— डॉ. शुभनीत कौशिक —
वर्ष 1942 में प्रकाशित ताराशंकर बंद्योपाध्याय का उपन्यास ‘गणदेवता’। बंगाल के पाँच गाँवों की कथा कहते हुए बीसवीं सदी के तीसरे-चौथे दशक के हिंदुस्तान के गाँवों का जैसा जीवंत चित्रण ताराशंकर बाबू ने किया है, वह मन मोह लेता है। लगभग छह सौ पन्नों में फैले हुए इस उपन्यास को हफ्ते भर से पढ़ते हुए ऐसा लगा कि शिवकालीपुर, कुसुमपुर, कंकना, देखुड़िया, महाग्राम – इन गाँवों में बरसों से रहता आया हूं। और यह भी कि देबू, यतीन, डॉक्टर जगन, सतीश, पातू, न्यायरत्न, द्वारका चौधरी, अनिरुद्ध, विश्वनाथ, तिनकौड़ी, इरशाद – ये मेरे अपने लोग हैं, जिन्हें मैं सालों से जानता हूं।
यही नहीं इस उपन्यास में तारा बाबू भारतीय साहित्य को कितने सशक्त स्त्री किरदार दे गए हैं – दुर्गा, पद्म (लुहार बहू), रांगा दीदी और सोना जैसी स्वाधीनचेता स्त्रियाँ। जो समाज द्वारा थोपे जा रहे तमाम बंधनों, अवरोधों को हटाते हुए और अपने ऊपर लगाए जा रहे तमाम लांछनों को दरकिनार करते हुए अपनी नियति का निर्माण खुद करती हैं। अपने निर्णय स्वयं लेती है और अधिकारपूर्वक अपनी बातें कहने और ख़ुद को जताने का साहस रखती है।
बंगाल के इन गाँवों के हवाले से हिंदुस्तान के देहातों की सामाजिक अवस्था की एक भरी-पूरी झाँकी प्रस्तुत कर गए तारा बाबू। जमींदारी व्यवस्था का कटु यथार्थ हो, इस्तमरारी बंदोबस्त और सर्वे-सेटलमेंट, खानापूरी की प्रक्रिया हो, जरीब, दादन जैसी प्रक्रियाओं का इतनी बारीकी से तारा बाबू ने चित्रण किया है कि कई बार तो लगा कि इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य की किताब ‘भारत का आर्थिक इतिहास’ के पन्ने ही मेरे सामने खुले हुए हैं।
सचमुच यह उपन्यास हिंदुस्तान के देहातों के रोज़मर्रा जीवन और उनकी सामाजिक ताने-बाने को इस समग्रता में रखता है कि वह इतिहासकारों और समाज वैज्ञानिकों के लिए भी ईर्ष्या का विषय होगा। पंचग्राम के जरिए हिंदुस्तान के लाखों गाँवों की झांकी प्रस्तुत कर देना और उन गाँव में चल रही तमाम उथल-पुथल को यूं उकेर देना तारा बाबू जैसे समर्थ उपन्यासकार के बूते की ही बात थी।
जाति-व्यवस्था की जकड़बंदी, धर्म-संस्कार और सामाजिक रूढ़ियाँ, जजमानी का टूटना, मिल-कारख़ाने का आगमन, आधुनिकता का गाँव में प्रवेश – इन सारी ऐतिहासिक परिघटनाओं को भी तारा बाबू उनकी पूरी जटिलताओं के साथ हमारे सामने रखते हैं और समाज की विविध आवाजों को, उसकी बहुस्वरीयता को वे इस उपन्यास में बख़ूबी सामने लाते हैं।
मयूराक्षी नदी में आने वाली बाढ़ और उससे पंच ग्राम की त्रासदी, महामारी और अकाल से टूटते-बिखरते गाँव और किसानों के जीवट का जीवंत विवरण भी हमारे सामने यह उपन्यास रखता है। महाजनों के कर्ज के चंगुल में फँसे हुए किसानों की व्यथा कथा भी यह किताब हमारे सामने लाती है।
इतुलक्ष्मी, अशोक षष्ठी, घंटाकर्ण जैसे लोक पर्वों का भी अद्भुत चित्रण तारा बाबू ने किया है। बंगाली समाज में प्रचलित रूपकथाओं और लोकगीतों को उपन्यास के आधुनिक परिवेश में बड़ी खूबसूरती से तारा बाबू ने शामिल किया है। साथ ही, गाँव के इस आख्यान में राष्ट्रीय आंदोलन भी बड़ी जीवंतता के साथ मौजूद है। असहयोग आंदोलन से लेकर सिविल नाफ़रमानी आंदोलन तक की हलचलें भी इसमें जज़्ब हैं। कुछ इस तरह से कि राष्ट्रीय आंदोलन के उतार-चढ़ाव गाँव के जीवन में आते उतार-चढ़ाव से एकमेक हो उठाते हैं।
इस कालजयी उपन्यास का बेहतरीन हिंदी अनुवाद हंस कुमार तिवारी ने किया है, जो भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित है। कहना न होगा कि यह किताब भारतीय साहित्य की एक धरोहर है।















