संवाद की वापसी : “शेखर टुनाइट” का सांस्कृतिक पाठ

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— परिचय दास — ।। एक ।। मई , 2026 में आरम्भ हुए "शेखर टुनाइट" के अब तक सार्वजनिक रूप से चर्चित एपिसोडों में प्रमुख रूप...

आत्मरति, अवसाद और प्रहसन में घिरा समाज – अरुण कुमार त्रिपाठी

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मशहूर समाजशास्त्री आशीष नंदी ने कुछ साल पहले एक पुस्तक लिखी थी जिसका शीर्षक था—रिजीम्स आफ नारसिसिज्म, रिजीम्स आफ डेस्पेयर। यानी आत्मरति और अवसाद...

बशीर बद्र : धीमी रोशनी का शायर

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— परिचय दास — ।।एक।। बशीर बद्र की ग़ज़लों में शब्द केवल अर्थ नहीं रखते, वे अपने भीतर एक हल्की-सी धूप, एक ठंडी छाया और एक...

वैभव सूर्यवंशी और भारत का वैभव – रवीश कुमार

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वैभव सूर्यवंशी की बल्लेबाज़ी से क्रिकेट की चर्चाओं को नए-नए मुहावरे से भर दिया है। इन मुहावरों ने राष्ट्रीय स्तर पर भारत को लेकर...

सिनेमाई चश्मा और सामाजिक यथार्थ: ‘दो दीवाने शहर में’ और जातिगत...

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— अम्बेदकर कुमार साहु — यह लेख फिल्म ‘दो दीवाने शहर में’ (पात्र: ईशान/शशांक और रौशनी/मृणाल ठाकुर) का एक आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारतीय...

स्मृतियों के कैमरे में क़ैद रघु रॉय! – श्रवण गर्ग

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रघु राय को लेकर मन में कई तरह की स्मृतियाँ हैं। शुरुआत अनुपम मिश्र से करते हैं। साल 1971 में इंदौर छोड़कर प्रभाष जोशीजी...

पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर… जैसा मैंने देखा !!

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— गोपाल शर्मा — "मुझे यह भ्रम नहीं है कि मुझे याद रखा जाएगा। मैं केवल एक ही बात चाहता हूँ कि लोग याद रखें...

तीसरी प्रकृति से डरी बेचारी मर्दानगी – योगेन्द्र यादव

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चलिए, ट्रांसजेंडर कानून में हुए संशोधन की बात “कामसूत्र” से शुरू करते हैं। संस्कृत साहित्य के इस कालजयी ग्रंथ (अधिकरण 2, अध्याय 9) में...

पेरिस पालोमा के गीत ‘लेबर’ का नारीवादी विश्लेषण – मोनिका वर्मा

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पेरिस पालोमा का गीत ‘श्रम’ समकालीन नारीवादी विमर्श में एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक पाठ के रूप में उभरकर सामने आया है। यह गीत महिलाओं के...

लोहिया का स्त्री-विमर्श – प्रेम सिंह

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(यह लेख करीब 25 साल पहले लिखा गया था। लेख का संपादित अंश पहले ‘जनसत्ता’ और उसके बाद पूरा लेख ‘सामयिक वार्ता’ और ‘वसुधा’...