किन राहों पर चलें हम! – डॉ योगेन्द्र

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भागलपुर में ही था, उस वक्त भी , जब गणेश जी को दूध पिलाया गया था। गणेश जी की मूर्ति दूध पी रही थी और पढ़े- लिखे लोग कंकंतक दूध पिला रहे थे। उनके मन में न सवाल था, न झिझक थी। पंक्तिबद्ध होकर इस बेवकूफी को समारोहपूर्वक पूरे देश में अंजाम दिया गया। भारत की मानवीय चेतना कितनी विस्फोटक है, इसका लिटमस टेस्ट किया गया। टेस्ट होने के बाद इसके बार बार प्रयोग हुए। एक और प्रयोग किए जा रहे हैं – यूजीसी निर्देशों के द्वारा। पहले सोशल मीडिया पर लंपटों की सेनाएं आयीं और दुष्प्रचार शुरू हुआ। दुष्प्रचार ऐसा शक्ल लेने लगा कि चैनलों पर डिबेट होने लगे। यूजीसी निर्देश में ऐसा कुछ नहीं है कि सवर्ण जाति के तथाकथित संरक्षक इतने उत्तेजित हो जायें कि गाली गलौज और नफ़रत संबंधी घृणित बयान देने लगें।

विश्वविद्यालयों में जातिवादी भेदभाव न हों, इसके लिए यूजीसी ने निर्देश दिया है। लोग इतने उत्तेजित क्यों हैं, यह समझ के परे है। यहां तक कि जिन्हें दस – बारह साल से ईश्वर की तरह पूज रहे थे, उन्हें तेलिया कह कर पुकारा जा रहा है। कहां विष्णु, कहां तेली! ऐसा हो क्यों रहा है? क्या कारण है? क्या यह साजिश है? जैसे गणेश प्रतिमा प्रकरण में हुआ, उसे ही दुहराने की चेष्टा है? पहले माध्यम धर्म था, अब जाति है।

भारतीय समाज की पहली और झकझोरने वाली पीड़ा जाति है। सदियों से जाति खासकर हिन्दुओं को मनुष्य बनने नहीं देती। जन्म होता है और जाति चिपक जाती है। इस जाति के भी अनेक रूप हैं। जातियों के सम्मान में भी एकरूपता नहीं है। जाति इतनी घृणित हो जाती है कि अस्पृश्यता को जन्म देती है। छूने मात्र से लोग कलुषित होने लगे। किसी की प्रतिभा इसमें लगी रही कि कैसे छूत – अछूत का वितंडा खड़ा करें और अपना स्वार्थ साधें। इस देश की यह एक भयानक कमजोरी है। जातियों में बंटा देश विश्वगुरु क्या बनेगा, वह देश गुरु भी नहीं बनेगा। जिन लोगों ने हिन्दुओं के संगठन बनाये, वह जाति पर चुप रहे। आज भी चुप हैं। मोहन भागवत कुछ नहीं बोल रहे। उनकी चुप्पी भी एक रणनीति है। वे कहते हैं कि हिन्दुओं के खिलाफ साजिश हो रही है। सच्चाई यह है कि हिन्दू ही हिन्दू के खिलाफ है। जो जाति के पक्ष में हैं, वही हिन्दुओं को एक नहीं होने दे रहे। जाति रख कर हिन्दुओं को कितना एक करेंगे। एक ही ईश्वर के संतानों में इतना तफरका क्यों है, तथाकथित हिन्दू इसका जवाब नहीं देते। जिन्होंने भी हिन्दू एकता की बात की, वे सभी हिन्दू विरोधी थे।

यह दुनिया बहुत खूबसूरत है। हम विश्व बिरादरी के सदस्य हैं। हमारा दिमाग उदात्त होना चाहिए। अगर हम ख़ुद को मनुष्य मानते हैं तो उन विभेदों को नहीं मानना चाहेंगे जो मनुष्य को जातियों और संप्रदायों में बांटते हैं। ज्ञान और विवेक क्या यह इजाजत देता है कि मनुष्य को खंड खंड में बांट कर देखें? एआई के युग में हम जाति से चिपके हुए हैं। भारत की मुक्ति जाति मुक्ति से ही संभव है।‌ बंधन मनुष्य की आदत नहीं है। वह तो नदी है या कल कल‌ करता झरना है।‌ मैंने बचपन की कक्षा में आरसी प्रसाद सिंह की एक कविता पढ़ी थी-

यह जीवन क्या है? निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है।
सुख-दुख के दोनों तीरों से चल रहा राह मनमानी है।
कब फूटा गिरि के अंतर से? किस अंचल से उतरा नीचे?
किस घाटी से बह कर आया समतल में अपने को खींचे?
निर्झर में गति है, जीवन है, वह आगे बढ़ता जाता है!
धुन एक सिर्फ़ है चलने की, अपनी मस्ती में गाता है।
बाधा के रोड़ों से लड़ता, वन के पेड़ों से टकराता,
बढ़ता चट्टानों पर चढ़ता, चलता यौवन से मदमाता।
लहरें उठती हैं, गिरती हैं; नाविक तट पर पछताता है।
तब यौवन बढ़ता है आगे, निर्झर बढ़ता ही जाता है।


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