देश का समाजवादी आंदोलन आपको याद कर रहा है जनेश्वर जी !

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Janeshwar

chanchal

— चंचल —

22 जनवरी (2010 ) को जनेश्वर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया –  एक आमद ऐसी भी !  आज मशहूर समाजवादी जनेश्वर मिश्र ज़ी की पुण्यतिथि है उन्हें पुष्पांजलि अर्पित कर रहा हूँ ।

१९७५ देश में आपातकाल की घोषणा के साथ , प्रतिपक्ष के तमाम “लोग” गिरफ़्तार हो गये , साम्यवादियों को छोड़ कर । उस समय तक हम समाजवादी बन चुके थे । काशी विश्वविद्यालय में विद्यार्थी थे । समाजवादी दस्तूर के मुताबिक़ बर बखत लड़ाई में व्यस्त रहते । मुद्दे लबे सड़क गिरे पड़े मिलते । मुद्दों को मुट्ठी में बाँधा जाता , मुट्ठी ऊपर आसमान की ओर तनती , सड़क जुलूस हो जाती , सड़क की गर्मी , सरकार को नागवार लगती , पुलिस की बख्तरबंद गाड़ियाँ जुलूस को ठेल कर जेल में डाल आती । “ काम के न काज के , मन भर अनाज के “ की कहावत याद आती तो , दो एक दिन बाद सरकार ख़ुदय जेल का फाटक खोल देती और हम बाहर आ जाते , नये मसायल की तलाश में । जलसा , जुलूस , जेल , ज़हमत से जो समय बचता उसमे पढ़ाई में लगाया जाता । यह था गदहपचीसी का आलम ।

लेकिन इस बार जो हम लोग पकड़ाये वह दूसरे स्वभाव का था । अनगिनत तो रात में ही उठा लिये गये , जो बचे , बचने की फ़िराक़ में रहे उन्होंने अनगिनत उपाय किए , हुलिया बदल लिये , दाढ़ी रही तो बे दाढ़ी हो गये , खादी के उपासक रहे , ख़ाकी में घुस लिये , लेकिन पकड़ाये फिर भी , “ रत्ती भर भूल की वजह से “ । जो डूबने में सफल रहे , उसमे से अनेक तो समय आने पर उतराये नेपाल में । सब मिला कर बहुत दिलचस्प रहा आपातकाल का मंजर । कई एक साथ वाक़यी ज़्यादती हुई इनमे जार्ज फ़र्नांडीस और उनके ख़ास लोग रहे । इस विषय पर बहुत लिखा गया है । एक सतर में कहना हो तो – इतना भर कहा जा सकता है कि आपातकाल के ख़िलाफ़ केवल मुट्ठी भर लोग लोग लड़े हैं बाद बाक़ी तो सब आपातकाल लगते ही रातो रात उठा लिये गये थे । बहरहाल यहाँ हमारा विषय यह नहीं है , हम तो बात कर रहे थे जनेश्वर मिश्रा की ।

हा भी गिरफ़्तार हो गये । नया आशियाना बना सेण्ट्रल जेल बनारस । जेल की दुनिया अलग की दुनिया होती है , इसकी तमीज़ , तहज़ीब , रहन – सहन सब अलग का । भाषा भी अलहदा । कोई नया क़ैदी आता है तो उसे “ आमद “ बोलते हैं । नयी आमद क़ैदियों में अनेक सवाल उठाती है , कौन है ? किस “ धारा “ का है वग़ैरह वग़ैरह । किस क्लास में जायगा ? ( जेल मैनुअल के हिसाब से क़ैदियों को तीन श्रेणी में जीने की सुविधा दर्ज है , इसे “ ए“ “

“ बी “ और “ सी “ कहते हैं । ए ख़त्म कर दिया गया है । बी और सी चालू है । राजनीतिक बंदियों को बी क्लास मिलता है । ) एक साँझ खबर मिली कि नयी आमद हुई है । नैनी जेल से ट्रांस्फ़र होकर कई राजनीतिक बंदी बनारस सेण्ट्रल जेल आये हैं । इसी आमद में जनेश्वर मिश्र भी आये ।

जनेश्वर मिश्र गाँधी लोहिया परंपरा के बेहतर वाहक रहे हैं – सियासत के सवाल पर जीतने संजीदा रहे , निजी ज़िंदगी में उतने ही मजाकिया । चुटकी काटने में उस्ताद थे , तुर्रा यह कि ख़ुद संजीदा रह कर पूरे माहौल में ठहाका भर देते थे । दो साल तक जनेश्वर जी की सोहबत में रह कर , हंसते हुए जेल काट लिया गया , और वही दो साल अनगिनत किससे गढ़ गया । इस पर लिख चुका हूँ । बाद बाक़ी जनेश्वर जी की सियासी ज़िंदगी का इतिहास खुला पड़ा है । इससे एसबी वाक़िफ़ है।

आज उन्ही जनेश्वर मिश्र का पुण्यतिथि है । वे नहीं हैं लेकिन उनकी यादें अग़ल बग़ल , साथ साथ चल रही हैं । सादर नमन जनेश्वर जी । कई बार कल तक जिस बात को याद कर हंसी आती थी और केवल हंसी आती थी , आज उस हंसी के मुहाने पर जिसके हंसी मिलती थी , क़ुदरत जब उस मुहाने को बंद कर देती है तो हम हंसतेहंसते रोने लग जाते हैं ।

गमगीन होकर पुष्पांजलि अर्पित कर रहा हूँ

सादर नमन जनेश्वर जी


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