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हमारा स्वतंत्रता संग्राम और लियो टालस्टाय

by Samta Marg
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हमारा स्वतंत्रता संग्राम और लियो टालस्टाय

डॉ. कश्मीर सिंह उप्पल

डॉ. कश्मीर सिंह उप्पल

आजादी की लडाई में हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के अलावा कई विदेशी
साहित्यकारों,वैज्ञानिकों, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं का संग-साथ मिला
था। रूस के महान लेखक लियो टालस्टाय उनमें से एक थे। उन्होंने अपने
पत्रों की मार्फत स्वतंत्रता संग्राम को बहुत ताकत दी। प्रस्तुत है, इसी विषय
पर डॉ. कश्मीर सिंह उप्पल का यह लेख। – संपादक

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में रूस के महान लेखक लियो टालस्टाय का भारतीय समाजसेवियों, पत्रकारों
और लेखकों से विस्तृत पत्राचार का सम्बंध रहा है। टालस्टाय भारत से आने वाले पत्रों को गंभीरता से लेते थे
और प्राय: हर पत्र का उत्तर भी देते थे। उन्हें पत्र लिखने वालों में मद्रास के प्रसिद्ध नेता और पत्रकार ए.
रामशेषन थे जो लोकप्रिय सामाजिक-राजनैतिक समाचार पत्र ‘दि आर्यन’ प्रकाशित करते थे। उन्होंने एक पत्र में
टालस्टाय को लिखा – ‘हमारा देश एक मँहगी सरकार के अमले के कारण दिन-ब-दिन दरिद्र होता जा रहा है।
विदेशी पूँजीपति यहाँ की सम्पत्ति बाहर ले जा रहे हैं। परिणाम यह है कि निरन्तर अकाल पड़ते जाते हैं।’
 
टालस्टाय ने रामशेषन के इस पत्र में रूचि दिखाई और 25 जुलाई 1901 को एक लम्बा उत्तर दिया।
उन्होंने लिखा- ‘कोई भी समाज या जनसमूह जो हिंसा पर आधारित हो, न केवल आदिम अवस्था में है, पर बड़ी
खतरनाक अवस्था में भी है।’ इस पत्र में टालस्टाय ने भारत के ऐतिहासिक विकास की चर्चा करते हुए भारतीयों
को सुझाव दिया कि ‘इसी तरह चलता रहेगा, जब तक तुम्हारे लोग सिपाही बनकर काम करते रहेंगे। तुम्हें
अंग्रेजों के हिंसक शासन में सहायता नहीं देनी चाहिए और हिंसा पर आधारित सरकार में किसी प्रकार से भाग
नहीं लेना चाहिए।’
 

टालस्टाय यहीं नहीं रूके। उन्होंने भारतीय समाज में प्रचलित जाति व्यवस्था के आधार पर समाज-
विभाजन की घोर निंदा की। वे जाति-भेद में भारतीय जनता की एकता-विरोधी और शोषण की बात देखते थे।
प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार ‘द हिन्दू’ ने टालस्टाय के इस पत्र को लेकर एक लेख छापा और टालस्टाय का पक्ष लेते
हुए लिखा कि भारतीय जनता को महान रूसी लेखक के उपदेश पर चलना चाहिए।
 
टालस्टाय के साथ जिन अन्य भारतीय लेखकों ने पत्र-व्यवहार किया उनमें दार्शनिक बाबा प्रेमानंद भारती
प्रमुख थे। वे विवेकानन्द के शिष्य थे और 1902 में अमेरिका चले गए थे। वे लास ऐंजेल्स से ‘द लाईट आफ
एशिया’ नामक पत्र निकालते थे। भारती 1907 में भारत वापस लौट आये और यहीं से अपनी पत्रिका निकालने
लगे। टालस्टाय के ग्रंथालय में इस पत्रिका के कई अंक मिलते हैं।
 
मद्रास के प्रसिद्ध वकील और पत्रकार डॉ. गोपाल चेट्टी ने भी टालस्टाय के साथ वर्षों पत्र व्यवहार किया
था। उनसे पत्र व्यवहार करने वालों में प्रोफेसर रामदेव, लेखक अब्दुल्ला अल-मामू सुहारावर्दी, आरएम दासशर्मा,
दार्शनिक एसआर चित्ताल, कलकत्ता की पत्रिका की संपादक मिनी राबिन्सन और मद्रास के सामाजिक कार्यकर्ता
वैद्यनाथ आदि प्रमुख थे।
 


टालस्टाय के रूसी जारशाही के मूल्यों के खिलाफ ‘मैं चुप नहीं रह सकता’ के प्रकाशन के बाद उन्हें आने
वाले पत्रों का ताँता लग गया। जून 1908 में तारकनाथ मेहता ने एक पत्र और अपनी पत्रिका ‘फ्री हिन्दुस्तान’
के अंक टालस्टाय को भेजे थे। इसका उल्लेख टालस्टाय ने अपनी डायरी में किया है। टालस्टाय ने तारकनाथ
मेहता को भारत में उपनिवेशवाद के परिणामों को लेकर और सामग्री भेजने का भी लिखा था।
 


तारकनाथ ने टालस्टाय को अपने पत्र में बताया कि ‘यदि कोई भारतीय अंग्रेजों से न्याय की भिक्षा माँगता है तो उसे एकदम राजद्रोही कह दिया जाता है और उसे जेल में डाल देते हैं या उसे देश निकाला दे दिया जाता है। तिलक जैसे व्यक्ति पर, जो राष्ट्रीय आन्दोलन के नेता थे, विद्रोह उकसाने का इलजाम लगाया गया और छह बरस के लिए उन्हें निर्वासित कर दिया गया।’ उन्होंने यह भी लिखा कि ‘भारत गोरों के लिए स्वर्ग है पर भारतीयों के लिए नरक। हमारे लिए एक ही मार्ग बचा है कि हम आप जैसे लोगों का ध्यान आकृष्ट करें, जो
सारी दुनिया के सामने अंग्रेजों का पर्दाफाश कर सकें और इस तरह से उन पर अपना प्रभाव डाल सकें।’
 
टालस्टाय ने 14 दिसम्बर 1908 को तारकनाथ को ‘ए लेटर टू ए हिन्दू’ नामक पत्र लिखा। यह पत्र शीघ्र
ही अनुवादित होकर ‘स्वतंत्रता संग्राम’ का प्रेरणा-स्त्रोत बन गया। वे इस पत्र में कहते हैं कि ‘गुलामी भारत में
विचित्र जान पड़ती है, चूंकि यहाँ बीस करोड़ लोग हैं जिनकी आध्यात्मिक और शारीरिक शक्ति बहुत ऊँची
है, फिर भी वे ऐसे मुट्ठीभर लोगों की आधीनता मानते हैं, जो उनसे धार्मिक नैतिकता में कहीं अधिक नीचे हैं।’
रोम्या रोलॉ ने लिखा है कि टालस्टाय के ‘ए लेटर टू ए हिन्दू’ ने सारी दुनिया में उपनिवेशवादी गुलामी को
जबरदस्त टक्कर दी। भारत और अन्य देशों की उपनिवेशवादी सरकारों ने ‘ए लेटर टू ए हिन्दू’ को जब्त किया
और इसे सीधे विद्रोह भडक़ाने वाले अन्य साहित्य के समकक्ष माना। यह पत्र दुनिया की क्रान्तिकारी पत्र-
पत्रिकाओं का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गया था।
 
गांधी जी जब इंग्लैंड में वकालत पढ़ रहे थे उस समय 1889 में ‘फ्रांसीसी क्रान्ति’ की शताब्दी के अवसर
पर फ्रांस के ‘ऐफिल टावर’ पर एक भव्य प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम को टालस्टाय
संबोधित करने वाले थे। उन्हें सुनने के लिए गांधीजी भी लन्दन से पेरिस पहुँचे थे। टालस्टाय ने आधुनिक
सभ्यता को हिंसक, बनावटी, मुनाफाखोर और मानवता के लिए घातक करार दिया। गांधीजी इस भाषण को सुन
टालस्टाय से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका पहुँचकर टालस्टाय के साहित्य का गंभीर अध्ययन
किया। महात्मा गांधी का टालस्टाय के साथ पत्र-व्यवहार किन परिस्थितियों में शुरू हुआ था इसका उल्लेख

गांधीजी ने अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह’ में किया है। गांधीजी टालस्टाय की
‘स्वर्ग का राज्य तुम्हारे भीतर है’ पुस्तक एवं ‘पुनर्जागरण’ उपन्यास से काफी प्रभावित थे।
 
वर्ष1909 में गांधीजी दक्षिण अफ्रीका के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ ब्रिटिश सरकार से मिलने लन्दन आए
थे। लन्दन से ही गांधीजी ने टालस्टाय को दक्षिण अफ्रीका की पूरी स्थिति समझाई। उन्होंने इंग्लैंड की अपनी
यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि वे लन्दन जिस उद्देश्य से आए थे वह पूरा नहीं हुआ। अपने पत्र के
अन्त में गांधीजी ने ‘ए लेटर टू ए हिन्दू’ का अनुवाद कर भारतीयों में प्रचारित करने की अनुमति भी माँगी।
 
टालस्टाय ने सितम्बर-अक्टूबर 1909 में गांधीजी को भेजे अपने पत्र में लिखा कि ‘ईश्वर ट्रांसवाल
(अफ्रीका) में हमारे प्रिय भाई-बहनों की सहायता करे। हमारे यहाँ भी सौम्यता के विरुद्ध पशुता, विनम्रता और
प्रेम के विरुद्ध अहंकार और हिंसा के बीच यह लड़ाई तीव्र रूप से अनुभव की जा रही है।’ टालस्टाय ने पत्र के
अन्त में लिखा ‘भारतीय भाषा में मेरे पत्र का अनुवाद और प्रसार मेरे लिए बहुत आनन्द का विषय होगा।’
 
गांधीजी ने नवम्बर 1909 में एक और पत्र टालस्टाय को लिखा कि ‘आप अपने प्रभाव को, जैसे उचित
समझें, प्रयोग में लाकर इस आन्दोलन को लोकप्रिय बनाएँ। यदि यह सफल होता है तो वह न केवल अधर्म,
घृणा और झूठ पर धर्म, प्रेम और सत्य की विजय होगी, बल्कि यह भारत में लाखों लोगों के लिए और संसार
के और भागों में भी जनता के लिए आदर्श की तरह काम आयेगा।’
 
टालस्टाय अपनी आयु एवं स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओं के कारण इस पत्र का उत्तर नहीं दे सके थे। इसके
बाद अप्रैल 1910 में गांधीजी ने तीसरा पत्र लिखा और इस पत्र के साथ अपनी पुस्तक ‘इंडियन होमरूल’ भी
भेजी। गांधीजी ने टालस्टाय के ‘ए लेटर टू ए हिन्दू’ के कुछ अंशों का भी अपने पत्र में उल्लेख किया कि
‘भारतवासी राज्य शासन-व्यवस्था से असहयोग करें, ब्रिटिश सेनाओं में नौकरी न करें, टेक्स न दें इत्यादि। हम
देखते हैं कि गांधीजी ने टालस्टाय के विचारों को सम्मिलित करते हुए भारत में ‘असहयोग आन्दोलन’ चलाया
था।
 
25 अप्रैल 1910 को टालस्टाय ने गांधीजी को पत्र लिखा ‘मैने आपकी किताबें रूचि से पढ़ी हैं। मेरे मत से
उनमें जो अहिंसा के प्रश्न की आपने चर्चा की है, वह न केवल भारतीयों के लिए, परन्तु पूरी मानव जाति के
लिए सबसे अधिक महत्व की बात है।’ टालस्टाय ने पत्र के अन्त में लिखा- ‘मैं स्वस्थ्य नहीं हूँ और इसीलिए
आपकी किताब और आपके बारे में जो कुछ मेरे दिल में है, वह सब नहीं लिख पाऊंगा। मैं आपके काम की
बहुत सराहना करता हूँ। मैं ज्यों ही अच्छा हो जाऊँगा, लिखूँगा।’
 
इसी बीच ट्रांसवाल में भारतीयों का अफ्रीकी शासन के विरुद्ध आन्दोलन बहुत तेज हो गया। इस
आन्दोलन के फलस्वरूप अनेक आन्दोलनकारियों के परिवार अभावग्रस्त हो गए और वे भूख से मरने लगे। इन
परिवारों की सहायता के लिए गांधीजी ने अपने मित्र हेरमान कैलनबाख की 1100 एकड़ भूमि पर एक फार्म
बनाया और उसका नाम ‘टालस्टाय फार्म’ रखा। इस फार्म में अनेक परिवार खेती-बाड़ी करके अपनी आजीविका
चलाने में समर्थ हुए थे। टालस्टाय ने गांधीजी को अपना अंतिम पत्र लिखते हुए कहा ‘मनुष्य जाति के सारे
अन्याय और मुसीबतें इसलिए पैदा हुई हैं कि प्रेम के नियम को लोगों ने ठुकरा दिया और उसके स्थान पर
हिंसा का नियम ले आए हैं।’ इस तरह हम देखते हैं कि टालस्टाय के द्वारा भारतीयों को लिखे इन पत्रों की
सामयिकता आज भी बनी हुई है। (सप्रेस)


 डॉ. कश्मीर सिंह उप्पल सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं।

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