अभिजीत दीपके और नई पीढ़ी का संघर्ष

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Abhijeet Deepke

Dr. Lata Pratibha Madhukar

— डॉ लता प्रतिभा मधुकर —

सीजेपी के बढ़ते प्रभाव को देखकर कुछ शक्तियाँ असहज होती दिखाई दे रही हैं। यही कारण है कि अभिजीत दीपके को निशाना बनाने की कोशिश की जा रही है, इसलिए उस के पिताजी के जूनियर इंजिनियर की सत्तर हजार वेतन में उन का बेटा अमरीका कैसे जा सकता है ये सवाल अंधभक्त कर रहे है। जिन्हें पता नहीं कि ऐसे पाश्चिमात्य विश्व विद्यालय में कुछ परीक्षाएं उत्तीर्ण होने के बाद उन की पात्रता के अनुसार उन्हें उच्च शिक्षा के लिए फेलोशिप्स दी जाती है।

ऐसी फेलोशिप्स के लिए बच्चे दिन रात मेहनत करते हैं। क्यों कि इसमें उन की वहां की शिक्षा, निवास और पढ़ाई के लगनेवाली सामग्री का खर्चा विश्व विद्यालय उठाते है। ये ऐसे ही बोस्टन विश्वविद्यालय जैसे विश्वस्तरीय संस्थान में प्रवेश पाने के लिए जिस प्रतिभा, मेहनत और शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता होती है, वह अभिजीत ने अपने प्रयासों से सिद्ध की है। उस के जैसे जो भी बच्चे अपने मां पिताजी की औसत आमदनी अनंत अंबानी के परिवार की तुलना में दरिद्र रेशा के नीचे भले ही आती हो लेकिन गुणवत्ता में  अभिजीत को अपने वंश का प्रमाणपत्र लेने की जरूरत नहीं लगी। ये समझ सकते हैंस देश के गरीब, निम्न मध्यम वर्गीय लोग।

इसलिए तो नीट की एक्जाम भी उन के लिए उम्मीद और मानकों की कसौटी है और थी। जिन्हें उन की पढ़ाई के आधारपर प्रवेश मिला उन के देश की यानि भारत की गणना अविकसित देशों में आती है। ऐसे देशों के प्रतिभाशाली बच्चों को ऐसे विश्वविद्यालय कभी फेलोशिप देते हैं जैसे आप ने देखा है कि कल्पना चावला ऐसे छात्रों में एक थी। उन के पिताजी भी साधारण निम्न मध्यमवर्गीय थे। लेकिन कल्पना असाधारण बुद्धिमान थी । सोचिए कि नासा की फेलोशिप और उसे प्रवेश नहीं मिलता तो अंतराल में जानेवाली विश्व की पहली महिला भारत की कैसे होती?

ऐसे विकसित देशों में बुद्धिमत्ता और गुणात्मकता की कदर है। जिन बच्चों का फेलोशिप्स में नंबर नहीं लगता उन के लिए और भी परीक्षाएं होती है। जिस में हासिल क्रेडिट्स के आधार पर उन्हें शिक्षा की आधी फीज माफ की जाती है। तथा उन्हें लर्निंग विथ अर्निंग की छूट होती है। यानि कि कमाई करते करते सीखो। आप को वहां नौकरी ढूंढने में लेकिन कोई मदद नहीं करता। अनोखे देश और संस्कृति और उन की भाषा का दर्जा इन सब के सामने छात्रों का दम निकलता है। दिन रात दस दस घंटे शारिरिक नौकरी के बाद फिर पढ़ाई करनी पड़ती है । कॉलेज या क्लासेस में आप को बायोमेट्रिक्स पर हाज़िरी होती है। वहां हमारे जैसा घर का खाना मिलता नहीं। ऐसे समय पर चार पांच अन्य देशों के बच्चों के साथ रूम बांटते हुए उन के लिए भी खाना बनाना पड़ता है। वे भी बनाते है। अगर पढ़ना है तो बड़े बाप के बेटे हो तो बहुत आसान होती है जिन्दंगी। लेकिन आप के गरीब बाप को भी आप को उस का नाम रोशन करने के लिए जब बेटा या बेटी विदेश जाती है तो बहुत पापड़ बेलने पड़ते है। जिन बच्चों पर तथाकथित ऊँचे जाती , गौर वर्ण, वंश, धर्म की  सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक कृपा नहीं, ऐसे बेटी बेटे जब पढ़ने जाते है तो आप यहां की तुलना में उन के शारीरिक श्रम की कल्पना नहीं कर सकते। बहुत बार उन्हें वंशवाद और भेदभाव का सामना करना पड़ता है। बल्कि अपनी योग्यता के आधार पर वहाँ वे अध्ययन कर रहे हैं। इस के बावजूद उन्हें वहां उस देश के विद्यार्थियों की तुलना में बहुत बार कम समझा जाता है। ऐसी आर्थिक , सांस्कृतिक , वांशिक भेदभाव की लड़ाई लड़ने के बावजूद वे जब उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए अन्य देशों में या अपने देश में जॉब करने आते हैं तब उन को अच्छी वेतन वाली जॉब मिलना थोड़ा आसान होता है।

इसलिए जिन के पास होनहार, गुणवत्ता है ऐसे सब बेटी बेटी ने कल्पना चावला जेसी उड़ान भरने के सपने देखने ही चाहिए। और कितने भी रोड़े आए बीच में हौसले बुलंद रखने चाहिए। ऐसे बच्चों में से है एक अभिजीत दीपके। और इस से देश के अशिक्षित सत्ता धारियों को परेशानी होनी लगी।

दूसरी ओर, हमारे देश में अक्सर योग्यता की अपेक्षा सत्ता, प्रचार और राजनीतिक प्रभाव को अधिक महत्व दिया जाता है। एक चौथी पास मुख्यमंत्री और तड़ीपार गृहमंत्री बनता है तो उस की जांच के लिए इस तिवारी महाशय ने कभी FIR नहीं किया। शायद इसलिए इन महाशय की ही जांच करनी पड़ेगी कि इस को आय टी सेल, अमित शाह या आदित्यनाथ या नरेंद्र मोदी किन लोगों ने सुपारी या बॉक्सेस दिए है?

अब इस देश में अनेक ऐसे लोग हैं जिन को परिस्थिति वश स्कूल में जाने का मौका नहीं मिला। लेकिन उन्होंने अपने काबिलियत को जुमलों और अफवाह बनाकर एक भोंदू बाबा की करिश्मा बनाने की नौटंकी नहीं की , उस आधारपर ना पैसा कमाया न कोई पद।

ऐसे दूसरी ओर बुद्धिमान, ज्ञानी लेकिन स्कूली और कॉलेज की शिक्षा से वंचित  मोहम्मद इरफान जैसे अनेक लोग, है। जिन्होंने स्वाध्याय के बल पर गहरा ज्ञान अर्जित किया है और समाज को वैचारिक दिशा देने की क्षमता रखते हैं, आज भी किसी पद या प्रतिष्ठा के बिना आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

यह हमारे समाज की एक बड़ी विडंबना है। की आज भी देश के असंख्य श्रमिक और निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों की शिक्षा के लिए स्वयं कठिनाइयाँ सहते हैं।  हमारे देश में से अनेक उच्चवर्गीय और उच्च वर्णीय बच्चे विदेश जाकर पढ़ाई करते है सफलता प्राप्त करते हैं। लेकिन देश में वापस नहीं आते। जो आते है NRI का स्टेट्स रखते है।

उनमें से बहुत कम लोग अपना सुरक्षित जीवन छोड़कर भारत लौटते हैं, उन में भी बहुत ही कम लोग व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष का मार्ग चुनते हैं और सामाजिक क्रांति के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।

उन युवाओं में अभिजीत का नाम अब हमेशा के लिए दर्ज हुआ है। और अभिजीत दीपके की विशेषता यही है कि उन्होंने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का संदेश—”शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो” केवल नारे के रूप में नहीं, बल्कि अपने कार्यों के माध्यम से अपनाने का प्रयास किया है। और वो ऐसे युवाओं में से भी है कि वे महात्मा गांधी के अहिंसा और शांतिमयता के पथ पर चलने पर विश्वास रखते हैं।

भले भले लोगों ने गांधी आंबेडकर को एकसाथ प्रस्थापित करने की कोशिश की लेकिन इन जेन झी जनरेशन ने उन को ही नहीं महात्मा फुले, क्रांति ज्योति सावित्रीबाई फुले, फातिमा शेख, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, बिरसा मुंडा इन सब को प्रस्थापित किया।

डिजिटल तरीकों से संपूर्ण विश्व में युवाओं का संगठन निर्माण करना उनके कार्य का महत्वपूर्ण पक्ष है। जिस के कारण जनरल डायर क्रूर और कायर हमारे सत्ताधारी डर गए है। इन के लिए एक ऐसा आय टी सेल काम करता है कि जिस ने AI का प्रोग्रामिंग ही आरएसएस और भाजपा के अजेंडे पर बनवाया है। उन्होंने AI को भी गुलाम बनाया है। जो कि सच और वास्तव जानकारी को तोड़ मरोड़कर सत्ता पक्ष के डर से झूठी और तथ्यहीन कर देते हैं।

दूसरी ओर, देश में आर्थिक असमानता, बेरोज़गारी, शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियाँ, किसानों का संकट, बढ़ती सामाजिक विषमता और सत्ता के केंद्रीकरण जैसे प्रश्नों पर गंभीर सार्वजनिक बहस होना आवश्यक है।

इन मुद्दों पर जवाबदेही की माँग करना लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है। लेकिन 2014,से पिछले बारा वर्षों में जाति, धर्म और पहचान के आधार पर दंगे भड़का रही है सत्ता । और लोगों में हिंदू मुस्लिम के नज़्म पर धार्मिक तथा सांप्रदायिक टेढ़ भी बढ़ा रहे है सत्ताधीश और मठाधीश।

बढ़ते ध्रुवीकरण को लेकर भी अनेक समस्याओं का सामना आज की युवा पीढ़ी को करनी पड़ रही है नीट की एक्जाम में पेपर लीक करना इसी साजिश का हिस्सा है ताकि युवा पीढ़ी कोई विकल्प न होने के कारण इन के गुंडा प्रशिक्षण अग्निवीर में, बजरंग दल में शामिल हो।

लेकिन इन बच्चों को गोदी मीडिया के षड्यंत्र का अनुभव निजी जिंदगी में हुआ है। उन्हें नहीं कैद होना ऐसे चंगुल में जो एक धर्मांध जमातवादी लोगों ने बिछाया जाल है।
इसलिए अपने हक और मूल्यों से जागृत जेन झी पीढ़ी ने कई स्थानों पर संविधान, समानता और सामाजिक न्याय के मूल्यों को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाया है।

जंतर मंतर पर सीजेपी, AISA , SFi, AISU, भीम पार्टी आदि ने शुरू किया आंदोलन अब रुकने के बाद भी जनता ने अपने हाथ में लिया है। अब ये जन आंदोलन हो चुका है।

इस आंदोलन में बिरसा मुंडा, भगत सिंह , महात्मा फुले, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और महात्मा गांधी के विचारों को नए संदर्भ में स्थापित करते हुए इस पीढ़ी ने अपनी संविधान के प्रति प्रतिबद्धता का परिचय दिया है। अपनी आलोचनात्मक सोच और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का परिचय दिया है।

“जय भीम * ये नारा दलित परिवार में जन्मे अभिजीत का ही नारा नहीं था। वहां के तेजस्वी नेतृत्व नेहा बोरा, दानिश , मनीष, आमिर, ऋषिकेश, अंजली, आशुतोष और सौरव जैसे सारे साथियों ने इस नारे की गरिमा का बयान किया।
“जय भीम” केवल एक नारा नहीं, बल्कि समानता, मानवीय गरिमा और संवैधानिक मूल्यों में विश्वास का प्रतीक है—यह संदेश इस नई पीढ़ी ने अधिक व्यापक रूप से विश्व में पहुँचाया है।

इस आलेख का विषय हालांकि अभिजीत दीपके और उसके सर्टिफिकेट और गुणवत्ता से शुरू हुआ था इसलिए अभिजीत
की एक और विशेषता पर गौर करना उचित होगा। उन की विशेषता यह है कि वे व्यक्तिपूजा के विरोधी हैं। उन्होंने कई बार कहा है कि किसी एक व्यक्ति को सर्वशक्तिमान मानने के बजाय सामूहिक नेतृत्व, विविधता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर विश्वास किया जाना चाहिए। यही दृष्टिकोण लोकतंत्र को मजबूत बनाता है। वे कहते हैं कि एक व्यक्ति को भगवान बनाकर, विश्वगुरु बनाकर अंध भक्तों ने देश की तरक्की रोकी है। अब मुझे तरह की महत्ता मत प्रदान करो। ये एक संगठित, सामूहिक पहल है। इस देश की युवाओं का ये क्रेडिट है। उन के बलबूते आज ये आंदोलन खड़ा है और देश के हर राज्य और गांवों में स्कूल के किशोर और कॉलेज के विद्यार्थी तथा युवा इसे अपने नेतृत्व में आगे लेकर जा रहे है। और इस सच्चाई को आज सभी को स्वीकारना होगा।
किसी भी राजनीतिक मतभेद के और जातीय भेदभाव के आधार पर किसी कार्यकर्ता के परिवार, माता-पिता या भाई-बहनों को परेशान करना लोकतांत्रिक मूल्यों का और मानवी अधिकारों का उल्लंघन है।

मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उनका समाधान संवैधानिक और कानूनी तरीकों से ही होना चाहिए। इस तरह घर घर घुसकर बच्चों के अभिभावक और छोटे बहन भाईयों को धमकियां देकर, उन की पढ़ाई रोककर नहीं। आज की वास्तविक लड़ाई व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि दो भिन्न सत्ताओं के बीच है प्रजासत्ता के और व्यक्ति सत्ता के बीच है।

विचारों के बीच है—समानता और असमानता के बीच, न्याय और अन्याय के बीच है। लोकतंत्र और साम्राज्यवादी, सामंती, जमातवादी प्रवृत्तियों के बीच है।

तथा संविधानिक अहिंसक मूल्यों और भेदभाव , घृणा, बहिष्कृतता तथा हिंसक मूल्योंपर आधारित राजनीति के बीच है ये लडाई।
इसलिए, आइए, इन युवाओं द्वारा शुरू किए गए इस दूसरी आजादी के संघर्ष में हम भी अभिभावक, शिक्षक, छात्र, विविध व्यावसायिक , नौकरदार, किसान, मज़दूर, सारे सारे जागरूक नागरिक के रूप में लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक न्याय के पक्ष में अपनी जिम्मेवारी निभाएँ।

© डॉ. लता प्रतिभा मधुकर
सामाजिक और जनांदोलनों में सक्रिय वरिष्ठ कार्यकर्ता , फुले आंबेडकर वादी विचारक, समीक्षक तथा लेखिका 


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