वासुदेवशरण अग्रवाल : साहित्य में संस्कृति की खोज

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Vasudevsharan Agrawal: The Quest for Culture in Literature

Parichay Das

— परिचय दास —

।। एक ।।

हिंदी आलोचना का इतिहास केवल उन नामों से नहीं बनता जिन्हें इतिहास ने अपने मुख्य पृष्ठ पर जगह दी है। उसके आसपास, उसके पीछे और कभी-कभी उसकी बुनियाद में ऐसे आलोचक भी काम करते रहे हैं जिनकी दृष्टि अपने समय की प्रचलित आलोचना से कहीं अधिक व्यापक थी। वासुदेवशरण अग्रवाल ऐसे ही आलोचक हैं। उन्हें केवल पुरातत्त्ववेत्ता, इतिहासकार, कला-मर्मज्ञ या संस्कृति-चिंतक कह देना उनके व्यक्तित्व के एक बड़े हिस्से को आलोचना के बाहर छोड़ देना है। वस्तुतः वे संस्कृति को पढ़ने वाले ऐसे आलोचक थे जिनके लिए साहित्य संस्कृति से अलग कोई स्वायत्त द्वीप नहीं था।

उनकी आलोचना की सबसे बड़ी विशेषता उसका विस्तार है। वह कविता या गद्य की पंक्तियों से शुरू होकर वहीं समाप्त नहीं हो जाती। उसके पीछे वह समाज है जिसने उस रचना को जन्म दिया, वह लोक है जिसमें उसके प्रतीक बने, वह इतिहास है जिसमें उसकी स्मृतियाँ जमा हुईं, वह कला है जिसमें उसकी आकृतियाँ दिखाई दीं और वह सांस्कृतिक चेतना है जिसमें उसके अर्थ विकसित हुए। इसीलिए वासुदेवशरण अग्रवाल को पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि वे साहित्य की व्याख्या नहीं कर रहे, साहित्य के पीछे खड़ी पूरी सभ्यता को पढ़ने का प्रयत्न कर रहे हैं।

यहीं उनकी आलोचना अपनी विशिष्टता प्राप्त करती है। आधुनिक आलोचना ने साहित्य को समझने के लिए अनेक पद्धतियाँ विकसित कीं, लेकिन वासुदेवशरण अग्रवाल का रास्ता किसी एक पद्धति में बंद नहीं होता। पुरातत्त्व उनके लिए केवल मिट्टी में दबे अवशेषों का विज्ञान नहीं है; कला केवल देखने की वस्तु नहीं है; इतिहास केवल तिथियों और राजवंशों का क्रम नहीं है; लोक केवल मनोरंजन या अतीत की स्मृति नहीं है। ये सब मिलकर उस सांस्कृतिक मनुष्य का निर्माण करते हैं जिसकी अभिव्यक्ति साहित्य में होती है।

उनकी दृष्टि का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष भारतीय परंपरा को देखने का है। परंपरा उनके लिए मृत अतीत नहीं है। वह लगातार वर्तमान में अपना अर्थ बदलती हुई जीवित सत्ता है। इसीलिए वे भारतीय संस्कृति को किसी एक धार्मिक, भाषिक या सामाजिक सूत्र में बाँधकर नहीं देखते। वे उसकी अनेक परतों को एक-दूसरे से जोड़कर समझना चाहते हैं। भारतीय संस्कृति की शक्ति उन्हें उसकी बहुलता, उसकी ग्रहणशीलता और उसकी निरंतरता में दिखाई देती है।

यहाँ उनके आलोचक का विवेक विशेष रूप से दिखाई देता है। वे अतीत के सामने न तो केवल श्रद्धा से खड़े होते हैं और न केवल आधुनिकता के अहंकार से। उनकी दृष्टि में अतीत को समझना वर्तमान को समझने की शर्त है। लेकिन अतीत का अर्थ अतीत में लौट जाना नहीं है। उसके भीतर छिपे सांस्कृतिक अनुभव को पहचानना और उसे वर्तमान की चेतना से जोड़ना ही सार्थक पुनर्पाठ है।

वासुदेवशरण अग्रवाल के यहाँ लोक का महत्त्व इसी कारण बढ़ जाता है। भारतीय संस्कृति को केवल शास्त्रीय ग्रंथों में खोजने की प्रवृत्ति के बरक्स वे लोकजीवन, लोकविश्वास, लोककलाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों की ओर भी देखते हैं। इससे संस्कृति का अर्थ राजाओं, ग्रंथों और अभिजात संस्थाओं से बाहर निकलकर सामान्य मनुष्य के जीवन में फैल जाता है। खेत, उत्सव, प्रतीक, आभूषण, स्थापत्य, मूर्ति, कथा, लोकाचार और दैनिक जीवन की वस्तुएँ भी उनके लिए सांस्कृतिक पाठ बन जाती हैं।

यही उनकी आलोचना की एक बड़ी उपलब्धि है। वे उन चीजों को भी पढ़ने योग्य बना देते हैं जिन्हें सामान्य साहित्यिक आलोचना अक्सर साहित्य के बाहर छोड़ देती है। एक मूर्ति उनके लिए केवल मूर्ति नहीं है; उसके भीतर किसी युग की कल्पना, सौंदर्यबोध और जीवन-दृष्टि छिपी हो सकती है। कोई लोकप्रतीक केवल अंधविश्वास नहीं है; वह सामूहिक स्मृति की कोई गहरी परत बचाए हुए हो सकता है। कोई साहित्यिक बिंब केवल कवि की कल्पना नहीं है; उसकी जड़ें किसी दीर्घ सांस्कृतिक अनुभव में हो सकती हैं।

इस अर्थ में वासुदेवशरण अग्रवाल की आलोचना वस्तुओं के भीतर छिपे मनुष्य की खोज है।

उनकी इसी दृष्टि के कारण कला और साहित्य उनके यहाँ अलग-अलग अनुशासन नहीं रह जाते। भारतीय कला को समझते हुए वे उसके सांस्कृतिक अर्थों तक पहुँचते हैं और साहित्य को पढ़ते हुए उसके कलात्मक तथा सांस्कृतिक स्रोतों की ओर लौटते हैं। यह अंतःविषयता आज बहुत आधुनिक लगती है, जबकि उनके समय में ज्ञान की ऐसी सीमाओं को पार करना सहज नहीं था। आज विश्वविद्यालयों में साहित्य, इतिहास, कला, संस्कृति और लोक-अध्ययन को जोड़ने की बातें बड़े उत्साह से की जाती हैं; वासुदेवशरण अग्रवाल ने इन क्षेत्रों के बीच संवाद की आवश्यकता बहुत पहले अपने काम से प्रमाणित की थी।

उनकी पुस्तक ‘हर्षचरित : एक सांस्कृतिक अध्ययन’ को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। किसी साहित्यिक कृति को केवल उसके कथानक, शैली या लेखक की प्रतिभा तक सीमित न रखकर उसके पूरे सांस्कृतिक परिवेश में पढ़ना उनकी आलोचनात्मक पद्धति का परिचायक है। ‘पाणिनिकालीन भारत’ में भी साहित्यिक और भाषिक सामग्री को इतिहास और संस्कृति के व्यापक संदर्भों में देखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। ‘भारत की मौलिक एकता’ जैसी कृतियों में तो उनका सांस्कृतिक चिंतन और भी स्पष्ट होकर सामने आता है।

लेकिन उनकी आलोचना की शक्ति के साथ उसकी एक सीमा को भी देखना चाहिए। व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि कभी-कभी अत्यधिक व्यापक हो जाने का खतरा रखती है। जब संस्कृति के बहुत दूर-दूर तक फैले हुए सूत्रों को एक साथ जोड़ने की कोशिश होती है, तब व्याख्या में अनुमान का अंश बढ़ सकता है। प्रतीकों के अर्थों की खोज करते समय आलोचक को यह सावधानी रखनी पड़ती है कि वह अपने समय की कल्पना को अतीत पर आरोपित न कर दे। वासुदेवशरण अग्रवाल की आलोचना को आज पढ़ने का एक महत्त्वपूर्ण तरीका यही भी है कि उनकी उपलब्धियों के साथ उनकी पद्धति की सीमाओं को देखा जाए।

लेकिन सीमा और संभावना को अलग-अलग करके देखना आलोचना नहीं है। किसी आलोचक की बड़ी दृष्टि का मूल्य उसकी प्रत्येक स्थापना को अंतिम सत्य मान लेने में नहीं, बल्कि उसके द्वारा खोले गए प्रश्नों को पहचानने में है। वासुदेवशरण अग्रवाल ने हिंदी में संस्कृति को साहित्य के बाहर की कोई सजावटी चीज न मानकर साहित्य की अंतर्धारा के रूप में देखने की संभावना पैदा की।

आज जब संस्कृति शब्द स्वयं बहुत तेजी से राजनीतिक, बाजारी और पहचान-केन्द्रित अर्थों में इस्तेमाल होने लगा है, वासुदेवशरण अग्रवाल को फिर से पढ़ना इसलिए भी आवश्यक है कि उनकी संस्कृति-दृष्टि मनुष्य के जीवन की अनेक परतों से बनती है। संस्कृति केवल स्मारक नहीं है, केवल परंपरा नहीं है, केवल धार्मिक विश्वास नहीं है और केवल राष्ट्रीय गौरव का दूसरा नाम भी नहीं है। वह मनुष्य के जीने, सोचने, बनाने, याद रखने और अर्थ देने की दीर्घ प्रक्रिया है।

इसलिए वासुदेवशरण अग्रवाल की आलोचना का सबसे महत्त्वपूर्ण पाठ शायद यही है कि साहित्य को उसके अकेलेपन में नहीं, उसके संबंधों में पढ़ा जाए। कविता के पीछे लोक को देखा जाए, कथा के पीछे इतिहास को, प्रतीक के पीछे सामूहिक स्मृति को, कला के पीछे जीवन-दृष्टि को और परंपरा के पीछे मनुष्य के निरंतर बदलते अनुभव को।

हिंदी आलोचना ने साहित्य के अनेक पाठ किए हैं, लेकिन संस्कृति को साहित्य के भीतर पढ़ने की जो दृष्टि वासुदेवशरण अग्रवाल ने विकसित की, उसकी पूरी संभावनाओं का उपयोग शायद अभी बाकी है। उनकी असली जगह इसलिए आलोचना के इतिहास में किसी फुटनोट की नहीं, बल्कि उन रास्तों के बीच है जहाँ साहित्य संस्कृति में बदलता है और संस्कृति साहित्य में अपनी स्मृति बचाए रखती है।

शायद इसी कारण वासुदेवशरण अग्रवाल को फिर से पढ़ना अतीत की ओर लौटना नहीं है। यह अपने वर्तमान की उन जड़ों को पहचानना है जिन्हें आधुनिकता की तेज रोशनी में हम अक्सर देख नहीं पाते।

।। दो।।

हिंदी आलोचना में कुछ पुस्तकें ऐसी होती हैं जिन्हें पढ़ते हुए लगता है कि आलोचक किसी रचना की व्याख्या कर रहा है। कुछ पुस्तकें ऐसी होती हैं जिनमें आलोचक स्वयं रचना के भीतर प्रवेश कर जाता है और वहाँ से एक पूरा समय, समाज और मनुष्य बाहर आने लगता है। वासुदेवशरण अग्रवाल की ‘पद्मावत : मूल और संजीवनी व्याख्या’ इसी दूसरी तरह की पुस्तक है। यह केवल जायसी की व्याख्या नहीं है। यह उस मध्यकालीन संसार को फिर से देखने की कोशिश है जिसकी आवाज़ ‘पद्मावत’ में सुरक्षित है।

‘पद्मावत’ को पढ़ना आसान नहीं है। अवधी की भाषा, लोक-प्रयोग, मध्यकालीन सांस्कृतिक संकेत, सूफी प्रतीक-व्यवस्था, भारतीय आख्यान-परंपरा और जायसी की काव्यात्मक कल्पना, सब एक-दूसरे में इस तरह गुंथे हुए हैं कि केवल शब्दार्थ जान लेने से कविता का अर्थ नहीं खुलता। शब्द के पीछे लोक है, लोक के पीछे इतिहास है, इतिहास के पीछे विश्वास है और विश्वास के पीछे मनुष्य की वह आकांक्षा है जिसे कविता अपने प्रतीकों में बचा लेती है।

अग्रवाल की मौलिकता यहीं से शुरू होती है।

वे ‘पद्मावत’ को केवल सूफी प्रेमाख्यान मानकर नहीं पढ़ते। वे उसे एक बहुस्तरीय सांस्कृतिक दस्तावेज की तरह देखते हैं। यही कारण है कि उनकी व्याख्या में किसी अपरिचित शब्द का अर्थ केवल शब्दकोश से नहीं निकलता। वे उसे उस भूगोल, लोकजीवन और सांस्कृतिक व्यवहार में खोजते हैं जिसमें वह शब्द कभी जीवित रहा होगा।

इस दृष्टि से ‘संजीवनी व्याख्या’ नाम भी बहुत अर्थवान हो जाता है। व्याख्या यहाँ केवल कठिन शब्दों को सरल कर देना नहीं है। मृत या लगभग मृत हो चुके सांस्कृतिक संकेतों में फिर से जीवन का संचार करना है।

जायसी के शब्दों को अग्रवाल उस समय के जीवन से जोड़ते हैं। किसी वस्तु का नाम आता है तो उसके पीछे शिल्प दिखाई देने लगता है। किसी वनस्पति का उल्लेख आता है तो उसके साथ लोक-स्मृति और भौगोलिक परिवेश सामने आता है। कोई आभूषण आता है तो उसके पीछे सामाजिक जीवन की आकृति उभरती है। किसी कृषि-पद्धति या घरेलू वस्तु का संकेत मिलता है तो वह मध्यकालीन जनजीवन की ओर जाने वाला रास्ता बन जाता है।

यहीं उनकी आलोचना साहित्येतिहास से अलग होकर संस्कृति-आलोचना बनती है।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह है कि उन्होंने ‘पद्मावत’ को राजमहलों से बाहर निकाला। रत्नसेन, पद्मावती और अलाउद्दीन की कथा के पीछे जो सामान्य मनुष्य है, वह उनके लिए अधिक महत्त्वपूर्ण हो उठता है। किसान, कारीगर, ग्रामीण जीवन, घरेलू वस्तुएँ, लोक-विश्वास, भोजन, वस्त्र, शिल्प और प्रकृति, ये सब कविता की परिधि में नहीं रहते; वे उसके अर्थ का हिस्सा बन जाते हैं।

एक आलोचक के लिए यह मामूली परिवर्तन नहीं है।

साहित्य को केवल कथानक और भावों से पढ़ने पर ‘पद्मावत’ एक प्रेमकथा या आध्यात्मिक रूपक बन सकता था। अग्रवाल उसे जीवन की बहुरंगी संरचना में रख देते हैं। इसलिए उनकी व्याख्या पढ़ते हुए जायसी के शब्दों के साथ-साथ वह संसार भी दिखाई देने लगता है जिसमें वे शब्द पैदा हुए थे।

माता प्रसाद गुप्त ने अग्रवाल की इस विशेषता को पहचानते हुए उनकी व्याख्या को ऐतिहासिक और भाषा-विज्ञानपरक पद्धति की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना था। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इससे जायसी-अध्ययन को बहुत आगे बढ़ाने में सहायता मिली।

लेकिन अग्रवाल की आलोचना की विशेषता केवल यह नहीं कि वे इतिहास और भाषा को साथ लाते हैं। उनका असली काम शब्द के सांस्कृतिक अर्थ को पकड़ना है।

भाषा उनके लिए केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं है। भाषा किसी समाज की स्मृति है। किसी क्षेत्रीय शब्द के भीतर उस क्षेत्र का श्रम, उसकी वस्तुएँ, उसकी प्रकृति और उसका जीवन छिपा हो सकता है। इसीलिए ‘पद्मावत’ की अवधी उनके लिए बाधा नहीं, प्रवेश-द्वार है।

यहाँ एक अद्भुत आलोचनात्मक उलटाव दिखाई देता है। सामान्य पाठक कठिन शब्द देखकर शब्दकोश की ओर जाता है। अग्रवाल कठिन शब्द देखकर समाज की ओर जाते हैं।

यही वह क्षण है जहाँ उनकी आलोचना मौलिक बनती है।

वे पाठ के भीतर से जीवन की ओर जाते हैं और फिर जीवन से वापस पाठ में लौटते हैं। इसलिए उनकी व्याख्या केवल बाहरी सूचनाओं का संग्रह नहीं है। उसका उद्देश्य पाठ के भीतर छिपे अर्थ को अधिक विश्वसनीय बनाना है।

‘पद्मावत’ के संबंध में यह पद्धति विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि जायसी की कविता में प्रकृति, लोकजीवन और प्रतीकात्मकता का गहरा संबंध है। फूलों के नाम केवल फूलों की सूची नहीं हैं। ऋतुएँ केवल समय-सूचक नहीं हैं। जल, वन, पक्षी, सुगंध, वस्त्र, आभूषण और घरेलू जीवन की वस्तुएँ केवल दृश्य-सज्जा नहीं हैं। वे उस जीवन-जगत की संवेदनात्मक संरचना बनाते हैं जिसमें जायसी का काव्य जन्म लेता है।

अग्रवाल इस संसार को फिर से दृश्य बनाने की कोशिश करते हैं।

यहीं उनकी आलोचना में पुरातत्त्व का प्रवेश होता है। पुरातत्त्व उनके लिए मृत वस्तुओं का विज्ञान नहीं रह जाता। मूर्तियाँ, चित्र, स्थापत्य और प्राचीन वस्तुएँ साहित्य के साथ संवाद करने लगती हैं। यदि साहित्य किसी वस्तु का उल्लेख करता है तो पुरातात्त्विक सामग्री उसके दृश्य रूप को समझने में सहायता कर सकती है। इस प्रकार शब्द और वस्तु के बीच एक नया संबंध स्थापित होता है।

यह पद्धति आज हमें बहुत आधुनिक लगती है, क्योंकि आज साहित्य-अध्ययन में अंतर्विषयक दृष्टि की बहुत चर्चा है। लेकिन अग्रवाल ने साहित्य, इतिहास, पुरातत्त्व, कला और लोक-संस्कृति को एक साथ पढ़ने की आवश्यकता बहुत पहले पहचान ली थी।

उनकी मौलिकता का एक दूसरा पक्ष ‘पद्मावत’ के पाठ को लेकर है। वे केवल उपलब्ध पाठ को स्वीकार करके उसकी व्याख्या नहीं करते। हस्तलिखित प्रतियों, पाठांतरों और भाषिक प्रमाणों के आधार पर पाठ को समझने और जहाँ आवश्यक हो वहाँ संशोधित करने का प्रयास करते हैं। बाद के अध्ययनों में भी यह उल्लेख मिलता है कि उन्होंने माता प्रसाद गुप्त और आचार्य रामचंद्र शुक्ल के पाठों से कहीं-कहीं असहमति व्यक्त करते हुए पाठ-संशोधन का अपना उपक्रम किया।

इसका अर्थ है कि उनके लिए आलोचना पाठ के बाद शुरू होने वाली गतिविधि नहीं थी। सही पाठ की खोज स्वयं आलोचना का पहला चरण थी।

यह बात बहुत महत्त्वपूर्ण है।

आज हम आलोचना को प्रायः किसी पहले से तैयार पाठ पर विचार करने की प्रक्रिया मानते हैं। अग्रवाल के यहाँ पाठ स्वयं एक प्रश्न है। शब्द क्या था? उसका सही रूप क्या है? वह किस अर्थ में प्रयुक्त हुआ था? उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि क्या थी? और जब यह सब स्पष्ट होगा तभी काव्य का अर्थ खुलेगा।

इस दृष्टि से ‘संजीवनी व्याख्या’ वास्तव में आलोचना की एक ऐसी पद्धति प्रस्तुत करती है जिसमें पाठालोचन, भाषाविज्ञान, इतिहास, लोक-संस्कृति और काव्य-संवेदना एक-दूसरे से अलग नहीं रहते।

यही कारण है कि इसे केवल टीका कहना कम होगा।

लेकिन यहीं एक प्रश्न भी उठता है। क्या किसी काव्यकृति के हर सांस्कृतिक संकेत को ऐतिहासिक तथ्य की तरह पढ़ा जा सकता है?

नहीं।

और इस सीमा को स्वीकार करना आवश्यक है।

कवि का संसार इतिहास का सीधा दस्तावेज नहीं होता। कविता में कल्पना है, अतिशयोक्ति है, रूपक है, परंपरा से आए हुए रूढ़ बिंब हैं। जायसी जिस वस्तु का उल्लेख करते हैं, उसका होना और उसका वैसा ही होना, जैसा कवि बताते हैं, दो अलग बातें हैं। सांस्कृतिक आलोचना में यह अंतर जितना स्पष्ट रहे, आलोचना उतनी ही विश्वसनीय होगी।

अग्रवाल की पद्धति की यही सबसे बड़ी शक्ति और संभावित जोखिम दोनों है। उनकी खोजी वृत्ति पाठ के आसपास इतना विस्तृत संसार खड़ा कर देती है कि कभी-कभी आलोचक और सांस्कृतिक इतिहासकार के बीच की सीमा धुँधली हो जाती है।

लेकिन यह सीमा उनकी उपलब्धि को नकारती नहीं। बल्कि इससे उनकी आलोचना के मूल्यांकन का सही तरीका मिलता है। उन्हें हर निष्कर्ष के लिए अंतिम प्रमाण मानने के बजाय उस आलोचनात्मक साहस के लिए पढ़ना चाहिए जिसने साहित्य को एक विस्तृत सांस्कृतिक भूगोल में देखने की दृष्टि दी।

‘पद्मावत’ की उनकी व्याख्या का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि वे जायसी को उनके समय से काटकर आधुनिक अर्थों में पुनः परिभाषित नहीं करते। वे पहले उस संसार को समझना चाहते हैं जिसमें जायसी की कविता साँस लेती थी।

यहाँ आलोचक की भूमिका निर्णायक नहीं, अन्वेषक की है।

वह पाठ पर अपना अर्थ थोपने के बजाय पाठ से अर्थ निकालने के लिए उसके चारों ओर घूमता है।

यही उनकी आलोचना का नैतिक विवेक भी है।

जायसी के सूफी संदर्भ को समझते हुए भी अग्रवाल ‘पद्मावत’ को केवल सूफी मत का दस्तावेज नहीं बना देते। भारतीय आख्यान-परंपरा, लोकविश्वास, प्रेम की मानवीय अनुभूति और आध्यात्मिक आकांक्षा, इन सबको वे एक साथ देखने की कोशिश करते हैं। इसीलिए जायसी का प्रेम केवल व्यक्तिगत प्रेम नहीं रहता। उसमें मनुष्य की उस चिरंतन आकांक्षा की छाया दिखाई देती है जो अपने से बड़े किसी अर्थ की तलाश करती है।

यहाँ आलोचक और कवि के बीच एक रोचक संबंध बनता है। जायसी प्रतीक बनाते हैं; अग्रवाल उन प्रतीकों के सांस्कृतिक स्रोत खोजते हैं। जायसी अनुभव को काव्य में बदलते हैं; अग्रवाल उस काव्य के पीछे का जीवन फिर से सामने लाते हैं।

दोनों की रचनात्मकता अलग है, लेकिन दोनों के बीच संवाद है।

इसलिए ‘संजीवनी व्याख्या’ की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह नहीं कि उसने ‘पद्मावत’ को कठिन से सरल बनाया। उसकी उपलब्धि यह है कि उसने ‘पद्मावत’ को छोटा होने से बचाया।

यदि हम उसे केवल प्रेमकथा कहते, वह छोटी हो जाती।

यदि केवल सूफी रूपक कहते, वह छोटी हो जाती।

यदि केवल ऐतिहासिक आख्यान कहते, तब भी वह छोटी हो जाती।

अग्रवाल उसे उसके बहुवचन में पढ़ते हैं। उसमें प्रेम भी है, विरह भी, लोक भी, इतिहास भी, प्रतीक भी, प्रकृति भी, भाषा भी और सांस्कृतिक स्मृति भी।

यही उनकी आलोचना की उदारता है।

और शायद यही वह जगह है जहाँ वासुदेवशरण अग्रवाल हिंदी आलोचना के मुख्य प्रवाह से कुछ अलग खड़े दिखाई देते हैं। वे आलोचना को केवल मूल्यांकन की विधा नहीं मानते। उनके लिए आलोचना का एक काम भूल चुके संसार को फिर से दिखाई देना भी है।

यह विचार आज विशेष महत्त्व रखता है।

हमारे समय में साहित्य का पाठ तेजी से वर्तमान की राजनीतिक और वैचारिक श्रेणियों में किया जाता है। यह आवश्यक भी है, लेकिन पर्याप्त नहीं। किसी पुराने ग्रंथ को आज के प्रश्नों से पढ़ने के साथ यह भी जरूरी है कि हम उसके अपने समय की आवाज़ सुनें। अग्रवाल की ‘पद्मावत’ व्याख्या हमें यही संयम सिखाती है।

पहले पाठ को सुनो।

फिर उसके शब्दों को समझो।

फिर उसके पीछे का लोक खोजो।

फिर उसके सांस्कृतिक संकेतों को पहचानो।

और उसके बाद अपना अर्थ निर्मित करो।

इस क्रम में आलोचना निर्णय सुनाने की सत्ता से निकलकर समझने की कला बन जाती है।

यही कारण है कि ‘पद्मावत : मूल और संजीवनी व्याख्या’ को वासुदेवशरण अग्रवाल की सबसे खास कृतियों में रखना अधिक उचित लगता है। ‘हर्षचरित’ में उनकी संस्कृति-दृष्टि का विराट विस्तार दिखाई देता है, ‘कला और संस्कृति’ में उनका सांस्कृतिक चिंतन अपने स्वतंत्र रूप में सामने आता है, लेकिन ‘पद्मावत’ में उनकी आलोचनात्मक पद्धति काम करती हुई दिखाई देती है।

यहाँ वे केवल संस्कृति के बारे में नहीं बोलते; वे संस्कृति के सहारे एक महान काव्य को पढ़ते हैं।

और यही उन्हें महत्त्वपूर्ण बनाता है।

उनकी आलोचना का नेपथ्य इसलिए भी रोचक है कि वहाँ कोई एक सिद्धांत खड़ा नहीं है। वहाँ एक जिज्ञासु विद्वान है जो शब्द से लोक तक, लोक से इतिहास तक, इतिहास से कला तक और कला से फिर कविता तक जाता है।

आलोचना में इससे अधिक जीवंत यात्रा क्या होगी?

‘पद्मावत’ की संजीवनी व्याख्या को फिर से पढ़ना इसलिए जरूरी है कि वह हमें केवल जायसी की कविता नहीं लौटाती; वह हमें यह भी याद दिलाती है कि किसी महान रचना को समझने के लिए उसके शब्दों के साथ उसके समय की धड़कन भी सुननी पड़ती है।

वासुदेवशरण अग्रवाल की सबसे बड़ी देन शायद यही सुनने की क्षमता है।

उन्होंने ‘पद्मावत’ पर टीका नहीं लिखी।

उन्होंने उसके भीतर छिपे हुए एक युग को फिर से आवाज़ दी।

।। तीन।।

‘हर्षचरित : एक सांस्कृतिक अध्ययन’ में यहाँ वासुदेवशरण अग्रवाल केवल संस्कृति पर विचार नहीं करते, बल्कि एक संस्कृत साहित्यिक कृति को संस्कृति के विराट पाठ में बदल देते हैं।

वासुदेवशरण अग्रवाल की ‘हर्षचरित : एक सांस्कृतिक अध्ययन’ को केवल बाणभट्ट के ‘हर्षचरित’ की व्याख्या मानकर पढ़ना उसके साथ न्याय नहीं होगा। यह पुस्तक मूलतः इस बात की एक बड़ी आलोचनात्मक कोशिश है कि साहित्य को उसके भीतर बंद करके नहीं, उसके चारों ओर फैले हुए जीवन में पढ़ा जाए। बाणभट्ट ने हर्ष का चरित लिखा था; वासुदेवशरण अग्रवाल ने उस चरित के भीतर छिपे हुए एक युग का चरित खोजने की कोशिश की। यही वह बिंदु है जहाँ पुस्तक साहित्य-समीक्षा से संस्कृति-आलोचना में प्रवेश करती है।

‘हर्षचरित’ स्वयं संस्कृत गद्य की एक महत्त्वपूर्ण रचना है और हर्षवर्धन के जीवन से संबद्ध है। लेकिन अग्रवाल के सामने समस्या केवल यह नहीं थी कि बाणभट्ट क्या कहता है। उनकी वास्तविक जिज्ञासा यह थी कि बाणभट्ट जिस संसार में देखता, सोचता और लिखता है, वह संसार कैसा था। इसीलिए वे साहित्यिक पाठ के पीछे इतिहास, कला, स्थापत्य, वेशभूषा, आभूषण, सामाजिक व्यवहार, धार्मिक विश्वास, वनस्पति, पशु-पक्षी, नगर-जीवन और लोकाचार तक पहुँचते हैं। इस तरह ‘हर्षचरित’ उनके लिए एक बंद पुस्तक नहीं रहता; वह एक सभ्यता की खिड़की बन जाता है।

यहीं वासुदेवशरण अग्रवाल की आलोचना अपनी असली शक्ति दिखाती है।

सामान्य साहित्यिक आलोचना प्रायः रचना के भीतर जाती है। वह कथानक, भाषा, शैली, अलंकार, चरित्र और भाव-संरचना को देखती है। अग्रवाल भी इनसे अपरिचित नहीं हैं, लेकिन उनकी जिज्ञासा वहीं समाप्त नहीं होती। वे पूछते हैं कि किसी रचना में प्रयुक्त कोई वस्तु वहाँ आई कहाँ से? कोई वेशभूषा केवल वर्णन की वस्तु है या अपने समय के सामाजिक जीवन का संकेत? कोई आभूषण केवल सौंदर्य का उपकरण है या किसी सांस्कृतिक व्यवहार का प्रमाण? कोई वन-वर्णन केवल काव्यात्मक रमणीयता है या तत्कालीन पर्यावरण और जीवन-संबंध का दस्तावेज?

इस प्रश्नविधि से साहित्य के छोटे-से-छोटे विवरण का महत्त्व बदल जाता है।

बाणभट्ट का वर्णन तब केवल वर्णन नहीं रहता। वह प्रमाण में बदल जाता है। शब्द इतिहास की ओर खुलने लगता है और साहित्यिक बिंब संस्कृति का संकेतक बन जाता है। उपलब्ध सामग्री से यह भी स्पष्ट है कि अग्रवाल ने ‘हर्षचरित’ के वर्णनों को कला और पुरातत्त्वीय सामग्री के साथ मिलाकर देखने का प्रयत्न किया था। उदाहरणतः बाण के किसी वस्त्र-वर्णन को मूर्तिकला में दिखाई देने वाली वेशभूषा से जोड़कर उसके अर्थ को अधिक स्पष्ट किया गया। यही उनकी विशिष्ट अनुसंधान-पद्धति है: साहित्य को दूसरे सांस्कृतिक प्रमाणों के साथ रखकर पढ़ना।

इस दृष्टि से पुस्तक का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान यह है कि वह साहित्य और पुरातत्त्व के बीच एक संवाद स्थापित करती है।

आज ‘अंतर्विषयकता’ शब्द विश्वविद्यालयों में बहुत लोकप्रिय है। अलग-अलग विषयों को एक-दूसरे से जोड़ना आधुनिक बौद्धिक उपलब्धि माना जाता है। लेकिन वासुदेवशरण अग्रवाल ने बहुत पहले यह समझ लिया था कि भारतीय साहित्य की अनेक सामग्री को एक ही अनुशासन में कैद करके समझना संभव नहीं है। संस्कृत साहित्य पढ़ना हो तो इतिहास भी चाहिए, कला का ज्ञान भी, पुरातत्त्व की दृष्टि भी और भारतीय जीवन-परंपराओं की समझ भी। उनके लिए ज्ञान की शाखाएँ अलग-अलग कमरे नहीं हैं जिनके दरवाजे पर ताला लगा हो।

लेकिन इस पुस्तक की असली खूबी केवल सामग्री की बहुलता नहीं है। उसकी गहराई इस बात में है कि अग्रवाल ‘हर्षचरित’ को एक जीवित सांस्कृतिक संसार में पुनर्स्थापित करते हैं।

बाणभट्ट का हर्ष केवल एक राजा नहीं रह जाता। उसके आसपास एक पूरा समाज दिखाई देने लगता है। राजसत्ता के साथ धर्म है, धर्म के साथ लोकाचार है, लोकाचार के साथ उत्सव हैं, उत्सवों के साथ कलाएँ हैं, कलाओं के साथ शिल्प हैं और शिल्प के साथ मनुष्य का दैनिक जीवन है। इस तरह इतिहास ऊपर से नीचे उतरता है। वह केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं रहता, बल्कि मनुष्य के रहने, पहनने, खाने, सजने, यात्रा करने, पूजा करने और कल्पना करने का इतिहास बनने लगता है।

यहीं वासुदेवशरण अग्रवाल की सांस्कृतिक आलोचना अपने समय से आगे दिखाई देती है।

वे संस्कृति को केवल उच्चवर्गीय उपलब्धियों में नहीं खोजते। उनके लिए संस्कृति जीवन की समग्र अभिव्यक्ति है। बाद में ‘कला और संस्कृति’ में वे संस्कृति को मनुष्य के भूत, वर्तमान और भविष्य के जीवन के सर्वांगीण रूप के रूप में देखते हैं और कला को उसके मूर्त जीवन-रूप की अभिव्यक्ति मानते हैं। ‘हर्षचरित’ में इस सांस्कृतिक अवधारणा का व्यावहारिक रूप दिखाई देता है।

अर्थात् संस्कृति उनके लिए संग्रहालय में रखी हुई प्राचीन वस्तुओं का नाम नहीं है। वह मनुष्य के जीवन में सक्रिय अर्थ-व्यवस्था है।

यही कारण है कि उनके यहाँ वस्तुओं का भी अपना इतिहास है।

एक आभूषण हमें केवल सौंदर्य नहीं बताता; वह सामाजिक स्थिति, शिल्प और रुचि की सूचना देता है। एक वस्त्र केवल पहनावा नहीं है; वह जलवायु, तकनीक, सामाजिक व्यवहार और सौंदर्यबोध से जुड़ सकता है। एक स्थापत्य केवल भवन नहीं है; उसमें धार्मिक कल्पना, राजनीतिक शक्ति और सामुदायिक जीवन की छाप होती है। इस प्रकार अग्रवाल की आलोचना वस्तुओं को बोलना सिखाती है।

यह उनकी सबसे मौलिक आलोचनात्मक उपलब्धियों में से एक है।

साहित्य का पाठ अक्सर शब्दों में होता है, लेकिन संस्कृति का पाठ केवल शब्दों में नहीं होता। वह मूर्तियों में भी है, सिक्कों में भी, नगरों की रचना में भी, लोकाचार में भी और लोक-स्मृति में भी। वासुदेवशरण अग्रवाल ने साहित्य को इस विस्तृत पाठ-संसार में पढ़ने का साहस किया।

लेकिन यहाँ उनकी आलोचना से एक असुविधाजनक प्रश्न भी पैदा होता है। जब हम साहित्यिक वर्णन को सांस्कृतिक प्रमाण मानते हैं, तब क्या हर काव्यात्मक विवरण को ऐतिहासिक तथ्य माना जा सकता है?

उत्तर स्पष्टतः नहीं है।

कवि का संसार और इतिहासकार का संसार एक नहीं होता। साहित्य में अतिशयोक्ति होती है, कल्पना होती है, सौंदर्यबोध होता है, परंपरागत रूढ़ियाँ होती हैं। बाणभट्ट का वर्णन अपने आप में प्रत्यक्षदर्शी इतिहास नहीं है। वह एक लेखक की कलात्मक दृष्टि से निर्मित संसार है। इसलिए अग्रवाल की पद्धति की सबसे बड़ी शक्ति के भीतर उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी छिपी है: साहित्य से संस्कृति का पुनर्निर्माण करते समय प्रमाण और कल्पना के बीच की दूरी को लगातार पहचानना पड़ता है।

फिर भी अग्रवाल की महत्ता इस कारण कम नहीं होती। बल्कि यहीं उनकी आलोचना अधिक रोचक हो जाती है। वे हमें यह सिखाते हैं कि साहित्य को प्रमाण की तरह पढ़ना और साहित्य को साहित्य की तरह पढ़ना दो अलग काम हैं; दोनों के बीच संतुलन ही सांस्कृतिक आलोचना को गंभीर बनाता है।

उनकी आलोचना में एक और विशेष बात है: वे वर्तमान को अतीत से जोड़ते हैं। प्राचीन संस्कृति उनके लिए कोई मृत अवशेष नहीं है। वे वर्तमान भारतीय जीवन में उसकी बची हुई रेखाओं को खोजते हैं। यह प्रवृत्ति उनके व्यापक सांस्कृतिक लेखन में भी दिखाई देती है। भारतीय कला के संदर्भ में वे प्राचीन परंपराओं के ऐसे सूत्रों की ओर संकेत करते हैं जो गाँवों और नगरों के जीवन में किसी न किसी रूप में बचे हुए हैं।

इसलिए ‘हर्षचरित : एक सांस्कृतिक अध्ययन’ का असली विषय केवल हर्ष का युग नहीं है। उसका असली विषय है सांस्कृतिक स्मृति।

मनुष्य कितना कुछ भूल जाता है, लेकिन संस्कृति अपने ढंग से याद रखती है। कोई आकृति बची रहती है, कोई अलंकरण बचा रहता है, कोई लोकाचार बचा रहता है, कोई शब्द बचा रहता है, कोई मिथक बचा रहता है। साहित्य उन बिखरी हुई स्मृतियों को एक साथ देखने का अवसर देता है। अग्रवाल इसी स्मृति-संसार के आलोचक हैं।

इस अर्थ में उनका आलोचक एक खोजी की तरह काम करता है। वह रचना को पढ़कर रुकता नहीं, रचना के भीतर से सुराग उठाता है और दूसरे सांस्कृतिक क्षेत्रों में उनकी पुष्टि या विस्तार खोजता है। साहित्य उनके लिए सुरंग का प्रवेश-द्वार है।

यही कारण है कि उनकी आलोचना को केवल ‘ऐतिहासिक आलोचना’ कहना भी पर्याप्त नहीं है।

ऐतिहासिक आलोचना सामान्यतः रचना को उसके काल और परिवेश में रखती है। अग्रवाल उससे आगे जाकर उस परिवेश की भौतिक और सांस्कृतिक संरचना को पुनर्निर्मित करने की कोशिश करते हैं। उनके यहाँ इतिहास केवल कालक्रम नहीं, जीवन-रूप है।

और यहीं उनकी आलोचना में एक प्रकार की सर्जनात्मकता आती है।

वे केवल यह नहीं बताते कि बाणभट्ट ने क्या लिखा। वे उन शब्दों और संकेतों के पीछे एक संसार को दृश्य बनाने लगते हैं। इसलिए उनकी आलोचना पढ़ते हुए कभी-कभी लगता है कि हम किसी संग्रहालय में नहीं, बल्कि एक प्राचीन नगर की गलियों में चल रहे हैं। साहित्य का पाठ दृश्य में बदल जाता है।

यह गुण उन्हें सूखी अकादमिक आलोचना से अलग करता है।

उनकी भाषा में विद्वत्ता है, लेकिन विद्वत्ता का प्रदर्शन नहीं। गूढ़ विषयों को भी सहज ढंग से समझाने की क्षमता उनके लेखन की विशेषता मानी गई है। यह बात महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि सांस्कृतिक अध्ययन का सबसे बड़ा संकट अक्सर उसकी भाषा होती है। ज्ञान बढ़ते-बढ़ते मनुष्य से दूर हो जाता है। अग्रवाल का लेखन कई जगह उस दूरी को कम करता है।

फिर भी आज उन्हें केवल श्रद्धा से पढ़ना उचित नहीं होगा। उनके सांस्कृतिक पुनर्निर्माण में कहीं-कहीं भारतीय अतीत के प्रति गहरा आकर्षण और सांस्कृतिक एकता की खोज इतनी प्रबल हो जाती है कि इतिहास की अंतर्विरोधी शक्तियाँ अपेक्षाकृत पीछे छूट सकती हैं। जाति, लैंगिक असमानता, सत्ता-संबंध और सामाजिक संघर्षों को आज की आलोचनात्मक दृष्टि से और अधिक कठोरता से पूछना आवश्यक होगा।

यही वह जगह है जहाँ आज का पाठक अग्रवाल से संवाद कर सकता है, केवल उनका अनुयायी बनकर नहीं।

उनकी पुस्तक का पुनर्पाठ इसलिए आवश्यक है कि वह हमें दो बातें एक साथ सिखाती है। पहली, साहित्य को उसके सांस्कृतिक संसार से काटकर नहीं पढ़ा जा सकता। दूसरी, संस्कृति का अध्ययन भी केवल गौरव की भाषा में नहीं किया जा सकता। संस्कृति में सुंदरता है तो संघर्ष भी है; स्मृति है तो विस्मृति भी; निरंतरता है तो परिवर्तन भी; रचनात्मकता है तो सत्ता भी।

वासुदेवशरण अग्रवाल की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि उन्होंने साहित्य के आसपास के संसार को आलोचना के योग्य बनाया। उन्होंने कविता और कथा के बाहर पड़े हुए जीवन-सामान को अर्थ दिया। उन्होंने मूर्ति, वस्त्र, आभूषण, लोकाचार, स्थापत्य और पुरातात्त्विक अवशेषों को साहित्यिक संवेदना से जोड़कर देखा। इसीलिए उनकी आलोचना केवल साहित्य की व्याख्या नहीं है; वह एक सभ्यता की पढ़ाई है।

‘हर्षचरित : एक सांस्कृतिक अध्ययन’ को आज पढ़ना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि इससे हिंदी आलोचना के सामने एक भूला हुआ प्रश्न फिर उपस्थित होता है: क्या साहित्य की आलोचना केवल साहित्य की आलोचना है?

वासुदेवशरण अग्रवाल का उत्तर है कि नहीं। साहित्य मनुष्य के जीवन से निकलता है और जीवन की अनेक सांस्कृतिक धाराएँ उसमें आकर मिलती हैं। इसलिए साहित्य को समझना हो तो उसके शब्दों के पीछे छिपी हुई दुनिया को भी पढ़ना होगा।

उनकी आलोचना का नेपथ्य शायद यही है: वे रचना के पीछे खड़ी संस्कृति को सामने लाते हैं और संस्कृति के पीछे छिपे मनुष्य को खोजते हैं।

और इसीलिए ‘हर्षचरित’ उनके हाथ में केवल हर्ष का चरित नहीं रहता। वह एक ऐसे समय का जीवित दस्तावेज बन जाता है जिसमें इतिहास, साहित्य, कला और लोकजीवन एक-दूसरे से अलग नहीं थे।

आज जब ज्ञान के विभागों ने मनुष्य को भी विभागों में बाँट दिया है, वासुदेवशरण अग्रवाल की यह पुस्तक हमें एक पुराने लेकिन जरूरी सत्य की याद दिलाती है: मनुष्य का जीवन विषयों में नहीं बँटा होता; हमने उसे समझने के लिए विषय बनाए हैं।

अग्रवाल की आलोचना उन दीवारों के पार जाती है।

यही उनकी शक्ति है।

और शायद यही उनकी आज की सबसे बड़ी प्रासंगिकता भी।

।। चार ।।

पद्मावत’ को केवल सूफी काव्य मानने से इनकार~

अग्रवाल की सबसे महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक उपलब्धियों में एक यह है कि वे ‘पद्मावत’ को किसी एक व्याख्या में बंद नहीं करते। उसके सूफी आधार को स्वीकार करते हुए भी वे उसे केवल आध्यात्मिक रूपक में नहीं बदल देते।

रत्नसेन, पद्मावती, नागमती, हिरामन, सिंहलद्वीप, चित्तौड़ और अलाउद्दीन, इन सबके भीतर एक साथ लोककथा, प्रेमाख्यान, इतिहास, कल्पना और आध्यात्मिक संकेत काम करते हैं।

यानी अग्रवाल के यहाँ कृति का अर्थ एकमात्र नहीं है। यही बात उनकी आलोचना को आधुनिक बनाती है।

लोक और शास्त्र का अद्भुत मिलन~

‘पद्मावत’ की शक्ति केवल उसकी सूफी परंपरा में नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद लोक आख्यान-तत्वों में भी है।

अग्रवाल इस लोक आधार को गंभीरता से लेते हैं। वे मानो पूछते हैं कि जायसी की कविता केवल किसी दार्शनिक सिद्धांत से नहीं बनी, उसके पीछे सदियों से चलती आ रही कथा-स्मृति भी है।

इससे एक महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक प्रश्न पैदा होता है:

क्या महान साहित्य ऊपर से किसी दर्शन को ग्रहण करता है, या वह पहले से जीवित लोक-स्मृति और अनुभवों को अपने ढंग से रूपांतरित करता है?

अग्रवाल का पाठ दूसरे विकल्प को काफी बल देता है।

जायसी की भाषा को ‘पुरानी भाषा’ न मानकर जीवित भाषा की तरह पढ़ना

यह पक्ष बहुत महत्त्वपूर्ण है।

अग्रवाल के लिए अवधी केवल कठिन शब्दों का संग्रह नहीं। वह एक जीवित सांस्कृतिक संसार की भाषा है।

इसलिए शब्दार्थ की खोज उनके यहाँ सांस्कृतिक खोज बन जाती है। किसी शब्द का अर्थ जानना भर पर्याप्त नहीं; यह देखना भी जरूरी है कि वह शब्द किस वस्तु, व्यवहार, लोकविश्वास या जीवन-प्रसंग से जुड़ा था।

इस दृष्टि से उनकी व्याख्या भाषा-विज्ञान और संस्कृति-विज्ञान के बीच पुल बनाती है।

प्रकृति का पुनर्पाठ~

‘पद्मावत’ में प्रकृति सजावट नहीं है।

वन, पर्वत, समुद्र, ऋतुएँ, पक्षी, पुष्प, जल और वनस्पतियाँ जायसी के काव्य-संसार का हिस्सा हैं। अग्रवाल इन्हें केवल काव्य-सौंदर्य के रूप में नहीं देखते, बल्कि मध्यकालीन मनुष्य की प्रकृति-संबद्ध चेतना के संकेत के रूप में पढ़ते हैं।

यहाँ आज के पाठक के लिए एक नया प्रश्न निकलता है:

क्या आधुनिक मनुष्य ने प्रकृति को जितना जाना है, उतना ही उससे दूर भी हुआ है?

जायसी की प्रकृति और अग्रवाल की व्याख्या को साथ पढ़ने पर यह प्रश्न बहुत सुंदर ढंग से उभर सकता है।

स्त्री की उपस्थिति~

यह पक्ष आज की दृष्टि से फिर से खोलना चाहिए।

पद्मावती और नागमती को केवल प्रेम की पात्रियों या कथा के चरित्रों के रूप में देखना पर्याप्त नहीं। उनके माध्यम से स्त्री की भाव-सत्ता, दांपत्य, विरह, इच्छा, प्रतीक्षा और सामाजिक स्थिति के प्रश्न उठते हैं।

यहाँ अग्रवाल की व्याख्या को आज की स्त्रीवादी आलोचना के साथ रखकर देखा जा सकता है।

यहीं आपकी समीक्षा अधिक मौलिक हो सकती है। प्रश्न यह नहीं कि अग्रवाल ने स्त्री को कैसे पढ़ा, बल्कि यह कि:

उनकी सांस्कृतिक पद्धति से पढ़ी गई ‘पद्मावत’ में आज की आलोचना कौन-से ऐसे स्त्री-अनुभव देख सकती है जो उनके समय की व्याख्या में पूरी तरह सामने नहीं आए?

इतिहास और आख्यान के बीच~

यह सबसे गंभीर प्रश्नों में एक है।

‘पद्मावत’ को ऐतिहासिक दस्तावेज मानना गलत होगा। लेकिन उसमें इतिहास की स्मृति अवश्य है।

अग्रवाल का काम यहाँ दिलचस्प हो जाता है क्योंकि वे साहित्यिक आख्यान और सांस्कृतिक इतिहास के बीच संवाद स्थापित करते हैं।

यानी प्रश्न यह नहीं:

“पद्मावती सचमुच थीं या नहीं?”

बल्कि बड़ा प्रश्न:

“एक समाज ने पद्मावती की कथा की कल्पना क्यों की और उस कथा को इतनी दीर्घ सांस्कृतिक स्मृति क्यों मिली?”

यह प्रश्न ‘आलोचना का नेपथ्य’ के लिए बहुत उपयोगी है।

‘पद्मावत’ में भारतीय और इस्लामी सांस्कृतिक धाराओं का संवाद~

जायसी की काव्यभूमि को केवल हिंदू या केवल इस्लामी सांस्कृतिक ढाँचे में रख देना दोनों ही तरह से अधूरा होगा।

अग्रवाल की व्याख्या में यह संस्कृतियों के संपर्क और रूपांतरण का क्षेत्र बनता है।

सूफी कल्पना, भारतीय आख्यान, लोकभाषा, राजपूती कथा-स्मृति और भारतीय प्रतीक-संसार एक-दूसरे से संवाद करते हैं।

यही वह जगह है जहाँ ‘पद्मावत’ को गंगा-जमुनी संस्कृति जैसे सुविधाजनक सूत्र में सीमित किए बिना अधिक जटिल सांस्कृतिक संवाद के रूप में पढ़ा जा सकता है।

‘संजीवनी व्याख्या’ का अर्थ~

मेरे विचार में इस पर अलग से रुकना चाहिए।

संजीवनी केवल इसलिए नहीं कि कठिन मध्यकालीन पाठ को आधुनिक पाठक के लिए समझने योग्य बना दिया गया।

अग्रवाल मृत शब्दों में जीवन खोजते हैं।

उनका आलोचक जैसे कहता है:

शब्द मरते नहीं, उनके संसार हमसे छूट जाते हैं।

इसलिए व्याख्या उस संसार को वापस बुलाने का काम करती है।

यहीं उनकी आलोचना में एक सुगद्यात्मक आकर्षण भी पैदा होता है। वे सूचनाओं को केवल जमा नहीं करते, उनसे एक सांस्कृतिक दृश्य निर्मित करते हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न: क्या अग्रवाल स्वयं कभी ‘अर्थ’ अधिक नहीं देख लेते?

यहीं आलोचना को थोड़ा कठोर होना चाहिए।

इतिहास, पुरातत्त्व, लोक और प्रतीकों की सहायता से पाठ खोलते-खोलते आलोचक के सामने एक खतरा रहता है कि वह रचना में उतना ही देख ले जितना वह स्वयं देखना चाहता है।

विशेषतः मध्यकालीन प्रतीकों के साथ यह जोखिम बड़ा है।

इसलिए अग्रवाल की महानता को स्वीकार करते हुए यह पूछना भी जरूरी है:

क्या उनकी संस्कृति-दृष्टि कभी-कभी काव्य की बहुअर्थता को अपने सांस्कृतिक अर्थ में व्यवस्थित कर देती है?

यह प्रश्न उनकी आलोचना को श्रद्धांजलि से बचाकर वास्तविक आलोचना बनाएगा।

और सबसे खास पक्ष: आलोचक का अपना ‘भारत’

अंततः ‘पद्मावत’ पर अग्रवाल की व्याख्या पढ़ते हुए केवल जायसी दिखाई नहीं देते। स्वयं वासुदेवशरण अग्रवाल भी दिखाई देते हैं।

वे जिस भारत को खोज रहे हैं, वह केवल राजनीतिक भारत नहीं है। वह लोक, कला, भाषा, शिल्प, प्रकृति, स्मृति और परंपरा से निर्मित सांस्कृतिक भारत है।

इसलिए ‘संजीवनी व्याख्या’ को केवल जायसी की पुस्तक की व्याख्या कहना अधूरा होगा।

यह वासुदेवशरण अग्रवाल की अपनी सांस्कृतिक दृष्टि का भी आत्मप्रकाश है।

और यहीं से आपकी कड़ी का सबसे तीखा निष्कर्ष निकल सकता है:

अग्रवाल ‘पद्मावत’ को जितना खोलते हैं, उतना ही स्वयं भी खुलते जाते हैं।

यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी आलोचनात्मक दिलचस्पी है।

।। पांच।।

वासुदेवशरण अग्रवाल की आलोचना में एक बहुत अलग तरह की जिज्ञासा है। वे कविता में आए किसी शब्द को पढ़कर उसके भावार्थ पर रुकते नहीं। वे पूछते हैं कि यह वस्तु वास्तव में कैसी थी, उसका उपयोग कौन करता था, वह किस सामाजिक जीवन से जुड़ी थी और उस वस्तु के पीछे कौन-सी सांस्कृतिक स्मृति काम कर रही थी।

यहीं वे परंपरागत साहित्यिक आलोचक से अलग हो जाते हैं।

मान लीजिए ‘पद्मावत’ में कोई वस्त्र, आभूषण, शस्त्र, वनस्पति, भवन या घरेलू सामग्री आती है। सामान्य आलोचक उसके काव्यगत प्रयोजन पर बात करेगा। अग्रवाल उस वस्तु को कविता से बाहर निकालकर भारतीय जीवन के किसी बड़े सांस्कृतिक संदर्भ में रख देते हैं।

यह पद्धति मामूली नहीं है।

क्योंकि इससे आलोचना का विषय बदल जाता है। साहित्य में अब केवल मनुष्य और उसके भाव नहीं हैं। मनुष्य के आसपास की वस्तुएँ भी अर्थवान हो जाती हैं।

एक आभूषण स्त्री-सौंदर्य का उपकरण भर नहीं है। वह शिल्प की परंपरा, सामाजिक स्थिति, आर्थिक सामर्थ्य और सौंदर्यबोध का संकेत हो सकता है।

एक वस्त्र केवल शरीर ढकने की चीज नहीं। उसमें जलवायु, तकनीक, व्यापार, सामाजिक प्रतिष्ठा और स्थानीय संस्कृति की सूचना हो सकती है।

एक भवन केवल कथा का दृश्य नहीं। वह सत्ता, धर्म, स्थापत्य-ज्ञान और सामुदायिक जीवन की संरचना बता सकता है।

इस तरह अग्रवाल वस्तु को इतिहास में और इतिहास को साहित्य में वापस ले आते हैं।

यही उनकी आलोचना की मौलिक छलाँग है

यहाँ आलोचना केवल ‘कवि ने क्या कहा’ नहीं पूछती।

वह पूछती है:

कवि जिस संसार को देख रहा था, वह संसार बना कैसे था?

और इससे भी आगे:

उस संसार की वस्तुएँ मनुष्य के अनुभव को कैसे आकार देती थीं?

यहाँ वासुदेवशरण अग्रवाल आधुनिक सांस्कृतिक अध्ययन के कई बाद के प्रश्नों के बहुत निकट दिखाई देते हैं। आज हम वस्तु-संस्कृति, दृश्य-संस्कृति, लोक-स्मृति, भौतिक संस्कृति जैसी अवधारणाओं से परिचित हैं। अग्रवाल के यहाँ इनका कोई आधुनिक शब्दावली वाला सैद्धांतिक ढाँचा नहीं है, लेकिन उनकी कार्य-पद्धति में इसका बीज मौजूद है।

लेकिन यहीं उनकी आलोचना की परीक्षा भी शुरू होती है

अग्रवाल की यह पद्धति जितनी आकर्षक है, उतनी ही जोखिमपूर्ण भी।

यदि साहित्य में किसी वस्तु का वर्णन है, तो यह जरूरी नहीं कि वह वर्णन उस वस्तु की वास्तविक ऐतिहासिक स्थिति का बिल्कुल विश्वसनीय चित्र हो। कवि वस्तु को सुंदर बना सकता है, बढ़ा सकता है, बदल सकता है, प्रतीक बना सकता है।

इसलिए कविता से संस्कृति की ओर जाने वाले आलोचक को हमेशा सावधान रहना चाहिए कि काव्यात्मक कल्पना को ऐतिहासिक तथ्य न बना दे।

यहीं मैं अग्रवाल की पद्धति से एक आलोचनात्मक प्रश्न पूछूँगा:

क्या वस्तु की ऐतिहासिक पहचान कर लेने से उसका काव्यात्मक अर्थ भी निश्चित हो जाता है?

नहीं।

और यही बात उनकी आलोचना को पढ़ते समय याद रखनी चाहिए।

किसी पुष्प की वास्तविक प्रजाति पहचान लेना कविता में उसके सौंदर्यात्मक अर्थ को समाप्त नहीं करता। किसी आभूषण का पुरातात्त्विक नमूना मिल जाना उसके प्रतीकात्मक अर्थ को तय नहीं कर देता। किसी स्थापत्य की ऐतिहासिक जानकारी मिल जाना उसके साहित्यिक दृश्य को पूरी तरह समझ लेना नहीं है।

वस्तु का इतिहास और वस्तु का काव्य, दोनों अलग हैं।

अग्रवाल की शक्ति यह है कि वे दोनों के बीच पुल बनाते हैं। उनकी सीमा यह हो सकती है कि पुल बनाते समय कभी-कभी हमें यह भूलने का खतरा रहता है कि नदी के दोनों किनारे फिर भी अलग हैं।

फिर भी उनका महत्व कहाँ बचता है?

यहीं।

उन्होंने साहित्यिक आलोचना को यह एहसास कराया कि कविता केवल शब्दों से नहीं बनी होती; उसके पीछे वस्तुओं से भरी हुई दुनिया भी होती है।

मनुष्य जिस संसार में रहता है, वह उसके सौंदर्यबोध को बनाता है। वह जो पहनता है, जिस घर में रहता है, जिन चीजों को छूता है, जिन प्रतीकों को देखता है, जिन रास्तों से गुजरता है, जिन वस्तुओं को पवित्र या अपवित्र मानता है, वे सब उसकी कल्पना का हिस्सा बनते हैं।

इसलिए किसी कवि को समझना हो तो उसके शब्दों के साथ उसकी वस्तु-दुनिया को भी समझना होगा।

यही वासुदेवशरण अग्रवाल का वह अलग पक्ष है जिसे हिंदी आलोचना ने उतनी प्रमुखता से नहीं देखा जितनी मिलनी चाहिए थी।

और ‘आलोचना का नेपथ्य’ के लिए इससे एक बहुत सुंदर निष्कर्ष निकलता है:

वासुदेवशरण अग्रवाल ने साहित्य में उन चीजों को भी बोलने की जगह दी जो स्वयं बोल नहीं सकती थीं।

उनके यहाँ मूर्ति बोलती है, वस्त्र बोलता है, आभूषण बोलता है, भवन बोलता है, वनस्पति बोलती है, लोकवस्तु बोलती है।

आलोचक का काम केवल कवि की आवाज़ सुनना नहीं रह जाता।

वह उस संसार की मूक वस्तुओं की आवाज़ भी सुनने लगता है जिसमें कविता पैदा हुई थी।

यही शायद वासुदेवशरण अग्रवाल को केवल संस्कृति-चिंतक नहीं, बल्कि एक मौलिक संस्कृति-आलोचक बनाने वाला सबसे विशिष्ट गुण है।

।। छः।।

उनकी पुस्तक ‘पृथिवी-पुत्र’ इस दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसमें संस्कृति को केवल ग्रंथों, राजाओं, धर्मों और बड़े ऐतिहासिक प्रसंगों से समझने के बजाय धरती और मनुष्य के पारस्परिक संबंध से समझने का प्रयत्न मिलता है। पुस्तक 1949 में प्रकाशित हुई थी और इसके निबंध भूमि, मनुष्य और संस्कृति के संबंध को केंद्र में रखते हैं।

यहाँ अग्रवाल का सबसे अलग प्रश्न है:

संस्कृति पैदा कहाँ होती है?

उनका उत्तर किसी पुस्तकालय में नहीं, भूमि पर खड़े मनुष्य के जीवन में खोजा जा सकता है।

खेती, ऋतु, नदी, वनस्पति, ग्राम, लोकाचार, शिल्प, उत्सव, भोजन, वस्त्र, निवास और श्रम, ये सब उनके लिए संस्कृति के हाशिये की चीजें नहीं हैं। वे संस्कृति की मूल सामग्री हैं।

यहीं वे संस्कृतिवेत्ता से आगे बढ़कर आलोचक बनते हैं।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता: संस्कृति को ‘जीवन’ में वापस लाना

हिंदी में संस्कृति पर लिखते समय एक प्रवृत्ति रही है कि संस्कृति को प्रायः महान ग्रंथों, दार्शनिक विचारों और धार्मिक परंपराओं के माध्यम से देखा जाए। अग्रवाल इस ऊँचाई को छोड़कर नीचे आते हैं, उस मिट्टी तक जिसमें मनुष्य का जीवन चलता है।

उनके लिए गाँव केवल भौगोलिक इकाई नहीं है।

नदी केवल जलधारा नहीं है।

वृक्ष केवल वनस्पति नहीं है।

मिट्टी केवल कृषि की सामग्री नहीं है।

इन सबके साथ मनुष्य ने जो संबंध बनाया है, वही संस्कृति का निर्माण करता है।

इसलिए अग्रवाल की संस्कृति-दृष्टि मूलतः संबंधों की दृष्टि है।

लेकिन यहाँ एक आलोचनात्मक प्रश्न भी उठता है

अग्रवाल संस्कृति में निरंतरता, समन्वय और जीवन-संबंधों को बहुत महत्त्व देते हैं। यह उनकी शक्ति भी है और कहीं-कहीं उनकी सीमा भी।

क्योंकि संस्कृति केवल जोड़ती नहीं, विभाजित भी करती है।

भूमि सबकी हो सकती है, लेकिन भूमि पर अधिकार सबका समान नहीं रहा।

गाँव सामुदायिक जीवन का केंद्र हो सकता है, लेकिन गाँव के भीतर जाति, वर्ग और लैंगिक असमानताएँ भी रही हैं।

लोक-संस्कृति में सामूहिक सौंदर्य है, लेकिन लोकजीवन में संघर्ष भी है।

यदि संस्कृति को केवल उसकी निरंतरता, सौंदर्य और सामंजस्य से देखा जाए, तो उसके भीतर छिपे सत्ता-संबंध और सामाजिक तनाव दिखाई नहीं देते।

यहीं आज के आलोचक को अग्रवाल से थोड़ा आगे जाना पड़ेगा।

फिर भी ‘पृथिवी-पुत्र’ का महत्त्व कम नहीं होता

बल्कि इस आलोचनात्मक दूरी के साथ पढ़ें तो अग्रवाल और अधिक महत्त्वपूर्ण दिखाई देते हैं।

उन्होंने हिंदी संस्कृति-विमर्श को यह समझाने की कोशिश की कि संस्कृति कोई ऊपर से थोपी हुई अमूर्त वस्तु नहीं है।

मनुष्य जिस धरती पर जीता है, उसी के साथ उसके श्रम, स्मृति, विश्वास, कला और सौंदर्यबोध का रिश्ता बनता है।

इसीलिए मुझे लगता है कि ‘पृथिवी-पुत्र’ पर लिखते हुए आपका केंद्रीय वाक्य हो सकता है:

वासुदेवशरण अग्रवाल ने संस्कृति को संग्रहालय से निकालकर मिट्टी में रख दिया।

और आगे आलोचना का असली प्रश्न यह हो:

क्या हम अग्रवाल की धरती तक पहुँचने की दृष्टि को स्वीकार करते हुए उनकी सामंजस्यवादी संस्कृति-दृष्टि से आगे बढ़ सकते हैं?

यही उन्हें आज के समय में फिर से पढ़ने का सबसे सार्थक कारण है।

।। सात ।।

अग्रवाल के लिए कला संस्कृति से अलग कोई स्वायत्त सौंदर्य-वस्तु नहीं है। चित्र, मूर्ति, स्थापत्य, अलंकरण आदि में किसी समाज की जीवन-दृष्टि, धार्मिक चेतना, प्रकृति-बोध और सौंदर्यबोध मूर्त होता है। कला और संस्कृति में उनका यह विचार बहुत स्पष्ट है कि कला संस्कृति का मूर्त रूप है।
यहाँ उनका आलोचक केवल कलाकृति नहीं देखता, उसके पीछे खड़ी सभ्यता को देखता है।

भारतीय कला को केवल ‘प्राचीन कला’ न मानना
अग्रवाल भारतीय कला को संग्रहालय की मृत वस्तुओं की तरह नहीं देखते। उनके लिए किसी मूर्ति, चित्र या स्थापत्य को समझने के लिए उसके पीछे की जीवन-व्यवस्था को समझना आवश्यक है। इस दृष्टि से उनकी कला-आलोचना इतिहास, संस्कृति और सौंदर्यशास्त्र के बीच एक सेतु बनाती है। भारतीय कला इसी व्यापक दृष्टि का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

लोक और शास्त्र के बीच कृत्रिम दीवार को तोड़ना
अग्रवाल की संस्कृति-दृष्टि का एक बड़ा गुण यह है कि वे भारतीय संस्कृति को केवल संस्कृत ग्रंथों या अभिजात परंपराओं में बंद नहीं करते। लोकचित्र, लोकाचार, अलंकरण, घरेलू कलाएँ और ग्राम्य जीवन भी सांस्कृतिक इतिहास के प्रमाण बनते हैं। कला और संस्कृति में अलग-अलग प्रदेशों की लोक अलंकरण-परंपराओं की चर्चा इसका अच्छा उदाहरण है।

वनस्पति और प्रकृति को सांस्कृतिक पाठ की तरह पढ़ना
यह पक्ष विशेष रूप से रोचक है। वृक्ष, फूल, लता, नदी, ऋतु और भूमि उनके यहाँ केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं हैं। मनुष्य ने इनके साथ जो अर्थ-संबंध बनाए हैं, वे संस्कृति का हिस्सा हैं। यानी वे प्रकृति को वनस्पति-विज्ञान से संस्कृति-विज्ञान की ओर ले जाते हैं। साहित्य में किसी वृक्ष का आना उनके लिए केवल दृश्य-सौंदर्य का मामला नहीं रह जाता, उसके पीछे लोकविश्वास, धार्मिक संकेत और जीवनानुभव भी खोजे जा सकते हैं।

वस्तु’ को सांस्कृतिक दस्तावेज बना देना~
यह शायद उनकी सबसे मौलिक पद्धतियों में से एक है। आभूषण, वस्त्र, भवन, औजार, मिट्टी के पात्र, घरेलू वस्तुएँ, शिल्प और स्थापत्य उनके यहाँ बोलने लगते हैं। वे पूछते हैं कि किसी वस्तु का उपयोग कौन करता था, वह कैसे बनी, उसके पीछे कौन-सी तकनीक थी और समाज में उसका क्या अर्थ था।
इससे आलोचना का प्रश्न बदल जाता है: कवि ने क्या लिखा, से आगे बढ़कर कवि जिस संसार में लिख रहा था, वह संसार कैसा था?

संस्कृति को केवल विचार नहीं, जीवन-प्रणाली मानना
अग्रवाल के यहाँ संस्कृति का अर्थ केवल दर्शन, धर्म या साहित्य नहीं है। भोजन, वेशभूषा, निवास, कृषि, शिल्प, उत्सव, लोकाचार, कला और सामाजिक व्यवहार भी संस्कृति के अंग हैं।这 दृष्टि संस्कृति को अमूर्त अवधारणा से निकालकर जीवन की प्रत्यक्ष गतिविधियों में स्थापित करती है। यही कारण है कि उनकी सांस्कृतिक आलोचना में इतिहास और नृविज्ञान जैसी दृष्टियों की पूर्वपीठिका दिखाई देती है, यद्यपि उनकी भाषा आधुनिक अकादमिक पारिभाषिकता वाली नहीं है।

अतीत को वर्तमान की सांस्कृतिक स्मृति से जोड़ना~
अग्रवाल का अतीत केवल अतीत नहीं है। वे पुरानी वस्तुओं, कलाओं, प्रतीकों और परंपराओं में ऐसी सांस्कृतिक स्मृतियाँ खोजते हैं जो बाद के जीवन में भी किसी न किसी रूप में बनी रहती हैं। यहाँ उनकी आलोचना का लक्ष्य पुरातत्त्वीय सूचना देना भर नहीं है। वे यह देखना चाहते हैं कि एक सभ्यता अपनी स्मृति को किन रूपों में बचाकर रखती है।

इन सातों को एक साथ रखें तो अग्रवाल की सांस्कृतिक आलोचना की असली विशेषता सामने आती है:

वे संस्कृति को ग्रंथों में बंद करके नहीं पढ़ते; वे उसे मनुष्य, वस्तु, प्रकृति, कला, लोक और स्मृति के बीच फैला हुआ देखते हैं।

वासुदेवशरण अग्रवाल संस्कृति के आलोचक भर नहीं हैं; वे संस्कृति के ‘पाठ’ को विस्तृत करने वाले आलोचक हैं। उनके यहाँ पढ़ने योग्य केवल कविता और ग्रंथ नहीं, बल्कि मूर्ति, मिट्टी, वृक्ष, वस्त्र, आभूषण, भवन, लोकाचार और स्मृति भी हैं।

यहीं उनकी मौलिकता है। उन्होंने आलोचना से पूछा कि जिस जीवन से साहित्य बनता है, क्या उस पूरे जीवन को पढ़े बिना साहित्य को सचमुच पढ़ा जा सकता है?

।। आठ।।

वासुदेवशरण अग्रवाल की सांस्कृतिक आलोचना संस्कृति को किसी एक शास्त्र, ग्रंथ या विचार-परंपरा में सीमित नहीं करती। उनके लिए संस्कृति मनुष्य के संपूर्ण जीवन का विस्तार है। कला उसका दृश्य रूप है, लोक उसकी जीवित स्मृति, प्रकृति उसका परिवेश, वस्तुएँ उसकी भौतिक अभिव्यक्तियाँ, शिल्प उसके श्रम की साक्षी और परंपरा उसकी दीर्घकालिक स्मृति।

अग्रवाल की मौलिकता इस बात में है कि वे संस्कृति को ऊपर से नीचे की ओर नहीं, बल्कि जीवन के भीतर से पढ़ते हैं। वे मूर्ति के भीतर कलाकार को, वस्त्र के भीतर सामाजिक संरचना को, आभूषण के भीतर सौंदर्यबोध को, वनस्पति के भीतर लोकविश्वास को, स्थापत्य के भीतर जीवन-पद्धति को और लोकाचार के भीतर सामूहिक स्मृति को खोजते हैं। इस तरह उनके लिए संस्कृति कोई जड़ विरासत नहीं, बल्कि मनुष्य और उसके परिवेश के बीच निरंतर बनता हुआ संबंध है।

उनकी आलोचना की दूसरी बड़ी उपलब्धि है लोक और शास्त्र, कला और जीवन, प्रकृति और संस्कृति, वस्तु और विचार के बीच खड़ी कृत्रिम दीवारों को हटाना। वे दिखाते हैं कि किसी सभ्यता को उसके महान ग्रंथों से जितना जाना जा सकता है, उतना ही उसकी छोटी-छोटी वस्तुओं, लोककलाओं, स्थापत्य, रीति-रिवाजों और प्रकृति से उसके संबंधों से भी जाना जा सकता है।

लेकिन उनकी सांस्कृतिक दृष्टि को आज पुनः पढ़ते हुए एक आलोचनात्मक सावधानी भी आवश्यक है। संस्कृति में केवल निरंतरता, समन्वय और सौंदर्य नहीं होते; उसमें संघर्ष, असमानता, बहिष्कार और सत्ता-संबंध भी होते हैं। अग्रवाल की दृष्टि जहाँ सांस्कृतिक एकात्मता को बहुत सुंदर ढंग से पहचानती है, वहाँ आधुनिक आलोचना को उसके भीतर छिपे अंतर्विरोधों को भी सामने लाना होगा।

फिर भी उनकी सबसे बड़ी देन अक्षुण्ण रहती है। उन्होंने आलोचना के सामने ‘पाठ’ का अर्थ ही विस्तृत कर दिया। अब पाठ केवल साहित्यिक रचना नहीं रह जाता; मनुष्य के चारों ओर उपस्थित पूरा सांस्कृतिक संसार पाठ बन जाता है।

शायद वासुदेवशरण अग्रवाल को याद करने का सबसे संक्षिप्त और सार्थक ढंग यही है—

उन्होंने संस्कृति को पुस्तकों से निकालकर जीवन में पढ़ा और जीवन की मूक वस्तुओं को भी इतिहास, कला और साहित्य की भाषा दे दी।

यही उन्हें हिंदी की सांस्कृतिक आलोचना में एक अलग और आज भी प्रासंगिक स्थान देता है।

वासुदेवशरण अग्रवाल की साहित्यिक आलोचना का मूल आग्रह यह नहीं था कि साहित्य को केवल साहित्यिक उपकरणों से समझा जाए बल्कि यह कि रचना के पीछे उपस्थित पूरे सांस्कृतिक संसार को समझे बिना रचना का अर्थ अधूरा रह जाता है।

उनकी साहित्यिक आलोचना में इतिहास, संस्कृति, लोकजीवन, कला, भाषा, प्रकृति और मनुष्य की जीवन-पद्धति एक-दूसरे से जुड़ते हैं। वे साहित्य को उसके समय से काटकर नहीं देखते। किसी रचना में प्रयुक्त शब्द, प्रतीक, बिंब, वस्तु, लोकविश्वास अथवा प्राकृतिक संकेत उनके लिए केवल काव्य-सामग्री नहीं हैं; वे उस युग की जीवन-दृष्टि तक पहुँचने के मार्ग हैं। इसीलिए उनकी आलोचना में साहित्य का सामाजिक और सांस्कृतिक भूगोल लगातार उपस्थित रहता है।

उनकी दूसरी बड़ी विशेषता है साहित्य और संस्कृति के बीच संवाद स्थापित करना। वे साहित्य को संस्कृति का दर्पण मात्र नहीं मानते। साहित्य संस्कृति को सुरक्षित भी रखता है, उसका पुनर्संस्कार भी करता है और कभी-कभी उसके भीतर छिपे अर्थों को नई दृष्टि से सामने भी लाता है। इस दृष्टि से उनकी आलोचना केवल व्याख्या नहीं, सांस्कृतिक पुनर्पाठ है।

उनके यहाँ लोक-संवेदना का महत्त्व भी विशेष है। साहित्यिक परंपरा को केवल अभिजात और शास्त्रीय परंपरा के रूप में न देखकर वे उसके लोकाधारों की खोज करते हैं। इससे साहित्य का इतिहास अधिक विस्तृत और बहुस्तरीय बनता है। साहित्य में उपस्थित जीवन की छोटी-छोटी चीजें भी उनके लिए अर्थवान हो उठती हैं।

भाषा के स्तर पर भी उनका आग्रह महत्त्वपूर्ण है। वे शब्द को केवल शब्दकोशीय अर्थ में नहीं देखते; उसके पीछे छिपे सांस्कृतिक अनुभव को पकड़ना चाहते हैं। किसी पुराने शब्द को समझना उनके लिए उस शब्द से जुड़े जीवन-जगत को समझना भी है। इसलिए उनकी व्याख्या में शब्द से संस्कृति और संस्कृति से साहित्य की ओर जाने की एक विशिष्ट पद्धति दिखाई देती है।

उनकी आलोचना की एक बड़ी उपलब्धि यह भी है कि उन्होंने साहित्यिक आलोचना को अनेक ज्ञान-विधाओं से संवाद कराया, लेकिन उसे केवल शुष्क इतिहास या सूचना-विज्ञान बनने नहीं दिया। उनके यहाँ तथ्य के पीछे अर्थ है और अर्थ के पीछे जीवन। यही कारण है कि उनकी आलोचना में विद्वत्ता के साथ एक सौंदर्यबोध और सांस्कृतिक संवेदना भी बनी रहती है।

फिर भी उनकी साहित्यिक आलोचना को आज की दृष्टि से पढ़ते हुए सावधानी जरूरी है। कभी-कभी संस्कृति की व्यापक खोज साहित्यिक पाठ के अपने सौंदर्यशास्त्र पर भारी पड़ सकती है। प्रतीकों, वस्तुओं और सांस्कृतिक संकेतों की व्याख्या करते हुए आलोचक यदि बहुत दूर चला जाए तो कविता की बहुअर्थी कल्पना को ऐतिहासिक तथ्य समझ लेने का खतरा पैदा होता है। इसलिए अग्रवाल को पढ़ते हुए उनकी पद्धति को अपनाना जितना उपयोगी है, उसकी सीमाओं को पहचानना भी उतना ही आवश्यक है।

फिर भी उनका सबसे बड़ा योगदान यही है कि उन्होंने साहित्य को एक बंद कलात्मक वस्तु के बजाय एक जीवित सांस्कृतिक घटना की तरह पढ़ा। उनके यहाँ कविता के पीछे मनुष्य है, मनुष्य के पीछे समाज है, समाज के पीछे उसकी स्मृति है और उस स्मृति के पीछे एक दीर्घ सांस्कृतिक यात्रा।

इस अर्थ में वासुदेवशरण अग्रवाल की साहित्यिक आलोचना का सार यह है कि उन्होंने साहित्य के अर्थ-क्षेत्र को विस्तृत किया। उन्होंने हमें यह देखने की दृष्टि दी कि किसी रचना को समझना केवल उसके कथ्य, शिल्प और भाषा को समझना नहीं है; उसके पीछे मौजूद जीवन, लोक, प्रकृति, कला, इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति को पढ़ना भी है।

वासुदेवशरण अग्रवाल साहित्य में केवल लिखे हुए को नहीं पढ़ते; वे उस जीवन को भी पढ़ते हैं जो साहित्य में प्रत्यक्षतः लिखा नहीं गया, लेकिन जिसकी छाया हर शब्द, प्रतीक, वस्तु और बिंब के पीछे मौजूद रहती है।


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