संवाद और संग्राम के बीच हमारी सभ्यता – अरुण कुमार त्रिपाठी

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Our Civilization Between Dialogue and Conflict

Arun Kumar Tripathi

वैसे तो पूरी मानव सभ्यता ही संवाद और संग्राम के बीच उलझी हुई है लेकिन भारत विशेष तौर पर इसका शिकार है। जंतर मंतर आंदोलन के बाद पूरे देश के युवा आंदोलित हैं। वे शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से संतुष्ट नहीं हैं। उन्हें पूरी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव चाहिए। शायद पूरी व्यवस्था में परिवर्तन चाहिए। मौजूदा व्यवस्था में उनका दम घुटने लगा है। विपक्ष संसद में उनके मुद्दों को उठा रहा है। संसद बार बार स्थगित होती रहती है और बीच में सरकार कोई न कोई बिल पास करा रही है। विपक्ष गृहमंत्री अमित शाह से 20 जुलाई को युवाओं पर हुए लाठीचार्ज पर संसद में बयान की मांग कर रहा है। लेकिन राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन के आग्रह के बावजूद गृहमंत्री सदन में आने को तैयार नहीं हैं। वे सारा दिन अपने कार्यालय में बैठते हैं लेकिन सदन का सामना नहीं करना चाहते।

सरकार अपने अहंकार के कक्ष में बंद है। एक नमूना संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजुजू का बयान है। सभापति के अनुरोध के बाद दूसरे दिन उन्होंने कहा, “केंद्रीय मंत्री अमित शाह के नाम से आतंकवादी और अलगाववादी कांपते हैं। वे जब संसद में बोलेंगे तो विपक्ष झेल नहीं पाएगा। विपक्ष सरकार को निर्देश नहीं दे सकता। मंत्रिमंडल की सामूहिक जवाबदेही होती है इसलिए कौन मंत्री बोलेगा इसे सदन के पीठासीन अधिकारी और सरकार मिलकर तय करते हैं।” ऐसा कहते हुए वे विपक्ष को धमका रहे हैं और साथ ही अपने अहंकार का भी प्रदर्शन कर रहे हैं। वे संसदीय लोकतंत्र के उस सिद्धांत की उपेक्षा कर रहे हैं जिसके तहत यह माना गया है कि कार्यपालिका विधायिका के प्रति जवाबदेह है। याद रखना होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने टूजी घोटाले से बने संदेह को दूर करने के लिए एक बार स्वयं लोक लेखा समिति के समक्ष पेश होने की इच्छा जताई थी। प्रेस कांफ्रेंस तो वे समय निकालकर करते ही रहते थे। लेकिन इस सरकार ने कार्यपालिका को संसद, संविधान और न्यायपालिका सभी से ऊपर स्थापित कर दिया है। ऐसा कहते हुए इस सरकार के संसदीय कार्य मंत्री किसी संवाद से अधिक संग्राम के लिए विपक्ष और देश को ललकार रहे हैं।

दूसरी ओर मुंबई के बांद्रा-कुर्ला में नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में आयोजित युवा संवाद कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत साफ कहते हैं , “प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा है। यदि युवा आवाज उठाएं तो उन्हें देशद्रोही न कहो। शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांगें जायज हैं। उनकी मांगें नहीं सुनीं गईं इसलिए वे आंदोलन कर रहे हैं। नई पीढ़ी पिछली पीढ़ी के मुकाबले अधिक ईमानदार है। मैं जेन-जी पर आंख मूंदकर भरोसा करूंगा। वास्तव में आंदोलन भी संवाद का ही एक हिस्सा है।”

क्या यह संघ परिवार और उसकी सलाह से चलने वाली सरकार के भीतर का अंतर्विरोध है जिससे मौजूदा समस्या का समाधान निकलेगा या यह युवाओं के आक्रोश को ठंडा करने और थोड़ा पीछे हटकर हिंदू राष्ट्र के एजेंडा पर काम करने की रणनीति? दोनों चीजें हो सकती हैं लेकिन किसी श्रेष्ठ सभ्यता का अपने नागरिकों से संवाद करने का यह तरीका तो नहीं है।

इस समय संघ परिवार और कॉरपोरेट के नियंत्रण में चलने वाली व्यवस्था के संचालकों की चिंताएं दो तरह की हैं। संघ परिवार की चिंता यह है कि भारतीय संस्कृति के मटमैले जल में डुबोकर वह युवाओं के सारे प्रश्नों को मार क्यों नहीं पाया? जबकि उसके पहले की पीढ़ी को उसने इस तरह डुबोया था कि उसकी नाक से निकलते सांस के बुलबुले ही बचे थे क्योंकि उसने भाषा को मंदिर में कैद कर दिया था। और उसे बोलना बंद कर दिया गया था। चारों ओर एक ही राग था। आरोह में महामानव का विराट विश्वगान और अवरोह में एक संन्यासी की बुलडोजरी कानून व्यवस्था। फिर भी युवा पीढ़ी अपने पिताओं की तरह आज्ञापालक नहीं बन पाई। दूसरी ओर कॉरपोरेट की चिंता यह है कि प्रौद्योगिकी और प्रबंधन से सहज प्रतिभाएं अब कंपनियों के विलासिता से भरे और सरोकारहीन दमघोटूं माहौल से बाहर निकलना चाहती हैं और बायकाट करना चाहती हैं उनके उत्पादों का। 38 करोड़ युवाओं की प्रतिभा का इस्तेमाल तो वे कभी नहीं कर पाएंगे लेकिन इस बाजार को वे हाथ से कैसे जाने दें। वे हतप्रभ हैं कि उन्होंने इस पीढ़ी को धूल मिट्टी से उठाकर एआई के कल्पनालोक तक पहुंचा दिया फिर भी वह विद्रोह क्यों कर रही है। सभी को दबा देने का घमंड रखने वाली सरकार का विश्वास डगमगा रहा है। सूख रहा है संघ द्वारा बनाए कुएं में भरा भारतीय संस्कृति का नकली जल। और छंट रही है कॉरपोरेट की पैकेज प्रधान विलासिता की दुनिया की धुंध।

सवाल यह है कि क्या भारत में युवा पीढ़ी के असंतोष और विद्रोह पर ठीक से बहस हो पाएगी? या फिर वह हाय हाय करते हुए हें, हें करते हुए, हा हा करते हुए बिखर जाएगी? रघुवीर सहाय ने पिछली सदी के सातवें दशक में भारतीय समाज की इसी प्रवृत्ति पर राजनीतिक कटाक्ष करते हुए अपनी प्रसिद्ध कविता एक ‘अधेड़ भारतीय आत्मा’ में लिखा थाः—-
हर संकट भारत में एक गाय होता है
ठीक समय पर ठीक बहस कर नहीं सकती राजनीति
बाद में जहां कहीं से शुरू करो
बीच सड़क पर गोबर कर देता है विचार
इसलिए युवा पीढ़ी के विद्रोही तेवर और तर्कशीलता देखकर जितनी आशा बनती है उतनी ही निराशा पनपती है। मोहन भागवत शायद आक्रोशित कुछ युवाओं का दिल जीतकर उन्हें संवाद की दिखावटी दुनिया में ले जाना चाहते हैं, ताकि बीच सड़क पर राष्ट्रवाद और लोकतंत्र के विचार का गोबर किया जा सके।

क्या आंबेडकर और भगत सिंह के विचारों और गांधी के तरीकों से लैस युवा संघ सरकार और कॉरपोरेट के इस चक्रव्यूह का मुकाबला कर सकेंगे? क्या तेजी से परिणाम चाहने वाले युवा बहुत कुछ छोड़कर उतना समय दे सकेंगे जितना इस लड़ाई के लिए चाहिए? भाषाविद् और समाजवादी बौद्धिक गणेश देवी का कहना है कि यह तीव्र प्रौद्योगिकी का दौर है और पता ही नहीं चलता कि कब देश और दुनिया के किस कोने से परिवर्तन की लहर उठे और बहुत कुछ बदल कर रख दे। भारतीय सभ्यता ने विदेशियों के क्रूर आक्रमण और शासन झेले, उनसे लड़े और पराजित भी किया। लेकिन यह दौर पिछले दौरों से अधिक जटिल और कठिन है। क्योंकि शासन करने वाले, छल कपट और दमन करने वाले अपने ही लोग हैं। ऊपर से उन्होंने भारतीयता और हिंदू धर्म का चोला पहन रखा है। उनकी पीठ पर विदेशी आततायियों का हाथ है लेकिन विदेशी सहायता और समर्थन का आरोप वे दूसरों पर लगा लेते हैं। वे चाहते हैं कि उनकी अपनी सप्लाई लाइन बनी रहे लेकिन बाकी लोगों की कट जाए। एफसीआरए कानून में संशोधन का मकसद यही है।

लेकिन वे भूल रहे हैं कि पिछली पीढ़ी से विद्रोह करने की परंपरा न तो यूरोप से आई है और न ही आज नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश को देखकर पैदा हुई है। वास्तव में यह पौराणिक है। यह मानव सभ्यता के मूल में है। अगर ऐसा न होता तो नचिकेता अपने पिता बाजश्रवा से प्रश्न करते करते यमराज के पास न पहुंच जाता। सच के लिए विद्रोह करने की इसी परंपरा को कुंवर नारायण ने ‘नचिकेता’ नामक कविता में सशक्त ढंग से कहा हैः—
असहमति को अवसर दो
सहिष्णुता को आचरण दो
कि बुद्धि सिर ऊंचा रख सके….
उसे हताश मत करो काइयां तर्कों से हरा-हराकर।
अविनय को स्थापित मत करो,
उपेक्षा से खिन्न न हो जाए कहीं
मनुष्य की साहसिकता।
अमूल्य थाती है यह सबकी
इसे स्वर्ग के लालच में छीन लेने का
किसी को अधिकार नहीं…
आह, तुम नहीं समझते पिता, नहीं समझना चाह रहे,
कि एक-एक शील पाने के लिए
कितनी महान आत्माओं ने कितना कष्ट सहा है….
तुम्हारी दृष्टि में मैं विद्रोही हूं
सत्य, जिसे हम सब इतनी आसानी से
अपनी-अपनी तरफ़ मान लेते हैं, सदैव
विद्रोही सा रहा है ।

यह सब धर्म नहीं- धर्म सामग्री का प्रदर्शन है
अन्न, घृत, पशु, पुरोहित, मैं….
शायद इस निष्ठा में हर सवाल बाधा है
जिसमें मनुष्य नहीं अदृश्य का साझा है
तुम सब चतुर और चमत्कारी
बहुमत यही है- ऐसा ही सब करते
कितनी शक्ति है इस स्थिति में
जिससे भिन्न सोचते ही
मैं विधर्मी हो जाता हूं
मनुष्य स्वर्ग के लालच में
अक्सर उस विवेक तक की बलि दे देता
जिस पर निर्भर करता
जीवन का वरदान लगना
संवाद और संग्राम उसी ने किया है जिसने स्वर्ग का लालच छोड़ा है और माना है विवेक को जीवन का वरदान। चाहे नचिकेता रहे हों या फिर गांधी, आंबेडकर और भगत सिंह हों। उन्होंने न सिर्फ अपने स्थापित रीति रिवाजों और पहले की पीढ़ी से विद्रोह किया बल्कि विवेक की पताका को आसमान तक उठाया। आशा है नई पीढ़ी विद्रोह की उस राह पर दृढ़ता से आगे बढ़ेगी।


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