— परिचय दास —
गणतंत्र को प्रायः एक स्थापित राजनीतिक व्यवस्था के रूप में समझ लिया जाता है—एक ऐसी संरचना जो संविधान, संसद, चुनाव और विधि के सहारे चलती है। किंतु इस दृष्टि में गणतंत्र की आत्मा नहीं, केवल उसका ढाँचा दिखाई देता है। गणतंत्र, यदि केवल संस्थागत यंत्रणा बनकर रह जाए, तो वह भीतर से धीरे-धीरे निर्जीव होने लगता है। उसकी जीवंतता नागरिक चेतना से आती है, उस नैतिक विवेक से आती है जो सत्ता को प्रश्नों के घेरे में रखता है। गणतंत्र का वास्तविक संकट तब पैदा होता है जब वह अपनी आलोचना सहने की क्षमता खो देता है।
स्वतंत्रता को अक्सर अधिकारों की सूची में बदल दिया गया है—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन की स्वतंत्रता, विचार की स्वतंत्रता। परंतु स्वतंत्रता की यह कानूनी परिभाषा अपने आप में अधूरी है। स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, बल्कि एक आंतरिक अनुशासन है—अपने विवेक के प्रति उत्तरदायी होने का साहस। जहाँ नागरिक अपने प्रश्नों से डरने लगे, जहाँ असहमति को अपराध की तरह देखा जाने लगे, वहाँ स्वतंत्रता काग़ज़ पर तो रहती है, जीवन से विदा हो जाती है। गणतंत्र का भविष्य इसी बिंदु पर निर्णीत होता है।
आधुनिक समय में गणतंत्र के सामने सबसे बड़ा खतरा बाहरी नहीं, आंतरिक है। यह खतरा तानाशाही के रूप में नहीं आता, बल्कि सुविधा, चुप्पी और सहमति की भाषा में प्रवेश करता है। जब नागरिक यह मान लेता है कि राजनीति केवल नेताओं का काम है, और उसका अपना दायित्व केवल मतदान तक सीमित है, तभी गणतंत्र अपने नैतिक आधार से कटने लगता है। गणतंत्र नागरिक से निरंतर भागीदारी की अपेक्षा करता है—न केवल उत्सव के दिनों में, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन में।
स्वतंत्रता और गणतंत्र का संबंध यांत्रिक नहीं है। स्वतंत्रता गणतंत्र की देन नहीं, बल्कि उसकी शर्त है। यदि स्वतंत्रता सिकुड़ती है, तो गणतंत्र स्वतः कमजोर हो जाता है। इसीलिए गणतंत्र को बचाने का अर्थ केवल संस्थाओं की रक्षा नहीं, बल्कि उस मानसिकता की रक्षा है जो प्रश्न पूछने, असहमत होने और सत्ता से असुविधाजनक संवाद करने का साहस रखती है। जहाँ संवाद समाप्त होता है, वहीं गणतंत्र एकतरफ़ा भाषण में बदल जाता है।
गणतंत्र का एक बड़ा भ्रम यह है कि बहुमत ही उसका अंतिम सत्य है। बहुमत शासन की प्रक्रिया हो सकता है, किंतु बहुमत नैतिकता का पर्याय नहीं हो सकता। यदि बहुमत अल्पमत की आवाज़ को कुचलने लगे, यदि संख्या संवेदना पर भारी पड़ने लगे, तो गणतंत्र अपनी ही शर्तों का उल्लंघन करता है। गणतंत्र का मर्म अल्पमत की रक्षा में निहित है—उस असुविधाजनक उपस्थिति में जो सत्ता को लगातार अस्थिर बनाए रखती है।
स्वतंत्रता को जब राष्ट्रभक्ति के नाम पर सीमित किया जाने लगता है, तब वह धीरे-धीरे अनुशासन में बदल जाती है। यह अनुशासन नागरिक को नहीं, सत्ता को सहज बनाता है। गणतंत्र का उद्देश्य नागरिक को अनुशासित करना नहीं, बल्कि उसे सचेत बनाना है। सचेत नागरिक सत्ता के लिए सबसे कठिन चुनौती होता है, क्योंकि वह न तो नारे से संतुष्ट होता है, न ही प्रतीकों से।
गणतंत्र केवल वर्तमान का अनुबंध नहीं, स्मृति का भी क्षेत्र है। जब समाज अपने संघर्षों को भूलने लगता है, तब वह स्वतंत्रता को सहज मानने लगता है। स्वतंत्रता को सहज मानना ही उसका सबसे बड़ा अपमान है। गणतंत्र को जीवित रखने के लिए आवश्यक है कि नागरिक अपने अतीत को स्मरण में रखे—उस संघर्ष को, जिसने उसे बोलने का अधिकार दिया। स्मृति-विहीन गणतंत्र उत्सवप्रिय तो हो सकता है, विवेकशील नहीं।
आधुनिक राज्य में स्वतंत्रता को अक्सर सुरक्षा के नाम पर सीमित किया जाता है। सुरक्षा का यह तर्क इतना आकर्षक होता है कि नागरिक स्वयं अपनी स्वतंत्रता छोड़ने को तैयार हो जाता है। यही वह क्षण है जब गणतंत्र सबसे अधिक असुरक्षित होता है। स्वतंत्रता का त्याग हमेशा भय के वातावरण में होता है—और भय गणतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु है।
गणतंत्र भाषा में सांस लेता है। जब भाषा संकुचित होती है, जब शब्दों के अर्थ तय कर दिए जाते हैं, जब कुछ शब्द देशभक्ति बन जाते हैं और कुछ शब्द संदेहास्पद, तब गणतंत्र की अभिव्यक्ति सीमित हो जाती है। भाषा का संकुचन अंततः विचार का संकुचन है। गणतंत्र को बचाने का अर्थ भाषा को खुला रखना है—वह भाषा जिसमें प्रश्न पूछे जा सकें, व्यंग्य किया जा सके, और असहमति दर्ज हो सके।
स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण पक्ष जोखिम है। जो समाज जोखिम उठाने से डरता है, वह स्वतंत्र नहीं रह सकता। असहमति हमेशा जोखिम भरी होती है—सामाजिक, राजनीतिक और कभी-कभी व्यक्तिगत भी। गणतंत्र उस जोखिम को वैध बनाता है। जब जोखिम को अपराध बना दिया जाता है, तब गणतंत्र केवल नाम मात्र रह जाता है।
गणतंत्र और नैतिकता का संबंध अनिवार्य है। नैतिकता के बिना गणतंत्र केवल प्रक्रिया बन जाता है। कानून का पालन भय से भी हो सकता है, पर गणतंत्र का पालन केवल नैतिक स्वीकृति से होता है। नागरिक यदि कानून का पालन केवल दंड के डर से करे, तो वह गणतंत्र नहीं, केवल व्यवस्था है।
गणतंत्र सत्ता को सीमित करने की कला है। जो सत्ता स्वयं को असीम मानने लगे, वह गणतंत्र को भीतर से नष्ट कर देती है। इसलिए गणतंत्र में सत्ता के प्रति संशय एक गुण है, दोष नहीं। संशय लोकतांत्रिक चेतना का मूल स्रोत है। जहाँ संशय समाप्त होता है, वहाँ भक्ति शुरू होती है—और भक्ति राजनीति में सबसे खतरनाक भाव है।
समकालीन संदर्भ में गणतंत्र का संकट इस बात में भी दिखाई देता है कि नागरिक को उपभोक्ता में बदल दिया गया है। अधिकार माँगने वाला नागरिक अब सुविधाएँ चाहने वाला उपभोक्ता बनता जा रहा है। सुविधा प्रश्न को खत्म कर देती है। जहाँ सुविधा सर्वोच्च मूल्य बन जाती है, वहाँ स्वतंत्रता बोझ लगने लगती है।
गणतंत्र किसी एक पीढ़ी की संपत्ति नहीं है। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होने वाला नैतिक उत्तराधिकार है। यदि एक पीढ़ी अपने हिस्से की स्वतंत्रता को सुरक्षित नहीं रखती, तो अगली पीढ़ी उसे स्वाभाविक मानकर खो देती है। इसीलिए गणतंत्र को हर समय सजग रहना पड़ता है—उसे कभी विश्राम नहीं मिलता।
गणतंत्र किसी संविधान में बंद नहीं होता, वह नागरिक के विवेक में निवास करता है। स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास है। जो समाज इस अभ्यास से थक जाता है, वह धीरे-धीरे अपनी आवाज़ खो देता है। गणतंत्र तभी जीवित रहता है जब नागरिक असुविधा के बावजूद बोलता है, प्रश्न करता है और सत्ता के सामने खड़ा होने का साहस रखता है।
गणतंत्र एक व्यवस्था नहीं, एक जिम्मेदारी है—और स्वतंत्रता उसका सबसे कठिन किंतु सबसे अनिवार्य रूप।
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