राजनीति, पहचान और भाषा: गिरते मानकों की कथा – परिचय दास

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Parichay Das

मय की सबसे विचित्र विडंबनाओं में एक यह है कि संवाद के साधन जितने विस्तृत हुए हैं, संवाद की गुणवत्ता उतनी ही संकुचित होती गई है। शब्दों की संख्या बढ़ी है, अर्थों की गरिमा घटती चली गई है। आज सार्वजनिक जीवन में भाषा का जो रूप सामने आता है, वह किसी एक विचारधारा, किसी एक संगठन या किसी एक समूह की देन नहीं है; यह एक सामूहिक मनःस्थिति का परिणाम है, जिसमें विभिन्न धाराएँ अपने-अपने ढंग से सहभागी हैं। यह कहना सुविधाजनक है कि समस्या “दूसरे” में है पर असुविधाजनक सत्य यह है कि यह समस्या “हम सब” में फैली हुई है।

भारतीय राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो यहाँ विविध धाराएँ एक साथ सक्रिय हैं—राष्ट्रवादी विमर्श, उदार-लोकतांत्रिक परंपरा, वामपंथी दृष्टिकोण, क्षेत्रीय-आधारित राजनीतिक संरचनाएँ और एक उभरता हुआ डिजिटल एक्टिविस्ट संसार। इन सभी के बीच विचारों का संघर्ष स्वाभाविक है बल्कि आवश्यक भी है क्योंकि लोकतंत्र की जीवंतता इसी में निहित होती है किंतु जब यह संघर्ष भाषा की मर्यादा को तोड़ने लगता है तब वह विचार का नहीं, आवेग का रूप ले लेता है। यही वह बिंदु है जहाँ हर धारा, चाहे वह किसी भी नाम से पहचानी जाए, एक समान दोष में सहभागी हो जाती है।

राष्ट्रवादी धारा जो अपने को सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय एकता का वाहक मानती है, प्रायः अपनी भाषा में एक प्रकार की दृढ़ता और आक्रामकता को वैधता प्रदान करती है। इस धारा के भीतर यह विश्वास गहराई से उपस्थित रहता है कि वह राष्ट्र के हितों की रक्षा कर रही है और इसीलिए विरोध को वह मात्र असहमति के रूप में नहीं बल्कि संभावित खतरे के रूप में देखती है। जब विरोध को खतरे के रूप में देखा जाता है तो भाषा में कठोरता स्वाभाविक हो जाती है। ऐसे में “देशद्रोह”, “राष्ट्र-विरोधी” जैसे शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं रह जाते बल्कि आरोप बन जाते हैं जो संवाद की संभावना को सीमित कर देते हैं।

इसके विपरीत, उदार-लोकतांत्रिक या मुख्यधारा विपक्ष की भाषा परंपरागत रूप से संयमित मानी जाती रही है किंतु बदलते समय में यह संयम भी कई बार टूटता दिखाई देता है। जब यह धारा स्वयं को लोकतांत्रिक मूल्यों की संरक्षक के रूप में प्रस्तुत करती है तब उससे अपेक्षा भी अधिक होती है कि वह अपनी भाषा में उस गरिमा को बनाए रखे। परंतु जब यह अपेक्षा पूरी नहीं होती और भाषा में व्यंग्य, कटाक्ष या व्यक्तिगत आक्षेप बढ़ते हैं तब यह विरोधाभास और अधिक स्पष्ट हो जाता है। इससे न केवल उस धारा की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं बल्कि संपूर्ण राजनीतिक विमर्श की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।

वामपंथी धारा का अपना एक वैचारिक ढाँचा है, जिसमें वर्ग, शोषण और सत्ता-संरचना जैसे विचार प्रमुख हैं। यह धारा अपने को सामाजिक न्याय और समानता के पक्ष में खड़ा करती है किंतु जब यह वैचारिक दृढ़ता व्यवहार में कठोरता का रूप ले लेती है तब भाषा में भी एक प्रकार की आक्रामकता आ जाती है। “फासीवाद”, “जन-विरोधी”, “पूंजीवादी शोषण” जैसे शब्द जब अत्यधिक प्रयोग में आते हैं तो वे अपने मूल अर्थ खोने लगते हैं और एक सामान्य आरोप की तरह प्रतीत होते हैं। इससे संवाद की गहराई कम होती है और बहस सतही स्तर पर सिमट जाती है।

क्षेत्रीय और पहचान-आधारित राजनीतिक धाराएँ भी इस परिदृश्य का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनका केंद्र अक्सर स्थानीय मुद्दे, जातीय पहचान या भाषाई गौरव होते हैं। इस कारण इनकी भाषा में स्थानीयता का प्रभाव अधिक होता है, जो कई बार सीधेपन और तीखेपन के रूप में सामने आता है। जब यह भाषा राष्ट्रीय मंच पर पहुँचती है तो उसकी तीव्रता और अधिक स्पष्ट हो जाती है। यहाँ भी “हम” और “वे” का विभाजन इतना स्पष्ट होता है कि संवाद की संभावना कम होती जाती है और टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है।

डिजिटल युग ने इस पूरी प्रक्रिया को और अधिक जटिल बना दिया है। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक तो बनाया है परंतु उसे संयमित नहीं रखा। यहाँ हर व्यक्ति को बोलने का अधिकार है परंतु सुनने की बाध्यता नहीं। इस मंच पर भाषा का चुनाव तर्क या संवेदना के आधार पर नहीं बल्कि प्रतिक्रिया के आधार पर होता है। जो वाक्य अधिक उत्तेजक होता है, वही अधिक फैलता है। इस प्रकार भाषा का स्तर धीरे-धीरे गिरता जाता है और अशिष्टता सामान्य प्रतीत होने लगती है।

इन सभी धाराओं के उदाहरणों को यदि एकत्र किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्या किसी एक में नहीं बल्कि एक व्यापक प्रवृत्ति में है। हर धारा अपने विरोधियों के लिए कठोर शब्दों का प्रयोग करती है और अपने पक्ष की भाषा को उचित ठहराती है। यह चयनात्मक दृष्टि समस्या को और गहरा करती है क्योंकि इससे आत्मावलोकन की संभावना कम हो जाती है।

जब तक प्रत्येक धारा अपने भीतर झाँकने की क्षमता विकसित नहीं करेगी।तब तक यह स्थिति बनी रहेगी।
इस पूरे परिदृश्य के पीछे कुछ मूलभूत कारण भी हैं जिन्हें समझना आवश्यक है।

पहला कारण है ~ प्रोत्साहन की व्यवस्था। आज के समय में जो भाषा अधिक उत्तेजक होती है उसे अधिक ध्यान मिलता है। मीडिया, सोशल मीडिया और राजनीतिक मंच—सभी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं।

दूसरा कारण है ~ पहचान की राजनीति, जिसमें व्यक्ति अपने विचारों को अपनी पहचान से जोड़ लेता है और हर असहमति को व्यक्तिगत आक्रमण के रूप में देखने लगता है।

तीसरा कारण है ~ नेतृत्व का प्रभाव, जहाँ शीर्ष स्तर पर जो भाषा अपनाई जाती है, वही नीचे तक फैलती है।

इसके अतिरिक्त, भीड़ का मनोविज्ञान भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब व्यक्ति भीड़ का हिस्सा बनता है तो उसकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी कम हो जाती है। वह ऐसे शब्दों का प्रयोग करने लगता है, जिन्हें वह अकेले में शायद न करे। यह प्रवृत्ति सोशल मीडिया पर विशेष रूप से दिखाई देती है, जहाँ गुमनामी व्यक्ति को और अधिक निर्भीक बना देती है।

समाधान की दिशा में सोचते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह समस्या केवल नैतिक उपदेशों से हल नहीं होगी। इसके लिए व्यवहारिक परिवर्तन की आवश्यकता है। सबसे पहले, भाषा को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं।बल्कि जिम्मेदारी के रूप में देखना होगा। दूसरा, समाज को यह समझना होगा कि शालीनता कमजोरी नहीं बल्कि परिपक्वता का संकेत है। तीसरा, नेतृत्व को अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करना होगा क्योंकि वही सबसे प्रभावी होता है।

यह समस्या सामूहिक है और इसका समाधान भी सामूहिक प्रयास से ही संभव है। जब तक हम इसे किसी एक धारा की समस्या मानते रहेंगे तब तक हम समाधान से दूर रहेंगे। आत्मावलोकन की प्रक्रिया कठिन अवश्य है परंतु वही एकमात्र मार्ग है, जिससे भाषा की गरिमा को पुनः स्थापित किया जा सकता है।

सार्वजनिक जीवन में भाषा का जो पतन दिखाई देता है वह किसी एक धारा की देन नहीं है बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रवृत्ति का परिणाम है। इसे समझने के लिए हमें अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना होगा। तभी हम इस स्थिति का सही मूल्यांकन कर सकेंगे और उसके समाधान की दिशा में सार्थक कदम उठा पाएँगे।


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