प्रोफेसर रामचंद्र प्रधान नहीं रहे! – परिचय दास

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Professor Ramchandra Pradhan

Parichay Das

प्रोफेसर रामचंद्र प्रधान अब हमारे बीच नहीं हैं—यह स्वीकार करना जितना कठिन है, उतना ही आवश्यक भी। वे उन विरल अध्येताओं में थे जिनके लिए विचार केवल बौद्धिक उपक्रम नहीं, जीवन-पद्धति था। भारतीय समाजवादी आंदोलन को उन्होंने जिस गंभीरता, गहराई और आत्मान्वेषी दृष्टि से पढ़ा, वह उन्हें अपने समय के विशिष्ट समाजवादी चिन्तकों की पंक्ति में खड़ा करता है।

स्मृतियाँ जैसे एक साथ उमड़ आई हैं—उनकी धीमी, संयत वाणी; तर्क की स्वच्छता; और असहमति को भी स्नेह से स्वीकार करने का स्वभाव। वे बोलते थे तो लगता था मानो इतिहास की परतें धीरे-धीरे खुल रही हों। वे बताते नहीं थे, उद्घाटित करते थे।

भारतीय समाजवादी आंदोलन उनके अध्ययन का केन्द्रीय क्षेत्र था, पर वह उनके लिए केवल एक राजनीतिक धारा नहीं थी। वह भारत की नैतिक बेचैनी का इतिहास था। वे बार-बार इस बात पर बल देते थे कि समाजवाद को केवल आर्थिक ढाँचे की बहस तक सीमित करना उसके मूल स्वरूप के साथ अन्याय है।

उनके व्याख्यानों में जब राम मनोहर लोहिया का नाम आता तो उसके साथ केवल ‘सप्तक्रांति’ का उल्लेख नहीं होता, बल्कि भाषा, स्त्री, जाति और वैश्विक असमानता की समग्र दृष्टि भी खुलती थी। जब वे जयप्रकाश नारायण पर बोलते, तो ‘संपूर्ण क्रांति’ को वे एक नैतिक पुनर्जागरण के रूप में देखते—राजनीतिक परिवर्तन से कहीं अधिक गहरे स्तर पर। आचार्य नरेन्द्र देव के संदर्भ में वे भारतीय बौद्धिक परंपरा और समाजवादी संवेदना के अद्भुत समन्वय को रेखांकित करते।

उनका कृतित्व इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने समाजवादी आंदोलन को मिथकीय आभा से मुक्त कर उसके अंतर्विरोधों की भी सूक्ष्म पड़ताल की। वे यह स्वीकार करने में संकोच नहीं करते थे कि भारतीय समाजवादी धारा कई बार संगठनात्मक दुर्बलताओं, वैचारिक असंगतियों और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से आहत हुई। पर यह आलोचना किसी कटुता से नहीं, आत्मालोचन की नैतिक भूमि से आती थी। वे कहते थे कि किसी भी आंदोलन की प्रामाणिकता उसकी आत्म-समीक्षा की क्षमता में निहित होती है।

उनकी लेखनी में एक विशिष्ट संयम था। वे उत्तेजना से दूर रहते थे। उनके लेख और पुस्तकें तथ्यों की प्रामाणिकता, संदर्भों की विश्वसनीयता और तर्क की स्वच्छता के कारण अलग पहचानी जाती थीं। वे न तो अतीत का अंध-समर्थन करते थे, न वर्तमान का आवेगपूर्ण निषेध। उनके लिए इतिहास एक जीवित संवाद था—जिसमें अतीत और वर्तमान दोनों एक-दूसरे को आलोकित करते हैं।

व्यक्तित्व की दृष्टि से वे अत्यंत विनम्र थे। बड़े से बड़े मंच पर भी उनका स्वर कभी ऊँचा नहीं होता था। वे मानते थे कि विचार की शक्ति उसकी ध्वनि में नहीं, उसकी स्पष्टता में होती है। वे छात्रों और शोधार्थियों को केवल मार्गदर्शन नहीं देते थे; उन्हें सोचने की स्वतंत्रता भी देते थे। उनके पास जाने वाला कोई भी व्यक्ति केवल जानकारी लेकर नहीं लौटता था; वह एक नए प्रश्न के साथ लौटता था।

उनके लिए समाजवाद कोई जड़ सिद्धांत नहीं था; वह भारतीय समाज की जटिल संरचनाओं के बीच एक जीवित प्रक्रिया था। वे जाति, भाषा, क्षेत्रीय असमानता और ग्रामीण-शहरी विभाजन जैसे प्रश्नों को समाजवादी विमर्श के केंद्र में रखते थे। उनका आग्रह था कि यदि समाजवाद भारतीय समाज की वास्तविक संरचना को समझे बिना आगे बढ़ेगा तो वह केवल नारा बनकर रह जाएगा।

उनके भीतर एक नैतिक दृढ़ता थी। सार्वजनिक जीवन में अवसरवादिता और तात्कालिक लाभ की प्रवृत्तियों पर वे स्पष्ट असहमति दर्ज करते थे। वे विचार को सत्ता के समीप ले जाने के बजाय समाज के भीतर गहराई तक पहुँचाना चाहते थे। उनके लिए समाजवादी आंदोलन का मूल उद्देश्य सत्ता-प्राप्ति नहीं, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना था।

व्यक्तिगत स्तर पर वे अत्यंत आत्मीय थे। बातचीत में वे सामने वाले को पूरा समय देते थे। वे सुनने की कला जानते थे—और शायद इसी कारण उनके उत्तर इतने संतुलित और गहरे होते थे। वे कभी भी अपने ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करते थे बल्कि सामने वाले को सोचने के लिए प्रेरित करते थे।

उनके जाने से जो रिक्तता बनी है, वह केवल एक विद्वान के न रहने की रिक्तता नहीं है। वह उस संवाद-परंपरा के टूटने की पीड़ा है जिसमें विचार मतभेदों के बावजूद सम्मान के साथ आगे बढ़ता था। आज जब सार्वजनिक विमर्श में धैर्य कम होता जा रहा है, तब उनकी स्मृति हमें संयम और गंभीरता की ओर लौटने का आह्वान करती है।

उनका कृतित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए एक वैचारिक धरोहर है। भारतीय समाजवादी आंदोलन की जड़ों, उसकी शाखाओं और उसकी छायाओं को समझने के लिए उनका लेखन अनिवार्य रहेगा। वे हमें यह याद दिलाते हैं कि कोई भी आंदोलन तभी जीवित रहता है जब वह अपने भीतर प्रश्नों को स्थान देता है।

आज स्मृति ही उनका सबसे बड़ा सम्मान है। वे हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं हैं, पर उनके विचार, उनके शब्द और उनकी नैतिक आभा अब भी हमारे बौद्धिक जीवन को आलोकित करती रहेगी। उनके प्रति श्रद्धांजलि यही है कि हम संवाद को जीवित रखें, विचार को मानवीय बनाए रखें, और समाज के पक्ष में खड़े होने का साहस बनाए रखें।

भारतीय समाजवादी चिंतन की दीर्घ परंपरा में रामचंद्र प्रधान का नाम एक शांत किंतु गहरे प्रवाह की तरह स्मरण में आता है। वे उन विद्वानों में हैं जिन्होंने इतिहास को केवल घटनाओं की सूची नहीं माना बल्कि उसे मनुष्य की नैतिक यात्रा के रूप में पढ़ा। उनके लेखन में विचार का ताप है परंतु वह उत्तेजना का ताप नहीं—विवेक का ताप है; वह मनुष्य की स्वतंत्रता के पक्ष में जलती हुई एक दीर्घकालिक मशाल की तरह है।

Raj to Swaraj उनके लेखन का वह सोपान है जहाँ इतिहास अपनी राजनीतिक परिधि से बाहर निकलकर आत्मा का प्रश्न बन जाता है। ‘राज’ यहाँ केवल औपनिवेशिक सत्ता नहीं है; वह एक ऐसी संरचना है जो मनुष्य की चेतना पर छाया की तरह फैलती है और ‘स्वराज’ केवल सत्ता-हस्तांतरण नहीं बल्कि उस छाया से बाहर आने की प्रक्रिया है। प्रधान इस पुस्तक में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को घटनाओं के क्रम में नहीं बल्कि विचारों की अंतर्धारा में पढ़ते हैं। कांग्रेस की स्थापना, जनांदोलनों का उभार, किसान और श्रमिक चेतना, समाजवादी प्रवृत्तियाँ—ये सब उनके यहाँ एक समवेत स्वर रचते हैं। वे दिखाते हैं कि स्वराज की आकांक्षा केवल राजनीतिक नारा नहीं थी; वह आत्म-सम्मान, आत्म-निर्णय और नैतिक पुनर्जागरण का आग्रह थी। इस पुस्तक की भाषा में अकादमिक अनुशासन है पर भीतर एक आंतरिक लय भी है—जैसे इतिहास स्वयं अपने अर्थ खोज रहा हो।

Colonialism in India में उनका दृष्टिकोण और अधिक विश्लेषणात्मक हो उठता है। यहाँ वे औपनिवेशिक शासन को केवल शोषण की कथा के रूप में नहीं रखते; वे उसकी जटिलताओं को खोलते हैं। भूमि-व्यवस्था की पुनर्रचना, औद्योगिक अवनति, शिक्षा-नीति का निर्माण, प्रशासनिक केंद्रीकरण—इन सबके भीतर वे उस द्वंद्व को पहचानते हैं जिसमें आधुनिक संस्थाओं का आगमन और आर्थिक-सांस्कृतिक क्षरण साथ-साथ चलते हैं। उनके लेखन में एक संतुलन है—न तो अंध-निंदा, न ही अंध-स्वीकृति। वे औपनिवेशिकता को एक ऐतिहासिक परिस्थिति के रूप में पढ़ते हैं, जिसने भारतीय समाज को विखंडित भी किया और उसे नए प्रकार की राजनीतिक चेतना भी दी। इस विश्लेषण में समाजवादी दृष्टि की स्पष्ट छाया है—जहाँ वर्ग, श्रम और उत्पादन-संबंधों का प्रश्न इतिहास की धुरी बन जाता है।

Reading and Reappraising Gandhi में उनका चिंतन एक नैतिक और दार्शनिक विस्तार ग्रहण करता है। यहाँ वे गांधी को श्रद्धा के आसन पर बैठाकर नहीं, बल्कि संवाद के क्षेत्र में लाकर देखते हैं। गांधी उनके लिए स्थिर प्रतिमा नहीं, बल्कि गतिमान प्रश्न हैं। वे पूछते हैं—क्या आज की राजनीति, जो विकास और उपभोग की अंधी दौड़ में है, गांधी के संयम और नैतिक आग्रह को सुन सकती है? प्रधान गांधी के सत्य, अहिंसा और स्वावलंबन को समकालीन संदर्भों में परखते हैं। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि गांधी की सीमाएँ हैं; परंतु वे सीमाएँ भी विचार के लिए आवश्यक हैं, क्योंकि वहीं से आलोचनात्मक संवाद जन्म लेता है। इस पुस्तक में भाषा कहीं अधिक आत्मीय हो जाती है—जैसे लेखक स्वयं अपने समय से प्रश्न कर रहा हो।

रामचंद्र प्रधान का लेखन किसी एक विचारधारा की जकड़न में नहीं है, फिर भी उसमें समाजवादी आत्मा की धड़कन स्पष्ट है। वे इतिहास को जन-आकांक्षाओं की कथा मानते हैं। उनके लिए स्वतंत्रता केवल संवैधानिक शब्द नहीं; वह मनुष्य की गरिमा का पर्याय है। उनकी पुस्तकों में तथ्य की दृढ़ता है, पर उससे अधिक विचार की आंतरिक ईमानदारी है। वे पाठक को आदेश नहीं देते; वे उसे सोचने के लिए आमंत्रित करते हैं।

उनके कृतित्व में इतिहास, राजनीति और नैतिकता का एक त्रिवेणी-संगम दिखाई देता है। वहाँ राष्ट्रवाद है पर वह आक्रामक नहीं; वहाँ समाजवाद है पर वह नारे में सीमित नहीं; वहाँ गांधी हैं पर वे आलोचना से परे नहीं। यही संतुलन उन्हें विशिष्ट बनाता है। उनके लेखन को पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो भारत का आधुनिक इतिहास अपने अंतःस्वर में बोल रहा हो—संयत, प्रश्नाकुल और भविष्य के प्रति सजग।

प्रो. रामचंद्र प्रधान की पुस्तकों पर चर्चा प्रायः उनके विषय-विस्तार—उपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद और गांधी—तक सीमित रह जाती है; किंतु कुछ ऐसी अनकही परतें भी हैं जो उनके लेखन को अधिक सूक्ष्म और जटिल बनाती हैं।

पहली अनकही बात यह है कि Raj to Swaraj केवल औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता की कथा नहीं है; यह ‘राज’ की मानसिक संरचना पर भी प्रश्न है। प्रधान संकेत देते हैं कि औपनिवेशिक सत्ता के जाने के बाद भी ‘राज’ की प्रवृत्ति भारतीय प्रशासन और राजनीति में बनी रह सकती है। इस प्रकार यह पुस्तक स्वाधीन भारत की भी एक अप्रत्यक्ष आलोचना है। वे प्रत्यक्ष रूप से तीखे वाक्य नहीं लिखते, पर उनकी पंक्तियों के बीच यह चिंता उपस्थित रहती है कि कहीं स्वराज केवल नाम का परिवर्तन न बन जाए।

दूसरी बात, Colonialism in India में उनका दृष्टिकोण पारंपरिक राष्ट्रवादी इतिहास~लेखन से थोड़ा भिन्न है। वे औपनिवेशिकता को केवल दानव की तरह चित्रित नहीं करते। वे स्वीकार करते हैं कि औपनिवेशिक शासन ने आधुनिक शिक्षा, नौकरशाही और विधिक संस्थाओं का ढाँचा दिया—परंतु उसी के भीतर शोषण और असमानता का बीज भी रोपा। यह संतुलन उन्हें वैचारिक रूप से अधिक विश्वसनीय बनाता है, किंतु यही संतुलन उन्हें उग्र राष्ट्रवादी पाठकों के लिए कभी-कभी असुविधाजनक भी बना सकता है। उनकी समाजवादी संवेदना उन्हें वर्ग-संबंधों की ओर ले जाती है; वे राष्ट्रवाद की चमक के पीछे छिपे वर्गीय अंतर्विरोधों को रेखांकित करते हैं—यह पक्ष अक्सर कम चर्चा में आता है।

तीसरी अनकही परत Reading and Reappraising Gandhi में दिखाई देती है। प्रधान गांधी की पुनर्व्याख्या करते समय उन्हें आलोचना से मुक्त नहीं रखते। वे गांधी के नैतिक आग्रहों की प्रशंसा करते हैं, किंतु आधुनिक औद्योगिक समाज की जटिलताओं के संदर्भ में उनके विचारों की सीमाओं पर भी संकेत करते हैं। यहाँ प्रधान एक प्रकार का ‘संवादी समाजवाद’ रचते हैं—जहाँ मार्क्सवादी विश्लेषण और गांधीवादी नैतिकता का संवाद संभव है। यह संवाद उनके लेखन का मौन केंद्र है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रधान की भाषा में अकादमिक कठोरता है परंतु उसमें वैचारिक ईमानदारी की गर्माहट भी है। वे अपने निष्कर्षों को अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत नहीं करते; वे पाठक को विचार की प्रक्रिया में सहभागी बनाते हैं। उनके यहाँ इतिहास केवल अतीत का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि वर्तमान की आलोचना का साधन है।

रामचंद्र प्रधान की पुस्तकों की अनकही शक्ति उनके संतुलन में है—न तो वे भावुक राष्ट्रवाद में बहते हैं, न ही शुष्क समाजशास्त्रीय विश्लेषण में सीमित रहते हैं। वे उस मध्य-प्रदेश में खड़े दिखाई देते हैं जहाँ इतिहास, नैतिकता और राजनीति एक-दूसरे से संवाद करते हैं। शायद यही कारण है कि उनका लेखन शोर नहीं करता, पर दीर्घकाल तक स्मृति में बना रहता है।


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