— परिचय दास —
।। एक ।।
विजयदेव नारायण साही हिंदी आलोचना की परंपरा में किसी एक मत के उत्तराधिकारी नहीं थे; वे मूलतः सकारात्मक परिवर्तन व टकराव की बौद्धिक भूमि पर खड़े आलोचक थे। उनका संघर्ष व्यक्तियों से अधिक अवधारणाओं से था। वे उन स्थिर मान्यताओं को चुनौती देते हैं जो लंबे समय तक हिंदी आलोचना को दिशा देती रही थीं।
सबसे पहले उनका टकराव उस नैतिक-आदर्शवादी आलोचना से था जिसकी प्रतिष्ठा आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने स्थापित की थी। शुक्ल की आलोचना में “लोकमंगल” और “इतिहासगत प्रगति” केंद्रीय मूल्य थे। साही ने इस परंपरा के महत्त्व को नकारा नहीं, पर उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि क्या साहित्य को केवल सामाजिक उपयोगिता और नैतिक प्रगति की कसौटी पर आँका जा सकता है? उनके अनुसार काव्य का सत्य केवल लोकहित या नैतिक आदर्श में सीमित नहीं होता; उसमें अंतःचेतना की जटिलता, आत्म-संघर्ष और अस्तित्वगत द्वंद्व भी शामिल होते हैं। इस प्रकार वे शुक्लीय आलोचना की नैतिक-रेखीयता से टकराते हैं।
दूसरा टकराव मार्क्सवादी या प्रगतिशील आलोचना की उस रूढ़ि से था जो साहित्य को वर्ग-संघर्ष और ऐतिहासिक भौतिकवाद के प्रत्यक्ष प्रतिबिंब के रूप में देखने लगी थी। रामविलास शर्मा और उनके समकालीनों की आलोचना ने हिंदी साहित्य को सामाजिक यथार्थ से जोड़ा पर साही ने इस प्रवृत्ति में अंतर्निहित यांत्रिकता की ओर संकेत किया। उनका तर्क था कि यदि हर कृति को केवल वर्गीय दृष्टि से पढ़ा जाएगा तो उसकी काव्यात्मक स्वतंत्रता और आंतरिक संरचना उपेक्षित हो जाएगी। वे विचारधारा की उपयोगिता स्वीकार करते हैं पर उसे अंतिम मानदंड मानने से इंकार करते हैं।
तीसरा संघर्ष “नई कविता” और आधुनिकतावादी विमर्श की कुछ अतियों से भी था। अज्ञेय द्वारा प्रतिष्ठित व्यक्तिवादी आधुनिकता ने कविता को आत्मानुभूति और प्रयोगशीलता की दिशा दी, पर साही ने यह सावधानी बरती कि व्यक्तिवाद आत्म-केन्द्रितता में न बदल जाए। वे आधुनिकता को स्वीकार करते हैं पर उसे सामाजिक और नैतिक प्रश्नों से काटकर नहीं देखते। इस तरह वे शुद्ध कलावाद या निरपेक्ष सौंदर्यवाद से भी टकराते हैं।
चौथा टकराव आलोचना की घोषणात्मक और संस्थागत प्रवृत्ति से था। नामवर सिंह के समय में आलोचना एक प्रभावशाली अकादमिक अनुशासन बन चुकी थी, जिसमें विचारधारात्मक ध्रुवीकरण स्पष्ट था। साही इस संस्थागत स्वरूप से दूरी रखते हैं। वे आलोचना को “लाइन” या “स्कूल” में बदलने के विरुद्ध थे। उनके लिए आलोचना एक खुली बौद्धिक प्रक्रिया थी, न कि मत-प्रतिष्ठा का माध्यम।
पाँचवाँ और गहरा टकराव उस प्रवृत्ति से था जो मध्यकालीन साहित्य को सांप्रदायिक या सांस्कृतिक महिमामंडन की दृष्टि से पढ़ती थी। उन्होंने मलिक मुहम्मद जायसी जैसे कवियों को न तो केवल सूफ़ी आध्यात्मिकता का प्रतीक माना, न सांस्कृतिक समन्वय का रोमानी उदाहरण। उन्होंने ऐतिहासिक सत्ता-संबंधों, रूपक-संरचना और नैतिक द्वंद्व को केंद्र में रखकर पढ़ा। इस प्रकार वे परंपरा की रूढ़ व्याख्याओं से टकराते हैं।
साही का मूल संघर्ष आलोचना की किसी भी स्थिर, अंतिम और सर्वमान्य अवधारणा से था। वे साहित्य को प्रश्नों के लिए खुला क्षेत्र मानते थे। चाहे वह लोकमंगल की नैतिक कसौटी हो, मार्क्सवादी वर्ग-दृष्टि हो, आधुनिकतावादी व्यक्तिवाद हो या संस्थागत आलोचना का प्रभाव—साही ने हर जगह पुनर्विचार की माँग की।
उनकी विशिष्टता इसी में है कि वे किसी विचारधारा के प्रवक्ता नहीं बने; वे आलोचना को निरंतर आत्म-संशोधन की प्रक्रिया बनाना चाहते थे। हिंदी आलोचना की पूर्ववर्ती अवधारणाओं से उनका टकराव अस्वीकार का नहीं, पुनर्परिभाषा का टकराव था—जहाँ वे हर स्थापित मान्यता से यह पूछते हैं कि क्या वह मनुष्य और साहित्य की जटिलता को पूरी तरह पकड़ पा रही है।
विजयदेव नारायण साही का आलोचनात्मक विवेक हिंदी आलोचना में एक विशिष्ट नैतिक-बौद्धिक उपस्थिति के रूप में देखा जा सकता है। यह विवेक किसी पूर्वनिर्धारित विचारधारा का अनुयायी नहीं, बल्कि विचार के भीतर सक्रिय संशय का संवाहक है। साही के यहाँ आलोचना न तो घोषणापत्र है, न वाक्चातुर्य; वह एक गहन आत्म-संवाद है, जिसमें पाठ, समय और स्वयं आलोचक—तीनों कटघरे में उपस्थित रहते हैं।
उनके आलोचनात्मक विवेक की पहली विशेषता है—स्वतंत्र वैचारिक स्थिति। वे किसी विचारधारा को अंतिम सत्य के रूप में ग्रहण नहीं करते। मार्क्सवाद, आधुनिकतावाद, अस्तित्ववाद—इन सभी से उनका संवाद है, पर वे इनमें से किसी के स्थायी प्रतिनिधि नहीं बनते। उनका विवेक विचारधाराओं को उपकरण की तरह उपयोग करता है, पर उन्हें पहचान की तरह ओढ़ता नहीं। इसीलिए उनके लेखन में बौद्धिक स्वायत्तता की स्पष्ट आभा दिखाई देती है।
दूसरी विशेषता है—आत्म-संशय की नैतिकता। साही अपने निष्कर्षों को अंतिम रूप में स्थापित करने से बचते हैं। वे प्रश्न को निष्कर्ष से अधिक महत्व देते हैं। उनके यहाँ आलोचना एक खुली प्रक्रिया है—जहाँ अर्थ स्थिर नहीं, बल्कि संवादरत है। यह प्रवृत्ति उन्हें निर्णयात्मकता की कठोरता से दूर रखती है। वे मूल्यांकन करते हैं, पर उस मूल्यांकन के भीतर भी पुनर्विचार की गुंजाइश छोड़ते हैं। यह आलोचक की बौद्धिक ईमानदारी का संकेत है।
तीसरी विशेषता है—संरचना की बजाय चेतना पर ध्यान। साही साहित्य को केवल ऐतिहासिक या सामाजिक दस्तावेज़ की तरह नहीं पढ़ते; वे उसे चेतना की जटिल संरचना के रूप में देखते हैं। उनके लिए कविता या कथा केवल विचार की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रहे द्वंद्व का रूपांतरण है। वे पाठ के भीतर छिपी मानसिक और नैतिक उलझनों को पहचानते हैं। इसीलिए उनका विश्लेषण केवल बाहरी संदर्भों तक सीमित नहीं रहता; वह पाठ की आंतरिक बनावट में प्रवेश करता है।
चौथी विशेषता है—विश्व-दृष्टि का विस्तार। साही का आलोचनात्मक विवेक हिंदी साहित्य को विश्व-संदर्भ में रखकर देखने की क्षमता रखता है। वे भारतीय अनुभव को वैश्विक आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में समझते हैं। उनके यहाँ तुलनात्मकता प्रदर्शन नहीं, बल्कि चिंतन का स्वाभाविक आयाम है। यह व्यापकता उन्हें संकीर्ण सांस्कृतिक आग्रहों से बचाती है।
पाँचवीं विशेषता है—नैतिक साहस। साही का लेखन लोकप्रियता की शर्तों पर नहीं चलता। वे अपने समय की वैचारिक सुविधाओं से दूरी बनाए रखते हैं। यदि किसी प्रचलित मत से असहमति हो, तो वे उसे स्पष्ट करते हैं। उनका विवेक सत्ता-संरचना के निकट जाकर अनुकूल नहीं होता। इस अर्थ में उनका आलोचनात्मक स्वभाव संयत, पर निर्भीक है।
छठी विशेषता है—काव्यात्मक संवेदना और विश्लेषण का संतुलन। साही स्वयं कवि थे, इसलिए उनके आलोचनात्मक विवेक में संवेदना की आंतरिक लय मौजूद है। वे रचना को केवल सिद्धांत की कसौटी पर नहीं कसते; वे उसकी काव्यात्मक ऊर्जा को भी पहचानते हैं। विचार और अनुभव उनके यहाँ अलग-अलग खानों में नहीं रहते, बल्कि एक-दूसरे को आलोकित करते हैं।
सातवीं विशेषता है—प्रतिमान-संशय। वे किसी स्थापित मूल्य-मानदंड को अंतिम नहीं मानते। वे आलोचना को एक सतत पुनर्पाठ की प्रक्रिया समझते हैं। यही कारण है कि उनका विवेक कठोर श्रेणियों की बजाय लचीली और संवादधर्मी व्याख्याओं को महत्व देता है।
साही का आलोचनात्मक विवेक उस प्रकार का विवेक है जो साहित्य को विचार की प्रयोगशाला बनाता है, पर उसे विचारधारा का मंच नहीं बनने देता। वह आलोचना को बौद्धिक ईमानदारी का अभ्यास बनाता है। उसमें शोर नहीं, गहराई है; निर्णय नहीं, विवेक है; आग्रह नहीं, प्रश्न है।
यही वह गुण है जो साही को हिंदी आलोचना में एक अलग, अधिक आत्मिक और अधिक स्वतंत्र स्थान प्रदान करता है।
।। दो ।।
विजयदेव नारायण साही के बारे में जितना कहा गया है, उससे अधिक शायद वह है जो अनकहा रह गया। वे हिंदी आलोचना में किसी सुस्पष्ट ‘खेमे’ के प्रतिनिधि नहीं बने; यही उनकी ताक़त भी थी और सीमा भी। उन्होंने न तो वैचारिक घोषणापत्र लिखे, न अपने चारों ओर अनुयायियों का वलय रचा। परिणामतः उन पर संस्थागत प्रतिष्ठा का यथा अपेक्षित ध्यान नहीं जाता पर आलोचनात्मक ईमानदारी के स्तर पर वे अधिक ऊँचे ठहरते हैं।
उनका एक पक्ष सबसे पहले उनकी बौद्धिक बेचैनी में दिखाई देता है। वे किसी निष्कर्ष पर ठहर जाने वाले आलोचक नहीं थे। उनके लेखन में बार-बार आत्म-संशय, पुनर्विचार और अवधारणाओं की पुनर्परीक्षा मिलती है। यह गुण उन्हें वैचारिक रूप से अधिक आधुनिक बनाता है। उन्होंने विचारधाराओं का उपयोग किया, पर स्वयं विचारधारा के प्रचारक नहीं बने। यह भिन्नता उन्हें कई समकालीनों से अलग करती है, जिनके लिए आलोचना अक्सर वैचारिक प्रतिपादन का माध्यम बन जाती थी।
साही का महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी नैतिक दृष्टि है। वे साहित्य को केवल रूप या भाषा की संरचना के रूप में नहीं देखते; उसमें एक नैतिक संकट, एक मानवीय दुविधा की खोज करते हैं। उनके लिए काव्य का मूल्य इस बात से तय होता है कि वह मनुष्य की चेतना को कितना जटिल और संवेदनशील बनाता है। इसीलिए वे मध्यकालीन कवियों को भी आधुनिक प्रश्नों से जोड़कर पढ़ते हैं। उनकी आलोचना में मूल्यांकन का आधार किसी विचारधारा की स्वीकृति नहीं, बल्कि मानवीय गहराई है।
तीसरा आयाम उनकी आत्मिक स्वतंत्रता है। वे न तो पूर्णतः परंपरावादी थे, न आक्रामक आधुनिकतावादी। उन्होंने परंपरा को तोड़ा नहीं बल्कि उसके भीतर प्रवेश कर उसे भीतर से प्रश्नांकित किया। वे आधुनिकता को भी अंतिम सत्य की तरह स्वीकार नहीं करते। उनके लिए साहित्य एक खुला क्षेत्र है, जहाँ अर्थ लगातार बनते और टूटते रहते हैं। यह लचीलापन उन्हें किसी एक आलोचनात्मक पद्धति में बाँधने नहीं देता।
उनकी शैली उल्लेखनीय है। वे जटिल दार्शनिक अवधारणाओं को अपनाते हैं पर भाषा को अकादमिक जड़ता से मुक्त रखते हैं। उनके वाक्यों में एक तरह की आत्मीयता और संवादधर्मिता है। वे पाठक को निर्देश नहीं देते बल्कि सोचने के लिए उकसाते हैं। यही कारण है कि उनका लेखन घोषणात्मक कम और विवेचनात्मक अधिक है।
एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि साही ने साहित्य को सांस्कृतिक राजनीति से पूरी तरह अलग नहीं किया पर उसे “केवल राजनीति में सीमित” भी नहीं किया। वे सत्ता-संबंधों को पहचानते हैं पर काव्य की आंतरिक संरचना की उपेक्षा नहीं करते। उनके लिए रूप और विचार परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे को निर्मित करने वाले तत्व हैं। यह संतुलन आज की ध्रुवीकृत आलोचना में दुर्लभ दिखाई देता है।
साही का महत्त्व इस बात में है कि उन्होंने हिंदी आलोचना को आत्म-संशय और आत्म-निरीक्षण की संस्कृति दी। वे किसी आंदोलन के प्रतीक नहीं बने पर उन्होंने आलोचना को अधिक विवेकशील और अधिक नैतिक बनाया। उनका योगदान किसी एक सिद्धांत में नहीं बल्कि उस बौद्धिक ईमानदारी में है जो साहित्य को प्रश्नों के लिए खुला रखती है। यही उनकी स्थायी उपस्थिति है—कम प्रचारित, पर गहराई में अधिक प्रभावी।
।। तीन ।।
विजयदेव नारायण साही ने मध्यकालीन काव्य पर विचार करते हुए कई प्रतिष्ठित मान्यताओं को चुनौती दी। साही का मूल प्रश्न यह था कि दरबारी सत्ता से गहरे जुड़े कवि की धार्मिक उदारता को किस सीमा तक स्वायत्त माना जाए। खुसरो दिल्ली सल्तनत के सत्तात्मक ढाँचे से संबद्ध थे; उनकी काव्य-संवेदना उस दरबारी संस्कृति में विकसित हुई जहाँ इस्लामी सत्ता-चेतना निर्णायक थी। साही ने इस ऐतिहासिक संदर्भ की ओर संकेत करते हुए यह देखा कि सूफ़ी भावधारा की आध्यात्मिक भाषा और राजनीतिक यथार्थ के बीच एक जटिल संबंध है। यदि कहीं खुसरो के लेखन में सांस्कृतिक श्रेष्ठताबोध या इस्लामी प्रभुत्व का समर्थन दिखता है, तो उसे केवल सूफ़ी प्रेमवाद से ढँककर नहीं पढ़ा जाना चाहिए—यही साही का आग्रह था।
साही का तर्क अधिक सूक्ष्म था। वे यह दिखाना चाहते थे कि मध्यकालीन “समन्वय” को अक्सर एक रोमानी कथा की तरह प्रस्तुत किया जाता है जबकि उसके भीतर शक्ति-संबंध भी सक्रिय थे। खुसरो की रचनाओं में भारतीयता के प्रति आकर्षण और लोक-संवेदना का सम्मान अवश्य है पर साथ ही इस्लामी सत्ता-संरचना के प्रति निष्ठा भी है। साही ने इसी द्वंद्व को रेखांकित किया। यह आलोचना किसी धार्मिक समुदाय के प्रति वैमनस्य का समर्थन नहीं, बल्कि साहित्य को उसके ऐतिहासिक-राजनीतिक संदर्भ में पढ़ने का प्रयास है।
इसके विपरीत, जब साही मलिक मुहम्मद जायसी को पढ़ते हैं, तो उन्हें वहाँ सत्ता के प्रति अधिक दूरी और आत्म-संघर्ष की तीव्रता दिखाई देती है। “पद्मावत” में इस्लामी और हिंदू सांस्कृतिक तत्त्वों का समावेश है पर वह दरबारी महिमा-गान नहीं बनता।
अलाउद्दीन का चरित्र सत्ता-लिप्सा की आलोचना के रूप में उपस्थित होता है। साही के लिए यह अंतर महत्त्वपूर्ण था—एक ओर सत्ता से निकटता, दूसरी ओर सत्ता की आलोचनात्मक प्रस्तुति।
साही का उद्देश्य खुसरो को यह दिखाना था कि सूफ़ी उदारता का विमर्श ऐतिहासिक सत्ता-संबंधों से मुक्त नहीं है। वे साहित्य को महिमामंडित छवियों से बाहर निकालकर उसकी जटिलता में देखना चाहते थे। यदि उनकी भाषा कहीं तीखी प्रतीत होती है तो वह इसी आलोचनात्मक ईमानदारी का परिणाम है—न कि किसी धार्मिक समुदाय के प्रति द्वेष का।
विजयदेव नारायण साही की दृष्टि से मलिक मुहम्मद जायसी की कृति एक मात्र कथा या भक्ति साहित्य नहीं है बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और दार्शनिक विमर्श का संवेदनशील संग्रह है। साही ने जायसी के साहित्य को केवल सूफ़ी या धार्मिक प्रतीकवाद की दृष्टि से पढ़ने का विरोध किया और इसे उसके ऐतिहासिक, नैतिक और सौंदर्यात्मक आयामों में विश्लेषित किया। उनके अनुसार, जायसी की कविताएँ तत्कालीन सत्ता-संरचना, सामाजिक विरोधाभास और व्यक्ति के नैतिक द्वंद्व के जटिल चित्र प्रस्तुत करती हैं।
साही विशेष रूप से इस तथ्य पर जोर देते हैं कि जायसी के काव्य में धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक केवल माध्यम हैं, उद्देश्य नहीं। उदाहरण के लिए, उनकी प्रसिद्ध रचना “पद्मावत” में अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण केवल ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि सत्ता, लालच और नैतिकता के द्वंद्व का मंच है। साही इसे एक राजनीतिक और नैतिक आलोचना के रूप में देखते हैं, जो केवल धार्मिक दृष्टि से पढ़ने पर छूट जाती है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जायसी का सूफ़ी पृष्ठभूमि में लिखा जाना उसे हिंदू विरोधी या केवल आध्यात्मिक कथ्य नहीं बनाता; बल्कि वह उस समय के सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ की आलोचनात्मक अभिव्यक्ति है।
साही ने जायसी की भाषा और शैली पर भी गहन विवेचन किया। उनका कहना था कि भाषा की लचीलापन, रूपक का प्रयोग, और काव्यात्मक बिंब केवल अलंकरण नहीं, बल्कि अर्थ और सामाजिक चेतना की संरचना के माध्यम हैं। उन्होंने यह दिखाया कि जायसी की छवि-निर्माण तकनीक और संवादात्मक संरचना पाठक को कथ्य और सामाजिक संदर्भ दोनों में गहराई से ले जाती हैं। यही कारण है कि साही जायसी को केवल पारंपरिक भक्ति या रोमानी कवि नहीं मानते; वे उन्हें नैतिक-सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील, विचारशील और आधुनिक चिंतन की पूर्वरूप रचना मानते हैं।
साही के अनुसार, जायसी की कविताओं में सत्ता, प्रेम, आदर्श और व्यक्तिगत नैतिकता का जटिल संवाद है। पाठक को यह समझना चाहिए कि यहाँ न केवल अलाउद्दीन और रानी पद्मावत का संघर्ष है, बल्कि मानव चेतना की शत्रुता, लालच और धैर्य की परीक्षा भी छिपी हुई है। साही इसे साहित्य में ‘आंतरिक और बाह्य द्वंद्व’ का उदाहरण मानते हैं।
इस दृष्टि से, साही की व्याख्या केवल ऐतिहासिक या धार्मिक संदर्भ तक सीमित नहीं रहती। वे जायसी को उस समय का सामाजिक-राजनीतिक चिंतक मानते हैं, जिसने अपनी रचना में न केवल तत्कालीन सत्ता की आलोचना की, बल्कि मानव जीवन के मूल्य, नैतिक द्वंद्व और सामाजिक असमानता को भी प्रश्नांकित किया। उनके लिए जायसी की कृति आधुनिक आलोचना के दृष्टिकोण से भी प्रासंगिक है क्योंकि यह साहित्य को सत्ता और मनुष्य के आंतरिक संघर्ष के बीच पुल बनाती है।
साही की दृष्टि में जायसी की कृति एक बहुआयामी साहित्यिक दस्तावेज है—जो केवल भक्ति या सूफ़ी प्रतीक नहीं, बल्कि नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक विवेचन का गहन स्रोत है।
विजयदेव नारायण साही ने जब मलिक मुहम्मद जायसी की काव्य-दृष्टि का विश्लेषण किया तो उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से उस परंपरा की भी परीक्षा की जिसके भीतर मध्यकालीन सूफ़ी काव्य को समझा जाता रहा है। इस संदर्भ में अमीर खुसरो की प्रतिष्ठित छवि भी आलोचनात्मक प्रश्नों के घेरे में आती है। किसी अवमानना का संकेत नहीं बल्कि मूल्यांकन की पुनर्स्थापना है—जहाँ सांस्कृतिक महिमा-मंडन की जगह काव्य-सत्य को रखा जाता है।
साही ने यह संकेत किया कि अमीर खुसरो का काव्य दरबारी संस्कृति से गहरे जुड़ा हुआ है। उसमें चमत्कार, शब्द-क्रीड़ा और बौद्धिक कौशल की चमक है किंतु वह प्रायः सत्ता-केन्द्रित संवेदना से मुक्त नहीं हो पाता।
खुसरो की रचनात्मकता बहुभाषिकता के लिए प्रशंसित रही है पर साही की दृष्टि में यह सौंदर्य और कौशल का प्रदर्शन अधिक है, आंतरिक आत्म-संघर्ष कम। इसके विपरीत जायसी के यहाँ सत्ता का निकटत्व नहीं बल्कि उससे एक दूरी है। पद्मावत में सत्ता एक त्रासद भूख के रूप में उपस्थित होती है—अलाउद्दीन की आकांक्षा के माध्यम से—और कवि उसकी आलोचना करता है। इस प्रकार साही के विवेचन में जायसी दरबारी काव्य-परंपरा से भिन्न, अधिक आत्मसंवादी और अधिक नैतिक रूप से बेचैन कवि के रूप में उभरते हैं।
साही ने यह रेखांकित किया कि खुसरो के यहाँ रूपक प्रायः आलंकारिक कौशल का उपकरण है; वह तत्काल प्रभाव पैदा करता है किंतु उसका आध्यात्मिक और अस्तित्वगत गहनत्व सीमित रहता है। जायसी के रूपक इसके विपरीत आत्म-यात्रा की संरचना रचते हैं। पद्मावती, रत्नसेन और अलाउद्दीन केवल चरित्र नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की इच्छाओं, मर्यादाओं और अंधी महत्वाकांक्षाओं के प्रतीक बन जाते हैं। साही के अनुसार जायसी का रूपक एक जीवित आध्यात्मिक संरचना है, जो पाठक को भीतर तक झकझोरता है; जबकि खुसरो का रूपक कई बार अपनी कलात्मक चमक में ही संतुष्ट हो जाता है।
एक और गहरी भिन्नता साही ने अनुभव की—आत्म-संघर्ष की तीव्रता में। खुसरो के काव्य में प्रेम और सूफ़ी भावधारा का प्रवाह है, पर उसमें अंतर्विरोधों का तीखा द्वंद्व कम दिखाई देता है। जायसी के यहाँ प्रेम एक शांत आध्यात्मिक भाव नहीं, बल्कि जोखिम, असफलता और आत्मदाह से भरा अनुभव है। साही इस त्रासदी-बोध को जायसी की विशेषता मानते हैं। प्रेम यहाँ सौंदर्य का उत्सव नहीं, बल्कि आत्म-परिवर्तन की कठोर प्रक्रिया है।
साही का मूल्यांकन खुसरो की ऐतिहासिक महत्ता को नकारता नहीं, पर यह स्पष्ट करता है कि जायसी की काव्य-चेतना अधिक अंतर्मुखी, अधिक नैतिक और अधिक द्वंद्वात्मक है।
साही। के अनुसार जायसी आत्म-यात्रा और अस्तित्वगत संघर्ष के कवि हैं। साही की दृष्टि में यही बात निर्णायक है—जो जायसी को केवल परंपरा का उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि उससे आगे जाने वाला कवि सिद्ध करता है।
।। चार। ।।
विजयदेव नारायण साही ने मलिक मुहम्मद जायसी को पढ़ते हुए उन्हें केवल मध्यकालीन सूफ़ी कवि की पारंपरिक कोटि में नहीं रखा, बल्कि एक जटिल काव्य-चेतना के रूप में समझने का प्रयास किया। उनका विवेचन भावुक श्रद्धा या सांस्कृतिक पुनरावृत्ति का परिणाम नहीं बल्कि आलोचनात्मक पुनर्पाठ की प्रक्रिया है। साही के यहाँ जायसी एक जीवित पाठ हैं—जो हर बार पढ़े जाने पर नए अर्थ-स्तर खोलते हैं।
सबसे पहले साही का ध्यान पद्मावत की रूपक-संरचना पर जाता है। वे इसे केवल आत्मा-परमात्मा के मिलन का आध्यात्मिक आख्यान नहीं मानते। उनके अनुसार पद्मावती, रत्नसेन और अलाउद्दीन—ये पात्र एक-रेखीय प्रतीक नहीं हैं। वे मनुष्य की चेतना के विविध आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पद्मावती केवल सौंदर्य या परम सत्य का प्रतीक नहीं; वह एक आकांक्षा है, एक दुर्लभ बोध है, जिसे पाने की प्रक्रिया स्वयं संघर्ष और विडंबना से भरी है। रत्नसेन की यात्रा केवल प्रेम की यात्रा नहीं, बल्कि आत्म-परीक्षा की यात्रा है। अलाउद्दीन केवल खलनायक नहीं, बल्कि सत्ता और वासना की अनियंत्रित भूख का रूप है। साही इस त्रिकोण को मनुष्य के भीतर उपस्थित द्वंद्वों की संरचना के रूप में पढ़ते हैं।
दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष है—इतिहास और मिथक का संबंध। साही के अनुसार जायसी इतिहास का पुनरुत्पादन नहीं करते; वे इतिहास को मिथकीय रूप देते हैं। चित्तौड़ और दिल्ली की राजनीतिक घटनाएँ उनके लिए केवल पृष्ठभूमि हैं। असली कथा उस मानसिक और सांस्कृतिक तनाव की है, जो इतिहास के भीतर धड़कता है। इस दृष्टि से साही जायसी को इतिहास-लेखक नहीं, बल्कि इतिहास-रूपांतरक कवि मानते हैं। वे यह दिखाते हैं कि पद्मावत को ऐतिहासिक सत्य की कसौटी पर कसना उसके काव्य-स्वरूप के साथ अन्याय है।
तीसरा पक्ष है—प्रेम का द्वंद्वात्मक स्वरूप। साही प्रेम को जायसी के यहाँ केवल आध्यात्मिक उत्कर्ष के रूप में नहीं देखते। प्रेम में वासना, ईर्ष्या, स्वामित्व और हिंसा के तत्व भी मौजूद हैं। रत्नसेन की तपस्या और अलाउद्दीन की लालसा—दोनों में प्रेम की भिन्न परछाइयाँ दिखाई देती हैं। साही इस जटिलता को रेखांकित करते हैं कि प्रेम शुद्ध और एकांगी नहीं, बल्कि विरोधी प्रवृत्तियों का संगम है। यह विश्लेषण जायसी को सरल भक्ति-कवि की श्रेणी से बाहर निकालता है।
चौथा पक्ष है—भाषा और बिंब-योजना। साही ने जायसी की अवधी भाषा की काव्यात्मक शक्ति पर बल दिया। उनके अनुसार जायसी की भाषा में लोक और रहस्य का अद्भुत संयोग है। जल, दर्पण, वन, अग्नि, अंधकार और स्वप्न—ये बिंब बार-बार लौटते हैं और एक आंतरिक लय रचते हैं। साही इस लय को केवल सजावट नहीं, बल्कि अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया मानते हैं। भाषा यहाँ अर्थ की वाहक नहीं, अर्थ की सर्जक है।
पाँचवाँ पक्ष है—नारी की उपस्थिति। साही ने पद्मावती को केवल आदर्श नारी-प्रतिमा के रूप में नहीं पढ़ा। वे उसके भीतर निहित स्वायत्तता और मौन प्रतिरोध को भी पहचानते हैं। पद्मावती निष्क्रिय पात्र नहीं; वह कथा की दिशा निर्धारित करती है। उसका सौंदर्य केवल आकर्षण नहीं, बल्कि एक नैतिक कसौटी भी है—जिस पर रत्नसेन और अलाउद्दीन दोनों की परीक्षा होती है। साही इस स्त्री-पक्ष को आधुनिक दृष्टि से पढ़ते हैं।
छठा पक्ष है—सांस्कृतिक समन्वय। जायसी का काव्य हिंदू और इस्लामी सांस्कृतिक तत्वों के संवाद का उदाहरण है। साही इस संवाद को केवल सामंजस्य की कथा नहीं मानते; वे इसमें अंतर्निहित तनाव को भी पहचानते हैं। यह तनाव ही काव्य को जीवंत बनाता है। जायसी किसी एक सांस्कृतिक ध्रुव के कवि नहीं; वे बहुसांस्कृतिक अनुभव के कवि हैं। साही इस बहुलता को उनके काव्य की केंद्रीय विशेषता मानते हैं।
सातवाँ पक्ष है—आधुनिक प्रासंगिकता। साही के अनुसार जायसी का महत्त्व केवल ऐतिहासिक नहीं बल्कि समकालीन भी है। पद्मावत में जो अस्मिता, सत्ता, इच्छा और आत्म-खोज के प्रश्न उठते हैं, वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। साही का विवेचन जायसी को संग्रहालय से निकालकर वर्तमान की बहसों में ले आता है। वे मध्यकालीन काव्य को आधुनिक चेतना से जोड़ते हैं।
साही का जायसी-विवेचन एक बहुस्तरीय आलोचनात्मक उपक्रम है—जहाँ रूपक, इतिहास, प्रेम, भाषा, स्त्री और सांस्कृतिक संवाद—सभी को एक साथ पढ़ा गया है। उन्होंने जायसी को संकीर्ण धार्मिक या रोमानी व्याख्याओं से मुक्त कर एक जटिल, द्वंद्वात्मक और बहुअर्थी कवि के रूप में स्थापित किया।
इस गंभीर विवेचन का मूल तत्त्व यही है कि साही पाठ को स्थिर अर्थ में नहीं बाँधते; वे उसे प्रश्नों के लिए खुला रखते हैं। यही उनका आलोचनात्मक विवेक है—जो परंपरा को पुनर्जीवित करता है, पर उसे जड़ नहीं होने देता।
विजयदेव नारायण साही का मलिक मुहम्मद जायसी पर आलोचनात्मक अवदान हिंदी आलोचना में एक विशिष्ट और पुनर्पाठकारी हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है। साही ने जायसी को केवल ‘भक्ति’ या ‘सूफ़ी प्रेमाख्यान’ की परंपरा में सीमित कर देखने की प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाया। उन्होंने पद्मावत को एक बहुस्तरीय काव्य-पाठ के रूप में पढ़ने की आवश्यकता पर बल दिया—जहाँ रूपक, इतिहास, मिथक और आंतरिक चेतना एक जटिल संरचना में जुड़े हुए हैं।
साही का पहला महत्त्वपूर्ण योगदान यह है कि उन्होंने जायसी को केवल प्रतीकात्मक-आध्यात्मिक कवि मानने से इंकार किया। हिंदी आलोचना में लंबे समय तक पद्मावत को ‘रहस्यवादी प्रेम’ या ‘आत्मा-परमात्मा के मिलन’ की कथा के रूप में व्याख्यायित किया जाता रहा। साही ने इस एकरेखीय व्याख्या की सीमाएँ रेखांकित कीं। उनके अनुसार पद्मावत का रूपक बहुअर्थी है—वह केवल आध्यात्मिक प्रेम का आख्यान नहीं, बल्कि सत्ता, वासना, अस्मिता और आत्म-खोज के जटिल द्वंद्वों का काव्यात्मक विन्यास है।
दूसरा महत्त्वपूर्ण बिंदु है—रूपक की पुनर्व्याख्या। साही ने यह दिखाया कि जायसी के यहाँ रूपक स्थिर संकेत नहीं है। रत्नसेन, पद्मावती और अलाउद्दीन—ये केवल ऐतिहासिक या प्रतीकात्मक पात्र नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक अवस्थाओं के रूप हैं। साही का आग्रह यह था कि पद्मावत को केवल ऐतिहासिक स्रोत या धार्मिक आख्यान के रूप में न पढ़ा जाए; उसे मनुष्य की चेतना की संरचना के रूप में देखा जाए। इस दृष्टि से उन्होंने जायसी को आधुनिक आलोचनात्मक विवेक से जोड़ा।
तीसरा अवदान है—इतिहास और कल्पना के अंतर्संबंध पर बल। साही ने यह रेखांकित किया कि जायसी का काव्य ऐतिहासिक घटनाओं का प्रत्यक्ष दस्तावेज़ नहीं, बल्कि इतिहास की काव्यात्मक पुनर्रचना है। वे इतिहास को रूपांतरित कर एक सांस्कृतिक मिथक गढ़ते हैं। साही के अनुसार इस मिथकीय रूपांतरण में कवि की रचनात्मक स्वायत्तता सबसे महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार उन्होंने जायसी को इतिहास-लेखन की कसौटी से मुक्त कर काव्य-सृजन की कसौटी पर पढ़ा।
चौथा बिंदु है—चेतना की द्वंद्वात्मकता। साही ने जायसी के काव्य में अंतर्विरोधों की पहचान की। प्रेम और वासना, तप और लोभ, त्याग और हिंसा—ये सब पद्मावत में साथ-साथ उपस्थित हैं। साही का आलोचनात्मक विवेक इन द्वंद्वों को समेटता है; वह उन्हें किसी एक नैतिक निष्कर्ष में नहीं बदलता। इस प्रकार उन्होंने जायसी को एक जटिल कवि के रूप में पुनर्स्थापित किया।
पाँचवाँ महत्त्वपूर्ण पक्ष है—भाषा और बिंब-संरचना का विश्लेषण। साही ने जायसी की अवधी भाषा की काव्यात्मक ऊर्जा को पहचाना। उन्होंने दिखाया कि जायसी का काव्य केवल कथानक-प्रधान नहीं, बल्कि बिंब-प्रधान भी है। उनके रूपकों में जल, अग्नि, वन, दर्पण और स्वप्न जैसे प्रतीक लगातार एक आंतरिक लय रचते हैं। साही का विश्लेषण इस लय को उद्घाटित करता है।
छठा पक्ष है—परंपरा का आलोचनात्मक पुनर्पाठ। साही ने जायसी को केवल मध्यकालीन भक्ति-संस्कृति का प्रतिनिधि मानने की बजाय, उन्हें एक ऐसे कवि के रूप में पढ़ा जो अपने समय की सांस्कृतिक जटिलताओं से जूझ रहा है। उन्होंने जायसी को परंपरा के भीतर रखकर भी उससे आगे देखने का आग्रह किया। यह पुनर्पाठ जायसी को आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिक बनाता है।
साही का बड़ा योगदान शायद यही है कि उन्होंने जायसी को ‘स्थिर अर्थ’ से मुक्त किया। उन्होंने दिखाया कि पद्मावत एक बहुअर्थी काव्य है जो हर नए युग में नए अर्थ ग्रहण कर सकता है। उनके आलोचनात्मक विवेक ने जायसी को संकीर्ण धार्मिक या ऐतिहासिक व्याख्याओं से बाहर निकालकर एक व्यापक सांस्कृतिक और मानवीय परिप्रेक्ष्य में स्थापित किया।
साही का जायसी-विवेचन केवल पाठ-व्याख्या नहीं, बल्कि परंपरा की पुनर्स्थापना है—जहाँ मध्यकालीन कवि आधुनिक आलोचनात्मक चेतना के साथ संवाद करता है। यही उनका स्थायी और विशिष्ट अवदान है।
।। पांच ।।
विजयदेव नारायण साही को यदि आलोचना-पद्धतियों की रोशनी में पढ़ा जाए तो वे केवल एक कवि या आलोचक के रूप में नहीं बल्कि एक बौद्धिक प्रतिपक्ष के रूप में उभरते हैं। उनका लेखन आधुनिक हिंदी साहित्य में उस क्षण का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ काव्य केवल संवेदना की अभिव्यक्ति नहीं रह जाता, बल्कि आत्म-संदेह, वैचारिक विखंडन और नैतिक अस्थिरता का क्षेत्र बन जाता है।
आलोचना—विशेषतः न्यू क्रिटिसिज़्म, अस्तित्ववाद, मार्क्सवादी विमर्श और उत्तर-संरचनावाद—के उपकरणों से साही को पढ़ना एक बहुस्तरीय अनुभव देता है।
न्यू क्रिटिसिज़्म की दृष्टि से देखें तो साही की कविता में ‘आयरनी’, ‘टेंशन’ और ‘पैराडॉक्स’ की संरचना स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी पंक्तियाँ सतही भावुकता से दूर रहती हैं; उनमें अर्थ की आंतरिक गत्यात्मकता है। शब्द अपने प्रत्यक्ष अर्थ से अधिक, अपने अंतःसंबंधों के माध्यम से अर्थ रचते हैं। वे कथ्य को प्रत्यक्ष उद्घोषणा में नहीं रखते बल्कि उसे विखंडित बिंबों और आंतरिक तनावों में छिपा देते हैं। इस अर्थ में वे ‘क्लोज रीडिंग’ की माँग करते हैं। उनकी कविता में वक्तव्य नहीं, संरचना बोलती है।
साही का काव्य एक गहरे नैतिक संकट का काव्य है। यहाँ मनुष्य एक ऐतिहासिक सत्ता नहीं बल्कि एक अकेला, प्रश्नाकुल, आत्म-संदिग्ध प्राणी है। यदि हम उन्हें यूरोपीय चिंतन की पंक्ति में रखकर पढ़ें तो उनमें सार्त्र और कामू की तरह एक बौद्धिक बेचैनी दिखाई देती है—एक ऐसी स्थिति जहाँ मनुष्य किसी निश्चित वैचारिक आश्रय में नहीं टिक पाता। उनकी कविता में प्रतिबद्धता है पर वह घोषणात्मक नहीं; वह एक नैतिक विवेक के रूप में उपस्थित है। वे किसी विचारधारा के प्रवक्ता नहीं बनते बल्कि विचारधाराओं के भीतर की दरारों को उजागर करते हैं।
मार्क्सवादी आलोचना की कसौटी पर साही को परखें तो वे वर्ग-संघर्ष की भाषा में नहीं लिखते तथा “सत्ता-संरचनाओं के प्रति उनकी सजगता तीक्ष्ण है”। वे प्रतिरोध को नारे में नहीं बदलते। उनके यहाँ राजनीति का अर्थ केवल सत्ता-परिवर्तन नहीं बल्कि चेतना की पुनर्रचना है। इसीलिए उनका लेखन प्रत्यक्ष क्रांतिकारिता से भिन्न एक बौद्धिक प्रतिरोध रचता है। वे विचार को भावुक जन-उत्साह में नहीं घोलते; उसे विवेक की कठिन जमीन पर रखते हैं।
उत्तर-संरचनावादी परिप्रेक्ष्य से देखें तो साही के यहाँ अर्थ स्थिर नहीं है। उनका कथ्य एकल-केन्द्रित नहीं, बल्कि बहुविकल्पी है। भाषा स्वयं एक प्रश्न बन जाती है। वे अर्थ की अंतिमता पर विश्वास नहीं करते। यह विशेषता उन्हें आधुनिक पश्चिमी विमर्शों—विशेषतः डेरिदा की विखंडन-प्रवृत्ति—के निकट ले जाती है। साही के यहाँ वाक्य स्वयं अपनी सीमाओं को उजागर करता है। वे भाषा के भीतर छिपे सत्ता-तत्वों को भी पहचानते हैं।
अब यदि उनके समकालीनों से तुलना की जाए तो उनका अंतर अधिक स्पष्ट होता है। अज्ञेय के यहाँ आधुनिकता का सौंदर्यबोध अधिक शिल्प-सजग और आत्मान्वेषी है। अज्ञेय की कविता आत्म के गूढ़ अन्वेषण में जाती है, जबकि साही का आत्म सामाजिक और ऐतिहासिक प्रश्नों से घिरा हुआ है। अज्ञेय भाषा को एक सौंदर्यात्मक प्रयोगशाला में ले जाते हैं; साही भाषा को नैतिक बहस का क्षेत्र बना देते हैं। अज्ञेय का आत्म अपेक्षाकृत एकाकी और दार्शनिक है, जबकि साही का आत्म संवादरत और विवादग्रस्त है।
गजानन माधव मुक्तिबोध से तुलना करने पर अंतर और रोचक हो उठता है। मुक्तिबोध की कविता में विचार का ज्वालामुखी है—घनी, जटिल, प्रतीकात्मक और आंतरिक रूप से उग्र। साही अपेक्षाकृत संयत हैं। मुक्तिबोध के यहाँ स्वप्न और यथार्थ का द्वंद्व तीव्र और विस्फोटक है; साही के यहाँ यह द्वंद्व अधिक विश्लेषणात्मक और आत्म-नियंत्रित है। मुक्तिबोध एक प्रकार की ‘टोटल कमिटमेंट’ की ओर बढ़ते हैं, जबकि साही विचार के भीतर की शंकाओं को बचाए रखते हैं। इसीलिए साही की आलोचनात्मक दृष्टि अधिक संवादात्मक प्रतीत होती है।
यदि रघुवीर सहाय को साथ रखकर देखें तो सहाय का व्यंग्य अधिक प्रत्यक्ष और सामाजिक है। वे मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं को सीधी, तीखी भाषा में सामने रखते हैं। साही की भाषा अपेक्षाकृत अधिक दार्शनिक और विश्लेषणात्मक है। सहाय सामाजिक संरचना की विसंगतियों को उद्घाटित करते हैं; साही उन विसंगतियों के पीछे छिपे बौद्धिक संकट को रेखांकित करते हैं। सहाय में नागरिक चेतना का आक्रोश है, साही में बौद्धिक विवेक का असंतोष।
साही एक ‘मॉरल इंटेलेक्चुअल’ के रूप में उभरते हैं—ऐसे लेखक जो विचारधाराओं के बीच खड़े होकर उनकी सीमाओं को पहचानते हैं। वे किसी एक स्थिर प्रतिमान में नहीं बँधते। उनका लेखन न तो पूर्णतः रोमांटिक है, न ही कठोर वैचारिक; वह दोनों के बीच की दरार में स्थित है। यही दरार उनकी विशिष्टता है।
उनके समकालीनों में जहाँ कई कवि या तो शिल्प के प्रयोग में अधिक रमे रहे, या वैचारिक प्रतिबद्धता में अधिक स्पष्ट हुए, साही ने आलोचनात्मक आत्म-जागरूकता को केंद्र में रखा। वे अपने समय की बौद्धिक बेचैनी के साक्षी हैं पर उसके अंध-समर्थक नहीं। पश्चिमी आलोचना की दृष्टि से कहें तो वे ‘क्रिटिकल कॉन्शसनेस’ के कवि हैं—जहाँ कविता विचार का प्रतिरोध भी है और आत्मालोचन भी।
साही को पढ़ते हुए लगता है कि वे केवल अपने समय के कवि नहीं बल्कि आधुनिकता के संकट के कवि हैं—ऐसी आधुनिकता के जो स्वयं अपनी नींव पर प्रश्न उठाती है। उनके समकालीनों की तुलना में उनका अंतर इसी आत्म-प्रश्नाकुलता और वैचारिक संयम में निहित है।
।। छ: ।।
विजयदेव नारायण साही और नामवर सिंह को तुलनात्मक रूप से देखें तो यह समझना आवश्यक है कि दोनों की बौद्धिक संरचना और सार्वजनिक भूमिका भिन्न प्रकार की थी। एक ओर नामवर सिंह हिंदी आलोचना के संस्थागत चेहरा बने—विश्वविद्यालय, व्याख्यान-मालाएँ, साहित्यिक संगोष्ठियाँ ; साथ ही , वैचारिक ध्रुवीकरण उनके प्रभाव-क्षेत्र का विशेष हिस्सा रहे। दूसरी ओर साही का व्यक्तित्व अधिक आत्मसंवादी, वैचारिक रूप से स्वायत्त रहने वाला दिखाई देता है, भले ही साही इन सांस्थानिक जगहों पर जाते रहे हों !
यदि ईमानदारी को आलोचना की नैतिक श्रेणी मानें तो साही का लेखन अधिक आत्म-जोखिम उठाता हुआ प्रतीत होता है। वे किसी स्थापित वैचारिक खेमे के स्थायी प्रतिनिधि नहीं बनते। उनके यहाँ विचार एक ‘पोज़ीशन’ नहीं बल्कि एक सतत प्रश्न है। वे स्वयं अपने निष्कर्षों पर संदेह करने की क्षमता रखते हैं। इस अर्थ में उनकी आलोचनात्मक चेतना अधिक खुली और आत्मालोचनात्मक लगती है। इसके विपरीत, “नामवर सिंह ने कई ऐतिहासिक क्षणों में स्पष्ट वैचारिक पक्ष ग्रहण किया और उस पक्ष की वैधता के लिए तर्क-संरचना निर्मित की “। यह उनकी शक्ति भी थी और सीमा भी।
विश्व साहित्य के संदर्भ में साही का पाठ-संसार अधिक विस्तृत और बहुस्तरीय माना जाता है। वे यूरोपीय आधुनिकता, अस्तित्ववादी चिंतन, मार्क्सवादी बहसों और पश्चिमी साहित्यिक प्रवृत्तियों से प्रत्यक्ष संवाद करते हुए दिखाई देते हैं। उनकी भाषा में अनूदित ज्ञान का बोझ नहीं बल्कि आत्मसात बौद्धिकता की सहजता है। वे विदेशी विचारों को उद्धरण के रूप में नहीं बल्कि चिंतन की अंतर्धारा के रूप में ग्रहण करते हैं। नामवर सिंह का अध्ययन भी व्यापक था पर उनका लेखन प्रायः हिंदी साहित्य के आंतरिक परिप्रेक्ष्य को केंद्र में रखकर विकसित होता है। वे तुलनात्मकता की अपेक्षा परंपरा- व्याख्या में अधिक सक्रिय रहे।
साही का एक विशिष्ट गुण यह है कि वे किसी एक विचारधारा के स्थायी प्रवक्ता सिद्ध नहीं होते। वे मार्क्सवादी विमर्श से परिचित हैं पर उसका घोषणापत्र नहीं लिखते; वे आधुनिकतावाद से प्रभावित हैं पर उसके कट्टर संरक्षक नहीं बनते। वे विचारधाराओं के भीतर प्रवेश करते हैं पर उनमें साहित्यिक रूप से निवास नहीं करते। इसीलिए उनका लेखन वैचारिक स्वतंत्रता का आभास देता है।
नामवर सिंह ने समय-समय पर वैचारिक प्रतिबद्धताओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया और हिंदी आलोचना को एक वैचारिक दिशा देने का प्रयत्न किया। यह भूमिका उन्हें अधिक सार्वजनिक और प्रभावशाली बनाती है किंतु साथ ही उन्हें बहसों के केंद्र में भी रखती व एकपक्षीय भी बनाती है।
आलोचना-पद्धतियों की कसौटी पर देखें तो साही का लेखन ‘क्रिटिकल डिस्टेंस’ को अधिक महत्त्व देता है। वे पाठ के भीतर की जटिलताओं को खोलते हैं, बिना उसे किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष की ओर मोड़े।
नामवर सिंह की आलोचना में अक्सर एक निर्णायक स्वर दिखाई देता है—वे मूल्यांकन करते हैं, प्रतिमान प्रस्तावित करते हैं और साहित्यिक इतिहास की संरचना में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। साही का स्वर अपेक्षाकृत संकोची और विश्लेषणात्मक है; वे “प्रतिमान की स्थापना से अधिक प्रतिमान की शंका में रुचि रखते हैं “।
ईमानदारी का प्रश्न अंततः नैतिक संवेदना से जुड़ा है। साही की लेखकीय मुद्रा में एक प्रकार की बौद्धिक एकांतता है—वे लोकप्रियता या वैचारिक सत्ता के आकर्षण से दूर दिखाई देते हैं। उनका लेखन किसी गुट या विचार-शिविर की स्थायी भाषा नहीं बनता। नामवर सिंह का लेखन अधिक संवादोन्मुख और सार्वजनिक है; उन्होंने हिंदी आलोचना को मंच दिया, उसे राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया। यह संस्थागत उपस्थिति उन्हें प्रभावशाली बनाती है पर साथ ही, उनके वक्तव्यों को राजनीतिक संदर्भों में भी पढ़ा जाने लगता है।
साही की ताकत उनकी वैचारिक स्वायत्तता, विश्व-साहित्य की गहरी समझ और आत्मालोचनात्मक दृष्टि में है, जबकि नामवर सिंह की शक्ति उनकी व्याख्यात्मक भूमिका, आलोचनात्मक परंपरा- समझ और सार्वजनिक हस्तक्षेप में निहित है। एक अधिक स्वतंत्र बौद्धिक दिखाई देते हैं, दूसरा अधिक प्रभावकारी आलोचनात्मक व्यक्तित्व। दोनों की भूमिकाएँ भिन्न हैं; अंतर इन्हीं भूमिकाओं की प्रकृति से उपजता है।
।। सात ।।
इस अंतर को और गहराई से समझने के लिए साही व नामवर की बौद्धिक संरचना, लेखन-शैली और वैचारिक जोखिम को अलग-अलग परतों में देखना होगा।
विजयदेव नारायण साही का स्वभाव मूलतः ‘इनवर्ड क्रिटिकल’ है—वे पहले अपने भीतर तर्क गढ़ते हैं, फिर उसे भाषा में रखते हैं। उनकी आलोचना में आत्म-संशय एक रचनात्मक शक्ति की तरह काम करता है। वे अपने निष्कर्षों को अंतिम सत्य के रूप में प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि उन्हें एक बहस की शुरुआत की तरह रखते हैं। यह प्रवृत्ति पश्चिमी आधुनिकता की उस बौद्धिक परंपरा से जुड़ती है जहाँ विचार एक गतिशील प्रक्रिया है, स्थिर मत नहीं। साही की आलोचना में यह गत्यात्मकता स्पष्ट है—वे पाठ, लेखक और समय—तीनों के बीच एक खुला संवाद निर्मित करते हैं।
इसके विपरीत, नामवर सिंह की आलोचना में एक निर्णायक स्थापत्य दिखाई देता है। वे साहित्यिक इतिहास को व्यवस्थित करने का प्रयास करते हैं; वे धाराएँ पहचानते हैं, प्रवृत्तियाँ निर्मित करते हैं और मूल्यांकन के मानदंड प्रस्तावित करते हैं। यह कार्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी भाषा की आलोचना को संस्थागत आधार की आवश्यकता होती है। पर इसी प्रक्रिया में आलोचक का स्वर अधिक ‘अथॉरिटेटिव’ हो जाता है। नामवर सिंह का लेखन कई बार ‘विवेचन’ से अधिक ‘निर्णय’ की मुद्रा ग्रहण कर लेता है।
साही इस निर्णयात्मकता से दूरी बनाए रखते हैं। वे प्रतिमान-निर्माता की बजाय प्रतिमान-संशयक हैं। यदि कोई विचारधारा उन्हें आकर्षित करती भी है, तो वे उसके भीतर की अंतर्विरोधी परतों को पहले पहचानते हैं। यही कारण है कि वे किसी एक विचार के स्थायी प्रवक्ता नहीं बनते। वे विचारधाराओं से संवाद करते हैं, पर उनके भीतर विलीन नहीं होते। उनकी आलोचना में एक बौद्धिक ईमानदारी इसलिए दिखती है कि वे अपने समय के लोकप्रिय आग्रहों से प्रभावित होकर त्वरित निष्कर्ष नहीं देते।
विश्व साहित्य की समझ के संदर्भ में यह अंतर और स्पष्ट है। साही ने पश्चिमी दार्शनिक और साहित्यिक परंपराओं को केवल संदर्भ-सामग्री की तरह नहीं, बल्कि अपनी आलोचनात्मक चेतना का हिस्सा बनाया। वे अस्तित्ववाद, मार्क्सवाद, आधुनिकतावाद और समकालीन यूरोपीय चिंतन की जटिलताओं को आत्मसात करते हैं। उनके लेखन में यह बौद्धिक व्यापकता सहज रूप से उपस्थित रहती है। दूसरी ओर, नामवर सिंह की दृष्टि अधिकतर हिंदी साहित्य की आंतरिक संरचना के संदर्भों के पुनर्पाठ पर केंद्रित रही। यह उनकी सीमा नहीं बल्कि उनका चुना हुआ क्षेत्र था; किंतु इससे उनका विमर्श अपेक्षाकृत राष्ट्रीय-केन्द्रित बन जाता है।
सार्वजनिक भूमिका का भी यहाँ उल्लेख आवश्यक है। नामवर सिंह ने हिंदी आलोचना को एक सार्वजनिक मंच प्रदान किया। वे बहसों के केंद्र में रहे, विश्वविद्यालयीय संरचनाओं में सक्रिय रहे, और साहित्यिक राजनीति से भी उनका संवाद रहा। यह सक्रियता उन्हें प्रभावशाली बनाती है, पर साथ ही उन्हें विवादों का केंद्र भी बनाती है। साही का व्यक्तित्व अधिक एकांतप्रिय और वैचारिक रूप से संयत था। वे सार्वजनिक बहसों में उतने मुखर नहीं दिखते; उनका लेखन अधिक अंतरंग और चिंतनशील है।
ईमानदारी का प्रश्न फिर यहीं लौटता है—क्या आलोचना का कार्य विचार को लोकप्रिय बनाना है या उसे कठोर आत्म-समीक्षा में रखना? साही का आग्रह दूसरे प्रकार का है। वे अपने समय की बौद्धिक असुविधाओं को छिपाते नहीं। वे साहित्य को किसी वैचारिक अभियान का उपकरण नहीं बनाते। उनका लेखन एक स्वतंत्र चिंतक की तरह सामने आता है, जो अपने निष्कर्षों की कीमत स्वयं चुकाने को तैयार है। नामवर सिंह ने आलोचना को व्यापक पाठक-समाज तक पहुँचाया; साही ने उसे वैचारिक एकांत की गहराई दी।
एक आलोचक संस्थागत और ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह करता है; दूसरा आलोचक बौद्धिक स्वायत्तता और आत्म-संशय की परंपरा को आगे बढ़ाता है। साही की विशिष्टता इसी में है कि वे किसी विचारधारा की छाया में नहीं, बल्कि विचार की जटिल रोशनी में खड़े दिखाई देते हैं। उनकी लेखकीय उपस्थिति कम शोर वाली है, पर अधिक आत्मिक और विचार-सघन है।
यह कहा जा सकता है कि साही का महत्त्व उनके ‘स्वतंत्र विवेक’ में है—वे साहित्य को किसी विचार का प्रचार-क्षेत्र नहीं बनने देते। नामवर सिंह का महत्व उनकी ‘आलोचनात्मक संरचना’ में है—उन्होंने हिंदी आलोचना को आकार दिया। दोनों की भूमिकाएँ अलग हैं; अंतर इन्हीं बौद्धिक स्वभावों की भिन्नता से निर्मित होता है।
।। आठ।।
इस विमर्श को और स्पष्ट करते हुए कुछ ऐसे बिंदु सामने आते हैं जहाँ विजयदेव नारायण साही अपेक्षाकृत अधिक गहरे, अधिक स्वायत्त और अधिक नैतिक रूप से प्रामाणिक दिखाई देते हैं—विशेषकर जब उनकी तुलना नामवर सिंह से की जाती है।
पहला बिंदु है : बौद्धिक स्वायत्तता। साही किसी स्थिर वैचारिक खेमे के प्रतिनिधि नहीं बनते। वे मार्क्सवाद, आधुनिकतावाद या अस्तित्ववाद—किसी भी प्रवृत्ति से संवाद करते हुए भी उसकी शर्तों में बंधते नहीं। वे विचारधारा को उपकरण की तरह बरतते हैं, पहचान की तरह नहीं। इसके विपरीत, नामवर सिंह ने कई ऐतिहासिक अवसरों पर स्पष्ट वैचारिक पक्ष ग्रहण किया और उस पक्ष की आलोचनात्मक व्याख्या की। इससे उनका लेखन प्रभावशाली बना पर वैचारिक तटस्थता की गुंजाइश सीमित हुई। साही इस अर्थ में अधिक स्वतंत्र दिखाई देते हैं।
दूसरा बिंदु है : आत्मालोचन की क्षमता। साही की आलोचना में स्वयं अपने निष्कर्षों पर पुनर्विचार का अवकाश है। वे विचार को अंतिम रूप में स्थापित नहीं करते। उनके यहाँ प्रश्न, निष्कर्ष से अधिक महत्त्वपूर्ण है। यह प्रवृत्ति पश्चिमी आधुनिकता की उस परंपरा से मेल खाती है जहाँ ज्ञान स्थायी नहीं, पुनरवलोकनीय होता है। नामवर सिंह की आलोचना में अक्सर एक निर्णायक स्वर दिखाई देता है—वे मूल्य-निर्धारण करते हैं और साहित्यिक प्रवृत्तियों को स्पष्ट श्रेणियों में रखते हैं। इस निर्णायकता की अपनी उपयोगिता है पर इससे बहस का खुलापन कम हो सकता है।
तीसरा बिंदु है : विश्व-साहित्य का आत्मसात बोध। साही ने यूरोपीय और वैश्विक साहित्यिक विमर्शों को केवल उद्धरण की तरह नहीं बल्कि अपने चिंतन की संरचना में शामिल किया। उनके यहाँ विश्व-संदर्भ बौद्धिक विस्तार का संकेत नहीं, बल्कि विचार की अंतर्धारा है। वे भारतीय साहित्य को विश्व-आधुनिकता के व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखते हैं।
नामवर सिंह का अध्ययन व्यापक था पर उनका लेखन मुख्यतः हिंदी साहित्य की आंतरिक बहसों पर केंद्रित रहा। साही का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत अधिक कॉस्मोपॉलिटन और तुलनात्मक है।
चौथा बिंदु है : नैतिक जोखिम। साही ने कभी भी आलोचना को सत्ता-संरचना का उपकरण नहीं बनने दिया। वे संस्थागत शक्ति के केंद्र में नहीं रहे; उनकी उपस्थिति अधिक बौद्धिक और कम राजनीतिक थी। उन्होंने अपने लेखन को लोकप्रिय स्वीकृति की शर्तों पर नहीं ढाला। नामवर सिंह की भूमिका अधिक सार्वजनिक और संस्थागत थी—उन्होंने आलोचना को मंच दिया, पर इसके साथ साहित्यिक राजनीति के तनाव भी जुड़े। साही का एकांत उन्हें इस अर्थ में अधिक निष्कलुष और निर्भीक बनाता है।
पाँचवाँ बिंदु है : भाषिक संयम और विश्लेषणात्मक गहराई। साही की आलोचना में वाक्य संरचनाएँ विचार की जटिलता को वहन करती हैं। वे सूक्ष्म विश्लेषण में उतरते हैं, और अर्थ की परतों को खोलते हैं। उनका लेखन त्वरित प्रभाव से अधिक दीर्घकालिक बौद्धिक प्रतिध्वनि उत्पन्न करता है। नामवर सिंह की शैली अधिक वक्तृता-प्रधान और संवादधर्मी है—जो बहस के लिए उपयुक्त है, पर कई बार सूक्ष्म आत्म-संशय की जगह कम छोड़ती है।
छठा बिंदु है : प्रतिमान-संशय। नामवर सिंह ने हिंदी आलोचना में कई प्रतिमानों को आधार दिया—यह उनका ऐतिहासिक पक्ष है पर साही प्रतिमानों को प्रश्नांकित करते हैं। वे किसी भी स्थापित मूल्य-मानदंड को स्थिर सत्य नहीं मानते। यह दृष्टि उन्हें अधिक आलोचनात्मक और कम अनुशासनात्मक बनाती है। वे व्यवस्था-निर्माता की बजाय व्यवस्था-विश्लेषक हैं।
सातवाँ बिंदु है : विचार और संवेदना का संतुलन। साही के यहाँ आलोचना केवल वैचारिक विमर्श नहीं बल्कि एक संवेदनात्मक अनुभव भी है। वे पाठ के भीतर की मानवीय जटिलताओं को पहचानते हैं। उनके लिए साहित्य विचार का दस्तावेज़ नहीं बल्कि चेतना का विस्तार है। नामवर सिंह का आग्रह अधिकतर वैचारिक और ऐतिहासिक संरचना पर रहा; साही का आग्रह आंतरिक बौद्धिक अनुभव पर।
इन बिंदुओं के आधार पर कहा जा सकता है कि साही कई स्तरों पर अधिक गहरे और स्वतंत्र दिखाई देते हैं—विशेषकर वहाँ, जहाँ आलोचना को नैतिक साहस, आत्म-संशय और विश्व-दृष्टि की व्यापकता की आवश्यकता होती है।
हाँ, यह भी सच है कि नामवर सिंह का ऐतिहासिक प्रभाव अधिक व्यापक रहा—उन्होंने हिंदी आलोचना को राष्ट्रीय परिदृश्य पर स्थापित किया। पर यदि कसौटी बौद्धिक स्वायत्तता, विचार की ईमानदारी और विश्व-साहित्य की आत्मसात् समझ हो, तो साही कई स्थानों पर अधिक सघन और दीर्घजीवी प्रतीत होते हैं।
अंतर प्रभाव और गहराई के बीच का है—नामवर ने संरचना दी, दूसरे ने विवेक। जहाँ संरचना कभी-कभी समय के साथ बदलती है, विवेक अधिक स्थायी रहता है। यही वह क्षेत्र है जहाँ साही भारी पड़ते दिखाई देते हैं।
।। नौ ।।
यदि इस तुलना को और भी सूक्ष्म धरातल पर ले जाएँ, तो कुछ और क्षेत्र सामने आते हैं जहाँ विजयदेव नारायण साही की उपस्थिति अधिक गहरी और दीर्घजीवी प्रतीत होती है।
एक महत्त्वपूर्ण बिंदु है विचार की अंतर्दृष्टि बनाम विचार की संरचना। साही विचार को बाहर से व्यवस्थित नहीं करते; वे उसके भीतर प्रवेश करते हैं। उनकी आलोचना किसी वैचारिक ढाँचे को रेखांकित करने से पहले उसके नैतिक और अस्तित्वगत संकट को पहचानती है। वे यह देखने का साहस रखते हैं कि कोई विचार स्वयं को कहाँ धोखा दे रहा है। यह आत्म-आलोचनात्मक क्षमता उन्हें केवल सिद्धांतकार नहीं, बल्कि चिंतक बनाती है।
इसके बरअक्स, नामवर सिंह का योगदान विचार की संरचना और परंपरा- व्याख्या में अधिक दिखाई देता है—उन्होंने बहसों को रूप दिया, प्रवृत्तियों को नाम दिया और इतिहास को एक बौद्धिक मानचित्र दिया पर मानचित्र और भूगोल में अंतर होता है; साही भूगोल के भीतर की असमताओं को पढ़ते हैं।
दूसरा क्षेत्र है : वैयक्तिक नैतिकता का आग्रह। साही के लेखन में आलोचक की निजी जिम्मेदारी बार-बार उभरती है। वे विचार को केवल अकादमिक अभ्यास नहीं मानते; वह उनके लिए जीवन-मूल्यों से जुड़ा प्रश्न है। वे यह जोखिम उठाते हैं कि उनका निष्कर्ष लोकप्रिय न हो, फिर भी वे उसे लिखते हैं। यह बौद्धिक एकांत उनकी शक्ति है। नामवर सिंह की भूमिका अधिक सार्वजनिक रही—उन्होंने आलोचना को बहस का विषय बनाया। पर सार्वजनिकता कई बार आलोचक को तत्कालीन समीकरणों से बाँध देती है। साही इस बंधन से अपेक्षाकृत मुक्त रहे।
तीसरा बिंदु है : समकालीनता की जटिल समझ। साही अपने समय को केवल राजनीतिक घटनाओं के रूप में नहीं बल्कि मानसिक अवस्थाओं के रूप में पढ़ते हैं। वे आधुनिक मनुष्य की आंतरिक टूटन, संशय और द्वंद्व को पकड़ते हैं। उनकी आलोचना में यह संवेदना है कि साहित्य केवल सामाजिक दस्तावेज़ नहीं बल्कि चेतना की संरचना है। नामवर सिंह का फोकस अधिकतर साहित्यिक इतिहास और विचारधारात्मक परिप्रेक्ष्य पर रहा; साही चेतना के सूक्ष्म स्तरों तक उतरते हैं।
चौथा बिंदु है : कैंप-राजनीति से दूरी। साहित्यिक संसार में गुट और विचार-शिविर अक्सर आलोचना को पक्षधरता में बदल देते हैं। साही ने स्वयं को किसी स्थायी गुट का चेहरा नहीं बनने दिया। वे मित्रताओं और असहमतियों दोनों में स्वतंत्र रहे। इस कारण उनका लेखन कम प्रचारित रहा पर अधिक स्वायत्त भी। नामवर सिंह का प्रभाव व्यापक था, पर वह प्रभाव साहित्यिक-संस्थागत नेटवर्क से भी जुड़ा था। साही की शक्ति उनकी अपेक्षाकृत निर्लिप्तता में है।
पाँचवाँ क्षेत्र है : दीर्घकालिक प्रासंगिकता। प्रतिमान-निर्माण समय के साथ बदलता है; नई पीढ़ियाँ पुराने वर्गीकरणों को संशोधित करती हैं पर आत्म-संशय और बौद्धिक ईमानदारी जैसे गुण कालातीत रहते हैं। साही की आलोचना इसी कारण समय के साथ नई व्याख्याओं के लिए खुली रहती है। वे अंतिम शब्द नहीं बोलते; वे प्रश्न छोड़ते हैं। प्रश्न की यह विरासत अधिक स्थायी होती है।
छठा बिंदु है विचार और काव्यात्मकता का अंतर्संबंध। साही स्वयं कवि भी थे, इसलिए उनकी आलोचना में संवेदना की आंतरिक लय मौजूद है। वे पाठ को केवल सिद्धांत से नहीं, बल्कि काव्य-चेतना से पढ़ते हैं। यह द्वैत उन्हें विश्लेषण में एक अतिरिक्त गहराई देता है। नामवर सिंह का लेखन अधिकतर आलोचनात्मक स्थापत्य की दिशा में विकसित हुआ; साही के यहाँ आलोचना और काव्य-बोध एक-दूसरे में घुले हुए हैं।
जहाँ नामवर सिंह का प्रभाव व्यापक और संस्थागत लगता है, वहीं साही की ताकत आंतरिक और बौद्धिक है। प्रभाव इतिहास में दर्ज होता है; गहराई चेतना में। यदि कसौटी प्रभाव की हो तो नामवर सिंह अधिक दिखाई देते हैं; यदि कसौटी विचार की स्वायत्तता, आत्मालोचन और नैतिक साहस की हो तो साही कई स्तरों पर भारी पड़ते हैं।
साही की उपस्थिति शोर से नहीं बल्कि गंभीरता से पहचानी जाती है। वे किसी विचार के प्रवक्ता नहीं, विचार के अंतरात्मा-सरीखे आलोचक हैं। और साहित्य में अंततः वही आवाज़ दीर्घजीवी होती है जो सत्ता की नहीं, विवेक की भाषा बोलती है।
।। दस ।।
विजयदेव नारायण साही का आलोचनात्मक विवेक हिंदी आलोचना में एक विशिष्ट नैतिक-बौद्धिक उपस्थिति के रूप में देखा जा सकता है। यह विवेक किसी पूर्वनिर्धारित विचारधारा का अनुयायी नहीं बल्कि “विचार के भीतर सक्रिय संशय का संवाहक है” । साही के यहाँ आलोचना न तो घोषणापत्र है, न वाक्चातुर्य; वह एक गहन आत्म-संवाद है, जिसमें पाठ, समय और स्वयं आलोचक—तीनों कटघरे में उपस्थित रहते हैं।
उनका आलोचनात्मक विवेक अर्थात् स्वतंत्र वैचारिक स्थिति। वे किसी विचारधारा को अंतिम सत्य के रूप में ग्रहण नहीं करते। मार्क्सवाद, आधुनिकतावाद, अस्तित्ववाद—इन सभी से उनका संवाद है पर वे इनमें से किसी के स्थायी प्रतिनिधि नहीं बनते। उनका विवेक विचारधाराओं को उपकरण की तरह उपयोग करता है पर उन्हें पहचान की तरह ओढ़ता नहीं। इसलिए उनके लेखन में बौद्धिक स्वायत्तता की “अगाध” आभा दिखाई देती है।
आत्म-संशय की नैतिकता। साही अपने निष्कर्षों को अंतिम रूप में स्थापित करने से बचते हैं। वे प्रश्न को निष्कर्ष से अधिक महत्व देते हैं। उनके यहाँ आलोचना एक खुली प्रक्रिया है—जहाँ अर्थ स्थिर नहीं, बल्कि संवादरत है। यह प्रवृत्ति उन्हें निर्णयात्मकता की कठोरता से दूर रखती है। वे मूल्यांकन करते हैं, पर उस मूल्यांकन के भीतर भी पुनर्विचार की गुंजाइश छोड़ते हैं। यह आलोचक की बौद्धिक ईमानदारी का संकेत है।
संरचना की बजाय चेतना पर ध्यान। साही साहित्य को केवल ऐतिहासिक या सामाजिक दस्तावेज़ की तरह नहीं पढ़ते; वे उसे चेतना की जटिल संरचना के रूप में देखते हैं। उनके लिए कविता या कथा केवल विचार की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रहे द्वंद्व का रूपांतरण है। वे पाठ के भीतर छिपी मानसिक और नैतिक उलझनों को पहचानते हैं। इसीलिए उनका विश्लेषण केवल बाहरी संदर्भों तक सीमित नहीं रहता; वह पाठ की आंतरिक बनावट में प्रवेश करता है।
विश्व-दृष्टि का विस्तार। साही का आलोचनात्मक विवेक हिंदी साहित्य को विश्व-संदर्भ में रखकर देखने की क्षमता रखता है। वे भारतीय अनुभव को वैश्विक आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में समझते हैं। उनके यहाँ तुलनात्मकता प्रदर्शन नहीं, बल्कि चिंतन का स्वाभाविक आयाम है। यह व्यापकता उन्हें संकीर्ण सांस्कृतिक आग्रहों से बचाती है।
नैतिक साहस। साही का लेखन लोकप्रियता की शर्तों पर नहीं चलता। वे अपने समय की वैचारिक सुविधाओं से दूरी बनाए रखते हैं। यदि किसी प्रचलित मत से असहमति हो, तो वे उसे स्पष्ट करते हैं। उनका विवेक सत्ता-संरचना के निकट जाकर अनुकूल नहीं होता। इस अर्थ में उनका आलोचनात्मक स्वभाव संयत, पर निर्भीक है।
काव्यात्मक संवेदना और विश्लेषण का संतुलन। साही स्वयं कवि थे, इसलिए उनके आलोचनात्मक विवेक में संवेदना की आंतरिक लय मौजूद है। वे रचना को केवल सिद्धांत की कसौटी पर नहीं कसते; वे उसकी काव्यात्मक ऊर्जा को भी पहचानते हैं। विचार और अनुभव उनके यहाँ अलग-अलग खानों में नहीं रहते, बल्कि एक-दूसरे को आलोकित करते हैं।
प्रतिमान-संशय। वे किसी स्थापित मूल्य-मानदंड को अंतिम नहीं मानते। वे आलोचना को एक सतत् पुनर्पाठ की प्रक्रिया समझते हैं। यही कारण है कि उनका विवेक कठोर श्रेणियों की बजाय लचीली और संवादधर्मी व्याख्याओं को महत्व देता है।
साही का आलोचनात्मक विवेक उस प्रकार का विवेक है जो साहित्य को विचार की प्रयोगशाला बनाता है, पर उसे विचारधारा का मंच नहीं बनने देता। वह आलोचना को बौद्धिक ईमानदारी का अभ्यास बनाता है। उसमें शोर नहीं, गहराई है; निर्णय नहीं, विवेक है; आग्रह नहीं, प्रश्न है।
यही वह गुण है जो साही को हिंदी आलोचना में एक अलग, अधिक आत्मिक और अधिक स्वतंत्र स्थान प्रदान करता है।
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