
लोकतंत्र में सबसे पहले जिस चीज़ के लुप्त होने की खबर आती है, वह अक्सर आख़िर में समझ में आती है। जनता का अदृश्य होना कोई अचानक घटित घटना नहीं है; यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जिसमें जनता धीरे-धीरे मंच से हटाई जाती है और उसके नाम पर भाषण चलता रहता है। लोकतंत्र के दृश्य में जनता हर जगह होती है—नारों में, घोषणाओं में, पोस्टरों में, आँकड़ों में—लेकिन निर्णय के क्षण में वह कहीं दिखाई नहीं देती। वह एक जीवित इकाई नहीं, एक अमूर्त संज्ञा बनकर रह गई होती है।
पहले राजनीति जनता को संबोधित करती थी, अब जनता को प्रतिस्थापित करती है। जनता की जगह सर्वे ले लेते हैं, उसकी पीड़ा की जगह ट्रेंडिंग हैशटैग और उसकी आकांक्षा की जगह रणनीतिक स्लाइड्स। इस परिवर्तन में सबसे गहरी चोट संवाद को लगी है। संवाद दो जीवित पक्षों के बीच होता है; यहाँ एक पक्ष केवल आँकड़ों में जीवित है। लोकतंत्र में जनता अब सुनी नहीं जाती, पढ़ी जाती है—और वह भी चयनित पंक्तियों में।
राजनीतिक विमर्श में ‘जनता’ शब्द का प्रयोग जितना बढ़ा है, जनता की वास्तविक उपस्थिति उतनी ही घटती गई है। यह एक विचित्र विडंबना है कि जिस सत्ता की वैधता जनता से आती है, वही सत्ता जनता को केवल वैधता के स्रोत की तरह देखती है, सहभागी की तरह नहीं। जनता अब प्रश्न नहीं करती बल्कि प्रश्नों के उत्तरों में समेट दी जाती है। जो प्रश्न असुविधाजनक हैं, वे विमर्श से बाहर कर दिए जाते हैं; जो प्रश्न उपयोगी हैं, उन्हें बार-बार दोहराया जाता है।
इस अदृश्यता का सबसे सूक्ष्म रूप भाषा में दिखाई देता है। राजनीतिक भाषा में ‘हम’ का प्रयोग बढ़ा है लेकिन यह ‘हम’ समावेशी नहीं, प्रतिनिधिक है। कोई बोलता है और कहता है—हम चाहते हैं, हम सोचते हैं, हम तय करेंगे। यह ‘हम’ जनता नहीं है; यह जनता के बिना गढ़ा गया एक सर्वनाम है। जनता का बहुवचन यहाँ केवल व्याकरण में बचा है, व्यवहार में नहीं।
मीडिया, जो कभी जनता की आवाज़ कहलाता था, अब जनता का दृश्य बन गया है। जनता को दिखाया जाता है, सुना नहीं जाता। कैमरे भीड़ पर घूमते हैं लेकिन माइक्रोफ़ोन सत्ता के पास स्थिर रहता है। जनता की पीड़ा एक दृश्य है, समाधान नहीं। बहसें जनता के लिए नहीं, जनता पर होती हैं। जनता स्वयं उस बहस में उपस्थित नहीं होती—केवल उसका संदर्भ होता है।
राजनीतिक निर्णयों में जनता की अनुपस्थिति को ‘नीति’ का नाम दे दिया गया है। नीति विशेषज्ञ हैं, सलाहकार हैं, थिंक टैंक हैं—लेकिन जनता नहीं है। यह मान लिया गया है कि जनता को समझाने की ज़रूरत है, समझने की नहीं। इस धारणा ने लोकतंत्र को एकतरफ़ा बना दिया है, जहाँ संवाद का रास्ता ऊपर से नीचे जाता है, नीचे से ऊपर नहीं।
चुनाव इस अदृश्यता को कुछ समय के लिए ढक देते हैं। मतदान के दिन जनता फिर दिखाई देती है—कतारों में, उँगलियों पर स्याही लगाए हुए लेकिन यह दृश्य भी क्षणिक है। मतदान के बाद जनता फिर गायब हो जाती है और उसकी जगह ‘जनादेश’ ले लेता है—एक ऐसा शब्द जो जनता को एक संख्या में बदल देता है। संख्या बोल नहीं सकती, प्रश्न नहीं कर सकती।
सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब जनता स्वयं अपनी “अदृश्यता” को स्वीकार करने लगती है। जब वह मान लेती है कि निर्णय उसके लिए होते हैं, उसके द्वारा नहीं। यही वह क्षण है जब लोकतंत्र एक प्रक्रिया से बदलकर एक प्रबंधन प्रणाली बन जाता है। जनता नागरिक नहीं रहती, लाभार्थी बन जाती है—और लाभार्थी से प्रश्न की अपेक्षा नहीं की जाती।
जनता का अदृश्य होना केवल राजनीतिक समस्या नहीं है; यह एक सांस्कृतिक संकट भी है। जब समाज में प्रश्न पूछने की परंपरा कमज़ोर पड़ती है, जब असहमति को अवांछित समझा जाता है, तब जनता धीरे-धीरे स्वयं को हाशिए पर धकेल देती है। वह देखती है, सहती है लेकिन बोलती नहीं—क्योंकि बोलना अब जोखिम है।
लोकतंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर नहीं करता कि सत्ता कितनी शक्तिशाली है बल्कि इस पर करता है कि जनता कितनी दृश्य है। दृश्य होना केवल दिखना नहीं है, सुना जाना है। जब तक जनता को केवल एक शब्द की तरह इस्तेमाल किया जाता रहेगा, लोकतंत्र एक सुंदर खोल बना रहेगा—अंदर से खोखला।
यह निबंध किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता क्योंकि लोकतंत्र भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा है। यह एक चलती हुई प्रक्रिया है—या शायद, एक रुकती हुई। जनता अगर फिर से दृश्य होती है तो लोकतंत्र जीवित रहेगा। यदि नहीं तो लोकतंत्र केवल जनता के नाम पर चलता हुआ एक तंत्र बनकर रह जाएगा।
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