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बिजली संशोधन बिल के खिलाफ किसान संसद का प्रस्ताव

by Rajendra Rajan
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2 अगस्त। किसान संसद ने 2 अगसत 2021 को विद्युत संशोधन विधेयक 2020 को संचालित करने वाले नीति निर्देशों और दृष्टिकोणों और विधेयक के विशिष्ट प्रावधानों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया; जबकि विद्युत संशोधन विधेयक 2021 को सरकार द्वारा सार्वजनिक नहीं किया गया है। विचार-विमर्श के बाद संयुक्त किसान मोर्चा की तरफ से किसान संसद की कार्यवाही के बारे में निम्नलिखित बयान के साथ किसान संसद में पारित प्रस्ताव जारी किया गया-

30 दिसंबर, 2020 को सरकार के प्रतिनिधिमंडल से यह आश्वासन मिलने के बाद कि संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में किसान आंदोलन द्वारा रखी गई मांगों के अनुसार विद्युत संशोधन विधेयक 2020 को वापस ले लिया जाएगा, सदन आश्चर्य और निराशा के साथ संज्ञान लेता है कि सरकार यह या ऐसे किसी विधेयक को पेश नहीं करने के अपने वादे से मुकर गई है, जब यह विधेयक मानसून सत्र में कार्यावली के लिए सूचीबद्ध है –

* यह संज्ञान लेते हुए कि ऊर्जा के एक रूप के रूप में बिजली एक राष्ट्रीय संसाधन है और इसे सभी लोगों के लिए और विशेष रूप से गरीब और हाशिए पर के लोगों के मूल अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए;

* यह मानते हुए कि सस्ती, पर्याप्त और उच्च गुणवत्ता बिजली की आपूर्ति कृषि आजीविका को बनाए रखने के लिए एक पूर्वापेक्षा है, विशेष रूप से बारिश पर निर्भर किसानों के लिए जो भूजल तक पहुंच के लिए अपना निजी निवेश करते हैं, जो बड़ी सिंचाई परियोजनाओं, जिसमें किसानों को सहवर्ती लाभ और संवहनीयता के साथ या बिना महत्वपूर्ण निवेश हुआ है, द्वारा समर्थित नहीं हैं; विशेष रूप से यह देखते हुए कि ईंधन की कीमतों पर सरकार द्वारा उच्च कर संग्रह के कारण डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं, जबकि आम नागरिक हर जगह एक बुनियादी सेवा की वहनीय कीमतों के लिए विरोध कर रहे हैं जो सरकार को सामान्य रूप से सस्ती दरों पर प्रदान करनी चाहिए;

* यह संज्ञान लेने के बाद कि विधेयक ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों के सभी गतिविधियों पर टैरिफ को प्रभावित करेगा, चाहे वह दुकानें हों या डेयरी-फार्मिंग या आटा-चक्की या अन्य छोटे उद्यम, क्योंकि वे वाणिज्यिक शुल्क के संपर्क में आ जाएंगे;

* यह देखते हुए कि विधेयक मुख्य रूप से निजी बिजली कंपनियों के मुनाफे को बढ़ाने के लिये है जो इस क्षेत्र में “सुधारों” के लिए शोर-शराबा कर रहे हैं;

* यह देखते हुए कि विद्युत संशोधन विधेयक 2020 का मुख्य उद्देश्य निजी कंपनियों द्वारा (विद्युत अधिनियम 2003 के द्वारा बिजली उत्पादन क्षेत्र के निजीकरण के बाद) देश के बिजली वितरण क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए है;

* यह समझने के बाद कि इस तरह के निजीकरण का प्रतिकूल परिणाम बिजली – जो एक बुनियादी सेवा है जो सभी नागरिकों के लिए सुलभ होनी चाहिए – को आम उपभोक्ताओं के लिए महंगा बना देगा, और संशोधन विधेयक में अंतर्निहित बदलाव ग्रामीण क्षेत्रों और कृषि के लिए आपूर्ति की गुणवत्ता को खराब कर सकता है;

* यह समझने के बाद कि विद्युत संशोधन विधेयक राज्यों को किसानों और अन्य गरीब उपभोक्ताओं के लिए प्रति-सहायता (क्रॉस-सब्सिडी) को हटाने के लिए मजबूर करता है; केंद्र सरकार के केंद्रीकृत शक्ति के साथ एक राष्ट्रीय टैरिफ नीति के साथ, धारा 42(2) के अनुसार, ‘ऐसे अधिभार और क्रॉस-सब्सिडी को राज्य आयोग द्वारा उत्तरोत्तर कम किया जाएगा जैसा कि टैरिफ नीति में बताया जा सकता है’; जबकि कॉर्पोरेट उपभोक्ताओं को कम बिलों से लाभ होगा;

* यह संज्ञान लेने के बाद कि विधेयक सभी सब्सिडी योजनाओं को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) योजनाओं में परिवर्तित करने के बारे में है; यह जानने के बाद कि सभी किसानों के बिजली कनेक्शन की मीटरिंग की जाएगी (प्री-पेड मीटर की दिशा में पहले ही गतिविधि शुरू हो चुका है) और किसानों और उपभोक्ताओं से धारा 62(1) के अनुसार पूर्ण शुल्क लिया जाएगा; और यह समझने के बाद कि हालाँकि डीबीटी की बात हो रही है, किसानों की समय पर सब्सिडी प्राप्त करने की सुरक्षा का कोई आश्वासन नहीं है, और यह मान लिया गया है कि किसान शुल्क के पैसे का प्रबंधन करेंगे; और यह कि इस तरह के डीबीटी के परिणामस्वरूप अंततः सब्सिडी पूरी तरह से समाप्त हो जाएगी;

* इस बात से अवगत होने के बाद कि किसानों को या तो बढ़े बिलों का भुगतान करना होगा या डिस्कॉम द्वारा वियोजन का सामना करना होगा, और यह कि नई व्यवस्था में, किसानों और अन्य उपभोक्ताओं के खिलाफ देरी और बकाया राशि चलाई जाएगी; और यह सब उन करोड़ों किसानों के लिए मौत का सौदा होगा जो सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भर हैं;

* इस तथ्य का संज्ञान लेते हुए कि विद्युत संशोधन विधेयक एक बार फिर से टैरिफ और अन्य पहलुओं पर अपनी नीतियों को तय करने के राज्य सरकारों की शक्तियों और अधिकारों को छिनता है और राज्य सरकारों पर वित्तीय बोझ को बिना किसी अंतर्वाह के बढ़ाता है; कि राज्य सरकारें या भविष्य में अधिक सब्सिडी का बोझ वहन करेंगी या प्रति-सहायता (क्रॉस-सब्सिडी) को या तो कम करेंगी और समाप्त करेंगी;

* यह संज्ञान लेने के बाद कि हमारे संविधान की संघीय (फेडरल) भावना के खिलाफ जाकर राज्य सरकारों की शक्तियों को छिनता है; उदाहरण के लिए, राज्य विद्युत नियामक आयोगों के अध्यक्ष और सदस्यों को नियुक्त करने की राज्य सरकारों की शक्तियां छीन ली जाएंगी, जैसे बिजली उत्पादकों और डिस्कॉम के बीच विवादों को दूर करने के लिए राज्य आयोगों की शक्तियां छीन ली गई हैं; तथा

* किसान संसद प्रस्ताव पारित करती है कि –

क. विद्युत संशोधन विधेयक 2020 या 2021 को तत्काल वापस लिया जाए;

ख. भारत सरकार को निर्देश दिया जाता है कि वह संसद के इस सत्र में या उसके बाद के सत्रों में इस विधेयक या समान प्रावधानों वाले किसी अन्य विधेयक को पेश न करे।

ग. किसानों, कुटीर उद्योगों सहित ग्रामीण उत्पादन और प्रसंस्करण के लिए, और स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य नागरिक सेवाओं के लिए बिजली एक बुनियादी संसाधन होने के नाते, नीति ग्रामीण लोगों को सक्षम करने के लिए मुफ्त, उच्च गुणवत्ता, बिजली की नियमित आपूर्ति प्रदान करने के लिए होनी चाहिए जिससे किसानों को इसका लाभ मिले।

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