वैभव सूर्यवंशी की बल्लेबाज़ी से क्रिकेट की चर्चाओं को नए-नए मुहावरे से भर दिया है। इन मुहावरों ने राष्ट्रीय स्तर पर भारत को लेकर होने वाली चर्चाओं की निराशा पर चाँदी का वर्क़ चढ़ा दिया है। किसी देश में किसी खेल और किसी खिलाड़ी का उदय उसकी राष्ट्रीय महत्वकांक्षाओं की भी अभिव्यक्ति होता है। खेल का इतिहास ऐसे कई महान खिलाड़ियों से भरा है जिन्होंने अपनी और अपने मुल्क की ग़रीबों से लोहा लेते हुए देश का परचम लहरा दिया है। उनकी कामयाबी निराशा से मुल्क को बाहर भी खींच लाती है और आगे बढ़ने के मज़बूत इरादे में बदल जाती है। इस स्तर पर वैभव सूर्यवंशी का उदय क्या कोई मायने रखता है। मैंने वैभव सूर्यवंशी का एक भी मैच नहीं देखा है लेकिन उसकी चर्चाएं चारों दिशाओं से मुझ तक पहुँच रही है। यही किसी महान खिलाड़ी के आने की दस्तक होती है कि आप उसके नाम के साथ साथ उम्मीदों का सैलाब भी आता देखते हैं। क्या वैभव सूर्यवंशी उम्मीदों के किसी सैलाब पर खड़ा है या हताशा और निराशा से छिपने के लिए एक पर्दा बन गया है?
क्रिकेट में वैभव सूर्यवंशी व्यक्तिगत प्रदर्शन के सबसे बड़े प्रतीक बन चुके हैं। उसी समय में अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर मज़बूत नेता की छवि से प्रधानमंत्री मोदी फिसलते जा रहे हैं। आज नरेंद्र मोदी तमाम संस्थाएँ की विशालकाय टीम के दम पर ताकतवर नज़र आते हैं जो किसी पत्रकार से लेकर विपक्ष, सराकर से लेकर अखबार को कभी भी रौंद सकता है। शक्ति और पूंँजी के इसी अदृश्य तंत्र के दम पर वे अकेले प्रदर्शन करने का भरम पैदा करते हैं।वैभव सूर्यवंशी देश के एक पिछड़े राज्य बिहार से आता है और अपने परिवार के भावनात्मक समर्थन के दम पर मैदान में अकेला छाया हुआ है। वैभव का प्रदर्शन जिस मैदान में संभव होता है, वहाँ हर स्तर पर बराबरी के नियम है। नियम सबके लिए बराबर है और उन्हीं के बीच अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करना पड़ता है। मगर चुनाव में ऐसा नहीं है। चुनाव आयोग ने चुनावों में बराबरी के मैदान की भावना को रौंद दिया है। कोई भी चुनाव नहीं गुज़रता जिस पर धांधली से लेकर पक्षपात के ठोस आरोप न लगते हों। मगर वैभव बराबरी के मैदान में अकेला अपने दम पर प्रदर्शन कर रहा है, उसे लोगों का दिल जीतने के लिए गोदी मीडिया के ज़रिए खुल कर और व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में छुप कर प्रोपेगैंडा करने की ज़रूरत नहीं पड़ता है। बस उस मैदान में खेलना होता है, जहाँ खेल के नियम खिलाड़ी के हिसाब से नहीं बदलते हैं।
वैभव क्रिकेट की नई संभावना है। लोग तरह-तरह की जिज्ञासा लेकर उसका खेल देखने आ रहे हैं कि आज वैभव क्या करेगा, इधर से घूमती आती गेंद को उधर कैसे मारेगा और उधर जाती गेंद को इधर कैसे समेटेगा। लेकिन क्या इन करोड़ों दर्शकों के बीच नरेंद्र मोदी को लेकर कोई जिज्ञासा बची है? इन दर्शकों का आजीवन वोटर और समर्थक बने रहना अलग बात है लेकिन नरेंद्र मोदी के घोर समर्थकों में अब उन्हें लेकर जिज्ञासा नज़र नहीं आती। उन्हें पहले से पता है कि संकट के समय उपदेश देंगे, संदेश देंगे और फिर सूचनाओं से लेकर धारणाओं को मैनेज करेंगे। एक समय था जब उनके समर्थकों को नरेंद्र मोदी में तमाम संभावनाएँ नज़र आती थीं जिस तरह से आज लोगों को वैभव में ब्रैडमैन, तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, विवियन रिचर्ड और विराट नज़र आ रहा है। क्रिकेटे के स्टेडियम में वैभव का ऐश्वर्य कायम होता जा रहा है लेकिन अर्थव्यवस्था के मैदान में उसी भारत का वैभव भरभराने लगा है।
आज भारत आर्थिक अवसरों का देश नहीं रहा मगर यह एक पार्टी के लिए सरकार बनाते रहने का असीम अवसरों का देश बन गया है। आज ही ब्लूमबर्ग में एंडी मुखर्जी ने लिखा है कि भारत के पास आइडिया नहीं है, युद्ध ख़त्म हो जाने से कैपिटल और AI के मामले में भारत की ख़ामियों का इलाज नहीं हो पाएगा। दो साल से रुपया गिरता हुआ सौ के करीब पहुँच रहा है। दो साल से विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकाले जा रहे हैं। दो साल से भारत AI और चिप बनाने के क्षेत्र में चीन और अमेरीका के करीब होने का दावा कर रहा है मगर सबको दिखाई दे रहा है कि भारत के पास AI और चिप के मामले में कोई नया आइडिया नहीं है। विदेशी निवेशकों के भारत से चले जाने के पीछे एक कारण यह भी बताया जा रहा है कि निवेशक चीन, ताइवान और दक्षिण कोरिया में पैसा लगा रहे हैं जहाँ AI और चिप के क्षेत्र में तेज़ रफ़्तार से प्रगति हो रही है और इस क्षेत्र में लीडर बन गए हैं। भारत मैन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र में भी कहीं नहीं है। चीन को टक्कर देने का नाटक-नाटक करते करते चीन के आयात पर निर्भर हो चुका है। आत्म निर्भर भारत कई साल के प्रचार के बाद भी सफल नज़र नहीं आता है।
केंद्र सरकार की तीन तीन बड़ी परीक्षाएँ विवाद में हैं। नीट यूजी की परीक्षा का पेपर लीक हुआ, CBSE जैसी संस्था बारहवीं की परीक्षा की कॉपी ठीक से चेक नहीं कर पाई, SSC की परीक्षा में पेपर लीक हो गया तो कहीं परीक्षा केंद्र पर ज़रूरत से ज़्यादा छात्र पहुँच गए। सर्वर डाउन होने के कारण छात्रों को लौटाया जाने लगा तो उन्होंने हंगामा कर दिया। भारत की जवानी की कोई कहानी नहीं है। यहां का जवान पेपर लीक और पेपर कैंसिल से परेशान है। शिक्षा मंत्री की असफलता पहाड़ की तरह है मगर उनकी कुर्सी चट्टान की तरह सुरक्षित है। कोई हिला नहीं पा रहा है। इस खंडित विखंडित अर्थव्यवस्था और राजनीति के दौर में सरकार निराश करती है, वह दमन का प्रतीक बनती जा रही है लेकिन इसी में वैभव सूर्यवंशी उम्मीदों का चमन बन जाता है। वह हर देश के घातक गेंदबाज़ों के सामने तन कर खड़ा हो जाता है। दूसरी तरफ मज़बूत नेता के रुप में उभरे प्रधानमंत्री मोदी दबे दबे से नज़र आते हैं और उनके सामने राष्ट्रपति ट्रंप तने-तने से। ट्रंप ने सीज़फ़ायर, टैरिफ़, वीज़ा और ग्रीन कार्ड के नियमों को लेकर भारत को कितनी बार टारगेट किया मगर प्रधानमंत्री मोदी चुप रह गए। अपने बल्ले को पीछे कर लिया। वे ग्लोबल लीडर की टीम में नज़र तो आते हैं मगर बारहवें खिलाड़ी के रुप में। आईपीएल के खेल को अपने विज्ञापनों से अमीर आयोजन बनाने वाले भारत के बिज़नेसमैन ख़राब आर्थिक नीतियों पर बोल नहीं सकते मगर उन्हीं के पैसे से चलने वाले खेल में एक 15 साल का बच्चा अपने बल्ले से गरज रहा है। ऐसा लगता है सारे डरपोकों को बंद कमरे में ताली बजाने के लिए वैभव मिल गया है।
वैभव का इंस्टिक्ट आज के भारत के इंस्टिक्ट से काफी अलग है। आज के भारत में प्रधानमंत्री मोदी प्रेस का सामना नहीं कर सकते। प्रेस को ख़त्म कर दिया गया है। नगरपालिका से लेकर न्यायपालिका तक पर लोगों का बड़ा वर्ग शक करने लगा है, उसके कार्यों और फैसलों से उत्साहित नहीं होता है। सुप्रीम कोर्ट इस बात से नाराज़ हो जाता है कि NCERT की किताब में न्यायपालिका के भ्रष्टाचार को लेकर क्यों पढ़ाया जा रहा है, उसी देश में मद्रास हाईकोर्ट की आवाज़ आती है कि इस बात को कोई नहीं नकार सकता है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, जज कोई पवित्र गाय नहीं हैं एक कोर्ट कहता है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, एक कोर्ट कहता है कोर्स में मत पढ़ाओ कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है।
धर्म की राजनीति के कारण भारत में संभावना की जगह डरावना ने ले ली है। 27 मई की शाम वैभव की बल्लेबाज़ी की चर्चा जब आग की तरह फैल रही थी उस शाम गोदी मीडिया के चैनलों पर बकरीद की कुर्बानी और सड़क पर नमाज़ को लेकर बहस हो रही थी। इस देश में करीब 80 प्रतिशत लोग मांसाहार करते हैं मगर बकरी की कुर्बानी राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन जाती है। कहीं नमाज़ पढ़ने पर रोक लगाई जा रही थी तो कहीं नमाज़ पढ़ने के लिए लोग अदालत में जा रहे थे, मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाई जा रही थी। उसी 27 मई की शाम वैभव सूर्यवंशी ऐसी पारी खेलता है कि पूरा देश उसके पीछे सिमट आता है।क्या हिन्दू क्या मुसमलान सब वैभव को सौ के पार जाते देखना चाहते थे। उसके एक एक शॉट पर झूमने लग जाते हैं।गोदी मीडिया अगर पेन है तो वैभव सूर्यवंशी पेन किलर बन जाता है।
आईपीएल का वैभव लौट आया है मगर वैसा वैभव राष्ट्रीय क्षितिज पर अब नहीं आ सकता। उसके आने की उम्मीद से लोग डर जाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत अपना नैतिक और आर्थिक वैभव खोता जा रहा है। जिने पीछे भारत को सुपर पावर बनाने का ख़्वाब देखा जा रहा था, उन्हें छोड़ कर लोग वैभव का खेल देख कर सुपर पावर फील करने लगे हैं। प्रधानमंत्री मोदी गर्मी में पानी पीने का संदेश दे रहे हैं। जल्दी ही नहाते समय पानी के बचाने पर उपदेश देंगे और जनता तारीफ करेगी। उसी जनता को यह नहीं दिखेगा कि दिल्ली में अगर कई जगहों पर पानी नहीं आ रहा है तो दूर दराज़ इलाकों में क्या हालत होगी। क्रिकेट को तेंदुलकर और विराट के बाद वैभव सूर्यवंशी मिल गया है, भारत को उसका वैभव कब मिलेगा? 2047 मेें?
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