महिला दिवस के मौके पर धर्मसत्ता और पितृसत्ता से मुक्ति पर विचार!

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On the occasion of Women's Day, thoughts on freedom from religious authority and patriarchy

16 मार्च को महिला दिवस के उपलक्ष्य में एक संवाद एचआरडीसी रांची में सम्पन्न हुआ। यह आयोजन झारखंड जनाधिकार महासभा की पहल तथा आदिवासी वीमेन्स नेटवर्क, कैथोलिक हेल्थ एसोसिएशन, शक्ति अभियान , संभवा इंजोर, नारी मुक्ति संघर्ष चतरा और महिला उत्पीड़न विरोधी संघर्ष एवं विकास समिति के सहयोग से हुआ। पूरा कार्यक्रम वक्तव्य और गीत के क्रमिक मेल के साथ बढ़ता रहा।

पूरे सत्र का संचालन रोज मधु तिर्की, अलका आनंद और रीना ने किया। प्रियशीला बेसरा, हीरामणि और अन्य महिलाओं ने गीतों की शमां बांधी। किरण ने आधार पत्र रखा । उन्होंने अपने विचार पत्र में शाहबानो , भंवरी देवी, बिल्किस बानो के प्रकरण के जिक्र के साथ धर्मसत्ता और राज्यसत्ता का पितृसत्ता के साथ गहरे बुने रिश्ते को उजागर किया।

चर्चा की शुरूआत करते हुए नीलम तिग्गा ने कहा कि महिलाओं को पुरुषों के साथ बराबरी से वंचित कर दिया जाता है। परिवार की सेवा करने के बहाने समाज सेवा से रोकने की कोशिश होती है। समाज काम करने पर व्यंग्य होता है। देर से आने पर सुरक्षा की चिन्ता की जगह संदेह के तीखे सवाल बरसते हैं। प्रोत्साहित नहीं, हतोत्साहित किया जाता है।

एपवा की नन्दिता भट्टाचार्य ने कहा कि धर्मसत्ता, राज्यसत्ता और पितृसत्ता साथ साथ चलती हैं। जो आजादियां हमने लड़कर हासिल की हैं, आज उन सबके छीनने के हालात आ गये हैं। आज त न्यायालय भी यौन उत्पीड़न और बलात्कार की परिभाषा बलात्कारियों के पक्ष में बदल रहा है। महिलाओं को आजादी है नहीं, थोड़ी थोड़ी राहत की तरह दी जाती है। ‘ये सड़कें हमारी’ अभियान हम पर थोपी गयी बंदिशों के नकार का एलान था। मनुवादी सोच घर से लेकर शीर्ष के हर संस्थान तक काबिज है। युजीसी रेगुलेशन पर रोक भी हमारे साथ मनुवादी भेदभाव को बनाये रखने की मुख्य न्यायाधीश की पहल थी।

थियोसोफिकल व्याख्याता इदन टोपनो ने बहुधर्मी जुटान को सम्बोधित करना कठिन बताते हुए अपनी बात रखी। उन्हें कहा कि कोई धर्म बिना समीक्षा के नहीं रहनी चाहिए। कहीं परम्परायें हमारे सहकर्मी सहधर्मी पुरूष को प्रधानता तो नहीं देती, यह आंकना होगा। ईसाई धर्म भी पितृसत्तात्मक है। धर्म अगर हम जीते हैं तो अपने जीवन में बेहतरी के लिए हर बात की तरह धर्म भी उसकी समीक्षा करते हुए बरतेंगे। धर्म में सभी बातें कही गयी हैं, लेकिन उनकी व्याख्याएं मरोड़ दी जाती हैं।

झारखंड की बड़ी सामाजिक नेता दयामणि बारला ने कहा, झारखंड के 26वें साल में समाज के ताने बाने में , झारखंड की राजनीति में हम महिलाएं कहां हैं। आज बड़े खतरे हैं। आज सबको छोटे छोटे अलगावों को छोड़ना होगा। हमलोगों को ऐसा झारखंड चाहिए था, जहां हम देर रात भी निकलें और कोई दिक्कत न हो। लेकिन आज चारों ओर असुरक्षा बढ़ गयी है। झारखंडी महिलाएं दूसरों की दुकान में काम करती हैं, अपना दुकान नहीं खोलतीं। हम ढ़ेंकी का चावल भी बेचना नहीं चाहते। इस मोर्चे पर भी हम महिलाओं को उतरना होगा। जैसा चल रहा है, सही नहीं चल रहा। हमें ऐसा नहीं चलने देना होगा।

शांति निकेतन बंगाल से आयीं लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान की सहसंयोजक मनीषा बनर्जी ने कहा कि जहां जो भी लड़ रहा है, हमारी लड़ाई है। वोट के लिए हमलोगों को लड़ाई नहीं लड़ना पड़ा था। आज लाखों महिलाओं का नाम एस आई आर से वोटर लिस्ट से कट रहा है। कारण है पितृसत्ता। शादी के बाद नाम बदलने, घर बदलने के नाम पर उनकी नागरिकता संदिग्ध बनायी जा रही है।

शक्ति क्लब की निक्की ने बताया कि हमलोगों पर बहुत पाबंदियां हैं। यहां वहां निकलने पर मनाहियां हैं । पर हम निकलेंगी। आप सबों के साथ कदम से कदम मिलाकर बढ़ेंगी।

नसरीन जमाल ने कहा कि मैं जिस समुदाय से हूं वहां यह संघर्ष चलता आ रहा है। हमें अवसर मिले नहीं, हमने अवसर छीना है। हम अपने धर्म की बात कहें तो शायद धर्म में महिलाओं पर पाबंदी की बात नहीं है। लेकिन समाज के ठीकेदार गलत बातें परोसते हैं, हमें बांध देते हैं। जामताड़ा के हर मस्जिद में महिलाएं भी नमाज पढ़ती हैं। यह रांची में नहीं हो रहा है। चार शादी नहीं लिखी गयी। बेशर्त तीन तलाक नहीं है। हमें अपने अंदर धर्म को समझने का आत्मविश्वास लाना होगा। कोई हमारे लिए यह नहीं करेगा। महिला मुक्ति संघर्ष संगठन चतरा की सहसंयोजक संजू देवी ने कहा कि काम हम करें नाम पुरूष होता है। बच्चा पुरूष का माना जाता है। बच्चा के साथ नाम पिता का चलता है। पर हम इसे बदलेंगे। अपना नाम स्थापित करेंगे। कैथोलिक हेल्थ एसोसिएशन की रश्मि ने कहा कि हम जाने अनजाने पितृसत्ता की राह चलते हैं। उसने अपनी कविता के माध्यम से अपने भाव कहे।

आदिवासी जन परिषद की सेलीना लकड़ा ने कहा कि 12 साल से आंदोलन में हूं। हमारे आसपास बड़ी कमी है। लोग हिकारत भाव से कहते हैं कि नेता बन गयी है। नेतागिरी, राजनीति को गलत मानते की धारणा सही नहीं।
एक अन्य महिला सहभागी ने कहा कि धर्म के कर्मकांडों का जामा महिलाओं को ही पहनाया जाता है। देवी और डायन दोनों बनाया जाता है। संथाल परगना से आयीं मीना मुर्मु ने बताया कि इन दिनों बड़े पैमाने पर महिलाओं का बलात्कार और कत्ल हो रहा है। वे लगातार दोषियों को सजा दिलाने के काम में लगी हुई हैं।

व्याख्याता आलम आरा ने सदानी नगपुरिया में अपनी बातें रखीं। महिला को कोई जगह नहीं मिली। धर्म का मतलब मानवता , नैतिकता है। धर्म का उद्देश्य पूरी दुनिया में समानता है। पर वह व्यवहार में नहींहै। हमें अपने बच्चों को पितृसत्ता की मानसिकता से मुक्त करना है। क्या ईश्वर के भरोसे छोड़ देने से छउआ (बच्चा) बचेगा? नहीं न । तब तो हम ईश्वर से भी ज्यादा प्रभावशाली हैं न। जीवन बचाने के लिए, सबसे बुनियादी वजूद महिलाओं की आजादी के लिए पितृसत्ता को खत्म करना ही होगा। हम अपने को आजाद समझें। अपने सोच को आजाद रखें। यह सबसे बड़ी शर्त है, आजादी की। महिलाओं को हीन समझने वाली पितृसत्ता सबसे घिनौनी है। बिना इससे विकृत हुए इसे साफ करना होगा।

इसके बाद एलीना होरो के पहल पर उनके साथ सारे सहभागियों ने एक साथ संकल्प घोषणा पढ़ा। यह बहुत ही प्रेरक और प्रभावशाली क्षण रहा। संकल्प पत्र बहुत सार्थक और व्यापक बन पड़ा था।

इस कार्यक्रम में मुस्लिम महिलाओ की भी अच्छी भागीदारी रही। कार्यक्रम में प्रवीर पीटर, टॉम कावला, सिराज, श्रीनिवास, बी बी चौधरी, मंथन, आशीष भागे, बिलकन डांग, अमल पांडेय, रॉयल डांग, रोज खाना, आकांक्षा , मनोज, सुधांशु शेखर, उत्तम , कुमुद आदि शामिल रहे।


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