एक थे बादशाह खान!

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Badshah Khan.

सीमान्त गांधी, बादशाह खान, बाचा खान जैसे कई कई नामों से जाने जानेवाले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायकों में एक खान अब्दुल गफ्फार खान का शुमार उस दौर के सबसे विनम्र, सबसे सुलझे और अपने सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध नेताओं में होता है। वे पश्तूनों के ऐसे आध्यात्मिक मार्गदर्शक थे जिन्होंने आज़ादी और मानव-सेवा के लिए ‘ख़ुदाई खिदमतगार आंदोलन’ की शुरुआत की थी। इस संगठन ने महात्मा गांधी की प्रेरणा से सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के अस्त्र से ब्रिटिश राज से पश्तूनों की आज़ादी के लिए लंबा संघर्ष किया। था वे भारत के विभाजन के प्रबल विरोधी थे। उनका लक्ष्य संयुक्त, स्वतन्त्र और धर्मनिरपेक्ष भारत था। उनकी इच्छा के विपरीत देश का विभाजन हो गया तो उन्होंने पाकिस्तान में पश्तूनों के अधिकारों और स्वतंत्र पख़्तूनिस्तान के लिए अपनी जंग जारी रखी। उन्हें अपने संघर्षों की भारी क़ीमत चुकानी पड़ी। वे कई वर्षों तक पाकिस्तान की जेलों में रहे। 20 जनवरी, 1988 में हाउस अरेस्ट के दौरान ही उनका निधन हुआ।

बादशाह खान की सादगी, सरलता और उनके भीतर पल रहे बंटवारे के दर्द को 1969 की एक घटना में देखा जा सकता है। उस साल प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के बुलाने पर अपने इलाज़ के लिए वे भारत आए थे। हवाई अड्डे पर उन्हें लेने के लिए इंदिरा गांधी और जयप्रकाश नारायण पहुंचे थे। खान साहब जहाज़ से निकले तो उनके हाथ में मात्र एक छोटी गठरी थी जिसमें उनका कुर्ता-पाजामा भर था। इंदिरा जी ने उनकी गठरी पकड़ कर कहा – इसे हमें दीजिए, हम ले चलते हैं। खान साहब ने गहरी सांस भरते हुए में कहा था – बस यही तो बचा है हमारे पास। इसे भी ले लोगी? उनकी बात पर इंदिरा जी और जयप्रकाश जी दोनों की आंखें नम हो गईं।

आज़ाद भारत के पहले गैर भारतीय भारत रत्न खान अब्दुल गफ्फार खान की पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि !


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