योगी की दृष्टि : ब्राह्मण और श्रमण से आगे

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— परिचय दास — ।। एक ।। नाथ परंपरा को केवल वैदिक, तांत्रिक, योगिक और श्रमण तत्त्वों का मिश्रण कह देना पर्याप्त नहीं है। प्रश्न यह...

प्रेम, छल और समकालीन मनुष्य की त्रासदी –  परिचय दास 

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।। एक।। केतन, सिया और चेतन चौधरी से जुड़ा यह प्रकरण केवल एक संभावित अपराध-कथा नहीं है; यह हमारे समय की उन दरारों का भी...

25 जून आपातकाल 1975 : समकालीन परिप्रेक्ष्य में पुनर्विचार

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— परिचय दास — भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून , 1975 की रात केवल एक तिथि नहीं है बल्कि वह एक ऐसा मोड़...

आपातकाल और सत्ता समर्थक साहित्यकारों की उलझन

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— परिचय दास — आपातकाल के समर्थक साहित्यकारों पर पुनर्विचार करते समय सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि साहित्य और सत्ता का संबंध सदैव...

संवाद की वापसी : “शेखर टुनाइट” का सांस्कृतिक पाठ

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— परिचय दास — ।। एक ।। मई , 2026 में आरम्भ हुए "शेखर टुनाइट" के अब तक सार्वजनिक रूप से चर्चित एपिसोडों में प्रमुख रूप...

आत्मरति, अवसाद और प्रहसन में घिरा समाज – अरुण कुमार त्रिपाठी

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मशहूर समाजशास्त्री आशीष नंदी ने कुछ साल पहले एक पुस्तक लिखी थी जिसका शीर्षक था—रिजीम्स आफ नारसिसिज्म, रिजीम्स आफ डेस्पेयर। यानी आत्मरति और अवसाद...

बशीर बद्र : धीमी रोशनी का शायर

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— परिचय दास — ।।एक।। बशीर बद्र की ग़ज़लों में शब्द केवल अर्थ नहीं रखते, वे अपने भीतर एक हल्की-सी धूप, एक ठंडी छाया और एक...

वैभव सूर्यवंशी और भारत का वैभव – रवीश कुमार

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वैभव सूर्यवंशी की बल्लेबाज़ी से क्रिकेट की चर्चाओं को नए-नए मुहावरे से भर दिया है। इन मुहावरों ने राष्ट्रीय स्तर पर भारत को लेकर...

सिनेमाई चश्मा और सामाजिक यथार्थ: ‘दो दीवाने शहर में’ और जातिगत...

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— अम्बेदकर कुमार साहु — यह लेख फिल्म ‘दो दीवाने शहर में’ (पात्र: ईशान/शशांक और रौशनी/मृणाल ठाकुर) का एक आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारतीय...

स्मृतियों के कैमरे में क़ैद रघु रॉय! – श्रवण गर्ग

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रघु राय को लेकर मन में कई तरह की स्मृतियाँ हैं। शुरुआत अनुपम मिश्र से करते हैं। साल 1971 में इंदौर छोड़कर प्रभाष जोशीजी...