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आखिर राजनीति के खेल में ,हाशिय पर धकेले मुस्लिम को आरक्षण

by Samta Marg
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आखिर सवाल उठ ही गया कि सच्चर कमेटी ने जो पसमांदा मुस्लिम के लिए उसकी दशा को देखते हुए आरक्षण का सवाल उठ ही गया , क्योंकि मुस्लिम जातिवाद से बाहर हैं,

यदि जातिवाद से बंधा उसका नतीजा सिख को ही भोगना पड़ा क्योंकि जो जातिवाद के खिलाफ वही जातिवाद में फंस गया , आज उसी जातिवाद ने अलग गुरदवारे भी स्थापित कर लिए ,

आश्य तो यह था कि इससे अंतले पायदान पर बैठे सिख को लाभ होगा परंतु सिख को ही जातिवाद में धकेल दिया जबकि अकाली नेता मास्टर तारा सिंघ के सामने यह सवाल आया था कि हिन्दू तो जातिवाद में फंसा हैं आप क्यों इस में फंसना चाहते हैं ,

यह धारा 25 का मुद्धा हैं यह इसी जातिवाद को मानने का कारण हैं तभी तो सिख को इस में समाहित किया ,

सिख को यह अहसास ही नही हुआ कि गो बिन्द राय से गो बिन्द सिंघ में परिवर्तित होते हुए जातिवाद से सिख बाहर निकल गया ,

पहाड़ी राजा जो हिन्दू थे और गुरू गो बिन्द राय के साथ खड़े वही क्यों बाहर हो गये यह समझना चाहिए , मास्टर तारा सिंघ उस समय चाहते तो सिख को अलग से राजनीतिक आरक्षण मिल जाता , यदि ऐसा होता तो मुस्लिम को भी l


जो डा अम्बेडकर की बहुत वाह वाही करते थकते नही क्या उनको यह अहसास नही था कि सिख और मुस्लिम हाशिय पर आ जायेगा जबकि गाँधी ने यह वायदा भी किया था

अगर आरक्षण मिल जाता तो सिख इस जातिवाद से बाहर निकल आता क्योंकि अम्बेडकर ने ही हिन्दू को धर्म न मानकर आरक्षण हिन्दू को दे दिया जबकि सिख और मुस्लिम को यह कह कर कि धर्म अधारित आरक्षण की कोई व्यवस्था नही होगी ,

आज 131 MP तो पहले ही हिन्दू हो गये जबकि हिन्दू तो एक धर्म ही तो हैं जैसा संघ का मानना हैं चाहे वह उच्चतम न्यायालय को आधार बना जीवन शैली ही को प्रचारित करे क्योंकि धर्म का अर्थ ही जीवन शैली हैं इसलिये सिख ,

जैन, बुद्ध, मुस्लिम सभी की अपनी अपनी जीवन शैली ही तो हैं l केवल 412 का चुनाव ही तो और अब जाति जन गणना से ज़ितनी ज़िसकी संख्या भारी उतनी उसकी हिस्से दारी का सवाल उठ गया तो मुस्लिम और सिख को भी उसके संख्या बल से आरक्षण मिले यह यक्ष प्रशन हैं,

हालांकि यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि सिख का संख्याबल बहुत ही कम हैं उसे विशेष आरक्षण दिया जाये क्योंकि वह हिन्दू और मुस्लिम के बीच की कड़ी हैं , यही भारत को भारत बनाये रखा हैं l

यह जो 80:20 का सूत्र प्रचार का माध्यम बना यही से यह आवाज उठी हैं अन्यथा कहाँ सवाल खड़ा था l


दया सिंघ

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