सोशलिस्टों के पितामह आचार्य नरेंद्र देव को नमन! — प्रोफेसर राजकुमार जैन

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Narendra Dev
आचार्य नरेंद्रदेव (31अक्टूबर 1889 - 19 फरवरी 1956)

Raj kumar Jain

19 फरवरी 2026 सोशलिस्टों के पितामह आचार्य नरेंद्र देव की 70वीं पुण्यतिथि है। आचार्य जी की शख्सियत को किसी एक लेख, किताब या भाषण में व्यक्त नहीं किया जा सकता। उन पर अनेक लेख, किताबें और भाषण प्रकाशित हो चुके हैं, और यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। कुछ उदाहरणों से ही उनके व्यक्तित्व का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वे कितनी बड़ी शख्सियत और महामानव थे।

17 मई 1934 को पटना में ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ की स्थापना आचार्य जी की अध्यक्षता में ही हुई थी। महात्मा गांधी से जब श्रीप्रकाश जी ने आचार्य जी का परिचय करवाया, तो पहली ही मुलाकात में गांधी जी उनसे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा—
“श्रीप्रकाश, तुमने ऐसे रत्न सरीखे व्यक्ति को कहाँ छुपा रखा था और मुझसे कभी उनके बारे में बताया भी नहीं।”

आचार्य जी ने ब्रिटिश हुकूमत का विरोध करते हुए कई वर्ष जेल में बिताए। जब वे और पंडित जवाहरलाल नेहरू अहमदनगर किले की जेल में बंद थे, उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ लिख रहे थे। नेहरू जी ने पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा है कि यह किताब आचार्य नरेंद्र देव तथा मौलाना आज़ाद की सहायता के बिना नहीं लिखी जा सकती थी। उन्होंने कहा— “आचार्य नरेंद्र देव मेरे लिए एक एनसाइक्लोपीडिया सिद्ध हुए।”

उनके व्यक्तित्व के गहरे प्रभाव की एक और मिसाल 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव की है। सुभाष चंद्र बोस उम्मीदवार थे और गांधी जी के आशीर्वाद से पट्टाभि सीतारमैया भी मैदान में थे। सुभाष बाबू ने प्रस्ताव रखा कि यदि आचार्य जी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाए तो वे अपना नाम वापस ले लेंगे। गांधी जी भी इस पर सहमत थे, परंतु अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इसे स्वीकार नहीं किया।

आचार्य जी के निधन पर जवाहरलाल नेहरू ने 20 फरवरी 1956 को राज्यसभा में श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा—

“चालीस वर्ष से अधिक समय बीत गया, जब हम दोनों स्वतंत्रता संग्राम की धूल और धूप में तथा जेल जीवन की लंबी नीरवता में साथ रहे। हमने विभिन्न स्थानों पर चार या पाँच वर्ष साथ बिताए—यद्यपि मुझे इस समय ठीक अवधि याद नहीं है। हम अनगिनत अनुभवों और अनुभूतियों के सहभागी रहे और स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे को अंतरंग रूप से जानने और समझने लगे। इसलिए मेरे लिए और हममें से अनेक अन्य लोगों के लिए उनका निधन एक गहरी व्यक्तिगत हानि है।”

आज की राजनीति में, जहाँ दल-बदल कपड़े बदलने जैसा सहज हो गया है, आचार्य जी ने नैतिकता का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। वे उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुने गए थे। परंतु जब उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी का गठन कर उसमें शामिल होने का निर्णय लिया, तो नैतिक आधार पर आचार्य जी और उनके 11 समाजवादी साथियों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।

30 मार्च 1948 को उत्तर प्रदेश विधानसभा में अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए आचार्य जी ने कहा—

“मैंने और मेरे ग्यारह साथियों ने आज असेम्बली से त्यागपत्र देने का निर्णय कर लिया है और कांग्रेस-असेम्बली पार्टी के नेता को अपना त्यागपत्र दे दिया है। मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि कांग्रेस से पृथक होने का यह निर्णय हमारे जीवन का सबसे कठिन निर्णय है। बिना पूर्व विचार के हमने यह निर्णय सहसा नहीं किया है।

ब्रिटिश पार्लियामेंट तथा अन्य व्यवस्थापिकाओं का इतिहास बताता है कि ऐसे अवसर पर लोग त्यागपत्र नहीं देते। हम चाहते तो इधर से उठकर किसी दूसरी ओर बैठ जाते, किंतु हमने ऐसा करना उचित नहीं समझा। संभव है कि आपके आशीर्वाद से निकट भविष्य में हम इस विशाल भवन के किसी कोने में अपनी कुटी का निर्माण कर सकें (हर्षध्वनि), परंतु चाहे यह संकल्प पूरा हो या नहीं, हम अपने पथ से विचलित नहीं होंगे।

हम जानते हैं कि हमारे देश का यह युग निर्माण का है, न कि ध्वंस का। अतः हमारी आलोचना सदा इसी उद्देश्य से होगी। हम व्यक्तिगत आक्षेपों से बचने का प्रयत्न करेंगे और किसी अनावश्यक विवाद में नहीं पड़ेंगे। राजनीतिक जीवन को स्वस्थ और नीतिपूर्ण बनाने में हम अपना हाथ बढ़ाना चाहते हैं। इन बातों में महात्मा जी का उपदेश हमारा पथ-प्रदर्शन करेगा।

हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि हमने किसी विद्वेष या विरोध की भावना से प्रेरित होकर यह कार्य नहीं किया है। हममें किसी प्रकार की कटुता नहीं है। हमारे अनेक साथी और सहकर्मी कांग्रेस में हैं और उनके साथ हमारा संबंध मधुर रहेगा। हमारे समान राजनीतिक आदर्श और निष्ठा हमें अब भी एक सूत्र में बाँधे रखेंगे।

माननीय अध्यक्ष महोदय, आप एक कुटुंब के सम्मानित सदस्य होते हुए भी इस भवन के अन्य कुटुंबों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। अतः हम आशा करते हैं कि आप हमें आशीर्वाद देंगे कि हम अपने उद्देश्यों की पूर्ति में सफल हों। हम आपके तथा कांग्रेस असेम्बली पार्टी के नेता माननीय पंडित गोविंद वल्लभ पंत के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।”

स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा, समाजवादी सिद्धांतों, नीतियों और कार्यक्रमों के मूल स्थापक, भारतीय संस्कृति के व्याख्याता, प्राचीन साहित्य, इतिहास, बौद्ध धर्म-दर्शन तथा समाजवाद के पुरोधा—इस प्रकांड पंडित आचार्य नरेंद्र देव के प्रति हम नतमस्तक हैं।


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