संघर्ष और निर्माण की राजनीति : शंकर गुहा नियोगी की याद में

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The Politics of Struggle and Construction: In Memory of Shankar Guha Niyogi

Dr. Shubhnit Kaushik

— Dr. Shubhneet Kausik —

आज छत्तीसगढ़ के जननायक शंकर गुहा नियोगी का शहादत दिवस है। पच्चीस साल पहले 28 सितम्बर 1991 की सुबह गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी। वह हत्या दरअसल आज़ाद हिंदुस्तान में विकल्प तलाशती और संभावनाओं से भरी हुई उस राजनीति की हत्या थी, जो निर्माण के लिए संघर्ष और संघर्ष के लिए निर्माण में यक़ीन रखती थी संघर्ष और सृजन की वह राजनीति, जो जनता की क्षमताओं में विश्वास रखती थी, उसकी उम्मीदों, आकांक्षाओं, परम्परा और संस्कृति को समझती थी और उनके अनुभवों को अपने लिए सबक़ बना लेती थी।

वर्ष 1942 में बंगाल के दीनाजपुर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे धीरेश (शंकर गुहा के बचपन का नाम) के शंकर गुहा नियोगी बनने की गाथा सचमुच प्रेरणादायी है। बंगाल कोल इंडिया में कार्यरत अपने ताऊ के साथ रहते हुए उन्होंने बचपन में ही कोयला खदानों में काम करने वाले मज़दूरों के जीवन को बहुत नज़दीकी से देखा। जैसे-जैसे उनकी समझ विकसित हुई उन्होंने भारतीय समाज-व्यवस्था के आर्थिक-राजनीतिक ढाँचे की वस्तुस्थिति को जाना, जो एक गरीब मज़दूर को और गरीब तथा एक धनी पूँजीपति को और अधिक अमीर बनाती जाती है।

साठ के दशक के शुरुआती वर्षों में युवा धीरेश ने बंगाल में चल रहे आंदोलनों को क़रीब से देखा। पॉलीटेक्निक की पढ़ाई करते हुए वे आल इंडिया स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन से जुड़े और यहाँ से उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई। एक ओर उन्होंने मार्क्सवादी चिंतन को गहराई से समझना शुरू किया और दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत को भी उन्होंने आत्मसात् किया।

बीस साल की उम्र में धीरेश ने भिलाई स्टील प्लांट में बतौर अप्रेंटिस काम करना शुरू किया, जहाँ वे 1968 तक काम करते रहे। पॉलीटेक्निक की उनकी पढ़ाई और भिलाई के ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षण ने उन्हें तकनीकी और प्रौद्योगिकी की बारीकियों से परिचित कराया। इसी की बदौलत वे आगे चलकर तकनीकी और प्रौद्योगिकी से जुड़े सवालों पर अधिकार और सूझ के साथ अपनी बात रख सके और अर्ध-मशीनीकरण की धारणा दे सके। वे तकनीकी ज्ञान को सामाजिक दृष्टि के साथ संतुलित करने के हिमायती थे।

शंकर गुहा नियोगी सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई (एमएल) तीनों दलों से समय-समय पर जुड़े रहे। इन दलों से जुड़ाव ने उनके राजनीतिक चिंतन को परिपक्वता दी। मगर शंकर जी पार्टी की सीमाओं में बंधकर काम करने वाले नेता नहीं थे। वे जनता के नेता थे और उनके लिए जनता से बढ़कर कोई नहीं था, पार्टी भी नहीं। असल में उनके जननायक बनने की शुरुआत ही उन्हें सीपीआई (एमएल) द्वारा पार्टी से निष्कासित किए जाने से होती है।

स्वतंत्र और आलोचनात्मक दृष्टि के हामी धीरेश ने इसके बाद अपनी इयत्ता को छत्तीसगढ़ की माटी में विलीन कर दिया। उनके लिए सिद्धांत और उनकी व्यावहारिकता की असल कसौटी अब छत्तीसगढ़ का समाज बन गया। एक सच्चे जननायक की तरह जनता से जुड़ने के लिए उन्होंने छत्तीसगढ़ी और गोंडी भाषा सीखी और छत्तीसगढ़ी समाज के सुख-दुःख से एकाकार हो गए।

सत्तर के दशक में उन्होंने दानीटोला के खदान मज़दूरों के बीच संगठन का काम शुरू किया। मैनेजमेंट परस्त और मज़दूर विरोधी यूनियनों की जगह उन्होंने ऐसी यूनियन का निर्माण किया, जो मज़दूरों के हितों के लिए लड़ने को तत्पर रहती थी। शंकर जी ने महिला श्रमिकों, ठेका मज़दूरों और खेतिहर मज़दूरों के साथ बढ़चढ़कर लड़ाई लड़ी। आपातकाल में जेल की सजा काटने के बाद जब वे लौटे तो वे दल्ली-राजहरा के मज़दूरों के आंदोलन से जुड़ गए और उसी समय छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ की नींव रखी गई। यह संगठन ही छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा और महिला मुक्ति मोर्चा का आधार बना।

सितम्बर 1991 – जिस महीने शंकर जी की हत्या हुई, उस महीने भी वे मज़दूर साथियों के साथ दिल्ली गए और मज़दूरों का एक ज्ञापन राष्ट्रपति को सौंपा गया। अपने आख़िरी क्षणों में भी संघर्ष और निर्माण की राजनीति में दत्तचित्त होकर लगे रहे, विकल्पहीन होती जा रही इस दुनिया में विकल्प खड़े करते रहे। हत्या से ठीक पहले की रात को वे लेनिन की किताब ‘ऑन ट्रेड यूनियंस’ पढ़ रहे थे, जो उनके सिरहाने रखी हुई थी। उन्हें सलाम!


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