— परमजीत एस. जज —
कॉन्ट्रोवर्शियल फिल्म “पंजाब 95” सेंसर बोर्ड की आपत्ति के कारण अभी तक रिलीज़ नहीं हो सकी है। लेकिन इसका टाइटल बदल कर “सतलुज” नाम से ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 पर दिखाया गया था। भारत सरकार ने इसे हटाने के लिए कुल 48 घंटे लिए। हालांकि इस बीच यह फिल्म डाउनलोड हो कर बिजली की गति से पूरे पंजाब में तमाम तरह के लोगों के बीच पहुंचने लगती है। इसके बारे में कोई विमर्श शुरु करने से पहले इसकी पृष्ठभूमि में मौजूद अहम स्मारकों का ध्यान रखना चाहिए।
बीसवीं सदी के पंजाब में हुए जन आंदोलनों का इतिहास एक दिलचस्प अध्ययन है। एक सदी में सोलह आंदोलन हुए और इनमें से छह हिंसक साबित हुए। गदर पार्टी के आंदोलन से शुरू होने वाले इस सफर में बब्बर अकाली आंदोलन और शहीदेआजम भगत सिंह का क्रांतिकारी राष्ट्रवाद दिखाई देता है। इतिहास का ये हिस्सा आज़ादी और विभाजन से पहले का है। इसके बाद रियासतों में किराएदारों का आंदोलन शुरु हो गया था, जब रेड कम्युनिस्ट पार्टी बनी। इसने ज़मीन मालिकों के खिलाफ हथियार उठाने का काम किया था। 1967 में नक्सली आंदोलन शुरू हुआ। आखिरकार 1972 में इसे दबाने में सफलता मिली। फिर 1978 में सिखों का एक युग लंबा हिंसक आंदोलन चला था। यह 1990 के दशक तक चलता रहा। इसी लंबे अंतराल के कारण इसे सबसे बड़ा आंदोलन माना जाता है। इसने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से पंजाब के लोगों की ज़िंदगी के तमाम पहलुओं को छुआ है। यहां भी इसकी छवि दिखाई देती है।
नकली एनकाउंटर जैसे मुद्दे को यह उठाती है। यह ब्रिटिश शासकों से हमें विरासत में नहीं मिला है। और न ही यह हिंसक आंदोलनों से निपटने के तरीके के तौर पर उभरा है। पंजाब में 1960 के दशक में तस्करों के खिलाफ इसे एक कारगर औजार के तौर पर ईजाद किया गया था। जहां तक मिलिटेंट मूवमेंट की बात है, तो नक्सली इसके पहले टारगेट बनते हैं। इस मूवमेंट के दौरान “टेररिस्ट” को नहर में फेंक दिया जाता या “अनआइडेंटिफाइड” बता कर चुपके से जला देने का काम करते थे। इन एनकाउंटर और ऑपरेशन में यह ध्यान देने की बात है कि अंग्रेजी हुकूमत में हुए हिंसक संघर्षों के दौरान आरोपियों को ट्रायल के बाद फांसी की सजा मिलती थी। लेकिन नक्सली मूवमेंट और सिख मिलिटेंट मूवमेंट में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण मिलता है।
फिल्म में इसके काल्पनिक रूप को देखने से पहले ध्यान रखना होगा कि ऐसी कहानियों में आम तौर पर दुर्घटना से जुड़ी किसी पहलू को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं। इसे एक मात्र सच मानने का खतरा भी पैदा होता है। यह फिल्म अकाली दल से जुड़े ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट के बारे में बताती है। जिसने सिख मिलिटेंट मूवमेंट की कड़वी सच्चाई को सामने लाने का काम किया। 6 सितंबर 1995 को पुलिस ने मानवाधिकार कार्यकर्त्ता जसवंत सिंह खालरा को उठा लिया था। इस घटना से जुड़ी कड़ियों को इसमें दिखाया गया है। मानवाधिकार और संविधान की परवाह किए बिना इसे दबाने का काम किया गया। इसलिए सच उजागर करना देशहित का काम है।
फिल्म की शुरुआत चलती जीप में शराब पीते हुए कुछ पुलिसवालों के एक दृश्य से होती है। वो इस पल का बेखौफ मज़ा लेते हुए किसी खास मिशन पर जा रहे हैं। हरिके पहुँचने के बाद कुछ लोगों को घसीट कर ले जाते और गोली मार देते हैं। इसके बाद फोकस बैंक में काम करने वाले जसवंत सिंह खालरा पर है। वह एक कपल को लोन देने के काम में लगे हैं। खालरा के परिवार और पेशा दिखने के बाद कहानी फिर पुलिस द्वारा पकड़े गए युवा मिलिटेंट्स के गायब होने के मुख्य मुद्दे पर आ जाती है। जसवंत सिंह खालरा के किडनैप होने तक की कहानी पर फैक्ट्स हावी रहती है। लेकिन बाद में कहानी में बदल जाती है। गुरतेज कौर का मामला इसे और स्पष्ट करता है। यह एक ऐसा कैरेक्टर जिसका बेटा पहले ही गायब हो चुका है। पुलिस से उसके बारे में पूछती रहती है। जब उसे पोस्टमॉर्टम के लिए ले जाया तो पता चला कि वह ज़िंदा थी। फिर पुलिस उसे बाहर ले गई। मौत के घाट उतारने के बाद फिर उसकी बॉडी को पोस्टमॉर्टम के लिए हॉस्पिटल वापस लाया गया।
सच्चाई यह है कि 1993 में सुरजीत सिंह के मामले में ऐसा हुआ था। उसे मरा हुआ मान कर पुलिस पोस्टमॉर्टम के लिए पट्टी सिविल हॉस्पिटल ले गई। लेकिन पता चला कि ज़िंदा है। पुलिस उसे हॉस्पिटल से बाहर ले गई और फिर मार कर वापस लाती है। कम्युनिस्ट नेता सतपाल डांग ने यह मुद्दा उठाया। प्रेस ने खूब छापा। आखिरकार संबंधित पुलिस ऑफिसर को कानूनी प्रक्रिया के तहत सज़ा मिली। ऐसी अन्य घटना की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। खालरा के अपहरण के बाद ये कहानी बन गई है। हालांकि आखिर तक कहीं भी बेवजह बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं लगती है। उसे कैसे टॉर्चर किया गया? फिर कैसे मार दिया गया? पुलिस ने उसकी बॉडी को कैसे ठिकाने लगाया? इन प्रश्नों का सही जवाब किसी को पता नहीं है। खालरा और उनकी पत्नी को छोड़ कर प्रायः सभी नाम काल्पनिक हैं।
आखिरी बड़ी आतंकवादी घटना 31 अगस्त 1995 को हुई। तत्कालीन मुख्य मंत्री सरदार बेअंत सिंह शहीद हुए थे। 19 फ़रवरी 1992 को उन्होंने पंजाब के मुख्य मंत्री का पद ग्रहण किया था। असल में इसके बाद ही आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन चरम पर पहुंचता है। 28 फ़रवरी 1992 को अमृतसर के बगड़ियन गाँव में खालिस्तान के भिंडरावाले टाइगर फ़ोर्स के प्रमुख की मौत हुई थी। तब तक ज़्यादातर उग्रवादी नेता या तो मारे जा चुके थे या सीमा पार कर पाकिस्तान भाग गए थे। बचे-खुचे उग्रवादियों को खत्म करने के लिए अभियान चलाया गया। पुलिस ने लगभग दो साल तक यह ‘मॉपिंग-अप ऑपरेशन’ चलाया। इस बीच बड़े पैमाने पर उग्रवादियों का सफाया किया गया था। पुलिस ने श्मशान घाटों पर 25,000 शवों का अंतिम संस्कार किए जाने का दावा पेश किया था। हालांकि तब तक ज़्यादातर आतंकी मारे जा चुके थे। इसलिए ये आंकड़ा बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया लगता है। जसवंत सिंह खालरा कुल 2,000 मामलों की पहचान कर सके थे। सही आंकड़ा इससे कहीं ज़्यादा हो सकता है। अगर हम 1978 से 1995 तक के उग्रवाद के पूरे दौर को देखें तो ऐसी अनेक बातें सामने आती हैं।
पंजाब में उस दौर में लोगों की तीन श्रेणियाँ मिलती हैं। उग्रवादी तथा उनके परिवार और पुलिस तथा राज्य। इसके अलावा आम लोगों का तीसरा वर्ग भी दिखता है। उग्रवादियों और पुलिस के साथ ही पीड़ितों में एक बात आम थी कि इनमें से ज़्यादातर जाट सिख समुदाय से थे। पुलिसकर्मियों को उग्रवादियों को खत्म करने के लिए प्रेरित करने वाले मुख्य कारण दो ही थे। उग्रवादियों ने पुलिस अधिकारियों और उनके परिवारों पर हमले शुरू कर दिए और दूसरा आखिरी छह सालों में उग्रवादियों को मारने में असाधारण उत्साह दिखाना आगे बढ़ने का एक पक्का तरीका साबित हो रहा था। ये दोनों बातें मिल कर एक खतरनाक कॉम्बिनेशन बन गईं। पुलिस ने कई मामलों में उग्रवादियों के परिवारों को भी नहीं बख्शा। इसका क्लासिक उदाहरण अजीत सिंह संधू के केस में है। खालरा के अपहरण के समय वह तरनतारन पुलिस के कप्तान पद पर थे। निचले रैंक के पुलिस अधिकारी से तेजी से आगे बढ़ने के मामले में उनके बारे में आगे भी चर्चा होती रहेगी।
उस दौर में उग्रवादियों की गतिविधियों और पुलिस की रेड्स का असर सभी जाति और वर्ग के लोगों पर पड़ा। ज़मींदार और सरकारी कर्मचारी अपने गाँव छोड़कर शहरों में बसने चले गए। उग्रवादियों के गुस्से के डर से निचले स्तर के पुलिसकर्मी भी अपने परिवार को शहरों में भेज देते हैं। 1989 से 1992 तक शायद ही कोई ऐसा दिन गुज़रा होगा जब अख़बारों में मौत की खबरें नहीं छपी हों।
इस फिल्म के अंत में कुछ गहरी बातें सुनने को मिलती हैं। एसएसपी और सीबीआई के अधिकारी के बीच का संवाद गौर करने योग्य है। पंजाब को बाहर का कोई व्यक्ति आसानी से नहीं समझ सकता है। 1984 में दिल्ली के त्रिलोकपुरी में हुए सिख-विरोधी दंगे की बात होती और 1983 में हुए डीआईजी अवतार सिंह अटवाल की हत्या का ज़िक्र भी होता है। वह बताते हैं कि कैसे उन्हें गोल्डन टेम्पल की सीढ़ियों पर मार दिया गया। फिर कैसे उनकी लाश छह घंटे तक वहीं पड़ी रही थी। इसमें एक्स्ट्रा-जुडिशियल किलिंग (कानूनी प्रक्रिया से हटकर की गई हत्या) का सवाल उठाया गया है।
जसवंत सिंह खालरा के अपहरण का मामला पुलिस के लिए एक दुखद विडंबना बना हुआ है। वे कोई उग्रवादी नहीं थे। पुलिस के साथ “एनकाउंटर” में मारे गए उग्रवादियों की भोग सेरेमनी में शामिल अवश्य होते थे। क्या उन्हें इसलिए खत्म करवाया जा सकता है? उन्होंने लावारिस लाशों के रहस्य का पर्दाफाश किया था। आखिरकार 1997 में उन्होंने खुदकुशी किया था। हालांकि भोग सेरेमनी में भाजपा और अन्य दलों के नेताओं के साथ कई और जाने-माने लोग शामिल होते रहे। यहाँ जॉन डन की मशहूर पंक्तियाँ याद आती हैं:
हर इंसान की मौत मुझे कमज़ोर करती है,
क्योंकि मैं भी इंसानियत का हिस्सा हूँ।
इसलिए यह जानने की कोशिश न करो
कि घंटी किसके लिए बज रही है,
यह तुम्हारे ही लिए बज रही है।
हनी त्रेहान डायरेक्टर के तौर पर बहुत अच्छा काम करते हैं। इसे सिंपल और बिना ज़्यादा स्पेशल इफेक्ट्स के पेश करने से ऐसा लगता है जैसे स्क्रीन पर जो हो रहा है वह असली है। सभी एक्टर्स अपने रोल के साथ इंसाफ करते दिखते हैं। तीन किरदारों में कलाकारों ने जान डाल दिया है। जसवंत सिंह खालरा, परमजीत कौर (उनकी पत्नी) और एसएसपी सुग्गा। ये फिल्म देख कर हैरत होती है कि सेंसर बोर्ड ने इसे स्वीकृति क्यों नहीं दी। हालांकि इस मूवी में 1995 के छोटे से कालखंड की तस्वीर है। उग्रवादी आंदोलन पंद्रह साल तक जारी रहा।
वर्षों पहले ख़्वाजा अहमद अब्बास ने सुप्रीम कोर्ट में अभिव्यक्ति की आजादी के मामले में सवाल खड़ा किया था। एक बार फिर पुराना सवाल खड़ा होता है। इस फिल्म को रिलीज़ करने की इजाज़त नहीं दी गई है। यह ‘धुरंधर’ टाइप की हाल में आई फिल्मों के मुकाबले कहीं कम हिंसक है। इसमें ऐसा भी कुछ नहीं है जो देश-विरोधी हो या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करती हो। जहाँ तक राज्य की राजनीति की बात है, तो इससे किसी भी राजनीतिक पार्टी को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है।
अनुवाद; रणधीर गौतम
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