Tag: अरुण कुमार त्रिपाठी
इक्कसवीं सदी में निराशा के नए कर्तव्य – अरुण कुमार त्रिपाठी
आज के चौंसठ साल पहले डॉ राम मनोहर लोहिया ने नैनीताल में 23 जून 1962 को एक व्याख्यान दिया था, जिसका शीर्षक था ‘निराशा...
ऐसे तो नहीं बनेगी भारतीय ज्ञान प्रणाली : अरुण कुमार त्रिपाठी
एक ओर भारत सरकार देश में भारतीय ज्ञान प्रणाली कायम करने का दावा कर रही है तो दूसरी ओर भारतीय विश्वविद्यालयों में विद्वता का...
अच्छाई का मार्केट इतना डाउन क्यों – अरुण कुमार त्रिपाठी
देश दुनिया बुरे दौर से गुजर रही है। पिछला साल काल की लंबी डोर में कई गांठें लगा गया। अच्छाई ने उन्हें खोलने की...
राष्ट्र प्रेरणा स्थल और हमारा राष्ट्रीय चरित्र – अरुण कुमार त्रिपाठी
लखनऊ के लोगों ने उद्घाटन के दिन ही राष्ट्र प्रेरणा स्थल से 7000 गमले चुरा कर यह साबित कर दिया कि राष्ट्रीय चरित्र न...
क्रोधित लोकतंत्र में हम लोगों का भविष्य – अरुण कुमार त्रिपाठी
लोकसभा में गृहमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के बीच चुनाव सुधारों पर बहस के दौरान जिस प्रकार क्रोध का लेन देन हुआ वह हमारे लोकतंत्र...
इतिहास की कल्पना बनाम कल्पनाओं का इतिहास – अरुण कुमार त्रिपाठी
वंदे मातरम् पर संसद में हुई दस घंटे की बहस से क्या मिला? क्या किसी ने कोई सबक लिया और देश में कहीं सद्भाव...
असली खतरा समाज के बर्बरीकरण का है – अरुण कुमार त्रिपाठी
कभी महात्मा गांधी ने कहा था कि असली खतरा समाज के बर्बरीकरण का है। लगता है वह समय आ गया है। राज्य की संस्थाएं...
झूठे आंकड़ों का भूखा है मध्यवर्ग – अरुण कुमार त्रिपाठी
असत्य और हिंसा को गले लगा चुका भारतीय मध्यवर्ग महज उपभोक्तावादी वस्तुओं का ही भूखा नहीं है। उसे प्राचीन भारत के गौरव-बोध के साथ...
सच्चिदाजीः सत्तावन का जज्बा और लीची की मिठास – अरुण कुमार...
किसी भी पढ़ने लिखने वाले और समाजवादी विचारों और मूल्यों में विश्वास करने वाले के लिए यह गर्व का विषय हो सकता है कि...
लोकतंत्र बिहार से लौटेगा या अमेरिका से? – अरुण कुमार त्रिपाठी
लोकतंत्र की दुर्दशा से बेचैन भारतीय समाज एक ओर बिहार में चल रहे चुनाव की ओर उम्मीद से देख रहा है तो दूसरी ओर...




















