुर में सम्मेलन का अधिवेशन हुआ था, जहां पर दिनकरजी ने अपनी कविता ‘हिमालय’ सुनायी। यहीं से पाण्डेयजी और दिनकरजी में घनिष्टता हो गयी जो इतनी बढ़ी कि दोनों ने पटना में एक ही जगह अपने मकान बनवाये।

सन् 1935 में पाण्डेेयजी सम्मेलन पटना लाये और उसके लिए खुद के भवन के प्रयास में जुट गये। उस समय बिहार में कांग्रेस की सरकार बन गयी थी। पाण्डेयजी ने अवसर का लाभ उठाया और सम्मेलन के लिए सरकार से महज दस रुपये मालगुजारी पर भूमि प्राप्त कर ली तथा भवन निर्माण के प्रयास में जुट गये। सन् 1937 से 1942 तक बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधान मंत्री रहे तथा सन् 1952 में उन्हे सम्मेलन का सभापति भी चुना गया, परन्तु सम्मेलन का यह कार्यकाल बाद में उतना सहज नहीं रहा। उन पर तरह-तरह के आरोप लगे, हिन्दी-हिन्दुस्तानी का झगड़ा खड़ा किया गया। यहां तक कि उन्हें गैरबिहारी कह कर हटाने का प्रयास भी किया गया। उन्हीं के शब्दों में- ‘मेरा मंत्रित्व काल शुरू में बड़ी शांति के साथ बीता; क्योंकि उस वक्त तक सम्मेलन के पास किसी तरह की स्थायी या अस्थायी सम्पत्ति नहीं थी, इसलिए किसी को सम्मेलन के प्रति रुचि नहीं थी। स्थायी समिति या कार्य समिति की बैठक करने कि लिए धर-पकड़ कर सदस्यों को बुलाना पड़ता था। लेकिन ज्यों-ज्यों सम्मेलन के पास सम्पत्ति होती गयी, त्यों-त्यों सम्मेलन में – सम्मेलन के कामों में नहीं- लोगों की रुचि बढ़ती गयी और काम में अड़ंगा धीरे-धीरे लगने लगा।’

राजनीति से अलग हो जाने और केवल यह अनुभव करने कि ‘कांग्रेस किस ओर’ के अलावा उससे प्रत्यक्ष सम्बन्ध चवन्नियां सदस्यता की भी नहीं रही। परन्तु सम्मेलन से प्रत्यक्ष रूप से अलग हो जाने के बाद भी वे हमेशा उसकी मदद करते रहे। वे बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के भी संचालक मंडल के सदस्य रहे, परन्तु उसके साथ भी इसी तरह सहयोग का रिश्ता बना रहा।

सन् 1967 में पटना में मैं उनसे मिला था, पिताजी भी साथ थे। उन लोगों में करीब एक घंटे तक बातें हुईं। क्या बातें हुईं, यह मुझे याद नहीं परन्तु उस समय भी वे काफी व्यस्त थे तथा अगल-बगल के अपने श्वेत केशों के साथ उनका व्यक्तित्व ऋषि तुल्य काफी प्रभावी लगा। दूसरी मुलाकात संभवतः 1972 में हुई। वे अपने भतीजे श्री काशीनाथ पाण्डेय के अगस्तकुण्डा (वाराणसी) स्थित आवास पर आये हुए थे। उस समय वे कुछ पढ़ रहे थे। उस समय भी पिताजी से उनकी काफी बातें हुईं, परन्तु उन बातों में उस समय मेरी कोई रुचि नहीं थी। इस बात पर आश्चर्य जरूर हुआ कि अब वे बाहर टहलने नहीं जाते। घर की छत पर ही सौ चक्कर लगा लेते हैं। उस उम्र के आदमी का इतना चलते रहना, जरूर आश्चर्यजनक लगा। मिलने के काफी पहले ही एक किताब ‘देशभक्त और देशद्रोही’ पढ़ चुका था। आयरलैण्ड की राजक्रान्ति पर आधारित यह उपन्यास अति रुचिकर लगा। पुस्तक ज्ञानमंडल से छपी थी परन्तु उसपर लेखक का नाम नहीं था। बाद में मालूम हुआ कि उसके लेखक पाण्डेयजी ही थे।

जब समझना शुरू किया तो उनसे मुलाकात नहीं हो पायी। उस समय मेरी राजनीतिक और लेखकीय व्यस्तता बढ़ रही थी, परन्तु उससे क्या? समय तो रुकता नहीं। धीरे-धीरे पाण्डेय जी की अवसान बेला आ गयी और जलालपुर माफी (मिर्जापुर) में जनमा और खब्बू नाम से पहचाना जानेवाला यह बालक हिन्दी और हिन्दुस्तान के लिए ही विकसित होता हुआ अंत में छह जून 1986 को पटना में अपनी इस यात्रा को पूरी कर दधीचि की तरह वहां की मिट्टी में मिल गया।

न हन्यते हन्यमाने शरीरे।

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