जांबाज साथी बृजेंद्र तिवारी चला गया!

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Brijendra Tiwari

‌साथी बृजेंद्र तिवारी के असामयिक निधन की खबर से बेहद तकलीफ हुई। कुछ दिन पहले ही मैं और साथी रमाशंकर सिंह उनसे मिलने के लिए ग्वालियर में अस्पताल में गए थे। जीवन रक्षक नलियों, यंत्रों‌ से घिरा होने के बावजूद भी उन्होंने देखते ही हमेशा की तरह हाथ जोड़कर नमस्ते करने का प्रयास भी किया। ‌ धीमी आवाज में ‌ कुछ वाक्य भी कहे। आज मानस में कुछ पुरानी स्मृतियों उभर रही है। बृजेंद्र ग्वालियर यूनिवर्सिटी छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए थे, ‌ छात्र संघ के उद्घाटन समारोह में उन्होंने मुझे विशेष अनुरोध करके ग्वालियर बुलाया था। बृजेंद्र‌ एक जांबाज लड़ाकू साथी था। ग्वालियर समाजवादी तहरीक में‌ जितने भी संघर्ष, मोर्चे, सत्याग्रह‌ भूख हड़ताल‌ सभा, ‌ सेमिनार‌ वगैरा होते थे,‌ उसमें हमेशा हरावल दस्ते के रूप में उनकी शिरकत होती थी। ग्वालियर की मजदूर यूनियनों ‌ मैं उनकी मौजूदगी ‌ मालिकों के लिए एक खौफ होती थी।

पुश्तैनी खेती उनकी आजीविका का साधन थी। मजबूत कद काठी के कारण दूर से ही उनकी पहचान हो जाती थी। ‌ ओजस्वी वक्ता,‌ संघर्षों में जहां ‌ उनकी आक्रामक ‌ मुठभेड़‌ वाली आकृति दिखाई देती थी वहीं निजी संबंधों में उनकी विनम्रता खुलूश,‌ अदब‌‌ भी देखने लायक होता था। पिछले कई सालों से ‌ एक बनियान नुमा ‌ साधारण कुर्ता तथा पायजामा ‌ के साथ साधारण ‌ रबड़ की चप्पल पहने हुए वे दिखाई देते थे। उनके पिताजी‌ विष्णु दत्त तिवारी ग्वालियर के मशहूर वकील होने के साथ-साथ नामवर सोशलिस्ट नेता भी थे। दोनों बाप बेटे ग्वालियर से विधायक भी बने। बृजेंद्र के जाने से न केवल एक पुराना साथी बिछड़ गया‌ एक खालीपन का एहसास भी हो रहा है। दुख की इस घड़ी में मेरी संवेदना उनके परिवार के साथ है। दुःखी मन से ‌‌ अपने साथी को श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहा हूं।

– राजकुमार जैन


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