बैशाख, जेठ और माघ पूर्णिमा भारत के तीन संतों के जन्मदिन हैं. बैशाख और जेठ की पूर्णिमा बुद्ध और कबीर के तथा माघ-पूर्णिमा रैदास के. पता नहीं, ये उनके सचमुच के जन्मदिन हैं, या लोकस्वीकृत; लेकिन हैं तो हैं. इस बहाने हमें उन्हें याद करने का अवसर मिलता है.
तो आज माघ मास की यह पूर्णिमा है – गुरु रैदासजी का जन्मदिन. सबसे पहले हम उनके नाम का स्मरण या सुमरन करते हैं, इसलिए कि हमारे पास उनके नाम के सिवा और क्या है. उनके जो विचार हैं, उन्ही के नाम के हिस्सा बन गए हैं.
कबीर और रैदास दोनों बनारस में जन्मे. यही शहर उनकी कर्मभूमि भी था. दोनों आस-पास या लगभग एक समय में रहे. अनेक किंवदंतियां दोनों के मिलने-जुलने की है. दोनों के विचार भी मिलते-जुलते हैं. दोनों एक ही सांस्कृतिक आंदोलन — भक्ति आंदोलन — के महान संत-विचारक थे.
रैदास और कबीर मध्यकाल के थे. उस समय के समाज की अपनी समस्याएं थीं. तुर्क आक्रमणकारियों और शासन ने बौद्धों और उनके शिक्षा केंद्रों को विनष्ट कर दिया था, जिससे कई तरह की सांस्कृतिक जटिलताएं उभरी थीं. वर्णाश्रम व्यवस्था सामंतवादी ( आज कह सकता हूँ पूंजीवादी भी ) सामाजिक ढाँचे केलिए काम की चीज थी. इसलिए पूरे देश में सामंतवाद ने इसे संरक्षण दिया हुआ था. यह सामंती-पुरोहिती गठ-जोड़ था, जिससे दोनों फल-फूल रहे थे. लेकिन इस व्यवस्था ने मिहनतक़श किसानों और दस्तकारों केलिए अत्यंत अपमानजनक सामाजिक स्थितियां बनाई हुई थी. श्रमशील लोग ज्ञान और आध्यात्मिकता केलिए अयोग्य करार दिए गए थे. सामंती ढाँचे को महसूस होता था इन मिहनतक़श लोगों के आध्यात्मिक और ज्ञानी होने से उत्पादन व्यवस्था पर प्रभाव पड़ेगा और उनके स्वार्थ प्रभावित होंगे. यह उनकी अपनी व्याख्या थी. जनतंत्र नहीं था कि विमर्श की कोई सामूहिक प्रणाली विकसित होती. भारत में इस्लाम आया तब पहले चरण में तो वह ब्राह्मणवादी वर्णाश्रम व्यवस्था से कुछ स्तरों पर टकराया, लेकिन जल्दी ही दोनों का मेल-जोल हो गया. मुस्लिम शासकों को भी अनुभव हुआ कि समाज पर वर्चस्व या प्रभुत्व बनाये रखने केलिए जातपात वाली यह वर्णव्यवस्था काम की चीज है. नतीजतन खुद मुस्लिम समाज में अशरफ, अरजाल और अजलाफ श्रेणियां बन गयीं. नवाबों ने सामंती ढाँचे को और शोषणकारी बना दिया.
कबीर और रैदास ने ऐसे ही जटिल समाज को सम्बोधित किया था. वे दस्तकार थे. ग्रामीण नहीं, शहरी दस्तकार. मोची और बुनकर. जूते गांठने और चादर बुनने का पेशा था उनका. बाजार और संचार के साधन विकसित नहीं होने से उत्पादन के दाम उन दिनों कम मिलते होंगे. ग्रामीण दस्तकारों और नगरीय दस्तकारों में इसी कारण बहुत अंतर होता था. कुशल कारीगर शहरों में खिंचे चले आते थे. निश्चित ही कबीर और रैदास के परिवार वाले कुशल कारीगर रहे होंगे, तभी बनारस में आना और रहना संभव हुआ होगा. नगर में इनके उत्पादन के वाजिब दाम मिलने से इनके जीवन में थोड़ा अवकाश भी सृजित हुआ होगा. इसी कारण इन्हे चिंतन का अवसर भी मिला. इनके पास ग्रन्थों के अध्ययन का अभाव जरूर था. धर्मग्रन्थ तो इन्हे छूने की भी मनाही थी. लेकिन इनलोगों ने परवाह नहीं की. जिन धर्मग्रंथों ने इन्हे अछूत घोषित किया था, उन्हें ही इन लोगों ने अछूत घोषित कर दिया. चिंतन-मनन की गहराइयों में उतर कर ज्ञान के मोती निकाले और उसे अपनी जनता को समर्पित किया. भक्ति-आंदोलन के तमाम कवियों ने अपने पेशे और अपनी जाति पर गर्व किया. द्विजों ने उन्हें अछूत-नीच घोषित किया हुआ था. इसे उन्होंने स्वीकार लिया और इसे लिए-दिए गैर-बराबरी वाली वर्ण-व्यवस्था पर हल्ला बोल दिया. इन्होने अपने समान्तर ईश्वर गढ़ लिए. इसी ईश्वर का नाम लेकर जातिवाद पर आक्रमण करने वाला यह अद्भुत आंदोलन था. जात-पात पूछे नहीं कोई ; हरि को भजै सो हरि का होई.
रैदास चामवाला थे ( चायवाला नहीं ). चमार थे. उनकी जाति को समाज में कोई ऊँचा स्थान नहीं मिला था. इसे उन्होंने स्वीकार किया है. लेकिन अपनी सामाजिक श्रेणी को उन्होंने अपनी आध्यात्मिकता के लिए कहीं से बाधक नहीं माना. इसकी उपेक्षा की. उन्हें ही देखा जाय –
जाति ओछी, पाती ओछी, ओछा जनमु हमारा .
रामनाम की सेवन किन्ही, कही रैदास चमारा .
कोई पूरी सृष्टि को शब्दमय देखता है. अक्षर ही उसका ब्रह्म है. .ॐ है उनका ब्रह्माण्ड. लेकिन यह रैदास पूरे ढाँचे को उलट देते हैं. वह अपनी पूरी सृष्टि को चाममय देखते हैं, ऐसा है उनका दर्प . —
जहां देखो वहां चामहि चाम.
चाम के मंदिर बोलत राम
चाम की गौ, चाम का बछड़ा
चाम का हाती, चाम का राजा
चाम के ऊंट पर, चाम का बाज़ा
सुनो रैदास ! सुनो कबीर भाई !
चाम बिना देह किनकी बनाई .
(कमलेश वर्मा की किताब ‘ जाति के प्रश्न पर कबीर ‘ से उद्धृत रैदास बानी)
रैदास और कबीर दोनों ने वर्ण-व्यवस्था के विकल्प में एक नये समाज की प्रस्तावना और खाका पेश किया था. यह इनका यूटोपिया था, इनका लोक. कबीर का लोक अमरदेस था और रैदास का बेगमपुरा. बेगमपुरा का अर्थ है बिना गम का नगर. उल्लास की नगरी. जाति-पाँति विहीन, वेद-पुराण-कुरान के पाखंड से रहित कामगारों की यह दुनिया ऐसी है, जिसमें बैठ कर खाने वाले गपोड़ों केलिए कोई जगह नहीं है. यह मिहनतक़शों की नगरी है. उनका लोक है. कार्ल मार्क्स का कम्युनिस्ट समाज भी यही तो है. कबीर और रैदास जाति वैमनस्य के नहीं जाति भेद विनाश के चिन्तक हैं. को बाभन को शूदा. कोई ब्राह्मण, कोई शूद्र नहीं; या जैसा ब्राह्मण वैसा शूद्र. भेदभाव रहित, प्रेमपूर्ण समाज. यही बेगमपुरा और अमरदेस का सामाजिक दर्शन है.
लेकिन कुछ ही समय बाद तुलसीदास ने बेगमपुरा और अमरदेस को ख़ारिज करते हुए ” गौ-द्विज हितकारी रामराज ” की अवधारणा रखी और प्रश्रयप्राप्त विशिष्ट समाज के लोगों ने इसे अपना सामाजिक दर्शन मान लिया. अफ़सोस की बात कि आधुनिक ज़माने के हमारे उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन में गाँधी ने इसे उसका हिस्सा बना लिया. आंबेडकर और कई दूसरे लोग विरोध करते रहे, लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन पर समाज के ऊँचे तबके का ऐसा दबदबा था कि कबीर और रैदास के विचार दर-किनार कर दिए गए. अब तो रामराज और राममंदिर के प्रश्न उभर कर राष्ट्रीय राजनीतिक प्रश्न बन गए हैं. ऐसा लगता है संसदीय लोकतंत्र पुरोहिती लोकतंत्र में परिवर्तित होने ही वाला है. यह लोकतंत्र नागरिकों को जोड़ने वाला नहीं, तोड़ने वाला होगा. जाति, वर्णधर्म और दूसरे तरह के भेद-भावों का उच्छेद संसदीय लोकतंत्र की आवश्यक शर्त है. यही समावेशी जनतंत्र होगा. रैदास ने अच्छी तरह समझ लिया था कि जातिवाद के खात्मे के बगैर मानव समाज एक नहीं होगा.
जाति-जाति में जाति है, ज्यों केतन के पात
रैदास मानुस ना जुड़ सके, जबतक जाति न जात .
लोगों को जोड़ने की चिन्ता रैदास की प्राथमिक चिन्ता है. समता मूलक समाज की चिन्ता. न इसकी तानाशाही, न उसकी. वर्चस्वमुक्त सहकार भाव समाज.
आज विकट सांस्कृतिक संकट के माहौल में हमें रैदास और कबीर की कुछ अधिक ही याद आती है. आज उनकी बानी हमारे कानों में हौले से मानव मुक्ति के अर्थ खोलती है. जीने के तरीके बताती है.
रैदास के जमाने में राजस्थान के राणा राजघराने की एक बहू मीरा ने रैदास की वाणी को सुना; मीरा मध्यकाल की स्त्री-चेतना का प्रतिनिधित्व करती थीं. राजकुमार सिद्धार्थ ही केवल गृहत्याग नहीं करते, एक राज-रानी भी करती है. मीरा ने सिद्धार्थ की तरह गृहत्याग किया और बनारस आकर अपने समय के सुबुद्ध संत रैदास की शिष्या हो गयीं.
वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहि जासु की
संदेह-ग्रन्थ खंडन-निपन बानी विमल रैदास की .
वेद-पुराणादि संदेह ग्रंथों का निपुणता से खंडन करनेवाले गुरु रैदास को उनके जन्मदिन पर महान मीरा के शब्द उधार लेकर मैं भी बंदन करता हूँ.
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