सात्विक जीवन का बोध – सुज्ञान मोदी

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Understanding the Satvik Life

sugyan modi

सात्विक जीवन ऐसा जीवन है जिसमें हम सत्य, अहिंसा, त्याग, करुणा, प्रेम, सेवा और जीवदया के माध्यम से अपनी चैतन्य आत्मा के साथ और संपूर्ण जगत के साथ एक होते जाते हैं। सात्विक जीवन एक ऐसी आध्यात्मिक यात्रा है जो हमारे सामाजिक जीवन को व्यावहारिक संतुलन प्रदान करता है। यह हमारे व्यक्तिगत जीवन को आत्मिक सुख, संतोष और शांति से भर देता है। इस तरह यह शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार का आरोग्य सुनिश्चित करता है।

सात्विकता अलग से कोई गच्छ-मत, संप्रदाय या ट्रेंड नहीं है। बल्कि यह मनुष्य के मनुष्य बनने की दिशा में प्रगति का सूचक है चाहे वह मनुष्य धरती के जिस किसी भी हिस्से का हो।

आजकल जिस प्रकार की जहरीली खेती हो रही है वह भी सात्विकता के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा है। विषयुक्त उर्वरक और कीटनाशक रसायनों से भी प्रकृति के जैविक तत्वों के प्रति बहुत हिंसा होती है। वही विष फिर अनाजों, फल-सब्जियों के माध्यम से हमारे शरीर में भी आता है। विषैला भोजन न केवल शारीरिक बीमारियों का कारण बनता है, बल्कि वह हमारे मन को भी विकारी और दूषित बनाता है। इसलिए अहिंसक खेती, ऋषि खेती, प्राकृतिक खेती और जैविक खेती ही शाकाहार को भी सही मायने में सात्विक बना सकती है। श्री पालीवाल जी जैसे सात्विक साथियों का प्रयास इस दिशा में अत्यंत सराहनीय है।

आगे मैं आपसे कुछ व्यावहारिक निवेदन करना चाहूंगा कि सात्विक जीवन जीने के लिए हमें व्यावहारिक रूप से किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

१. सात्विक जीवन के लिए हमें विनम्रता पूर्वक और विचारशील होकर दूसरों की बातों को सुनने का धैर्य सात्विकता का लक्षण है।

२. हम अपने क्षुद्र स्वार्थों से ऊपर उठें और त्याग, समर्पण, उदारता, सेवा जैसे भावों से स्वयं को समाज को समर्पित करें।

३. शांतिपूर्ण समाधान के लिए संवादों में हमें अपनी भाषा का ध्यान रखना है ताकि हमारे सहज मानवीय संबंध खराब न हों। किसी के प्रति व्यक्तिगत आक्षेप, चरित्र-हनन, कटु-वचन अथवा व्यंग्य-उपहास आदि सात्विकता के एकदम प्रतिकूल व्यवहार हैं। प्रेमिल आह्वान से ही विचारों का सम्मानजनक आदान-प्रदान संभव है।

४. सात्विकता के लिए जीवन में हर प्रकार का संयम अनिवार्य है। क्या और कितना देखें, क्या और कितना सुनें, क्या और कितना बोलें, क्या और कितना खाएँ-पीएँ, इस सब पर लगातार नजर रखना आवश्यक है। इच्छाओं-कामनाओं पर नियंत्रण, विकारों पर नियंत्रण भी संयम से ही सधेगा।

५. योग, प्राणायाम, विहार, ध्यान और श्रद्धा-भक्ति से युक्त प्रार्थना भी सात्विक जीवन-चर्या के प्रमुख अंग हैं। श्रद्धा और भक्ति से ही हृदय की सच्ची निर्मलता संभव हो पाती है। सबके मंगल की भावना उत्पन्न होती है।

६. सद्ग्रंथों का नित्य स्वाध्याय भी सात्विक जीवन के लिए आवश्यक है। ऋषियों, बुद्धों, तीर्थंकरों और संतों-सूफ़ियों की वाणी ही सच्चे सात्विक साहित्य हैं जिनसे मनुष्य जीवन को सात्विक दिशा मिल सकती है।

७. दूसरों की सेवा और मदद भी सात्विक जीवन-चर्या का परिचायक है। जितना सामर्थ्य हो उतनी निर्दोष सेवा अवश्य करनी चाहिए। हम समाज के लिए किस प्रकार उपयोगी हो सकते हैं, सदा ऐसा चिंतन करना।

८. नाम, पद-प्रतिष्ठा, प्रचार आदि आसक्ति से मुक्त कर्म ही सात्विक निष्काम कर्म की कोटि में आते हैं। उसी से हमारा अपना और समाज का भला हो सकता है।

९. कृतज्ञता भी सात्विक मनुष्यों का सबसे बड़ा गुण है। हमपर सबका उपकार है। हर क्षण के जीवन के लिए हम प्रकृति और परमात्मा के आभारी हैं। हमें सेवा का अवसर देनेवाले का भी हम्हीं पर उपकार है, ऐसा भाव रखना सात्विकता का लक्षण है।

१०. अपने उद्देश्यों और लक्ष्यों का सतत मूल्यांकन करते रहना। गुणग्रहण और गुणविकास करते हुए आत्मसुधार करते रहना सात्विकता का लक्षण है।

११. संगीत और कला संबंधी रुचियों का परिष्कार करते रहना ताकि हम उसी प्रकार के संगीत और कला से जुड़ें जिससे अपना आत्मोत्थान हो सके और सबका नैतिक, चारित्रिक विकास हो सके।

१२. प्रकृति के साथ जुड़ाव भी सात्विकता का लक्षण है। पर्यावरण के रक्षण की भावना भी सात्विकता का लक्षण है।

१३. जीवन में अनिश्चितता को स्वीकार करके चलना भी सात्विकता का लक्षण है। जीवन में सात्विकता से हम दुःख में पड़ने पर उद्विग्न नहीं होते हैं और न सुख में ज्यादा स्वच्छंदतापूर्ण आचरण करते हैं।

१४. कुसंग त्याग और सत्संग का आश्रय लेना भी सात्विक जीवन-चर्या का अनिवार्य अंग है। संतों की वाणी का नित्य श्रवण, मनन और अनुशीलन-परिशीलन सात्विक जीवन-चर्या के लिए अत्यंत आवश्यक है।

१५. सदा ही सकारात्मक भाव से भरे रहना। निराशा की जगह आशा, संदेह की जगह विश्वास, यह सब सात्विक जीवन-चर्या के परिचायक हैं।

१६. क्षमाभाव भी सात्विक जीवन-चर्या के पथिकों के लिए अत्यंत आवश्यक है। बीती बातों को बिसारकर सबको क्षमा करना और सबसे क्षमा मांगते हुए आध्यात्मिक बोध के स्तर पर आगे-ही-आगे बढ़ते जाना, यह सात्विकता का लक्षण है।


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