Home » शैलेन्द्र चौहान की कविताएं

शैलेन्द्र चौहान की कविताएं

by Samta Marg
0 comment 86 views

इतिहास में झोंकने पर

यादों की भी एक उम्र होती है

बिसरने लगती हैं धीरे-धीरे

कुछ होती हैं गड्डमड्ड

इतिहास होता है विशिष्ट

और होता है विशिष्ट जनों का

मैं पहुँचा था जब वहाँ

थी शिक्षा की कुछ अधिक सुविधाएं

थोड़ी अधिक जनसंख्या बड़ा नगरीय क्षेत्र

हालांकि नहीं था वह बड़ा नगर

एक ठीक-ठाक कस्बा, जिला मुख्यालय

इतिहास था

रहा था अशोक वहाँ का सूबेदार

विवाह किया था वहाँ की कन्या से

आसपास कुछ खंडहर

पुरातत्विक अवशेष

मेघदूत में दर्ज था वह सुंदर और समृद्‍ध क्षेत्र

संप्रति था बस एक साधारण नगर

शिक्षण संस्थाएं थीं

महाविद्यालय और इंजीनियरिंग कॉलेज

दसवीं कक्षा में प्रविष्ट हुआ

उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में

बीता वह वर्ष फिर अगला वर्ष

विद्यालय और घर इतना ही आकाश

खाली समय में पढ़ना कुछ किताबें

साहित्यिक और जासूसी उपन्यास

सामने था मंदिर

पुजारी का बेटा शंकर

उसके साथ जाना नदी किनारे

बेतवा और वैस नदियों का संगम

चरण तीर्थ, छोटे बड़े अनेक मंदिर

नदी पार हेलियोदर का स्तंभ, वनप्रांतर

कुछ दूरी पर उदयगिरि की गुफाएं

सांची के स्तूप थे विद्यालय की दिशा में

विद्यालय से महाविद्यालय

सपनों के पंख निकले फड़फड़ाने लगे

उड़ने को और आगे किसी बड़े नगर में

नहीं थे संसाधन

प्रवेश लिया इंजीनियरिंग कॉलेज में

इतिहास के बाद विस्तृत हुआ कुछ भूगोल

विषय के अलावा पढ़ा कुछ और साहित्य

पुष्यमित्र वाचनालय में

साहित्य और संस्कृति में सक्रियता थी नगर में

पर मुझे पाना था अपना लक्ष्य

यही बड़ी उपलब्धि थी हो सकूं आत्मनिर्भर

महत्वाकांक्षाएं धीरे-धीरे सिमटने लगी थीं

समेट लिये पंख

आर्थिक स्थितियां थीं बाधक

यथार्थ खूबसूरत न सही

ठोस तो था

उड़ने के लिये था साहित्य

जिसमें अपना अलग पथ था

अलग वेदना थी अलग ही लक्ष्य

क्या था जो नहीं था विदिशा में

सोचता हूँ तो लगता है

नागरबोध, उन्मुक्तता, खुली दृष्टि, ज्ञान का विस्तार

कोई आंदोलन, प्रतिरोध

नहीं थी संभावनाओं की आहट

इतिहास भी अशोक और पुष्यमित्र शुंग का था

मेरा अपना जो हासिल है

उसकी पृष्ठभूमि में

यही तो है अब

मेरा अपना इतिहास

झांकता हूं कभी-कभी

बिसरने से रोकने का जतन है किंचित

———————–

शिशिर की एक सुबह

पार्क में गौरैया नहीं

नहीं सुनाई दे रही थी चिउं चिउं

गिलहरी भी नहीं थी

दौड़ती भागती पेड़ पर चढ़ती

वे बूढ़े भी नहीं थे

जो किसी पक्ष को भावविभोर होकर सराहते

ध्यान करने वाले भी नहीं

रात भर जागकर सुबह किसी बेंच पर सोये हुए

युवक, मजदूर या ग्रामवासी भी नहीं

क्रिकेट खेलते हुए बच्चे नदारद

घूमने वाले लोग भी नहीं

निर्जन और शांत है पार्क

कोहरा है

सूरज भी ठिठका है धुंध में

कभी कभी किसी देश और समाज में

पसरा होता है ऐसा सन्नाटा

अपने अंधेरों में  दुबके हुए लोग

ईश्वर को याद कर

प्रकाश की कामना करते हैं

——————

बदल गये हम तो इतने

न पहचान सके खुद को भी

लड़ते थे बचपन में कर लेते थे कुट्टी

फिर भूल सभी गिले शिकवे

साथ खेलते थे हम

चाव बहुत था सब कुछ जानें

घटता जो पास हमारे

और सुनाते अग्रज जो कुछ

उसको पहचानें

विद्यालय से कॉलेज तक

मस्ती में रहते, हँसते गाते

संस्कारों, मूल्यों, आदर्शों को रटते

परिजनों के सम्मान की खातिर डटते

अपनी दुनिया नई-नई रचते

उन्नत होगा  यह समाज

बदलेगा संसार

सबको कपड़ा, सबको अन्न मिलेगा

काम मिलेगा, सम्मान मिलेगा

श्रम का पूरा दाम मिलेगा

भटके काफी तब काम मिला

प्रतिद्वंद्विता, स्पर्धा और ईर्ष्या

दफ्तर वाली राजनीति

व्यवहारिक ज्ञान बढ़ा

जानी देश विदेश की घटनाएं

कूटनीति और अर्थनीति

कैसा गोरखधंधा है

जो कूट कुटिल वह शक्तिमान

जो भोला भाला वह परेशान

मन में ठानी यह सब खत्म करेंगे

विषमता और अन्याय मिटेंगे इक दिन

जीवन सबका सुंदर होगा

लगे रहे हम इसी यत्न में

फिर सब तेजी से बदला

जो सोचा था उसका उल्टा

लेकिन आस नहीं छोड़ी

आपस में इक दूजे को समझाया

हर हाल में होगा सब चंगा

कटु यथार्थ है सतत संघर्ष

धीरे-धीरे स्वप्न हुए धूमिल

खुद की चिंता बड़ी लगी

निज स्वार्थ औ’ नित नये समझौते  

अच्‍छा और बुरा गड्डमड्ड सब

था एक मदारी एक जमूरा

देखा था तब हमने

अब फैले चारों ओर जमूरे

जीवन भर जिनने विरोध की बातें की

सुर उनके अब बदले

गजब तमाशा प्रहसन नये नये

हैं आज मुखौटे कई कई

भूले वह चेहरा जो दमका करता था

नहीं दिखाई देता वह

अब उससे डर लगता है

कितने बदल गये हम

न पहचान सके खुद को भी

——————-

हर गली कूचे, सड़क और पार्क में

छुट्‍टी के दिन दिख जाएंगे बच्चे खेलते हुए क्रिकेट

हो गया है यह हमारा राष्ट्रीय खेल

भूल गये हैं अब हॉकी

मेजर ध्यानचंद के बाद कौन, पता नहीं

एथलेटिक्स, कुश्ती, कबड्डी, खो-खो

गिल्ली डंडा, गेंद-गड्ढा, लट्टू, कंचे, अष्टा-चंगा, सातोलिया

घुलमिल गया है क्रिकेट हमारे जीन्स में

हो जैसे पारंपिक और सांस्कृतिक कर्म

लाख कोसिए, कहते रहिए औपनिवेशिक मानसिकता

पूंजीवादी और वित्तपोषित उपक्रम

उन्माद, मीडिया का व्यापार

कोई फर्क नहीं पड़ेगा इसके आकर्षण पर

बड़े शहरों की पॉश कॉलोनियों को छोड़

उपनगरों, कस्बों, गाँवों में दिखेंगे बच्चे खेलते क्रिकेट

पत्थरों से ईंटों से, लकड़ियों से बनाकर स्टंप

और कुछ नहीं तो पेड़ या खंभे या किसी ओट को मानकर

खड़े हो जाते आगे मुस्तैद

फेंकी हुई बॉल से मुठभेड़ करते

देखते बनता उत्साह

बच्चे हैं तो खेलना तो रुचेगा ही

मजा आता है बहुत

तुलना करता हूँ अपने बचपन से

नहीं होता था टीवी

रेडियो से प्रसारित होती कमेंट्री

पान की दुकानों, छोटी गुमटियों, चौराहों पर कमेंट्री सुनने को आतुर खड़े होते लोग

स्कोर जानने को उत्सुक

पाँच दिनों का टेस्ट मैच

टुक-टुक करते बल्लेबाज

बनी रहती उत्सुकता हर पल

दफ्तरों में होता फुरसत का माहौल

पाँचों दिन

नहीं होता था वन डे, टी-20 या आईपीएल

काउंटी मैच होते थे ब्रिटेन में

उसी तर्ज पर विकसित हुआ आईपीएल

पटौदी, वाडेकर, गावस्कर, विश्वनाथ, चंद्रशेखर, बेदी, प्रसन्ना, सोलकर जबान पर होते थे लोगों के

बदल गई हैं अब तक कई पीढ़ियां

स्कूलों में खेलों के नामपर दौड़, कूद, कुश्ती, एथलेटिक्स

वॉलीबॉल, फुटबाल, हॉकी, बैडमिंटन, टेबल टेनिस

जैसा जो कुछ उपलब्ध होता सुविधानुसार

क्रिकेट भी होती थी किसी किसी स्कूल में

खरीद ली गई होती थी जहाँ किट

तब भी सड़कों, गलियों, पार्कों, खाली मैदानों में हम खेल लेते थे क्रिकेट

लकड़ी या ईंटों से स्टंप बनाकर

अपनी जैसी दूसरी टीमों से होते थे मैच

खेलना कूदना माना जाता था स्वास्थ्य के लिए आवश्यक

बेशक पढ़ाकू बच्चे नहीं आते थे खेलने

रोकते थे उनके माँ-बाप

अब भी काम्पटीशन की ख्वाहिश वाले नहीं खेलते हैं खेल

बहुत से बच्चे मैदान पर न जाकर खेल लेते हैं इंटरनेट पर

धनिकों के पास बढ़ा है धन

उपलब्ध हैं उनके लिए वीडियो, थ्री डी गेम्स

अधिकांश जन आज भी हैं विपन्न

बीता है समय गुजर गई आधी शती

बदली है महज टेक्नोलॉजी

नहीं बदले हैं बच्चों के मन

उनका उत्साह और रुचि

——————-

स्थापित लोग

स्थापित लोग स्थापित होने से पहले

कड़ी मेहनत करते हैं

वे अपने कर्म क्षेत्र में घुसते जाते हैं गहरे

वहां की मिट्टी को धीरे-धीरे पर्त दर पर्त हटाते हैं

उसे सूंघते हैं, समझते हैं

उसकी कठोरता को कम करते हैं

उसे नर्म करते हैं, उपजाऊ बनाते हैं

वे मिट्टी से अलग नहीं होते

मिट्टी बन जाते हैं

जैसे जैसे वे अपने काम में पारंगत होते हैं

वे चूहों की भूमिका में आ जाते हैं

वे छोटे मोटे कीट खाते हैं

अन्न खाते हैं

किसी घर में घुस जाएं तो

खाद्यान्न के अलावा और भी चीजें कुतरने लगते हैं

स्थापित होने के बाद अपनी स्थिति को बचाए रखने के लिए

वे गुट बनाते हैं

छोटे चूहों को अन्न गोदामों का पता बताते हैं

लोकप्रियता बढ़ाने के लिये तरह तरह के जतन करते हैं

छोटे घरों की अपेक्षा बड़े घरों में घुसते हैं

बेहतर खाद्य पदार्थों का आकर्षण खींचता है

उन्नत होने का अहसास होता है

सार्वजनिक संस्थानों, सरकारी दफ्तरों और विशाल महलों का रुख करते हैं

वहाँ खतरे कम होते हैं सुविधा अधिक

शाम पाँच बजने के बाद उनका अपना राज होता है

वे खतरों से खेलते हैं

पकड़े जाने पर दूर वीराने में छोड़े जाने से घबराते नहीं

कोई जालिम मौत के घाट उतार दे

यह रिस्क भी होती है

लेकिन वे अपनी धुन के पक्के होते हैं

धीरे-धीरे वे चूहे से साँप बन जाते हैं

रुतबा बढ़ जाता है

चूहे डरते हैं सहमते हैं

उनका भोजन बनते हैं

साँप लाभदायक भी होते हैं

नहीं बढ़ने देते चूहों की संख्‍या

साँप की अपनी विशेषताएं हैं

पहचान है

कुछ जहरीले भी नहीं होते

लेकिन साँप तो साँप

उसका डर बड़ा होता है

लोग सोचते हैं अगर डंस लिया तो नहीं बच पाएंगे

वे नहीं लेते कोई पंगा

स्थापित लोग कड़ी मेहनत करते हैं

बनने के लिये साँप

निर्बल लोग होते हैं  उनका भोजन

खतरा भाँप छुप जाते हैं बिलों में

समझते हैं वे अंतर अच्छी तरह

निर्बल और सबल का

——————-

कवि होने के लिए

कविताएं लिखना मात्र नहीं होता काफी

बताना होता है कि

मैं लिखता हूँ कविताएं

सुनाना होता है उन्हें गाहे-बगाहे

कोई चाहे या न चाहे

बनना होता है ढीठ

पूछना होता है कैसी लगी कविताएं

करना होता जिक्र मित्रों की कविताओं का

प्रशंसा करनी होती है उनकी

अग्रजों का लेना होता है आशीर्वाद

मठाधीशों को करना होता है प्रसन्न

बरतनी होती है चतुराई

साधना होता है आलोचकों और संपादकों को

रहना होता है सावधान द्वेष रखने वालों से

बनने लगता है आभा मंडल

आप कहलाने लगते हैं कवि

—————-

डुबोया मुझको होने ने मैं न होता तो क्या होता !

सूचना प्राप्त हुई है मेरी रचना फलां पत्रिका में छप रही है..

संपादक का आभार

सूचना मिली है कि अकादमी के एक कार्यक्रम में मुझे भाषण देना है..

अकादमी के अध्यक्ष, सचिव और कार्यक्रम संयोजक का आभार

सूचना मिली है मेरी किताब फलां प्रकाशक छाप रहा है..

प्रकाशक का आभार

सूचना मिली है कि मेरी किताब पर एक पत्रिका में समीक्षा छपी है..

संपादक और समीक्षक का बहुत बहुत आभार

सूचना मिली कि मुझे एक पुरस्कार प्रदान किया जा रहा है..

पुरस्‍कारदाताओं का अत्यधिक आभार

अनेक सूचनाएं हैं जो मैं से शुरू होती हैं और मैं पर ही खत्म होती हैं

मेरा जन्मदिन, विवाह, विवाह की वर्षगांठ

मेरे बेटे, बेटी, पोते,पोती, नाती, नातिन सबके किसी दिन पर या उपलब्धि पर शुभकामनाओं की आकांक्षा

बीमार होने पर स्वास्थ्य लाभ के लिये दुआओं की अपेक्षा

माता-पिता या किसी संबंधी की मृत्यु पर सहानुभूति की अपेक्षा

अपने बारे में सबकुछ दूसरों को बता देने की बलबती इच्छा

निःसंकोच जारी है फूहड़ता की हद तक

(काइयांपन और स्वार्थ के अलावा)

निज प्रदर्शनप्रियता

दिखावटी, सतही और भोंथरी संवेनाएं

व्यक्तित्व का हल्कापन, अगंभीरता, गरिमा का क्षरण

समाज के स्वास्थ्य के लिये चिंता का सबब हैं

मानसिक स्वास्थ्य की चिंताजनक मनोवैज्ञानिक स्थिति है

सृजनात्मकता के ह्रास की सूचक हैं

बचा जा सकता है इससे

संवेदना हवा में उछालने की चीज नहीं है

दूसरे को समझने और हौसला देने से संप्रेषित हो जाती है सहज ही

———————-

बैठ गए हैं वे लेकर खाता-बही

गिरोह के किन किन सदस्यों की आई हैं किताबें इस वर्ष

गिरोह के बाहर के किन लेखकों को कर लिया जाए शामिल

कुनबा बढ़े लेकिन न हो कोई नुकसान

शत्रु-पक्ष को दी जा सके कड़ी शिकस्त

स्वाभिमानियों को किया जाए दरकिनार

अधिकतर रहें दिल्‍ली के और आसपास के

कुछ बिहारी, पिछले दिनों बढ़ी है जिनकी तादाद तेजी से दिल्‍ली में

कुछ लखनवी जिनका समूह है सशक्त

हैं एक जनसंगठन के लोग सक्रिय

कुछ भोपाल से

एक-दो राजस्थान से

बाकी चार- छह- दस बाकी प्रदेशों से

किनकी कविता पुस्तकें की जाएं चिन्हित

कौन हों कहानीकार

किन्हें करें शामिल कथेतर  विधाओं में

कौन होंगे आलोचक

नाम तय हो चुके हैं सबके

उनकी किताबों के बारे में ली जा रही है जानकारी

कुछ बड़े प्रकाशकों के भी आग्रह हैं

कुछ शासन-प्रशासन से जुड़े  मित्रों का दबाव

दिल्ली विवि के प्राध्यापक तो होंगे ही, जनेवि के भी कुछ

बीएचयू और इलाहबाद विवि से भी होंगे

और कुछ इतर भी

जाति के हिसाब से भी सोचा गया है

ब्राह्मण होंगे सर्वाधिक फिर भूमिहार, कायस्थ

कुछ दलित, आदिवासी शामिल करने होंगे

दो एक ठाकुर और यादव भी रहें तो अच्छा हो

महिलाओं का चमकदार प्रतिनिधित्व हो

मुसलमान, ईसाई, सिख भी हों  एक-आध शामिल

इस तरह बन गई है पूरी रूपरेखा

चित्रगुप्त की डायरी हो गई तैयार

लिखे जा रहे हैं लेख

भेजे जा रहे हैं स्पांसर करने वाली पत्रिकाओं को

प्रतीक्षा है दिसंबर के अंतिम सप्ताह की

दाग दी जायेगी तोप

गत वर्ष की चर्चित पुस्तकें

—————-

विडंबना

यह महज संयोग ही था कि सुरंग धंसने के बाद ही होने थे कुछ राज्यों में चुनाव

आगे देश के चुनाव भी होने थे

तो धीरे-धीरे सुस्त रफ्तार से जागा सोता हुआ प्रशासन

नेता भी कुनमुनाए जैसे ही ध्यान आया चुनावों का

हुए क्रेडिट लेने को आतुर  

बचाव के हुए यत्न तेज

वरना होता वही हस्र इन मजदूरों का भी

जो  होता रहा है दशकों से

और उससे भी पीछे औपनिवेशिक समय में,

सामंती व्यवस्था में

मारे गए लाखों मजदूर निर्माण कार्यों में घटित दुर्घटनाओं से

लाभ के लोभ में

नहीं किए सुरक्षा के समुचित उपाय

ठेकेदारों, राजनेताओं, अधिकारियों की मिलीभगत से

असुरक्षा और असावधानियों का निरंतर सिलसिला रहा कायम

कभी धंसने से खान, कभी पुल टूटने से, बांध और कभी इमारतें ढह जाने से

रेल दुर्घटनाओं में, ऊंचे- ऊंचे खंभों के गिरने से,

मिलों और कारखानों में घटती दुर्घटनाओं से

तो कभी बाढ़ से, नदियों के किनारे बनते प्रकल्पों में भूमि के भारी कटाव से

होती रही सुरक्षा में चूक निरंतर

विकास के नाम पर होता है बहुत कुछ

उपेक्षा कर प्रकृति, पर्यावरण और मनुष्यों की

किसके लिए ?

नहीं समझी गरीब मजदूरों की जान की कोई कीमत

कुछ हजार, अब कुछ लाख कर दिया घोषित मुआवजा

मुँह बंद हो गए सबके

मीडिया हुआ शांत

वैसे भी उसे कहाँ फुरसत चुनाव, क्रिकेट और कॉर्पोरेट हितों से

उसका भी लक्ष्य वही है

बस लाभ और लाभ

खबर अच्छी है

बचा लिए गए मजदूर

अब भले ही ले लें चुनावों में क्रेडिट

चुनावों के बाद फिर वही होगा

लाभ-लोभ का गणित

जो शाश्वत है इस व्यवस्था में

जारी रहेगा सुरक्षा से समझौता

यदि नहीं जागे वर्गों, धर्मों, जातियों और क्षेत्रों में बंटे

एक सार्वभौम देश के नागरिक

जो किए जा चुके हैं इन दिनों

मात्र मतदाताओं में परिणित

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

You may also like

Leave a Comment

हमारे बारे में

वेब पोर्टल समता मार्ग  एक पत्रकारीय उद्यम जरूर है, पर प्रचलित या पेशेवर अर्थ में नहीं। यह राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह का प्रयास है।

फ़ीचर पोस्ट

Newsletter

Subscribe our newsletter for latest news. Let's stay updated!