— डॉ. हेमेन्द्र चंडालिया —
सन् 1991 में विश्व व्यापार संगठन के प्रस्तावों पर भारत ने हस्ताक्षर किए, जिसके बाद हम उस वैश्विक व्यवस्था का हिस्सा बने जो एल.पी.जी. — अर्थात् उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण — से परिभाषित हो रही थी। इस व्यवस्था को नए उदारवाद, नव-साम्राज्यवाद और आर्थिक उपनिवेशवाद जैसे विशेषणों से भी अभिहित किया गया। ‘विश्व-ग्राम’ या ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा का व्यापक प्रचार हुआ और यह विचार स्थापित किया गया कि यही अंतिम यथार्थ है तथा इसका कोई विकल्प नहीं है — “देयर इज़ नो अल्टरनेटिव।” जहाँ पूँजीवादी देश और उनके पोषित मीडिया इसका समर्थन कर रहे थे, वहीं विशेषकर तीसरी दुनिया के देशों में इसका विरोध भी उभरने लगा। स्वयं अमेरिका में प्रख्यात विचारक नोम चॉम्स्की और अन्य बुद्धिजीवियों ने इस वैश्विक व्यवस्था को अन्यायपूर्ण बताया।
वैश्वीकरण का विचार अत्यंत जटिल और बहुआयामी है; अतः इस पर संक्षेप में चर्चा करना कठिन है। इसी संदर्भ में डॉ. नरेश भार्गव ने एक छोटी किंतु अत्यंत सारगर्भित पुस्तक “वैश्वीकरण : सामाजिक परिप्रेक्ष्य” लिखी, जो 2014 में रावत पब्लिकेशन्स से प्रकाशित हुई। डॉ. भार्गव स्वयं लिखते हैं— “यह पाठ्यपुस्तक नहीं है, अपितु केवल विश्लेषण है। इसलिए यह पाठ्य भी है और संदर्भ भी।” पुस्तक पढ़ने के बाद स्पष्ट होता है कि इसमें पाठ्यपुस्तक जैसी सरलता और संदर्भग्रंथ जैसी तथ्यात्मक गंभीरता, दोनों का समन्वय है। पुस्तक दो भागों में विभक्त है— पहला अवधारणात्मक और दूसरा वैश्वीकरण के प्रभावों का विश्लेषणात्मक पक्ष। अंत में वैश्वीकरण से जुड़ी सकारात्मक और नकारात्मक बहसों की चर्चा की गई है। हिंदी में इस विषय पर गंभीर पुस्तकों का अभाव रहा है, इसलिए इसका महत्व और बढ़ जाता है।
पुस्तक में छह अध्याय हैं। पहला अध्याय अवधारणात्मक है, जिसमें विषय का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करते हुए वैश्वीकरण की परिभाषा और उसके क्षेत्र से संबंधित भ्रांतियों का निराकरण किया गया है। डॉ. भार्गव, एंथनी गिडिन्स के अंतर्निर्भरता सिद्धांत का उल्लेख करते हुए लिखते हैं— “वैश्वीकरण मानवीय है तथा मनुष्य द्वारा किए गए प्रयत्नों का परिणाम है। यह किसी अदृश्य वाहक की देन नहीं है जिसके विरुद्ध हम संघर्षरत हों। इसमें सभी देशों का योगदान है। जो लोग वैश्विक समस्याओं के विरुद्ध संघर्षरत हैं, वे भी आधुनिक साधनों का उपयोग करते हैं। यहाँ तक कि आधुनिकता के विरोधी जड़तावादी शक्तियाँ भी आधुनिक साधनों का खुलकर उपयोग कर रही हैं।” वे यह भी स्वीकार करते हैं कि मार्क्सवादी दृष्टिकोण से भी वैश्वीकरण को समझा जा सकता है। वैश्विक पूँजी के प्रसार और समायोजन की जो प्रवृत्ति आज दिखाई देती है, उसका संकेत 1848 के कम्युनिस्ट घोषणापत्र में मिलता है, जहाँ कहा गया था कि अपने उत्पादों को बेचने के लिए बुर्जुआ वर्ग पूरी दुनिया के बाजारों का चक्कर लगाता है।
दूसरे अध्याय, “वैश्विक समाज के सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य” में वैश्वीकरण और स्थानीयकरण के अंतर्संबंधों पर चर्चा की गई है। इसमें मैक्स वेबर, इमाइल दुर्खीम, वेलेन्स्टीन, अप्पादुराई, वाटर्स आदि के विचारों का विश्लेषण है। यह भी रेखांकित किया गया है कि विश्व समाज की अवधारणा पर विचार करते समय प्रायः कार्ल मार्क्स की उपेक्षा की जाती है, जबकि उनके चिंतन का मूल आधार अंतरराष्ट्रीयवाद ही था। डॉ. भार्गव का मत है कि वेलेन्स्टीन के विचारों पर मार्क्स का स्पष्ट प्रभाव है। स्क्लेयर के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व से उत्पन्न देश-पार (ट्रांसनेशनल) प्रक्रियाओं की विश्वव्यापी स्वीकृति ही वैश्वीकरण है। इसी अध्याय में ‘ग्लोकलाइजेशन’ की अवधारणा भी स्पष्ट की गई है, जिसका अर्थ है— स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप वैश्विक दृष्टि के साथ जीवन-यापन।
तीसरे अध्याय में वैश्वीकरण के व्यावहारिक पक्षों पर विचार किया गया है। इसमें आर्थिक, राजनीतिक, मानवाधिकार, सामाजिक आंदोलनों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर इसके प्रभावों की चर्चा है। यह अपेक्षा की गई थी कि वैश्वीकरण से राष्ट्र-राज्य कमजोर होंगे, किंतु वास्तविकता इसके विपरीत सामने आई— राष्ट्र-राज्य और अधिक सशक्त हुए तथा राष्ट्रीयता के प्रति उनका आग्रह बढ़ा।
चौथे अध्याय में सांस्कृतिक पक्ष का विस्तृत विश्लेषण है। जनसंचार, पर्यटन, प्रवासन और आतंकवाद जैसे विषयों को सांस्कृतिक संदर्भ में समझाया गया है। पाँचवें अध्याय में पर्यावरण, शिक्षा, धर्म, जेंडर, विकास और स्वास्थ्य जैसे मानवीय तथा प्राकृतिक पक्षों पर विमर्श किया गया है। पर्यावरण संबंधी चर्चा में आधुनिकता और वैश्वीकरण की शक्तियों, भौतिक परिवर्तनों तथा उनसे उत्पन्न पर्यावरणीय क्षति और आंदोलनों का उल्लेख है। शिक्षा के संदर्भ में कहा गया है कि पारंपरिक शिक्षा का युग समाप्त हो रहा है और ‘ज्ञान-श्रमिकों’ के उत्पादन का दौर प्रारंभ हो चुका है। धर्म, धर्मनिरपेक्षता, रूढ़िवाद और धार्मिक कट्टरतावाद से जुड़े आतंकवाद की प्रवृत्तियों पर भी विचार किया गया है। यह भी कहा गया है कि वर्तमान वैश्विक युग विचारधाराओं के क्षरण का युग प्रतीत होता है।
छठा और अंतिम अध्याय इस प्रश्न पर केंद्रित है कि वैश्वीकरण उपलब्धि है या संकट। इसकी द्वंद्वात्मक प्रकृति को समझाने का प्रयास किया गया है। डॉ. भार्गव विभिन्न समाजशास्त्रियों को उद्धृत करते हुए मार्टिन बेल (2003) के ‘अतिपूर्वीकरण’ संबंधी विचार का उल्लेख करते हैं, जिसके अनुसार वैश्वीकरण राष्ट्र-राज्य की सीमाओं को भंग कर देगा। हालांकि, वे स्वयं इस मत को अव्यावहारिक मानते हैं। इस अध्याय में समानीकरण (होमोजेनाइजेशन), कोकाकोलाकरण और आंतरिकीकरण (इंटरनलाइजेशन) जैसी अवधारणाओं का भी विवेचन है। अंत में भारतीय संदर्भ में वैश्वीकरण के प्रभावों पर विचार किया गया है।
लगभग एक दशक पूर्व प्रकाशित यह पुस्तक आज और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है, क्योंकि वैश्वीकरण अब एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है, जहाँ अतिराष्ट्रवाद तथा आर्थिक-सांस्कृतिक साम्राज्यवाद नए रूपों में सामने आ रहे हैं। यदि डॉ. भार्गव आज होते, तो संभवतः वे इस पुस्तक के संशोधित और विस्तारित संस्करण की तैयारी कर रहे होते।
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