Home » भारतीय राजनीति में सात्विक चरित्र के दुर्लभ प्रतिमान

भारतीय राजनीति में सात्विक चरित्र के दुर्लभ प्रतिमान

by Samta Marg
0 comment 108 views

भारतीय राजनीति में सात्विक चरित्र के दुर्लभ प्रतिमान

 सुज्ञान मोदी

भारत की राजनीतिक संस्कृति का जब भी मूल्यांकन होता है तब प्रायः उसके अप्रिय प्रसंग
ही ज्यादा सामने आते हैं। औपनिवेशिक दासता से नवस्वतंत्र देशों की लोकतांत्रिक राजनीतिक
धाराओं में भी कई विरोधाभासी प्रवृत्तियाँ उभरीं। न केवल विचारधारा के स्तर पर, बल्कि
नेतृत्व करनेवाले व्यक्तित्वों की सामाजिक पृष्ठभूमि के स्तर पर भी विविधता ने अपनी
जगह बनाई। कई स्तरों पर संघर्षों की अंतर्धारा प्रवाहमान रही। और उन्हीं संघर्षों से तपे-
तपाए ऐसे गुदड़ी के लाल भी प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर चमक उठे मानो नियति ने उन्हें
इस लोकतंत्र का गौरव बढ़ाने के लिए चुना हो।
ऐसे प्रसंगों में कर्पूरी ठाकुर का नाम आते ही हमारी आँखों में वैसी ही चमक पैदा हो जाती है
जैसी स्वयं कर्पूरी ठाकुर जी की आँखों में सदा विद्यमान रहती थी। वे सच्चे मायनो में
समाज के अंतिम पायदान पर खड़े मनुष्य की आवाज़ थे इसलिए ‘जननायक’ की उपाधि
उनके लिए सर्वथा उपयुक्त बैठती है। राजनीति जैसी काजल की कोठरी में भी अपनी
चारित्रिक शुचिता कायम रख पानेवाले बड़भागियों के वे मानो प्रतिमान थे। बुद्ध, महावीर,
जनक और सीता के जहाँ पग पड़े ऐसी पावन भूमि मिथिला ने उन्हें अपनी प्रिय संतान के
रूप में पवित्र संस्कारों से अभिसिंचित किया। गांधीजी, विनोबा, लोहिया जी और जयप्रकाश
जी जैसे सात्विक सत्पुरुषों की प्रेरणा से उन्होंने राजनीति में भी सात्विक सत्याग्रही का बाना
अपनाया।
प्रेम और द्रोहभाव का अद्भुत समन्वय उनके व्यक्तित्व में था। विनम्रता और सादगी की वे
जीवंत मूर्ति थे। सहजता इतनी कि उनकी उपस्थिति मात्र ही सामनेवाले की असहजता को
मानो हर लेती थी। समाजवाद के वास्तविक मर्म को समझनेवाले और देश-दुनिया पर जागृत
दृष्टि रखनेवाले कर्पूरी ठाकुर जब अपने विचारों के धारा-प्रवाह संप्रेषण पर आ जाते थे तो
उनकी अंतः सलिला प्रखरता और ओजस्विता मानो सोते की भाँति फूट पड़ती थी। फिर
उसका प्रवाह देखने-सुनने लायक होता था।


इसकी एक बानगी आपातकाल के दौरान संत विनोबा को लिखे गए उनके चार प्रसिद्ध पत्रों
में देखने को मिलती है। प्रथम तीन पत्रों में बाबा विनोबा के प्रति उनकी श्रद्धा और उनका
आक्रोश एक साथ व्यक्त हुआ है। प्रथम तीन पत्रों में कई स्थान पर तो वे विनोबा को
धिक्कारते हुए प्रतीत होते हैं। लेकिन जैसे ही उन्हें पता चलता है कि ‘अनुशासन पर्व’ पर
विनोबा के विचारों गलत और शरारतपूर्ण तरीके से व्याख्यायित किया गया है और बाद में
दिए गए स्पष्टीकरणों को न केवल अखबारों में अपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया, बल्कि स्वयं

तात्कालीन केन्द्र सरकार ने विनोबा के नाम को गलत तरीके से उपयोग करके विनोबा के
साथ छल किया है, उन जैसे पुण्यात्मा पर लांछन लगवाया है, तो वे अपने चौथे पत्र में
विनोबा के प्रति आत्मीय सहानुभूति प्रकट करने में एक क्षण की भी देरी नहीं लगाते। क्योंकि
इस बार वे सुनी-सुनाई बातों की जगह विनोबा के मूल वक्तव्यों की प्रति को तीन चार बार
पढ़ते हैं और गहराई से समझते हैं। पुनः उसे विनोबा की संपूर्ण साधनामय यात्रा और
पवित्रता के साथ मिलाकर देखते हैं। चूँकि विनोबा के साथ उनका वर्षों का निकट का
सान्निध्य रहा था इसलिए उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि न केवल विनोबा राजनीतिक
छल का शिकार हो गए हैं, बल्कि मिसइन्फॉर्मेशन और मीडिया पर कब्जे की वजह से समूचा
विपक्ष भी विनोबा के विषय में गलतफहमी का शिकार हो गया है। इसके बाद विनोबा के
प्रति उनकी श्रद्धा पुनः बलवती हो उठती है और उनका स्वर बदल जाता है। यही एक सच्चे
सत्यसाधक की पहचान होती है कि वह अपनी भूल को सुधारने में एक क्षण की भी देरी नहीं
लगाता। वह स्वयं के गलत साबित होने के भय से अपनी भूलों पर अड़ता नहीं है। इसलिए
बाद में कर्पूरी जी विनोबा के साथ हुए छल का हिसाब लेने के लिए भी तात्कालीन सरकार से
भिड़ने को तैयार होते हैं।
लोहिया जी के बाद भारतीय राजनीति में यदि वैसा ही कोई न्यायप्रिय, निर्लोभी और सत्य के
लिए भी कोई भी कीमत चुकाने की तैयारी वाला कोई शख्सियत नज़र आता है तो वे
निस्संदेह कर्पूरी ठाकुर ही थे। श्रद्धा और सात्विकता से पूरित व्यक्तित्व था उनका। और
गांधी-विनोबा के वास्तविक विभूतिमत्व से उनका गहन परिचय रहा। लोहिया विचार के प्रति
उनकी सच्ची निष्ठा उनकी विशेष पहचान रही। इसलिए जब उन्हें बिहार की जनता ने
मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दी तो उन्होंने लोहिया के विचार पर आधारित क्रांतिकारी निर्णय
लेने का साहस किया। बिहार के शिक्षामंत्री रहते अंग्रेजी की अनिवार्यता को हटाना भी एक
ऐसा ही साहसिक निर्णय था। भले ही ‘कर्पूरी डिवीजन’ कह-कहकर ऐसी डिग्री को चिढ़ाया
गया। लेकिन बिहार के ग्रामीण और अंग्रेजीदाँ वातारवरण से वंचित बच्चों को बड़े पैमाने पर
अंग्रेज़ी में फेल कर-करके जो अन्याय किया जा रहा था उसको उन्होंने सुधारने की कोशिश
की।


वह प्रसंग ऐसा है कि कर्पूरी ठाकुर जब बिहार के शिक्षा मंत्री थे तो उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा
में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कर दी थी। इसके बाद कर्पूरी जी की सार्वजनिक आलोचना
शुरू हुई थी। एक वर्ग ने कहना शुरू कर दिया था कि चूँकि कर्पूरी जी स्वयं अंग्रेजी नहीं
जानते हैं, खुद ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं, इसलिए अंग्रेजी को हटा रहे हैं। कर्पूरी ठाकुर के इस
फैसले के बाद जो बच्चे बिहार में मैट्रिक पास हुए थे, उन्हें ‘कर्पूरी डिविजन’ से पास कहा
जाने लगा था। जबकि सच्चाई यह थी कि कर्पूरी जी ने बिहार की जमीनी हकीकतों को
लोहिया जी की दृष्टि से समझा था। तात्कालीन बिहार में अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण
गाँव के बच्चे मैट्रिक पास नहीं कर पाते थे, जिस कारण वे सिपाही तक की नौकरी में शामिल
नहीं हो पाते थे। सिपाही की नौकरी में अंग्रेजी जानने की कोई जरूरत नहीं थी, लेकिन अंग्रेजी

की वजह से मैट्रिक में फेल होने के कारण तमाम योग्यताओं और क्षमताओं के बावजूद वे
सिपाही तक नहीं बन पाते थे। उस दौर में लड़कियों के लिए भी मैट्रिक पास होना जरूरी-सा
होता जा रहा था। क्योंकि सबको कम से कम मैट्रिक पास बहू ही चाहिए थी। लेकिन अंग्रेजी
जैसी विदेशी भाषा की अनिवार्यता की वजह से लड़कियाँ तो और कम संख्या में मैट्रिक पास
होती थी। ऐसी कई वजहों से कर्पूरी ठाकुर ने अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म करने का
फैसला लिया था। फिर भी उन्होंने अंग्रेजी की पढ़ाई को बंद नहीं करवाया था। जिन्हें अंग्रेजी
पढ़नी थी, वे पढ़ सकते थे, परीक्षा दे सकते थे। लेकिन अंग्रेजी की अनिवार्य बाध्यता को
हटाकर कर्पूरी जी ने दरअसल दलितों-वंचितों और महिलाओं के लिए सरकारी सेवाओं में प्रवेश
का दरवाजा खोल दिया, जिसे बड़ी चालाकी से समाज के विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों तक
सीमित रखा गया था। यह लोहियावादी न्याय दृष्टि थी।
इसलिए कर्पूरी जी के इस निर्णय की आलोचना या मजाक बनाए की असली वजह यह थी
कि उन्होंने पिछड़ों और महिलाओं को आगे बढ़ाना शुरू किया था। बिहार का सामंती और
पुरुष मानसिकतावाला समाज हिल गया था कि कर्पूरीजी जिस तरह से महिलाओं के लिए
संभावनाओं के नए द्वार खोजने लगे हैं, उससे ये लड़कियाँ या महिलाएँ घर से बाहर
निकलना शुरू करेंगी। पिछड़े वर्ग के लोग अब विशेषाधिकार वर्ग की बात नहीं सुनेंगे।
इसलिए कर्पूरी जी के इस सूझ-बूझ भरे और गांधी-विनोबा-लोहिया विचार से प्रेरित निर्णय का
मजाक बनाया गया।
आज भारत की राजनीतिक संस्कृति जिस रसातल में पहुँच गई है, उसे देखते हुए बरबस
कर्पूरी जी जैसे सादगी, संयम और सात्विकता के जीवंत प्रतिमान ध्यान में आ जाते हैं।
हमने अपने ऐसे पूर्वजों को कैसे बिसरा दिया? हमें उनके इन पवित्र गुणों को अपनाना था।
गृहस्थ की मर्यादा का पालन करना था। सबके साथ न्याय हो, इस भावना को लोकनीति में
सबसे ऊँचा स्थान देना था। सबके लिए उच्च गुणवत्तापूर्ण, मूल्यपरक और चारित्र-निर्माण
आधारित शिक्षा की व्यवस्था करनी थी। निःशुल्क और सेवाभाव से भरी स्वास्थ्य-सुविधाओं
और आरोग्यमूलक आहार-विहार-पोषण से भरी कृषि नीति और स्वास्थ्य-नीति को अपनाना
था। सबके लिए अर्थपूर्ण उत्पादन की दृष्टि से स्थानीय रोजगार की व्यवस्था करनी थी।
गृहस्थ स्त्री-पुरुषों, युवाओं और नवपीढ़ियों को चैतन्य, जागृत मनुष्य बनाना था। सत्य, प्रेम
और करुणा पर आधारित परिवार, समाज और व्यवस्था का सृजन करना था।
लेकिन ऐसा लगता है कि अब हमने गांधी-विनोबा-लोहिया विचार से मुँह ही मोड़ लिया।
उसका दुष्परिणाम हमारे सामने है। ऊपरी भौतिक दिखावे बढ़ते गए, लेकिन समाज नैतिक
रूप से खोखला हो गया। अब किसी को आंतरिक प्रसन्नता नहीं। कोई शारीरिक और
मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं। चारित्रिक पतन अपने चरम पर है। शील-सदाचार पर कहीं चर्चा
तक नहीं होती।

ऐसे में कर्पूरी जी जैसे सात्विक, चरित्रवान, शील-सदाचार वाले बिरले नेताओं का स्मरण हो
आता है। उन्होंने अपने जीवन से दिखाया था कि काजल की कोठरी से भी निष्कलंक और
निष्कलुष रहकर निकला जा सकता है। अपनी नई पीढ़ियों को हम राजनीतिक प्रसंगों से
अलग नई चारित्रिक दृष्टि से रची गई उनकी जीवनी को पढ़ा सकें, तो ही इस अंधे युग में
भी कोई राह दिखाई देगी।

You may also like

Leave a Comment

हमारे बारे में

वेब पोर्टल समता मार्ग  एक पत्रकारीय उद्यम जरूर है, पर प्रचलित या पेशेवर अर्थ में नहीं। यह राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह का प्रयास है।

फ़ीचर पोस्ट

Newsletter

Subscribe our newsletter for latest news. Let's stay updated!