— अच्युदानंद किशोर नवीन —
परसों से पहले के दिन योगेंद्र यादव जी की किताब मिली और आज उसका आद्यंत अवलोकन भी कर डाला। स्वधर्म की एक नई व्याख्या प्रस्तुत की गई है। स्वार्थ में ‘स्व’ है, मगर धर्म नहीं है; सर्वधर्म में धर्म है, मगर ‘स्व’ नहीं है। योगेंद्र जी बताते हैं कि स्वधर्म मनमर्ज़ी या मनमौजीपन नहीं हो सकता। यदि देश का अर्थ ‘गण’ है, तो उसका स्वधर्म होना आवश्यक है। यह भी रेखांकित किया गया है कि भारत का स्वधर्म जड़ और शाश्वत नहीं हो सकता; वह प्रवाहमान है।
पुस्तक का पहला खंड स्वधर्म पर केंद्रित है, जिसमें इसके विभिन्न आयामों को विस्तार से समझाया गया है। जन, गण और मन की अवधारणा में ‘जन’ को जनता-जनार्दन के रूप में, ‘गण’ को केवल जनसमूह नहीं बल्कि एक राजनीतिक समुदाय के रूप में रूपायित किया गया है। ‘मन’ को जनमानस से जोड़ते हुए उसे आदर्श और मूल्यबोध उन्मुख बताया गया है। इन सबको समेटते हुए इस बात पर बल दिया गया है कि गण की संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए एक व्यवस्था आवश्यक है—और वह है संविधान।
योगेंद्र जी ‘राष्ट्र-राज्य’ की जगह ‘राज्य-राष्ट्र’ की अवधारणा का समर्थन करते हैं। राज्य-राष्ट्र मॉडल यह मानता है कि राजनीतिक सीमाएँ सांस्कृतिक सीमाओं से अनिवार्यतः एकरूप नहीं होतीं, और न ही उनकी ऐसी अनिवार्यता है। गहरी सांस्कृतिक विविधताओं के बावजूद एक राजनीतिक समुदाय की कल्पना संभव है।
राष्ट्रवाद से प्रायः ‘एक राष्ट्र, एक संस्कृति, एक नस्ल, एक भाषा और एक धर्म’ की धारणा बनती है। यह संकीर्ण देशपरस्ती है, जो राष्ट्रवाद के नाम पर भारत में प्रभावी होती जा रही है। यूरोप के इक्कीस देशों की एक साझा आधिकारिक मुद्रा है—क्या इससे उनकी संप्रभुता खतरे में पड़ती है?
एक सिद्धांत जड़ जमाता जा रहा है कि “राष्ट्रहित में सभी अधिकार कुचले जा सकते हैं।” जॉन पॉवेल का मत है कि “भारतीय राष्ट्रवाद का ध्येय किसी को पराया माने बिना अपनत्व स्थापित करना था।”
छठी शताब्दी के विष्णु पुराण में उत्तर में हिमालय और दक्षिण में सागर के बीच के क्षेत्र को भारत कहा गया है। हमारा राष्ट्रवाद यूरोपीय राष्ट्रवाद से भिन्न रहा है। यूरोप में एक कबीला आकर मूल कबीले को खदेड़ देता था, जबकि भारत में विविध तत्व आत्मसात होते गए। भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की परंपरा रही है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की बहुश्रुत कृति संस्कृति के चार अध्याय इसी भाव से आरंभ होती है—
“हे आर्य, हे अनार्य,
हे द्राविड़, हे चीन,
शक, हूण, पठान, मोगल,
एक देह में हुए लीन।”
योगेंद्र जी इस विकृति पर खुलकर कहते हैं कि यह ढोंगी राष्ट्रवाद है। यह न तो चीन के विस्तारवाद से मुकाबला करने का साहस जुटा सकता है, न ही डोनाल्ड ट्रंप जैसी दादागिरी से।
सांप्रदायिकता की चुनौतियों पर चर्चा करते हुए वे ओवैसी की पार्टी AIMIM के संदर्भ में कहते हैं कि यह मुसलमानों की, मुसलमानों के लिए और मुसलमानों द्वारा बनी पार्टी है। इसी प्रकार वे शिरोमणि अकाली दल को सिखों की, सिखों के लिए और सिखों द्वारा बनी पार्टी बताते हैं।
योगेंद्र जी का मत है कि ओवैसी के उदय की भाजपा को प्रतीक्षा थी। इस बिंदु पर वे सटीक पकड़ रखते हैं। किंतु अन्ना और केजरीवाल के पीछे संघ के प्रभाव को वे उतनी स्पष्टता से नहीं देख पाए। अन्ना आंदोलन ने भाजपा के शासन का मार्ग प्रशस्त किया, जिसका दुष्परिणाम देश आज भुगत रहा है।
गुरुश्रेष्ठ सच्चिदानंद सिंहा और साथीश्रेष्ठ सुनील ने ‘आप’ पार्टी की विचारशून्यता और खोखलेपन को आरंभ में ही समझ लिया था। सच्चिदा जी ने निर्दलीयता की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए कहा था—“मान लीजिए संसद में निर्दलीय सांसदों का बहुमत हो जाए और सरकार बने, तो प्रत्येक सांसद अपने मत के अनुसार देश को हाँकने लगेगा। देश एक स्पष्ट दिशा के बजाय अनेक दिशाओं में बिखर जाएगा। देश चलाने के लिए सुसंगत विचारधारा आवश्यक है।”
सेक्युलरवाद की त्रुटियों पर भी सम्यक दृष्टि डाली गई है। योगेंद्र जी ने आश्चर्य व्यक्त किया है कि सेक्युलरवाद का अर्थ नास्तिकता मान लिया गया है और उसका अनुवाद ‘धर्मनिरपेक्षता’ कर दिया गया है। वे स्पष्ट करते हैं कि ‘धर्म’ वह है जो धारण करे, जो शुभ और नैतिक हो। सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुँचाना हमारा धर्म है; सत्य बोलना और अन्याय का विरोध करना भी धर्म है। ऐसे में धर्म से निरपेक्ष होना आदर्श स्थिति नहीं हो सकती। निरपेक्षता निष्क्रियता का बोध कराती है। वे ‘पंथनिरपेक्षता’ को अधिक उपयुक्त शब्द मानते हैं।
सांप्रदायिकता चाहे अल्पसंख्यक की हो या बहुसंख्यक की—दोनों की भर्त्सना होनी चाहिए। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद देश में फैले उन्माद की एक बैठक स्मरण आती है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में मंदिर तोड़े गए थे। सांप्रदायिकता-विरोधी बैठक लाला नागेंद्र प्रसाद के आवास पर हुई थी। समता संगठन की ओर से हम लोगों ने यह सुझाव दिया कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में मंदिर-ध्वंस की निंदा करते हुए यहाँ के मुस्लिम बुद्धिजीवी पर्चा जारी करें। इससे सकारात्मक संदेश जाएगा। पर्चा छपा और हमने उसे चौक-चौराहों तथा मदरसों में वितरित किया।
गांधी, नेहरू, भगत सिंह और सुभाष बोस वाला सेक्युलरवाद भारतीय राष्ट्रवाद का अभिन्न अंग है। यदि इसे हटा दिया गया तो राष्ट्रवाद बहुसंख्यक वर्चस्व का रूप ले लेगा।
आज यह भी ध्यान देने योग्य है कि सत्तारूढ़ भाजपा का एक भी मुस्लिम विधायक या सांसद नहीं है। दूसरी ओर पाकिस्तान में कुछ हिंदू विधायक और सांसद हैं।
नागरिकता कानून में संशोधन कर उसे धर्म से जोड़ दिया गया है। यदि बांग्लादेश, पाकिस्तान या अफगानिस्तान से कोई गैर-मुस्लिम भारत आता है—भले ही अवैध रूप से—तो उसे नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है।
योगेंद्र जी का सुझाव है कि सेकुलर राजनीति को अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय और भेदभाव का प्रतिकार करना चाहिए। दुर्भाग्य से आज सेकुलर भारत की बात करने वाले अल्पसंख्यक हो गए हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर पुलवामा, मणिपुर, कश्मीर और चीन पर भी पर्याप्त चर्चा की गई है। सांस्कृतिक स्वराज की आवश्यकता को भी रेखांकित किया गया है। जेएनयू में संस्कृत विभाग खोलने पर हुए विरोध का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि जनता से कटी भाषा में संवाद संभव नहीं। “झूठी बातें देशी शब्दावली की चाशनी में लिपटी होती हैं”—इस टिप्पणी से वे संवाद की शैली पर प्रश्न उठाते हैं।
हिंदी दिवस और पखवाड़े पर व्यंग्य करते हुए वे इसे औपचारिकता बताते हैं। हिंदी पट्टी का स्नातक भी शुद्ध वर्तनी नहीं लिख पाता—यह विडंबना है।
पुस्तक के अंतिम खंड में स्वराज के अष्टांग मार्ग का विवेचन है—राष्ट्रीय संप्रभुता, लोकतांत्रिक स्वशासन, विश्व शांति, प्रकृति से संबंध, शोषण से मुक्ति, सांस्कृतिक स्वाधीनता, वैयक्तिक स्वतंत्रता और आध्यात्मिक मुक्ति।
दो दशक पहले योगेंद्र जी ‘युगधर्म’ की चर्चा करते थे और राजनीति को युगधर्म मानते थे। उनका आग्रह था कि राजनीति से विमुख होना समाधान नहीं है। भारत जैसे देश में समस्याओं का समाधान स्वस्थ राजनीति से ही संभव है। देश नीति और नेतृत्व से चलता है—जिसकी स्पष्ट आर्थिक, शैक्षिक, रक्षा, विदेश, आंतरिक और रोजगार नीतियाँ हों।
योगेंद्र जी की अनेक छवियाँ उभरती हैं—प्रखर बुद्धिजीवी, शिक्षक, चुनाव विश्लेषक, लेखक, संपादक, टिप्पणीकार और किसान आंदोलन के सहभागी। सरकार ने उन्हें ‘आंदोलनजीवी’ कहकर छोटा दिखाने का प्रयास किया, किंतु उनका लेखन और सक्रियता अपने आप में साक्ष्य है।
पुस्तक का पहला संस्करण एक सप्ताह में समाप्त हो गया—यह मिथक भी टूटा कि हिंदी की किताबें बिकती नहीं हैं।
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