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प्रकाश मनु की छह कविताएँ

by Samta Marg
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(1)
रात : तीन कविताएँ


एक

रात मैं एक अंधे कूप में था माँ
रात था एक भारी सर्द अँधियारा
पानी बेछोर
नीले शीशे सा…
उसमें लगातार हाथ-पैर मारता
छटपटाता
तिरता रहा मैं ताबड़तोड़
तिरता रहा हिम्मत बाँध
जब तक कि सुबह होते-होते किनारे न आ लगा।
मगर वह खौफ,
वह सर्द सन्नाटा…
पत्थर पर उग आई काई सा?
आत्मा पर पड़ती चोट पर चोट
भय का ताबूत…?
याद अब भी है
पर नहीं पता वह भीतर का था
या बाहर किसी डरावने जंगल का?
रात कैसा अंधकूप था माँ

रात कैसा था अँधियारा

दो


जिन्होंने भूल से भी कभी पहचाना नहीं
जिन्होंने नहीं खर्च की कभी एक मद्धिम सी मुसकान भी,
जिन्होंने कभी नहीं पूछा कि तुम जिंदा हो प्रकाश मनु
रात अचानक वे आए कहीं से, धधाकर गले मिले
मिलाया हाथ…
फिर बातें हुईं देर-देर तक आत्मा की तान पर पुलकते हुए,
सुबह हुई
वे फिर अजनबियों में बदल गए थे।

तीन

रात मैं बेहिसाब जख्म खाकर लेटा था
चीसते थे घाव,
सारा शरीर एक कराह…
कि अचानक वे आए
वे दोनों चुस्त फुर्तीले अश्विनीकुमार
आते ही मुसकराए हुए
घाव साफ किए उन्होंने कटोरे में रखे पानी से
फिर दवा लगाकर पट्टियाँ बाँधी
और सहलाते रहे मेरा सिर
जब तक कि मैं नींद की खामोशी में नहीं चला गया
सुबह उठा
नहीं थे जख्म वहाँ, नहीं पट्टियाँ
न दर्द न चीस…

तो फिर आए भी थे वे अश्विनीकुमार
या सिर्फ…?

(2)
सब कुछ जाने के बाद


सब कुछ जाने के बाद भी
कुछ न कुछ तो बच ही रहता है
जिंदगी की बची हुई
आस जैसा
बची हुई साँसों के हिसाब जैसा
किसी अदृश्य डोर में बँधी
पत्ती
या कि खुशियों की झाँई जैसा
सब कुछ जाने के बाद भी
जो कुछ बचा
कल उसी को बिछाया मैंने फटी हुई दरी सा
उसी को ओढ़ा पुराने तार-तार कंबल सा
उसी से पोंछा दुख उसी से आँसू
उसी में लपेटकर रख लिया
आत्मा का जगमगाता हुआ सबसे उज्ज्वल मोती
जिसमें अब भी नूर है
दूर टिमटिमाते दीए सा उजाला
और अब तसल्ली से सोऊँगा
उसी को तकिया बनाकर
बच रहा जो सब कुछ जाने के बाद।

(3)
रात—एक अंधी गुफा

रात मैं एक अंधी गुफा में था माँ
गुफा काली और अँधेरी थी और अंतहीन
मैं अंतहीन आवाजों के शोर में दब गया था
मेरा गला भारी चट्टानों से दबा था
और लग रहा था, मैं अब कभी बोल नहीं पाऊँगा
रात मैं एक अंधी गुफा में था माँ।
अतीत के के सब किए-अनकिए अपराध…
असंख्य पछतावे भूल-गलतियाँ सदियों की
मन के भीतर के असंख्य वात्याचक्र और दुर्बलताएँ
वे सब बड़ी-बड़ी चट्टानों की शक्ल में
मेरे ऊपर आ पड़े थे
और मैं लेटा था प्राणहीन श्वासहीन बेजान
अपनी अंतिम घड़ियाँ गिन रहा था…
रात मैं एक अंधी गुफा में था माँ!
चारों तरफ से आ रहे थे तीर और मुझे बेधते थे
मैं पोर-पोर बिंधा पैने तीरों से
धज्जी-धज्जी सा हुआ
टूटा-फूटा, अस्तित्वहीन
देख रहा था सारा तमाशा कुफ्र का।
रात काली थी खौफनाक और वह रो रही थी
किसी मादा सूअर की तरह कराहती आवाज…
भीतर एक करुणा सी जगाती थी
दूर तक पसरी थी उसकी गंध…
खुद में पता नहीं क्या-क्या छिपाए, दुराए
क्या कुछ कहती सी

रात के उस सन्नाटे में
दूर कहीं हाड़ कँपाती आवाजों का शोर…
लोग आ रहे थे लोग जा रहे थे
पता नहीं क्या कुछ टूट और बन रहा था
और इधर मैं पड़ा था
एक भारी चट्टान तले
टूटा-फूटा, अस्तित्वहीन, कुचला हुआ सा…
रात मैं एक अंधी गुफा में था माँ।
मैं अपने से अलग जिस अंधी गुफा में था
किसी शव सा निश्चेष्ट, बेजान
उसे रात क्यों कहते हैं माँ?
रात मैं किस अंधी गुफा में था माँ
और सुबह कैसे बाहर आया
क्यों इस बुरी तरह सुबक-सुबककर कराहती थी वह गुफा
क्यों थी इतनी दर्द भरी काली और विकराल
मैं कुछ भी नहीं जानता।
पर क्या गुफा मुझे जानती है?
क्यों वह सुबह-सुबह मुझे धकेल देती है बाहर
एक उम्मीद भरे नए दिन की शुरुआत के लिए!
उसे यकीन है दिन ढले फिर मैं आऊँगा इसी गुफा में
बेजान और निश्चेष्ट सा
तरह-तरह की अंतहीन आवाजों के शोर और निस्तब्धता
में गुम होने के लिए
रात मैं एक अंधी गुफा में था माँ
हालाँकि नहीं जानता कि वह मेरे लिए क्या है क्यों है
और उससे मेरा रिश्ता क्या है?

(4)
नदी सपने में रो रही थी माँ


रात नदी सपने में रो रही थी माँ
फटा-पुराना पैरहन पहने
चिंदी और तार-तार
उदास थी नदी, मैली और बदरंग
अपनी छाया से भी डरी-डरी सी
रो रही थी बेआवाज…
पता नहीं किसे वह पुकारती थी
किसे सुना रही थी अपना दुख
कल रात नदी सपने में रो रही थी।
पास ही मरी पड़ी थीं असंख्य मछलियाँ दुर्गंधाती
कातर बतखें,
निरीह कच्छप और घड़ियाल
उलट गई थीं उनकी आँखें
रात नदी सपने में रो रही थी माँ
रो रही थी बेआवाज…
उससे भीग रहा था हवा का आँचल
मौन आँखों से चुप-चुप बिसूरता था आकाश
बज रहा था एक खाली-खाली सा सन्नाटा
धरती के इस छोर से उस छोर तक…
बंजर थे मैदान
बंजर खेत
बंजर आदमी
बंजर सृष्टि की सब नियामतें…
रात नदी सपने में रो रही थी माँ!

(5)
खाली कुर्सी का गीत


अब सिर्फ खाली कुर्सी पड़ी है
सन्नाटे में
बिसूरती आने-जाने वालों को।
आदमी जो इस पर बैठता था चला गया
और अब खाली कुर्सी बिसूरती है आने-जाने वालों को
कभी-कभी टुकुर-टुकुर देखती है हर आगत को
और फिर हबसकर रोने लगती है।
आदमी था तो सब था
लोग भी बातें भी हँसी-खुशी और हँसने-गाने के साज भी
बातें भी चर्चाएँ भी
किस्से और कहानियाँ भी
गुजरे और आने वाले कल की तमाम हलचलें भी…
वह आदमी था तो सब था
भरी रहती थी बैठक
लोगों की रौनक और अंतहीन बातों के कोलाहल से।
आदमी
जो इस कुर्सी पर बैठता था
खुशमिजाज था
और उसके इर्द-गिर्द हमेशा एक महफिल सी रहती थी
वह बोलता था तो गुजरे हुए समय की दास्तान
सुनाई पड़ती थी उसकी बातों में
समय की घंटियाँ बजती थीं
और खिलखिलाहटों में बदल जाती थीं…
आदमी था तो बहुत से वादे थे

नए-पुराने
बहुत सी लंबी-चौड़ी बहसें और योजनाएँ…
किताबें थीं और किताबों की पूरी एक दुनिया।
इस कुर्सी के इर्द-गिर्द हँसते थे ठहाके
गाता था प्रेम
नाचती थीं किताबें
और हवा में थरथराते थे शब्द
बहुत कुछ था जो जिंदा था और जिंदादिली से भरा।
और तब कुर्सी भी इन गरमजोश बातों और बहसों
और मीठे ठहाकों में

जिंदा हो जाती थी
किसी जिंदा आदमी की तरह
और जाने कब आदमी की तरह खुलकर बतियाने लगती थी।
आज उस पर बैठने वाला आदमी
नहीं है
तो नहीं हैं गरम जोश भरी बातें न बहसें न वादे न योजनाएँ…
और हवा में दूर-दूर तक उड़ते ठहाके भी नहीं
अब महज एक कुर्सी है
खाली-खाली चुप्पी में सिमटी
बिसूरती हर आने-जाने वाले को।
इस पर बैठने वाला आदमी चला गया तो
जैसे सब चला गया…
और बच गया बस कुर्सी का एक खाली-खाली गीत।



(6)
सत्तर पार कर लेने पर


सत्तर पार कर लेने पर बार-बार आँखें
पीछे की ओर लौटती हैं

कैसा रहा सत्तर बरस का सफर
कैसी सुख-दुख की ठंडी या सीली छाँहें और धूप जमाने की
देखे गए कितने ही असह्य विद्रूप और वर्जनाएँ
राह में कितनी कठिन चट्टानें दोस्तियाँ हादसे
परीक्षाएँ कैसी-कैसी और विचित्र ऊहापोह भरे दिन।
सत्तर पार कर लेने पर
याद आने लगता है खुद-ब-खुद बहुत कुछ
जो कल तक कुहासे में था
इसलिए कि हमें हड़बड़ी थी फौरन से पेश्तर
धुर तक पहुँचने
और बड़ी से बड़ी मंजिलों तक उछाल लेने की।
बार-बार चोटिल हाथ-पाँव मोच पैरों की
और जख्म
अंदर-बाहर के…!
बड़ी अजीब फिसलनें और धक्के थे
बड़ी बदहवासी और हाँफमहाँफ
बड़े विचलन भरे युद्ध और अयुद्ध
जितने लड़े उससे अधिक टाले गए
और आग के जलते गोलों से गुजरते हुए
दौड़ते रहे आँखों के आगे बाँधे पट्टियाँ
अंधाधुंध।
सत्तर पार कर लेने पर नजर आने लगता है
सब कुछ
यकदम साफ-साफ
कि कहाँ-कहाँ लड़ना था
और हमने मुँह चुराया
किनसे धधाकर मिलना था और हम कतरा गए
और कि जहाँ सिर उठा, छाती तानकर मारनी थी टक्कर
हम दो कदम पीछे हटा नजरें झुकाए चुपचाप गुजर गए।
सत्तर पार करते-करते चश्मा काम करे न करे
मगर आँखों के आगे आ जाती हैं

तसवीरें साफ-साफ
दूसरों की ही नहीं अपनी भी कमजोरियाँ और कमीनापन
जिन्हें नंगे और सख्त शब्दों से दुरदुराना था
और हम मुकर गए।
और सत्तर तक आते-आते जब थकने लगी है चाल
हाँफने लगी हैं साँसें
चेहरे और जिस्म की मुरझा गई है खाल
चमक आँखों की चुग ली वक्त की झाँइयों ने
तो धीरे से अस्फुट मर-मर-मर की तरह
निकलते हैं होंठों से शब्द
आगे? अब आगे…?
अचानक सपनों की किसी भारी शिला के
खंड-खंड होने सरीखा
हमें ग्रसने लगता है यह अहसास
कि
हमने तो सोचा था कि
सत्तर बरस लंबी सुरंग से गुजरने के बाद
मिलेगी रोशनी की कोई साफ धुली लकीर
सीधा-सरल समतल कि खुशनुमा पठार कोई हरा-भरा
होगा सारे नामुराद कष्टों का अंत
हमारे ठिठके कदमों और इरादों को
मिलेगा मुक्त गगन
मुक्त धरा
पर…
यहाँ तो सत्तर बरस बाद भी
चारों ओर सत्तर-गुना-सत्तर दीवारें
बीच में अंधा कुआँ किनारे खाई
और रास्ता टटोलते, कँपकँपाते खस्ताहाल हाथ-पाँव…
क्या वह मिलेगा?
क्या वह मिलेगा जो बीच-बीच में झलक मारता
प्राप्य रहा जिंदगी भर का अपना

या…या फिर अचानक कोई चील मारकर झपट्टा
ले जाएगी चोंच में दबा
वह स्वादिष्ट कुरकुरा मीठी रोटी का टुकड़ा
और आपके चेहरे पर मरते-मरते
छपी रह जाएगी यह त्रासदी
कि हम अपनी जिंदगी को जिंदगी भर नहीं दे आए
वैसा अंत
जैसा कहानी-उपन्यासों में
अपने ही सिरजे नायकों को सार्थक यात्रांत पर पहुँचाने को
हम पसीना-पसीना होते रहे उम्र भर।
और यों छपा रह जाएगा यह भाव हमारे चेहरे पर
एक स्याह लकीरों वाली छायाकृति सरीखा
जिसे अंतिम दर्शनार्थियों में से कोई एकाध पढ़ेगा
और कहेगा साथ वालों से
कि लगता है यह शख्स मरते वक्त भी एक बेचैन शख्स था
जैसा कि जिंदगी भर रहा
और मरते वक्त इसका मुँह कुछ इस कदर खुला था
जैसे अपनी फिजूल और बेमानी मौत पर हँसते-हँसते
एकदम हक्का-बक्का रह गया हो!

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

सुप्रसिद्ध साहित्यकार, संपादक और बच्चों के प्रिय लेखक। मूल नाम : चंद्रप्रकाश
विग।

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