महात्मा गांधी का लेख “The Doctrine of the Sword” अहिंसा और सत्याग्रह की उनकी सोच को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण पाठ माना जाता है। इसे Young India में 1920 के आसपास प्रकाशित किया गया
इस लेख में गांधी एक जटिल लेकिन अहम बात साफ़ करते हैं: वे लिखते हैं कि अगर किसी स्थिति में केवल दो ही विकल्प हों कायरता (डरकर भाग जाना, अन्याय चुपचाप सह लेना) और हिंसा तो वे हिंसा को कायरता से बेहतर मानेंगे, क्योंकि कम से कम उसमें आत्म‑सम्मान और जोखिम उठाने का साहस होता है। लेकिन तुरंत साथ में वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि उनके लिए दोनों से ऊँचा मार्ग अहिंसा है, जो न कायरता है न हिंसा; वह “साहस के उच्चतर रूप” के रूप में सामने आती है, जहाँ व्यक्ति अन्याय के विरोध में खड़ा तो रहता है, पर हथियार नहीं उठाता, बल्कि स्वयं कष्ट सहकर उत्पीड़क के मन को बदलने की कोशिश करता है
गांधी इस लेख में अपने जीवन के उदाहरण देते हैं जैसे जब उनके पुत्र ने पूछा कि अगर वह पिता पर हमले के समय वहाँ होता तो क्या करता, तो गांधी ने कहा कि उस क्षण कायरता से भागने के बजाय हिंसक प्रतिरोध भी उनसे अधिक मर्दाना होता; फिर वे बताते हैं कि इसी कारण उन्होंने बोअर युद्ध, ज़ुलु “rebellion” और प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीयों की सैन्य भागीदारी का समर्थन किया, क्योंकि उनकी दृष्टि में उस समय भारतीयों को “कायर” नहीं, “साहसी” साबित होना था। लेकिन आगे वे यह रेखांकित करते हैं कि भारत की असली मुक्ति “तलवार के मार्ग” से नहीं, अहिंसा के मार्ग से होगी; यदि भारत तलवार की नीति अपनाएगा तो शायद क्षणिक विजय पा ले, पर वह भारत उनकी नज़र में आध्यात्मिक रूप से गिर जाएगा और दुनिया के लिए नैतिक उदाहरण नहीं रह पाएगा
“The Doctrine of the Sword” का वैचारिक महत्व यह है कि यह गांधी की अहिंसा को “कमज़ोरी” से अलग कर के “संगठित, अनुशासित साहस” के रूप में परिभाषित करता है। वे साफ़ कहते हैं कि कायर के लिए अहिंसा नहीं, पहले साहस ज़रूरी है; अहिंसा उसी का उच्चतर सोपान है, जो तलवार छोड़कर भी अन्याय के सामने डटा रह सकता है। आगे चलकर साबरमती, चंपारण, असहयोग, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो जैसे आंदोलनों में यही सिद्धांत व्यावहारिक रूप लेता है हथियार छोड़कर भी गिरफ्तारी, लाठीचार्ज, गोली और जेल का सामना करने वाली जनता उनके लिए “non‑violent soldier” है, जो तलवार की नहीं, आत्मबल और सत्य की “डॉक्ट्रीन” पर चल रही है
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