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अनामिका अनु की कविताएँ

by Samta Marg
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केरल से अनामिका अनु की कविताएँ:

1.वह उठेगा

अभेद्य अंधेरा

जुगनू के प्रकाश को बनाकर रस्सी 

वह फिर से होगा खड़ा

उसके तलवे

पर ठोक दी गयी हैं कई

कीलें

वह होगा खड़ा

और चढ़कर पहाड़ पर

फहराएगा सूरज का झंडा

हथेलियों पर गिरे रौशन पुष्पों

को छींट देगा

धरा पर

वह पीठ पर लादकर 

लाएगा सूरज

और 

उछाल देगा उसे गगन पर

वह उठेगा

उस भाषा में 

जो गिराती नहीं है

2.गोंड

सुंदर चित्र बेहतर भाग्य की परिकल्पना होगी 

डेढ़ हज़ार वर्ष पहले की

पर गोंड आज भी चित्र

उसी तरह बनाते हैं 

मानो अपना भाग्य लिख रहे हों

पतनगढ़गाँव की लड़कियाँ

हरे पर्वतों को प्यार करती हैं 

उन्हें पसंद है 

पेड़ और जानवरों को

महीन रंगीन धारियों में लपेटना

 उनमें से कुछ आपको बताएंगी

हमारी तस्वीर से 

मेसोथिलिक काल की चित्रकारी झाँकती है

हमारी कला प्रकृति प्रेरित और प्रकृति समर्पित है

वे बता पा रही हैं 

क्योंकि वे सीख गयी हैं वर्ण

रानी दुर्गावती आज भी आती है

और गोदावरी के तट पर 

बैठ गोंदी, हल्बी व भतरी लोकगीतों

से भिगोकर अपना आँचल लौट जाती हैं

नागपुर की मिट्टी में शौर्य सना है

बख़्त बुलंद शाह की नारंगी राजधानी

की माटी में  है गंध गोंड जीवन की

जानते हो

गोंड महल के आंगन में  सूखा सरोवर है

जिसमें कभी खिला करता था कुमुद गुलाबी

सरोवर कहता है कथा अतीत की

उस भाषा में जो उपजी थी

देव शम्भू शेक की डमरू से

लोकगीत और लोककथा में  रमी मिट्टी

को देह में लेप कर विदा हुए  राजाओं

का हृदय धड़कता है पर्वत,नदी और

उनके अपने वन में 

आज भी गोंड महल के प्राचीन

झरोखे से झाँकती  दुर्गावती रानी

मूँद लेती हैं अश्रुपूरित आँखें हाथ जोड़कर

उसकी जय गाथा से गूंज उठती हैं चहुँ दिशाएँ

हरी पहाड़ी वाली जाति

इतने रंग कहाँ से लाती ?

चित्रकारों के देह की माटी में ही होता है रंग

फ़र्श दीवारों पर कथा चित्र 

जीवन में रंग है

रंग में जीवन

गोंड जाति नहीं 

नदी गोदावरी की धारा है 

हरा पर्वत है

दुर्गावती है

बख़्त बुलंद शाह भी यही है

खेरला के किला

में  दबी लोक कथाएँ

घुँघरू बाँध कर अपने योद्घाओं  का

 जयजयकार दिन रात करती हैं 

कभी किले की  गुम दीवारों से पूछना

वे झूठ नहीं कहती हैं… 

3.चुंबकत्व

चुम्बकत्व है तुममें

तुम मानती नहीं

जबकि कितनी बार भौतिकी की कक्षा में

तीसरी डेस्क के बायीं बेंच पर बैठकर तुमने

बार-बार दुहराया है

गुरू जी के पीछे

कि

चुंबकत्व एक सार्वभौमिक परिघटना है

काश! मैं चीनी आख्यान का राजा ह्वें ती बन पाता

जिधर हाथ फैलाकर इशारा करता पुतला

उधर ही तुम होती

और मैं कुहासे में भी तुम तक पहुंच पाता

पृथ्वी चुंबक की तरह करती है व्यवहार

मैं चुंबक हूँ

काश तुम पृथ्वी हो सकती

तुममें होती उच्च चुंबकीय धारणशीलता और निग्राहिता 

मैं तुम्हारे किसी वैचारिक ध्रुव से जुड़ सकने का

सुख भोग सकता था

तुम मानोगी नहीं

फिर भी कहता हूँ :

आन्ना! तुम्हारे गुरूत्व के समक्ष

मैं खड़ा होना चाहता हूँ

मैं एक शक्तिशाली चुंबक हूँ

तापीय उतार चढ़ाव

इधर- उधर के आकर्षण

और क्षुद्र यांत्रिक हानियों से अप्रभावित

तुम्हारी प्रतीक्षा अब कील सी चुभती है 

मैं वेदना में सुख क्यों पा रहा हूँ?

4.मास्को में है क्या कोई बेगूसराय

कल जब राजेश्वरी मंदिर

की सीढ़ी पर बैठकर

याद कर रही थी माँ को

तो बिंदुसर सरोवर में खिल गए

 लाल कमल

जब घर को याद किया 

तो वह तिरहुत नागर शैली में

खड़ा कोई मंदिर लगा मुझे

खटांस खिखिर,सारण,लालसर,

बगेरी, पनडुक्की

कैथी की तरह विलुप्त हो गये

कल तिलकोर के पत्ते

पर पीठार लगा रही थी रमा

मैंने महसूस किया

उन हथेलियों की भंगिमा

और उसका रंग तुमसे मिलता जुलता है माँ

घीऊरा

और कटहल के बीज की चटनी

जब खाती हूँ

तो भुने धनिये की गंध मुझे रुला देती है

मेरी सासू माँ की उंगलियाँ पतली और

बहुत सुंदर हैं

भुन्ना मछली की चर्चा होते ही

मेरे भीतर पिता जाग उठते हैं

मैं पूरे दिन न कुछ खा पाती हूँ

न मुझे प्यास लगती है

कामनाएँ खिखिर की दुम हैं

जो रात में मोटी हो जाती है

आश्रय विहीन

वह रात भर करता रहता था विलाप

टिटही टाँग ऊपर करके सोता है

ताकि आसमान न गिरे ज़मीन पर

काँवर झील में प्रवासी पक्षी

कम हो गए

प्रेम की चाह अब भी बहुत बड़ी है

बस उसमें निर्मल जल

और मीन ही नहीं

मौसम जो बदला है

अधनंगा,सुरख़ाब,मजीठा,अरूण,चेंड

सब गये लौट क्या अपने देश

जुते खेत पर पसरी चांदनी हो गयी भदेस अब

कार्बोफुरान छींट भगाया अतिथि सुजान?

यह विचित्र देश

अतिथिदेवो भव का कौन कर रहा है

अब तक निर्लज्ज गान…

सलीम चिड़ियों के बारे में

कितना जानते थें

तुम प्रेम के बारे में क्या जानते हो?

बिहार का मास्को है बेगूसराय

मास्को में है क्या कोई बेगूसराय?

5.नुक़्ता 

वह अजीब था

कवि ही होगा

धूप की सीढ़ी पर  चढ़ता था

रात ढले

चाँदनी के साथ उतरता था

उस नदी के किनारे

जिसके पेट में थी कई और नदियाँ

वह कहता था

चलो दर्पण के द्वार खोलते हैं

अनुवाद करते हैं

आँखों की भाषा में

वैसे ओठों की लिपि भी बहुत सुंदर है

तुम्हें शायद आती नहीं होगी

मृत्यु के परे

एक सुनसान रात में

उसकी बालों की खुली टहनियों पर

सुगबुगा उठी प्रणय उत्सुक चिड़िया

उसके चेहरे पर जाग उठी मुस्कान

और धीमे से

नदी की देह में उतरा चाँद

रात के तीसरे पहर कोई राग मालकौंस गा रहा था

6.एक रात 

डोलती रेल में एक रात

गेंदे से जलते बल्ब के ठीक पास

चौकोर चन्द्रमा से चमकते आई पैड

पर

वे उँगलियाँ चलती रही

नीली घड़ी

उँगली में काला छल्ला

कलाई पर मोतियों की

एक पतली लड़ी

लिख रही थी

लम्बे समय से

शायद कोई रिपोर्ट 

कंबल के भीतर ठिठुरता मैं 

थोड़ी जगह बनाकर

देखता रहा उसकी

लिखती उंगलियों को

गुदगुदाती उस रात 

एक कविता भीतर में हाँफी लेकर

सो गयी

मैं उम्र भर उसे जगाता रहा

7.वह बाकमाल लड़का

वह बाकमाल लड़का

जिसके घुँघराले बालों में बँधे थें घुँघरू

जिसका रौशन चेहरा खुली किताब 

जिस पर लिखी थी

 एक गंध कस्तूरी

उसके लब की नाव पर

मुस्कुराहट की वह तालबद्ध ता-ता थैया

कोई कह दे वह जादू था

मैं भी पढ़ लूँगी

अय्यारी की कुछ किताबें

बस यूँ ही याद में उसके

उस प्यारे लड़के को

मैंने दे दी हैं कुछ कविताएँ

जिस लड़के को मध्य रात्रि से ठीक पहले

मै कहा था शब- ब -ख़ैर

और उसके सपनों को देकर आयी थी

ठंडी ओस, केसर के फूल और ख़ूब प्यार

वह बोलती आँखों वाला चश्मीश

जिसके खूबानी होंठों पर डूबती

हँसी को मैंने भोर कहकर सँभाला था

जिसकी उठती पलकों को शाम कहकर थामा था

जादूगरी के कई क़िस्से बस यूँ ही बन जाते हैं

कुछ काग़ज़ याद रखता है

कुछ क़लम भूल जाते हैं

अनामिका अनु

अनामिका अनु

1 जनवरी 1982 को मुज़फ़्फ़रपुर में जन्मी डाॅ.अनामिका अनु को भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार (2020), राजस्थान पत्रिका वार्षिक सृजनात्मक पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ कवि, प्रथम पुरस्कार, 2021) और रज़ा फेलोशिप (2022) प्राप्त है। इन्हें 2023 का ‘महेश अंजुम युवा कविता सम्मान’ (केदार न्यास) मिल चुका है।उनके प्रकाशित काव्यसंग्रह का नाम है ‘इंजीकरी’ (वाणी प्रकाशन,रज़ा फाउंडेशन)है। उन्होंने ‘यारेख : प्रेमपत्रों का संकलन’ (पेंगुइन रैंडम हाउस)का सम्पादन करने के अलावा ‘केरल से अनामिका अनु : केरल के कवि और उनकी कविताएँ ‘का भी सम्पादन किया है। इनकी किताब ‘सिद्धार्थ और गिलहरी’ को राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है जिसमें के सच्चिदानंदन की इक्यावन कविताओं का अनुवाद है। उन्होंने हिंदी में महत्वपूर्ण शोधपरक वैज्ञानिक लेख लिखे हैं और डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जीवनी लिखी है।

उनकी रचनाओं का अनुवाद पंजाबी,मलयालम, तेलुगू मराठी,नेपाली,उड़िया,अंग्रेज़ी,कन्नड़ और बांग्ला में हो चुका है।

वह एमएससी (विश्वविद्यालय स्वर्ण पदक) और पीएच डी (इंस्पायर अवॉर्ड, डीएसटी) भी हैं। अनामिका अनु की रचनाएँ देशभर के सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और मीडिया में देखने, पढ़ने और सुनने को मिलती हैं।

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