1) एक नया, विचित्र और व्यंग्यात्मक चेहरा लेकर उभरी यह पार्टी एक गैर–राजनीतिक उभार है। यह सभी स्थापित राजनीतिक दलों से लोगों की खिन्नता का चिह्न है, खासकर विपक्षी दलों की व्यर्थता और उनका अब तक जनता का विश्वास अर्जित न कर पाने का एक प्रत्यक्ष प्रमाण है।
2) काक्रोच जनता पार्टी एक तीव्र लेकिन अल्पकालिक उभार है। फिर भी स्पष्ट संकेत देता है कि हमारा ’राष्ट्र’ पेपर लीक, कुछ ऊपरी परिवर्तन के बावजूद संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था के खोखलेपन, इसके भीतर परिवारों को बेहाल कर देने वाली पैसे की मची लूट और शिक्षा माफिया द्वारा युवकों के भविष्य से खिलवाड़ करने के प्रति गंभीर नहीं है।
3) विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा शिक्षा के उपर्युक्त मुद्दों को पेपर लीक के तुरंत बाद जोरदार ढंग से उठाने के बावजूद असंतुष्ट युवाओं ने विपक्षी दलों पर विश्वास नहीं किया। वे इनके पीछे जाकर खड़े नहीं हुए। एक खास आग लगाने वाले वक्तव्य के प्रति सोशल मीडिया में उनका व्यापक आक्रोश फूटा और विरोध में अभिजीत आदि के नेतृत्व में वे खुद उठ खड़े हुए और जंतर मंतर में एक प्रदर्शन हुआ।
ऐसी घटनाएं विपक्षी दलों को भीतर से उद्विग्न करती हैं, पर वे विवश होकर ऊपरी मन से इन्हें समर्थन भी देते हैं।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य है कि ऐसे स्वतःस्फूर्त उभार केवल उत्तर भारत में होते हैं, दक्षिण में नहीं!
4) इसमें संदेह नहीं कि युवाओं की बढ़ती बेरोजगारी, उनके जीवन में बढ़ती अनिश्चितता, बढ़ते अवसाद और दूसरी तरफ शिक्षा के बाजार की लूटमार और आमतौर पर जीवन के बुरे हालात ने इस समय पूरे विश्व के युवाओं को अशांत कर रखा है। एक तरफ कारपोरेट व्यापार व्यवस्था है, दूसरी तरफ असहाय युवा हैं!
5) काक्रोच जनता पार्टी के युवकों का आंदोलन निश्चय ही जेनुइन है। फिर भी इसकी तुलना नेपाल आदि देशों में हुए विद्रोह से नहीं की जा सकती। यह इतनी व्यापक और वर्तमान सरकार के लिए ऐसा खतरा भी नहीं है कि धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने के लिए कभी कहा जाएगा। सरकार इसके दमन की जगह इसके धीरे–धीरे खुद शांत हो जाने के इंतजार में है।
6) यह आंदोलन कितना सफल होगा, इससे बड़ा प्रश्न यह है कि युवाओं की गरमाहट से भरा ऐसा हर आंदोलन क्या वर्तमान संपूर्ण राजनीति पर ही एक बड़ा प्रश्नचिह्न है? मेरे विचार से, लोगों को जब लगता है कि सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों उनकी वास्तविक समस्याओं को ठीक से नहीं उठा रहे हैं, तब वे नए या असामान्य विकल्पों की ओर देखने लगते हैं। जरा भी कहीं ऐसा कोई उभार होता है, लोग एक बड़ी आशा से भर जाते हैं! यह इसका चिह्न है कि लोगों के भीतर सच्चाई की भूख बची है।
7) यदि विपक्ष केवल सत्ता-विरोध तक सीमित रह जाए और कोई स्पष्ट वैकल्पिक दृष्टि न दे सके और बेहद बिखरा भी हो, तो जनता उसके प्रति उदासीन हो जाती है। हम देखते हैं कि कई बार आम लोगों ने व्यंग्यात्मक या प्रतीकात्मक उभारों का समर्थन करके मुख्यधारा की राजनीति के प्रति अपनी निराशा व्यक्त की है । यह ’सभी दल एक जैसे हैं’ वाली भावना का संकेत हो सकता है।
8) जब स्थापित विपक्षी दलों की राजनीति और चालाकी पर्याय हो जाती हैं, तब युवा शक्तियों के ऐसे स्वतःस्फूर्त उभार ध्यान आकर्षित करते हैं। लेकिन उनके पास कोई ठोस संगठन नहीं होता तो फायदा अंततः बूढ़ी राजनीतिक पार्टियां ही उठाती हैं, युवा फिर से हाशिए पर पहुंच जाते हैं।
9) सोशल मीडिया ऐसे नए या असामान्य राजनीतिक प्रयोगों को बहुत तेजी से लोकप्रिय बना देता है, भले उनका संगठनात्मक आधार कमजोर हो। युवाओं के ऐसे सच्चे आक्रोश समाज में उभर रहे नए प्रश्नों, नई पीढ़ी की आकांक्षाओं और वस्तुतः समाज में बची ’शांतिपूर्ण ढंग से राजनीतिक प्रयोग की शक्ति’ के परिणाम हैं। विपक्षी दलों के पास नए राजनीतिक प्रयोग की क्षमता फिलहाल नहीं है।
समस्या है, पुरानी दुनिया मर रही है और नई दुनिया जन्म लेने के लिए संघर्ष कर रही है, पर वस्तुतः जन्म नहीं ले पा रही है। क्योंकि जिनके पास सच्चाइयाँ हैं वे लंगड़े हैं– उनके पास संगठन शक्ति नहीं है और जो इस राजनीतिक बाजार में खूब दौड़ रहे हैं वे अंधे हैं– उनके पास वैकल्पिक दृष्टि नहीं है, सच्चा मन नहीं है!
पता नहीं कोई ऐसी जगह कब बनेगी जहां लंगड़े और अंधे की नई दोस्ती नजर आएगी!
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