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दुनिया में बढ़ती आर्थिक गैरबराबरी 

by Samta Marg
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दुनिया में बढ़ती आर्थिक गैरबराबरी 

और भूमंडलीकरण(नवसाम्राज्यवाद)

भूमंडलीकरण (नवसाम्राज्यवाद) पूंजीवाद का ही उच्चतम स्वरूप है। अमरीका के नेतृत्व में नवसाम्राज्यवाद के मौजूदा संस्करण “भूमंडलीकरण” के अंतर्गत WTO, IMF, और WB की त्रयी द्वारा परिसंचालित विश्व-व्यवस्था में दो चीज़ें  बड़ी तीव्र गति से बढ़ी हैं-

“अमीरों की अमीरी और ग़रीबों की ग़रीबी।”

और यह सच है कि दुनिया में ‌गैरबराबरी इतनी बेतहाशा बढ़ी है कि आय, संपत्ति और संसाधन चंद देशों, पूंजीपतियों और‌ कंपनियां ‌के हाथों में ‌सिमट गए हैं। मानव इतिहास में धन का इतना अभूतपूर्व और अविश्यनीय संकेंद्रीकरण, इतनी गहरी आर्थिक गैरबराबरी-आर्थिक विषमता- ग़रीबी, कुपोषण और भूखमरी- कभी नहीं थी।

आज हालत यह हो गई है कि दुनिया की कुल परिसंपत्ति का 72% भाग धरती के केवल 20 सर्वाधिक धनी लोगों के हाथों में सिमट गया है। आज की कुल वैश्विक संपत्ति 431 अरब डौलर ($431 trillion) है। विगत बीस वर्षों के दौरान अरबपतियों की संपत्ति 13.5 गुणा की रफ्तार से बढ़कर 13.1 अरब डौलर हो गई है। मौजूदा रफ्तार से अगले 40 वर्षों में अरबपतियों की संपत्ति बढ़कर 2.3 quadrillion हो जाएगी और फिर कुछ ही समय में दुनिया के लगभग सभी संसाधनों पर उनका कब्जा हो जाएगा।

दुनिया के मौजूदा 2,755 खरबपतियों में – एलोन मस्क, जेफ बेज़ोस, बर्नार्ड आर्नोल्ड, वारेन बफेट जैसे जो सबसे बड़े खरबपति हैं, वे दुनिया के 13.1 डौलर खरब के मालिक हैं। उनकी संपत्ति निचली पायदान के 4 बिलियन लोगों की संपत्ति से भी अधिक है।

दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति:

1. एलन मस्क: 294  बिलियन डॉलर

फोर्ब्स की अद्यतन सूची के अनुसार टेस्ला के सीईओ एलन मस्क आज के समय में दुनिया के सबसे अमीर व्‍यक्ति हैं। एलन मस्क के पास कुल सम्पति 294 बिलियन डॉलर है। इनका नाम 21 शताब्दी के सबसे क्रांतिकारी लोगों में आता है। इनकी कंपनी टेस्ला इलेक्ट्रिक कार बनाती है। इनकी कंपनी ‘फ्यूचर’ भी इलेक्ट्रिक कार बनाती है। एक अन्य कंपनी स्पेस एक्स है, जो स्पेस यात्रा को आसान बनाने के लिए काम कर रही है।

2. जेफ बेजोस-200 बिलियन डॉलर

अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस इस वर्ष के मध्य तक पहले स्‍थान पर काबिज थे, लेकिन वर्तमान समय में वे दुनिया के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति है। इनकी कुल संपत्ति 200 बिलियन डॉलर है। अमेजन को इन्होने साल 1994 में फाउंड किया था। शुरुआत में इनकी कंपनी सिर्फ किताबें बेचा करती थी, लेकिन आज ये कंपनी दुनिया के सबसे बड़ी e-commerce कंपनी है।

3. बर्नार्ड अरनॉल्ट- 170 बिलियन डॉलर

बर्नार्ड अरनॉल्ट इस लिस्‍ट में अब तीसरे स्थान पर पहुंच गए हैं, हालांकि वे इस साल पहले स्‍थान पर भी पहुंचे थे, लेकिन शेयरों में गिरावट के कारण इन्‍हें नुकसान हुआ। ये एक फ्रेंच इन्वेस्टर और LMVH के चेयरमैन और सीईओ है। वर्तमान समय में इनकी कुल सम्पति 170 बिलियन डॉलर है। LMVH एक लक्ज़री ब्रांड है जो  बहुत सारे महंगे प्रोडक्ट्स जैसे की घडी, कपड़े, ज्वेलरी, परफ्यूम आदि बनाती है।

4. मार्क जुकरबर्ग- 132 बिलियन डॉलर

फेसबुक के फाउंडर मार्क जुकरबर्ग दुनिया के चौथे सबसे अमीर व्यक्ति है, मार्क जुकेरबर्ग अभी कुल 137 बिलियन डॉलर के मालिक है। इन्होंने फेसबुक को फरवरी 2004 में फाउंड किया था। इसके अलावा मार्क ने साल 2012 में इंस्टाग्राम और साल 2014 में व्हाट्सएप को अरबों की डील कर खरीद लिया, और आज ये इन सभी कंपनियों से अरबों कमा रहे हैं।

5. बिल गेट्स- 128 बिलियन डॉलर

बिल गेट्स अमीरों की लिस्‍ट में अभी पांचवें स्‍थान पर बने हुए हैं। इनके पास अभी कुल सम्पति 128 बिलियन डॉलर है, जो इन्हे दुनिया का पांचवां सबसे अमीर आदमी बनाता है। बिल गेट्स कोई पहचान की मोहताज नहीं है, कुछ साल पहले तक गेट्स बहुत लम्बे समय तक दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति रहे चुके है। इनकी मुख्य आय का स्रोत माइक्रोसॉफ्ट कंपनी है, जिसके ये संस्थापक है इसके अलावा गेट्स ने कई सारे अन्य क्षेत्रो में भी अपने पैसा इन्वेस्ट कर रखा है। जैसे- रिटेल, साइंस, एनर्जी, इंजीनियरिंग इत्यादि।

6. लैरी पेज- 126 बिलियन डॉलर

दुनिया के सबसे प्रसिद्ध सर्च इंजन गूगल के संस्थापक लैरी पेज के पास इस समय कुल 126 बिलियन डॉलर की सम्पति है, जो इन्हें दुनिया का छठा सबसे अमीर आदमी बनाता है, गूगल ने साल 2006 में अरबो की डील कर यूट्यूब को खरीद था, इसके अलावा गूगल ने अन्य कई सारे टेक्नोलॉजी के प्रोडक्ट्स भी है। जिनसे इन्हे काफी कमाई होती है।

7. सेर्गेय ब्रिन- 121 बिलियन डॉलर

सेर्गेय ब्रिन भी गूगल के को-फाउंडर है और अमीरों के लिस्ट में ये सातवें स्‍थान पर मौजूद हैं। इनकी कुल सम्पति 121 बिलियन डॉलर है। जो की दुनिया का सातवां सबसे अमीर आदमी बनाता है। ब्रिन ने लैरी पेज के साथ मिलकर गूगल को दुनिया के दिग्गज कंपनी बनाया। आज गूगल बहुत लम्बे समय से दुनिया के टॉप सर्च इंजन कंपनी बनी हुई है।

8. लैरी एलिसन- 106 बिलियन डॉलर

कंप्यूटर टेक्नोलॉजी कंपनी ओरेकल के मालिक लैरी एलिसन विश्व के आठवें सबसे अमीर व्यक्ति है, इनके पास कुल सम्पति 106 बिलियन डॉलर है। जो इन्हें दुनिया के अरबपतियों के लिस्ट में शामिल करती है। इसके अलावा ये अमेरिका के 41वें सबसे बड़े आइलैंड के मालिक भी हैं।

9.  स्टीव बाल्मर- 105 बिलियन डॉलर

माइक्रोसॉफ्ट कार्पोरेशन के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी स्टीव बाल्मर की कुल संपत्ति 105 अरब डॉलर से ज्‍यादा हो गई है। दौलत की इस ऊंचाई पर पहुंचने वाले वे दुनिया के 9वें व्यक्ति बन गए हैं। ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के अनुसार ओरेकल कॉर्पोरेशन के संस्थापक लैरी एलिसन को इस साल नुकसान हुआ है, लेकिन वे इस स्‍थान पर बने हुए हैं।

10. वारेन बफेट- 102 बिलियन डॉलर

बर्कशायर हैथवे के चेयरमैन और सीईओ वारेन बफेट दुनिया के 10वें सबसे धनी व्यक्ति है। इनका नाम दुनिया के सबसे सफल इन्वेस्टर में आता है। वर्त्तमान समय में इनके पास 102 बिलियन डॉलर की सम्पति है और ये दुनिया के 10 वें सबसे धनी व्यक्ति हैं। 

11. मुकेश अंबानी, रिलायंस, जियो $81.6B

12 अमांसिओ ओर्टेगा जारा $74.2B 

13 स्टीव बाल्मर  $73.5B 

14 फ्रांक्वायस बटेनकोर्ट मेयर्स $71.9B 

15 एलीस वाल्टन वालमार्ट $68.7B 

16 जिम वाल्टन वालमार्ट $68.5B 

17 रौब वाल्टन वालमार्ट $68.2B 

18 मा हुआटेंग $61.3B 

19 कार्लोस स्लिम हेलु $60.8B 

संयुक्त राष्ट्रसंघ फूड सिक्योरिटी ओर्गानाईजेसन के अनुसार: “दुनिया के सबसे बड़े पूंजीपति एलोन मस्क की संपत्ति का मात्र 2% भाग दुनिया से भूखमरी मिटा सकता है।”

भूमंडलीकृत विश्व में तेजी से बढ़ती आर्थिक गैरबराबरी, ग़रीबी और भूखमरी के कारण समाजों में असंतोष,अफरन और बेचैनी पैदा हुई है। भीषण और भयावह असमानताओं ने दुनिया में अशांति, हिंसा और आतंकवाद की जमीन तैयार की है।

भूमंडलीकरण की आंधी में हाशिए पर जीने वाले, वंचित, उपेक्षित, बेबस, लाचार लोगों के हितों ‌और उनके मानवाधिकारों की रक्षा करने की चिंता गौण होती जा रही है।

भूमंडलीकरण के Trickle Down सिध्दांत के अंतर्गत यह दावा किया गया था कि इसका लाभ रिस-रिस कर नीचे के तबकों तक पहुंचेगा। लेकिन यह गलत साबित हुआ। इससे दुनिया के गरीबों को कोई राहत नहीं मिली। उल्टे उनके कष्टों और परेशानियों में वृध्दि हुई, रिसरिस कर (Trickle Down Effect) का लाभ सबसे निचले पायदान पर, हाशिए पर जीनेवाले वंचित, उपेक्षित, शोषित, दलित, दमित  लोगों तक पहुंचने का तो सवाल ही नहीं उठता।

आज पूरी दुनिया का अन्न उत्पादन पर्याप्त से कहीं बहुत अधिक है। इतना अधिक कि धरती पर रहने वाला कोई भी इंसान भूखमरी और कुपोषण का शिकार नहीं हो सकता। लेकिन इसके बावजूद भी दुनिया के 811 करोड़ -9.9% लोग- भूखमरी के शिकार हैं। वैश्विक स्तर पर 2019 से 2020 के बीच लगातार बढ़ती आर्थिक असमानताओं ने 200 करोड़ से अधिक लोगों को भूखमरी और कुपोषण के अंधेरे में धकेला है। 

आज 690 करोड़ लोग रोज रात में भूखे ही सो जाते हैं। हर महीने 5.5 करोड़ लोग गंदी बस्तियों (स्लम्स) की जिंदगी जीने को अभिशप्त हो रहे हैं। प्रति वर्ष 2.3 करोड़ बच्चे कुपोषणग्रस्त हो‌ रहे हैं। प्रति वर्ष 9.9 करोड़ लोग भूखमरी से मर जाते हैं।

हर बार जब दुनिया के अरबपतियों का मुनाफा 62 करोड़ डौलर या उससे अधिक बढ़ता है तो 60 लोग स्लम्स में धकेल दिए जाते हैं और 30 बच्चे भूखमरी से मर जाते हैं।

भूमंडलीकरण अपने मूल अर्थ में “भूमंडीकरण” यानी कि “बाजारीकरण” है। बाजारवाद एक औजार है नवसाम्राज्यवाद का, जिसके अंतर्गत यह दुनिया और कुछ नहीं, सिर्फ खरीदने-बेचने की जगह है। एक मंडी है, एक बाजार है। बाजारवाद उन्हीं लोगों को अपनी मंडी में जगह देता है जिनमें खरीदने- बेचने की क्षमता ‌होती है। जिन लोगों में खरीदने- बेचने की जितनी  क्षमता होती है, मंडी में उनके लिए उतनी ही जगह होती है। जो भूमंडीकरण या बाजारीकरण के अनुकूल नहीं है, उसके लिए यह भूमंडल कोलाहल- कलह से घिरा, खंडित – विखंडित और कुरूपताओं से भरा हुआ है।

दुनिया में वे गरीब-गुरबा भूखे-नंगे लोग, हाशिए पर जीने वाले लोग फालतू के बोझ हैं, जो बाजार से गुजरते तो हैं, लेकिन खरीददार नहीं होते, क्यों कि उनकी जेबें खाली रहतीं हैं। वे दुनिया में रहतेे तो हैं, मगर दुनिया के‌ तलबगार नहीं होते हैं।

बाजारवाद जनतंत्र की‌ समतामूलक प्रवृत्ति से मेल नहीं खाता। दोनों में ‌टकराव‌ का संबन्ध है। बाजारवाद जनतंत्र को फालतूपने ‌के एहसास से जोड़ता है। 

बाजारवाद की धूम में मानवीय अस्मिता, गरिमा और मानवाधिकारों की गुंजाइश नहीं है। आज सम्मोहक विज्ञापनों द्वारा व्यक्ति को उपभोक्ता में बदला जा रहा है। इच्छाओं का जरूरतों से कोई संबंध नहीं रह गया है।

इतिहास का रथ वही हांकते हैं, जिनके पास ज्ञान- विज्ञान की, विचार- विमर्श की, विचारधारा की शक्ति होती है। इतिहास अपनी यात्रा विचारधारा के बलबूते ही तय करता है। इतिहास का रथ हांकने वाले प्रभुत्वशाली वर्ग ने मुक्त बाजारवाद को सुदृढ़ किया। प्रभुत्वशाली वर्ग विचारधारा की आक्रामकता से अपनी बात मनवाता है।

सामाजिक-राजनीतिक शक्ति सदैव विचारधारा के माध्यम से सक्रिय और ताकतवर बनती है। विश्व में शक्ति के खेल में विचारधारा का ही महत्त्व है। शक्ति संपन्न देश ही निर्धारित करते हैं कि क्या कहना है और क्या नहीं कहना है और जो कहना है उसे कैसे कहना है। 

भूमंडलीकरण की आड़ में पश्चिम वालों ने एशिया- अफ्रीका के देशों  की छाती पर सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का झंडा गाड़ दिया। इन देशों में पश्चिमी देशों के रहन-सहन और ख़ान-पान का तेजी से अनुकरण किया जाने लगा। अमरीकी-अंग्रेजी फिल्मों की पसंदगी और लोकप्रियता बढ़ने लगी।

आज दुनिया एक उद्दयाम, अनियंत्रित और बेलगाम कारपोरेट बाजारवाद के हवाले हो गई है। बेलगाम कारपोरेट बाजारवाद के कारण दुनिया में सामाजार्थिक विषमता, गैरबराबरी और सामाजिक अन्याय में वृध्दि हुई है। बाजारीकरण के तहत यह सुनहरा सपना दिखाया गया था कि मुक्त बाजार, पूंजी, नई टेक्नोलॉजी और राज्य की कम होती भूमिका पर आधारित अर्थव्यवस्था से‌ तीसरी दुनिया के देशों की कायापलट हो जाएगी, अवसर बढ़ने से वे तेजी से विकास कर सकेंगे और जनता की खुशहाली बढ़ेगी। लेकिन व्यवहार में इन नीतियों के लाभ की‌ भारी भरकम मलाई अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मिली। अमीर और गरीब देशों के बीच की खाई चौड़ी होती गई है। रोजगार के अवसर घटे। प्रकृति का गैर आनुपातिक ढंग से दोहन कर पर्यावरण को  नुक़सान पहुंचाया गया है।

बाजारवाद जनतंत्र की‌ समतामूलक प्रवृत्ति से मेल नहीं खाता। दोनों में ‌टकराव‌ का संबन्ध है। बाजारवाद जनतंत्र को फालतूपने ‌के एहसास से जोडता है। बाजारवाद एक औजार है भूमंडीकरण अथवा नवसाम्राज्यवाद का। इसमें मानवीय अस्मिता, गरिमा और मानवाधिकारों की गुंजाइश नहीं है। भूमंडीकरण अथवा नवसाम्राज्यवाद के तहत आज सम्मोहक विज्ञापनों द्वारा व्यक्ति को उपभोक्ता में बदला जा रहा है। इच्छाओं का जरूरतों से कोई संबंध नहीं रह गया है।

भूमंडीकरण का चेहरा मानवीय नहीं है: (Globalization does not have a human face) बाजारवाद अपने साथ जिस पूंजी को लाता है वह अपने स्वभाव से ही अतिचंचल होती है। ऐसी पूंजी में श्रम से ‌सहमेल का भाव नहीं होता, जिससे उसका मानवीय चेहरा विद्रुप हो जाता है। 

भूमंडीकरण की तस्वीर वैसी रुपहली नहीं बनी जितनी पेश की गई थी। सच तो यह है कि उदारीकरण, निर्यातोन्मुखी अर्थनीति, भूमंडीकरण, निजीकरण, विश्व बाजार, ढांचागत सुधार सदृश शब्दांडबरों से सुसज्जित नवसाम्राज्यवाद ने‌ इस समय पूरी ‌दुनिया में हड़कंप मचा रखा है।

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