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क्या हमारी दूसरी आजादी कायम है?

by Rajendra Rajan
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— अनिल सिन्हा —

पातकाल को लेकर मौजूदा पीढ़ी को ज्यादा मालूम नहीं है। इसने भारतीय लोकतंत्र को एक नहीं भूलने लायक झटका दिया था। अंग्रेजों से लड़कर आजादी लेनेवाली पीढ़ी पूरी तरह निश्चिंत थी कि इस देश में सब कुछ हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र को कोई हिला नहीं सकता है। आपताकाल ने बता दिया कि लोकतंत्र पर कभी भी हमले हो सकते हैं और इसे बचाए रखने के लिए जनता का सजग रहना बहुत जरूरी है।

साठ के दशक में लोकतंत्र का माहौल ऐसा था कि डॉ राममनोहर लोहिया यह सवाल करते रहते थे कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर सरकार कितना खर्च कर रही है। साल 1962 में चीन के साथ युद्ध के समय भारतीय जनसंघ जैसी छोटी पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी की मांग पर नेहरू ने संसद का सत्र बुलाया और युद्ध पर चर्चा की। उन्होंने सारी आलोचनाओं का जवाब दिया। सत्तर के दशक की शुरुआत में भी सवाल पूछने का आलम यह था कि सरकार के हर फैसले पर सवाल उठाया जा सकता था।

बहुत कम लोगों को पता है कि आंध्र प्रदेश के नक्सलबाड़ी नेता किष्टा गौड़ तथा भुम्मैया की फांसी की सजा माफ करने की माँग करनेवालों में जयप्रकाश नारायण भी शामिल थे। विरोधी विचार रखनेवालों के पीछे पुलिस या खुफिया एजेंसियों लगाने का चलन नहीं था।

उन दिनों मीडिया में कोई राजनीतिक विश्लेषक नाम का प्राणी नहीं होता था और पार्टी-प्रवक्ता की हिम्मत नहीं थी कि सत्ता से सवाल पूछनेवाले को देशद्रोही बताए और पाकिस्तान जाने की सलाह दे।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध जीत लिया था और उनका सितारा बुलंद था। लेकिन इस बड़ी विजय को राजनीतिक रूप से भुनाने का प्रयास उन्होंने नहीं किया। सेना के पराक्रम को राजनीति से जोड़ने की कोशिश नहीं की। उन्होंने ‘गरीबी हटाओ’ के नारे पर चुनाव जीता। लेकिन वह शासन चलाने में लगाातार निरंकुश होती गईं। कांग्रेस पार्टी की मशीनरी पर उनका कब्जा हो गया था और वह मनमाने ढंग से फैसले लेने लगी थीं। शासन चलाने में वह अपने छोटे बेटे संजय गांधी की मदद लेने लगीं। ऐसे माहौल में ही जेपी आंदोलन शुरू हुआ। उसका मुद्दा था बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और महंगाई को रोकने में कांग्रेस सरकार की विफलता।

जेपी महसूस कर रहे थे कि देश में वैसा लोकतंत्र नहीं है जैसा होना चाहिए। इसलिए उन्होंने राज्य तथा केंद्र सरकार के खिलाफ पनप रहे गुस्से को एक दिशा देने का निश्चय किया। उन्हें लगा कि कांग्रेस को गद्दी छोड़नी चाहिए और जनता को यह अधिकार हो कि वह जब चाहे सरकार को हटा दे।

जेपी आंदोलन बेहतरीन लोकतंत्र के लिए था। लोग चुनी हुई सरकार को हटाने के लिए कह रहे थे क्योंकि उन्हें लगता था कि नागरिक सबसे ऊपर है। जनता का अपने अधिकारों पर इस तरह का भरोसा होना यही साबित करता है कि लोकतंत्र की जड़ें मजबूत थीं। लेकिन जनता की ताकत को इंदिरा गांधी स्वीकार करने को तैयार नहीं थीं। घटनाएं इस तरह से आगें बढ़ीं कि उन्हें आपातकाल लगाना पड़ा। आपातकाल का सहारा लेने के इंदिरा गांधी की परिस्थितियों से आज की

परिस्थितियों की तुलना करें तो अंदाजा होता है कि लोकतंत्र आज कितना कमजोर हो चुका है। आज आवाज उठाना ही कठिन हो गया है।

अदालत ने इंदिरा गांधी के चुनाव को जिन दो मुद्दों पर रद्द किया था वे भी आज बेमानी लगेंगे। एक मुद्दा उनके विशेष अधिकारी यशपाल कपूर से संबंधित था। उनपर यह आरोप था कि सरकारी पद से इस्तीफा देने के सप्ताह भर पहले से ही उन्होंने चुनाव प्रचार में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। दूसरा आरोप था कि उनकी चुनाव सभाओं के मंच बनाने में सरकारी अधिकारियों ने मदद की थी। दोनों आरोप सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग से संबंधित थे।

इसकी तुलना आज से करें तो हमें हैरत होगी। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में तो संवैधानिक पद पर बैठे राज्यपाल भी भारतीय जनता पार्टी के नेता की तरह बयान दे रहे थे। चुनाव के दौरान सीबीआई से लेकर ईडी तक तृणमूल नेताओें पर कार्रवाई करने में लगी थी और उन्हीं मामलों में फंसे उन लोगों के खिलाफ कुछ नहीं कर रही थी जो तृणमूल कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आ गए थे। चुनाव आयोग खुल कर भाजपा के साथ दिखाई दे रहा था।

इंदिरा गांधी ने चुनाव रद्द होने के 14 दिन बाद यानी 26 जून 1975 को आपातकाल लगा दिया। उन्होंने कानून बदल दिए ताकि उनका चुनाव रद्द नहीं हो और वह अपने पद पर बनी रह सकें। उन्होंने लोकसभा का कार्यकाल भी पांच साल से बढ़ा कर छह साल कर दिया। विपक्ष के सभी नेताओं को जेल में बद कर दिया। मीसा तथा डीआईआर के तहत हजारों लोगों को जेल भेज दिया गया। अखबारों पर सेंसरशिप लगा दी गई। सरकार की अनुमति के बगैर कुछ भी नहीं छापा जा सकता था।

 लोकतंत्र के ऐसे रूप की किसी ने कल्पना नहीं की थी। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर जबर्दस्ती नसबंदी कराई जाने लगी और नागरिकों के सारे अधिकार स्थगित कर दिए गए। लेकिन करीब 21 महीनों के इस दौर के बाद आपातकाल उठा लिया गया और 1977 में चुनाव कराए गए। इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं। उत्तर भारत में कांग्रेस का सफाया हो गया और जनता पार्टी की सरकार बनी। उसने आपातकाल लगाने के प्रावधान सख्त कर दिए और उन सारे कानूनों को रद्द कर दिया जो श्रीमती गांधी ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए बनाए थे।

आपातकाल की कहानी को आज ठीक से समझने की जरूरत है। एक बात तो साफ समझ में आती है कि इसे इंदिरा गांधी ने सत्ता में बने रहने के लिए लगाया था और इसके लिए उन्होंने कानून को तोड़ने-मरोड़ने की कोशश की थी। उन्होंने न्यायपालिका तथा मीडिया को भी स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने दिया। क्या वह और उनकी पार्टी लोकतंत्र के खिलाफ थी?

इसका जवाब 1980 में सत्ता में उनकी वापसी से मिलता है। उन्होंने आपातकाल के दौरान किए गए कानूनी परिवर्तनों को रद्द करने की जनता पार्टी की सरकार के फैसलों को नहीं पलटा। ऐसा नहीं है कि इंदिरा गांधी या कांग्रेस का काम करने का तरीका बदल गया और मनमाने ढंग से फैसले लेना बंद हो गया या भ्रष्टाचार बंद हो गया। लेकिन कांग्रेस और गांधी परिवार के रवैए में एक बहुत बड़ा अंतर आ गया। उन्होंने आपातकाल तो दूर जनता के मत की अवहेलना करना छोड़ दिया।

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने जनता का मत जानने के लिए दोबारा चुनाव कराए जबकि कांग्रेस के पास बहुमत था और चुनाव कराने की जरूरत नहीं थी। साल 1989 में बोफोर्स मामले को लेकर चुनाव हारने की पूरी संभावना के बावजूद राजीव गांधी ने सत्ता में बने रहने के लिए संवैधानिक संस्थाओं के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की। उनकी कोशिश यहीं तक रही कि जनता का समर्थन मिले। कांग्रेस ने मान लिया कि जनता का फैसला सबसे ऊपर है। इसलिए जेपी आंदोलन को दूसरी आजादी का आंदेालन कहना कोई बढ़ा-चढ़ा कर किया गया दावा नहीं है। इसने लोगों को यह अहसास दिलाया कि सत्ता में किसी के होने या न होने का फैसला उसके हाथों में है।

क्या आज आापातकाल के इतने दिनों बाद हम दावा कर सकते हैं कि जेपी आंदोलन ने लोकतंत्र की वापसी के रूप में देश को जो दूसरी आजादी दिलाई वह साबुत है?

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1 comment

C A प्रियदर्शी June 29, 2021 - 3:06 PM

यह बहुत अधूरा विश्लेषण है।
इमरजेंसी के बाद जंतंत्रिक संस्थानों का विकास हुआ। नये इंस्टिट्यूशन बने। जिनकी कल्पना भी जे पी आंदोलन के पहले नही की जा सकती थी। मैंने जे पी एन की उतर्गाथा सविस्तार लिखी है।
मानव अधिकार, स्त्री अधिकार, विस्थापितों का पुनर्वास, भूमि अधिकार, । सवाल इमरजेंसी के मुकाबले वर्तमान का नही है। जंतंत्रिक वतावरन को कमजोर करने वाली धारा के द्वारा जनतंत्र को गहरा बनाने वालों से लड़ कर, आगे बढ़ने का है। यानी भाजपा प्रतिक्रियावादी शक्तिओं के साथ रीले रेस करते हुए मजबूत हुई, । फिर अपने साथ के लोगों को भी परास्त किया।
इमर्जेंसी काल की अवस्था, आज से बेहतर थी यह कहना, विश्लेषण करने वाले के दूर तक ना देखने का सूचक है। सभी संस्थान इमर्जेंसी में ध्वस्त कर दिये गये थे। अनिल सिन्हा ने कुछ बानगी लिखी भी है।
रजीव गांधी का अलग प्रसंग है। उसने मां के समय का गतिरोध तोड़ने की भी कुछ कोशिश की थी।

खैर, यह सब विस्तार की बात हुई। अतीत के काले दिनों से सबक लेने वाले, आज सचेत हैं, यह अच्छा है।
आज के हालत, और कल का खतरा, हमारा माज़ी नही है। इसलिए सामना तो आज के शासन से है।
आज

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