— प्रोफेसर राजकुमार जैन —
आम लोगों की निगाह में आज सियासत एक पेशा बनकर रह गई है। विचारधारा और नेता कपड़े बदलने की तरह हो गए हैं। जहाँ पद, प्रतिष्ठा, शोहरत, दौलत मिले, वहीं चलो, उसी नेता की जय-जयकार करो—आज सियासत में सफलता का यही मंत्र बन गया है।
परंतु सवाल है, क्या पूरा समाज ऐसा ही हो गया है? जी नहीं। विचारधारा और उस इंसान को, जिसको हमने कभी अपना नेता माना था, उसकी खूबियों को अपना आदर्श बनाया था, उसके जिस्मानी रूप में न होने के बावजूद उसकी तस्वीर हमेशा हमें प्रेरणा देती रहती है। ऐसे ही थे चंद्रशेखर। हालांकि आमजन में उनकी पहचान भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री के रूप में है, परंतु हमारे लिए वह सोशलिस्ट तहरीक के उन कद्दावर नेताओं में थे, जिन्होंने समाजवादी विचारधारा और सिद्धांतों के लिए तमाम उम्र जद्दोजहद की। उत्तर प्रदेश प्रजा समाजवादी पार्टी के महामंत्री, कांग्रेस पार्टी के युवा तुर्क, कांग्रेस पार्टी में रहते हुए अपने नेता जयप्रकाश नारायण की शान बनाए रखने के लिए मंत्री पद के स्थान पर 19 महीने मीसाबंदी के रूप में रहना पसंद किया। हालात की मजबूरी के कारण प्रधानमंत्री पद को भी स्वीकार किया। परंतु एक बहुत ही मामूली सवाल पर कि राजीव गांधी की खुफिया गिरी हरियाणा के दो पुलिस वाले कर रहे हैं, उनको हटा दिया जाए, बिना किसी जाँच-तथ्य के। चंद्रशेखर को लगा कि कांग्रेस सरकार के समर्थन से चल रही मेरी सरकार को यह एक प्रकार का हुक्म है। यह तो प्रधानमंत्री पद की लेन-देन है। उन्होंने इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस पार्टी ने भरसक चाहा कि चंद्रशेखर इस्तीफा वापस ले लें, परंतु वे तो चंद्रशेखर थे। एक बार फैसला करने के बाद किसी दबाव में उसको वापस करना उनकी जहानियत नहीं थी।
8 जुलाई 2007 को तकरीबन 19 साल पहले उनका इंतकाल हो गया था। यह उनका जन्मशताब्दी वर्ष है। मुल्क भर में उनकी याद में उनके अनुयायी और चाहने वाले जगह-जगह कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं, पुस्तिका-किताबें प्रकाशित कर रहे हैं और प्रतियोगिताएँ आयोजित कर रहे हैं। इसी सिलसिले में उत्तर प्रदेश में बस्ती शहर में कार्यक्रम आयोजित हुआ। आयोजकों के बार-बार के इसरार के कारण मैंने भी अपनी हाजिरी वहाँ पर दर्ज की। कई पुराने समाजवादी साथियों से वहाँ पर मुलाकात हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मेरे पुराने समाजवादी साथी राजमणि पाण्डेय (भूतपूर्व विधायक) के साथ आंदोलन में भाग लेने के कारण जेल यात्रा भी हुई। दूर-दूर के जिलों से साथियों का जुटान वहाँ हुआ। सभा स्थल का उत्साह, आनंद और हर्षोल्लास देखने लायक था। आयोजकों ने बाहर से आने वाले साथियों का फूल-माला, फूलों के गुलदस्ते, गले में अंगवस्त्र, शाल और चंद्रशेखर जी का आकर्षक चित्र जिस सम्मान के साथ भेंट किया, उसको भुलाया नहीं जा सकता। यह सत्ताधीशों का जमावड़ा नहीं था, यहाँ पर चंद्रशेखर जी की समाजवादी गौरव गाथा का यशोगान करने वालों का जमघट था। डॉ. सुनीलम, अरुण त्रिपाठी, राकेश पाठक और अरुण श्रीवास्तव ने अलग-अलग जगह से आकर सभा को संबोधित किया। आयोजकों ने हर आने वाले के लिए जलपान और स्वादिष्ट भोजन की व्यवस्था की तथा उसके साथ ही मोहब्बत के साथ उसको परोसने वाले साथियों का प्रेम एक यादगार पल था।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. हरिओम श्रीवास्तव एवं प्रिंसिपल सुधाकर शाही जी और उनके साथियों ने महीनों से तैयारी करके समारोह की गरिमा को स्थापित कर दिया।
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